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: भ्रकाराक घनर्यामदास जालान गीताप्रेस, गोरखपुर
सं० १९८८ सं ० २०१० प॑ २०१३
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से २००८ तक ३९,२५० न्वा संस्करण १०३१००० दसवां संस्करण ५१०००
कुक ५४५१२५०
श्रीहरिः
निवेदन
-न्ल्य्ञ्व्ल्न्श
भगवान् श्रक्षंकराचार्यके अन्थोमे "विवेकचूडामणि" पक प्रथान श्रन्थ है । यह सुसुश्चु पुर्षोके चयि वडा ही उपयोगी हे । हिन्दी इसके कद अजुवाद् कारित दो चुके है, परम्त॒ उनके दाम अधिक ह 1 सस्ते मूल्यमे प्रेमी पाठकोको यह श्रन्थ निर जाय, श्रथानतः इसी उदेद्यसे गीतात्रेससे यदह प्रक्रादित किया गया डे 1 श्री्ंकराचार्यके उपनिषद्-भाष्य, भगवद्वीता- भाष्य, शरीविष्णुसहखनामके भाष्यका अचुवाद् एवं ङ ओर
भी अनुवाद छपे दँ । विनीत
प्रकाशक
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> ॐॐ
पन्न पुष्प ( + श जिन सन्तत ॒सदृक्ञान-खुधा-खुरसरी बहाई । छेकर तक-बिदशुल वाद्-मर्याद मिरादे ॥ शम-दम-व्याक कराल भाल क्ष-कला छिखकाई । वरःवैराग्य-विभूति-भूति-भूषण सुखदाई ॥ जो सद्घन सुलघन शान्तिघन बवोध-व्योम अविकार है ॥ उन शंकर-मोलि-मणीन्द्रपर ये पच-पुष्प निखार रहै ॥
अनुवादक
[> विषय-सूची
विषय पृष्ठ-संख्या विषय् षृष्ट-संखया १-मंगलाचरण . -** ७ रर्-प्राणके धमं * ३५ २-त्रह्मनिष्ठाका महत्व ८ २३-अंकार ˆ ३६ ३-ज्ञानोपर्न्धिका उपायः ˆ* १० २४-प्रेमकी आत्मार्थ॑ता ˆ-* ३७ ४-अधिकारिनिरूपण `" ` ११ २५-माया-निरूपण * ३७ प्-साघन-चतु्टय -** १२ रद्-रजोगुण ` ३८ &-गुरूपसत्ति ओर प्रदनविधि १५ २७-तमोगुण २९ ७-उपदेर-विधि ** १८ २८-स्च्वगुण " ४१ <-प्रस्न-निरूपण --* २० २९-कारण-शरीर ˆ ४२ ९-रिष्यप्रशंसा -* २१ ३०-अनात्म-निरूपण “ ४२ १०-ख-प्रयतनकी प्रधानता" २१ ३ १-आत्म-निरूपण “ ४३ ११-आत्मज्ञानका महत्व `ˆ २२ ३२-अध्यास " ४६ १२-अपरोक्षानुभवकी ३३-आवरणदयक्ति ओर
आवरयकता ००) विक्षेपशक्ति ४९ १३-प्रदन-विचार ** २५ ई४-बन्धनिरूपण २०९ १४-स्थूल-शरीरका वर्णन `" २६ ३५-आत्मानात्मविवेक ५० १५-विषय-निन्दा * २८, ३६-अन्नमय कोश॒ ˆ" ` ५२ १६-देहासक्तिकी निन्दा ˆ‡” ३० ३७-प्राणमव कोरा --° ५६ १७-स्थूल शरीर --‡ ३१९ ३८-मनोमय कोश ^ ९६ १८-दश इन्द्र्यो --* ३२ ३९-विज्ञानमय कोश ` ६र १९-अन्तःकरणचतुष्टय “ˆ ३२ ०-आत्माकी उपाधिखे २०-पञ्चप्राण -** ३२ असङ्गता “"“ ६३ २१-सृष्षम शरीर --- ३३ ४१-सुक्ति केसे होगी ! ˆ“ ˆ ९४
(अ)
विषय पृष्ठ-संख्या
४२-आत्मज्ञान ही सक्तिका
उपाय है ५६९. ४३-आनन्दमय कोश ˆ ˆ` ६९
४४-आत्मखवरूपविषयक प्ररन ७० ४५-आत्मखरूपनिरूपण ˆ ˆ ˆ ७१ ४६-न्रह्म ओर जगत्की एकता ७५
४७-त्रह्म-निरूपण *** ७८ ४८-मदहावाक्य-विचार ˆ†" ७९ ४९-ब्रह्म-भावना -*" ८२ ५० ~वासना-त्याग 4: ५१-अध्यास-निरास ००० द
५२-अहंपदार्थ-निरूपण ` ˆ` ९५
५ २-अहंकार निन्दा †“* ९७ ५४-क्रिया, चिन्ता ओर
वासनाका त्याग “` १०१ ५६८-प्रमाद-निन्दा ˆ-* १०४ ५६-असत्-परिहार `“ १०६ ५७-आत्मनिष्ठाका विधान ११०
विषय परष्ट-सख्या ५८-अधिष्ठान-निरूपण ˆ ˆ" ११४ ५९-समाधि-निरूपण ˆ ११६ ६०-वेराग्य-निरूपण ˆ“ १२२ ६१-ध्यान-विधि “** १२४ ६२-आत्मदष्टि “ १२६ ६३-प्रपञ्चका वाध “ १३१
६४-आत्म-चिन्तनका विधान १३३ ६प्-द्र्यकी उपेक्षा ˆ“ १३५ ६६-आत्मन्चानका फक ˆ“ १२७ ६७-जीवन्सुक्तिके कक्षण ` -* १३९ ६८-गप्रारव्ध-विचार °`“ १४४ ६९-नानात्व-निषेध -** १५० ७०-आत्मानभवका उपदेश २५१ ७१-बरोधोपरन्वि <
१५४ ७२-उपदेशका उपसंहार ˆ` १६६ ७३-रिष्यकी विदा “ १८२ ७४-अनुत्रन्ध-चतुष्टय ˆ“ १८२ ७५-ग्रनथ-प्रशंसा ˆ १८२
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श्रीदरिः
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नद्दितानि िगन्तानि यस्यानन्दाम्बुिन्दुना । ूर्णानन्दं प्रं वन्दे स्वानन्दे कस्वरूप्णिम् ॥
----+--ॐ>&-- ` मंगलाचरण
सर्ववेदान्तसिद्धान्तगोचरं तमगोचरम् । मोचिन्दं परमानन्दं सद्र प्रणतोऽस्म्यहम् ॥ १ ॥ जो अङ्गय होकर भी सम्पूण वेदान्तके सिद्धान्त-वाक्यसे जाने जाते है, उन परमानन्दलस्ूप सद्ुरुदेव नै प्रणाम करता द्र ।
विवेकचूडामणि ८
ब्रह्मनिष्ठाका मह
जन्तूनां नरजन्म दुरुभमतः पुंस्त्वं ततो विप्रता तखादवेदिकधमंमागेपरता विद्रखमसात्परम् । आत्मानात्मविवेचनं स्वनुभवो ब्रह्मात्मना संसिति- क्तिनो शतकोणजन्मसु कृतेः पुण्येन भ्यते ॥ २॥ जीवोको प्रथम तो नरजन्म ही दुर्म है, उससे भी पुरुषल ओर उससे भी ब्राह्मणत्वका मिठ्ना कठिन है; ब्राह्मण होनेसे भी वैदिक धर्मका अनुगामी होना ओर उससे भी विद्रत्ताका होना कठिन है । [ यह सव कुछ होनेपर भी ] आत्मा ओर अनात्माका विवेक, सम्यक् अनुभवः ब्रह्मात्मभावसे सिति ओर सुक्ति- ये तो करोडों जन्मोमे किये इए ञ्चभ कमेकि परिपाके बिना प्राप्त हो ही नहीं सकते । `
दल्भ | त्रयमेवेतदेवालुगरहेतुकम् । मरुष्यत्व श्वत महापुरुषसंश्रयः ॥ ३ ॥ भगवल्छपा ही जिनकी प्रापिका कारण है वे मनुष्यत्व, सुसुचुल ८ सुक्तं होनेवी इच्छा ) ओर महान् पुरुपोका सङ्ग ये तीनों ही दुम दै । रुन्ध्वा कथञिनरजन्म दुरुभं तत्रापि पुं्तं॒॑श्ुतिपारद्ेनम् । यः खात्मयुक्तो न॒ यतेत मूटढधी स द्यात्महा सं विनिहन्त्यसदुग्रहात्।। ४
९ जह्यनिष्ठाका महच्च
किसी प्रकार इस दुर्खभ मुष्य-जन्मको पाकर ओर उसमे भी, जिसमे श्रुतिके सिद्धान्तका ज्ञान होता है रेस पुरुपत्र पाकर जो मूटुद्धि अपने आत्माकी सुक्तिके ल्य प्रयत्न नहीं करता; वह निश्चय ही आत्मघाती है; वह असते आस्था रखनेके कारण अपनेको नष्ट करता है ।
इतः को न्वसि मूढात्मा यस्तु स्वाथ प्रमा्यत् | दुरभं मुषं देहं प्राप्य तत्रापि परुषम् ॥ ५॥ दुम मनुष्य-देह ओर उसमे भी पुरुषत्रको पाकर जो खार्थ-साधने प्रमाद करता है, उसते अध्रिक सूट ओर कौन होगा बदन्तु शाक्लाणि यजन्तु देवान् । कुवन्तु कर्माणि भजन्तु देवताः आद्मैक्यबोधेन विना विुक्ति- नं सिध्यति व्रमश्तान्तरेऽपि ॥ ६॥ भले ही कोई शाखोंकी व्याख्या करे, देवताओंका यजन करे, नाना श्युभ कर्म करं अथवा देवताओंको मजं, तयापि जबतक ब्रह्म ओर आ्माकी एकताका बोध नहीं होता तवतक सो ब्रह्माओंके बीत जानेपर भी सुक्ति नहीं हो सकती । अम्रतत्वस नश्चा वित्तेनेत्येव हि श्रातः व्रवीति कमणो शक्तरदेतलं स्फुटं यतः ॥ ७॥ क्योकि (धनसे अमृतलकी आखा नहीं है" यह श्रुति (सुक्ति- का हेतु कम नहीं है, यह बात स्पष्ट बतङाती है ।
विवेक-चूडामणि १०
ज्ञानोपरग्धिका उपाय अतो विभुक्त्य प्रयतेत विद्वान् संन्यस्तबाह्याथंसुखस्प्रहः सन् । सन्तं महान्तं सथुपेत्य देशिकं | तेनोपदिष्टाथसमाहितात्मा ॥ ८ ॥ ।
इसल्यि विद्वान् सम्पू्णं॒॑बाह्य भेोगोकी इच्छा व्याग कर , सन्तरिरोमणि गुरुदेवकी शरण जाकर उनके उपदेश कयि हए विषयमे समाहित होकर मुक्तिके सिये प्रयत करे ।
उद्धरेदात्मनात्मानं मग्नं संसाखारिधो ।
योगारूढत्वमासाद्य सम्यण्दशंननिष्टया ॥ ९ ॥
ओर निरन्तर सत्य वस्तु आत्मके दर्दानमे सित रहता इआ योगारूढ होकर संसार-समुद्रमे इवे इए अपने आत्माका आप ही उद्धार करे ।
संन्यस्य सवंकमाणि भवबन्धविथक्तये ।
यत्यतां पण्डितेधीररात्माभ्यास उपयितेः ॥१०॥
आत्माभ्यासमे तर इए धीर विद्रानोको सम्पूर्णं कर्मोको व्याग कर भव-बन्धनकी निचृत्तिके चयि प्रयत्न करना चाहिये ।
चित्तख शुद्धये कमे न तु वस्तूपलब्धये
वस्तुसिद्विर्विचारेण न ॒किश्चित् कर्मकोटिभिः ॥११॥
कर्मं चित्तकी शद्धिके व्यि ही है, वस्तूपरब्धि ( तत्वदृष्टि ) के ज्य नहीं । वस्तु-सिद्ि तो विचारसे ही होती है, करोड करमेसि कुछ भी नहीं हो सकता ।
१९१ अधिकारिनिरूपण
सञ्यग्विचार्तः सिद्धा रज्युतववधारणा ।
भ्ान््योदितमदहासपंभयदुःखविनाशिनी ॥१२॥
मटीमति विचारसे सिद्र इं रञ्जुतखका निश्चय भ्रमसे उतपन्न इए महान् सर्पमयरूपी दुःखको न करनेवाला होता है ।
अर्थख निश्चयो दो विचारेण हितोक्तितः ।
न स्नानेन नं दानेन प्राणायामशतेन वा ॥१३॥
कल्याणप्रद उक्तियोदरार। विचार करनेसे ही वस्तुका निश्चय होता देखा जाता है; सान, दान अथवा सैकड़ों प्राणायामोसे नहीं ।
अधिकारिनिरूपण
अधिकारिणमाशास्ते फठसिद्विरविशेषतः ।
उपाया देश्चकारा्याः सन्त्यखिन्सहकारिणः ॥१४॥
विरोषतः अधिकारीको दी फ-सिद्धि होती है; देख, काक आदि उपाय भी उसमे सहायक अवद्य होते है ।
अतो विचारः कतैव्यो जिज्ञासोरात्मवस्तुनः ।
समासाद्य . दयासिन्धुं गुरं व्ह्मविदुत्तमम् ॥१५॥
अतः ब्रह्रेत्ताओंमे श्रेष्ठ दयासागर गुरुदेवकी शरणमे जाकर लिज्ञाघुको आत्म-तत्वका विचार करना चादिये ।
मेधावी पुरुषो विद्रानूहापोहविचक्षणः ।
अधिका्यात्मविद्यायाघुक्तरक्षणरुक्षितः ॥१६॥
विवेकचूडामणि १२ |
जो बुद्धिमान् हो, विद्धान् हो ओर तकै-वितक॑मे ऊुशक हो रेते रक्षणोवाखा पुरुष दी आत्मविद्याका अधिकारी होता है ।
विचेकिनो विरक्तस्य शमादिगुणक्ञाणिनः ।
यक्षो हि बहजिक्ञासायोग्यता मता ॥१७।।
जो सदसद्विवेकी, वैराग्यवान्, राम-दमादि षटूसम्प्तियुक्त ओर सुयुश्चु हो उसीमेब्रहजिज्ञासाकी योग्यता मानी गयी है ।
साधन-चतुष्टय साधनान्यत्र॒ चत्वारि कथितानि मनीषिभिः । येषु सत्स्वेव सन्निष्ठा यदभावे न सिद्धयति ॥१८॥ मनखियोने जिज्ञासाके चार साधन बताये है, उनके होनेसे ही सत्यखरूप आत्मामे सिति हो सकती है, उनके विना नहीं ।
आदौ नित्यानित्यवस्तुबिवेकः परिगण्यते ।
इदायुत्रफरभोगपिरागस्तदनन्तरम् ॥१९॥
शमादिषटुकसम्पततिधु्ुतमिति स्फुटम् ।
पटला साधन नित्यानिव्यस्तु-विवेक गिना जाता है, दूसरा लोकिक एवं पारटोकिक सुख-भोणमे वैरग्यं होना है, तीसरा शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धाः समाधान--ये छः सम्पत्तियां है ओर चौथा सुपुष्षुता दै ।
जहम सत्यं जगन्मि्ये्येवंरूपो विनिश्चयः ॥२०॥
सोऽयं नित्यानित्यवस्तुविवेकः समुदाहृतः ।
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१३ खाधन-चतु्टय श्रह्म सत्य है ओर जगत् मिथ्या हे, ठेखा जो निश्चय है बरही नित्यानिल्य-वस्तु-विवेक कहलाता है । तद्वैराग्यं सगुप्सा या द्ौनश्रवणादिभिः ॥२१॥ देहादि्दमपरयन्ते नित्य भोगवस्तुनि । दसन ओर श्रवणादिके द्वार देहसे लेकर त्रह्मसेकपयन्त सम्पूर्णं अनित्य भोगपदार्थेमि ज वरणाुद्धि है वही चैरण्यः दै । विरज्य धिषयत्रातादोषद्या युष; २२) स्वरक्षये नियतावस्था सनस; अम उच्यते । बारंबार ॒दोष-दषटि करनेसे विपय-समूहसे विरक्त देकर चित्तका अपने ल्यमे स्थिर हयो जाना ही शमः है | विषयेभ्य; प्रावत्य॑ स्थापनं स्वस्वगोखके ॥\२२॥ उभयेषामिन्द्रियणां स दम्; परकीर्तितः । ` बाद्यानारम्बनं वृत्तरेपोपरतिरुत्तमा ॥२४॥ वेन्द्र ओर ज्ञनिन्द्िय दोनोंको उनके विषयोसे खचकर अपने-अपने गोख्कोमे स्थिर करना ष्मः कछाता है । चृत्तिका बाह्य विषयेका आश्रय न लेना यदी उत्तम (उपरति, है । सहनं सर्भदःखानामप्रतीकारपैकम् । विन्ताविकापरदितं सा तितिक्षा निगद्यते ॥ २५५॥ चिन्ता ओर शोकसे रहित होकर विना को$ प्रतिकार क्रिये सन प्रकारके कका सहन करना (तितिक्षा कहती है ।
विवेकचूडामणि १४ |
शाकस्य गुरुवाक्यस्य सत्यनुद्धयववारणप्रू | सा श्रद्धा कथिता सद्भिर्यया वस्तुपलस्यते ।२६॥ शाख ओर ॒गुरुवाक्योमे सत्य वुद्धि करना- इसीको सज्जनोने श्रद्धाः कहा है, जिससे कि वस्तुकी प्राति होती है । सवेदा स्थापनं बुद्धः शद्धे ब्रह्मणि सर्वथा । तत्समाधानमितयुक्तं न तु चित्तस्य लालनम् ॥२७॥ अपनी बुद्धिकी सव प्रकार छुद्धब्रहमे दी सदा सिर रखना इसीको (समाधान कडा है । चित्तकी इच्छपूर्तिका नाम समाधान नहीं है । अहङ्ारादिदेहान्तान्बन्धानज्ञानकल्पितान् | स्वस्वरूपावबोधेन मोक्तमिच्छा शरयुशुता ॥२८॥ अहंकारसे लेकर देहपर्यन्त जितने अज्ञान-कल्पित बन्धन है, उनको अपने स्वरूपे ज्ञानद्वारा व्यागनेकी इच्छा 'ुपु्षुताः है । मन्दमध्यमरूपापि वैरण्येण शमादिना । प्रसादेन गुरोः सेयं प्रबद्धा चयते फलम् ॥२९॥ वह॒ सुमुक्षुता मन्द ओर मध्यम भीहो तोमी वैर्यतथा शमादि षटसम्पत्ति ओर गुरुकृपासे वदकर फक उत्पन्न करती है । वैराय च. समुक्षत तीव्रं यस्य तु विदयते । तसिन्नवाथबन्तः स्युः फलवन्तः शमादयः ॥३०॥ जिस पुरुपम वैराण्य ओर सुमुकुच तीतर होति है, उसीमे शमादि चरितिथं ओर सफल होते है । दतयोमन्दता यत्र॒ विर्त्ु्योः । मरो सलिलवत्त्र॒ शमादेौसमातरता ॥३१॥।
।
१५ गुरूपसत्ति ओर प्रश्चविपव ओर प्रश्चविधि
जँ इन वैराग्य ओर सुपुक्षुलकी मन्दता है, वरहो शमादिका भी मरखस्तै जल-प्रतीतिके समान आभासमात् ही समङ्जना चाहिये । सोक्षकारणससभ्रयां भक्तिरेव ग्रीयसी । स्वसखरूपानुसन्धानं क्तिरित्यभिधीयते ॥३२॥ खात्मत्लालुसन्धानं भक्तिरित्यपरे जगुः। सुक्तिकी कारणूप सामग्रीमे भक्ति दी ससे बढ़कर है ओर अपने वासिक खरूपका अनुसन्धान करना दी (क्तिः कहता है ।
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वो-वो$ ‹स्वातमतखका अयुसन्धान ही भक्ति ट" - रेखा कहते हैं ।
®. £ © गुरूपसत्ति ओरं प्रल्लबिधि उक्तसाधनसम्पनस्त्वनिक्ञसुरास्मनः | ३३॥ उपसीदेद्शुरं प्रज्ञं यशाद्बन्धविसोक्षणप् । उक्त साधन-चतुष्टयसे सम्पन्न आत्त्लका जिज्ञासु पुरुष प्राज्ञ (स्थितप्रज्ञ) गुरुके निकट जायः जिसे उसके भव-वन्धकी निदृत्ि हो । ्रोतरियोऽनरजिनोऽकासहतो यो वहमवि्तमः ।॥२४)) ब्रह्मण्युपरतः शान्तो निरिन्धन इवानलः । अरितुकदथासिन्धुवेन्धुरानमतां सताम् ॥२५॥ तमाराघ्य गुरुं भक्त्या ्रहुप्रभयसेवनेः । प्रसन्नं तमनुप्राप्य प्रच्छेज्जञातव्यमात्मनः ॥२६॥ जो श्रोत्रिय हो, निष्पाप हो, कामनाओंसे शल्य हों, ब्रम वततत श्रेष्ठ हो, ब्रह्मनिष्ठ होः ईैधनरहित अग्निके समान शान्त ह, अकारण दयासिन्धु हं ओर प्रणत ( शरणापनन ) सञ्जनोँवे बन्धु
विवेकचूडामणि १६ |
( हितैषी ) हो, उन गुरुदेवकी विनीत ओर विनम्र सेवासे मक्तिपूरवक आराधना करके, उनके प्रसन्न होनेपर निकट जाकर अपना ज्ञातव्य इस् प्रकार पूे-- खामिननमस्ते नतलोकबन्धो कारुण्यसिन्धो पतितं भवान्धौ । मागुद्धरात्मीयकटाक्षष्टया ऋञ्व्यातिकारुण्यसुधामिवृ्टया ।॥३७॥ हे शरणागतवत्सल, करुणासागर प्रभो | आपको नमस्कार है । संसार-सागरमे पडे हए मेश आप अपनी सरट तथा अतिद्धाय कारुण्यामृतवर्षिणी कृपाकटाक्षसे उद्धार कीजिये । ुर्वारसंसारदवाभ्ितपं दोधूयमानं दुरश््वातेः । भीतं प्रपन्नं परिपाहि मत्योः शरण्यमन्यं यदहं न॒ जाने ॥३८॥ जिससे छुटकारा पाना अति कठिन है उस संसारदावानठसे दग्ध तथा दुमाग्यरूपी प्रबल प्रभञ्जन ( धी ) से अयन्त कम्पित ओर भयभीत इए सुज्ञ शरणागतकी आप मृदयुसे रक्षा कीजिये; क्योकि इस समय मै ओर किसी शरण देनेवाठेको नही जानता । , शान्ता महान्तो निवसन्ति सन्तो बसन्तवरलोकहितं चरन्तः । तीर्णाः स्वयं भीमभवाणंवं जना- नदेतनान्यानपि तारयन्तः ॥२९॥
१७ गुरूपसतति ओर परि ओर प्रश्चविधि
भयंकर संक्षार-सागससे खय उतीर्ण इए ओर अन्य जनको सी विना कारण दही तारते तथा टोकहितका आचरण करते अति शान्त महापुर्प ऋता वसन्तक सपान निवास कते दै । अयं खायः खत णत यत्परः शरसापनोदप्रवणे सहात्मनाम् । सरथाशरेष खयसर्ववकंश-
[क (~
प्रमाभितक्षसवतिं शिति किरु \५०॥
महासाओंका यह खभाव ही दहैकि वे खतः टी दस्रोका श्रम दूर करेन प्रदृत होते ई । सू प्रचण्ड तेजते सन्त पृध्वी तलको चन्द्रदेव खयं दी शान्त कर् देते दें।
रहमानन्दरसालुभृतिकरितिः पूतैः सुशीतेः सिति-
सप्म्ाकरलोञ्छतेः ्रुतिसुसै्कयामृतेः सेचय ।
सन्तप्तं अवतापदघ्दहनय्वारभिरेनं प्रभो
धन्यास्ते मबदीकषणक्षणमतेः पती कृताः खीकृताः \४१॥
हे प्रभो ! प्रचण्ड संसार-दावानल्की उ्वाखसे तपे इए इस दीनशरएणापन्को अप अपने ब्रहमानन्दरसालुमवसे युक्त परमपुनीत, सुशीतठ, निर्मट ओर वाक्रूपी खर्णकट्टासे निकले इए श्रवणदुखद वचनामृतोषे सीचिये [ अभीत इसके तापको शान्त कीनियि] । वे धन्य दै, जो आपके एक हषणकरे करणामय दरिपथकर पात्र होकर अपना च्िग्ये ह ।
कथं तरेयं मवसिन्धुमेतं
का वा गतिम कतमोऽस्त्युपायः । वि° चू° र
विवेकचूडामणि १८
जाने न किष्ित्कृपयाव मां भोः संसारदुःखक्षतिमातनुष्व ॥४२॥ शः इस संसार-समुद्रको केसे तरखगा £ मेरी क्या गति होभी ? उसका क्या उपाय है १ यह भ कुछ नहीं जानता | प्रभो ! कृपया . मेरी रक्षा कीजिये ओर मेरे संसार. ुःखके क्षयका आयोजन कीनिये । = उपदेरा-विधि तथा वदन्तं शरणागतं खं संप्तारदावानतापतपतम् । निरीक्ष्य कारुण्यरसाद्रर्टया दद्यादभीतिं सहस्रा महात्मा ॥४२॥ इस प्रकार कहते हए अपनी शरणमे अये संसारानल संतप्त शिष्यको महात्मा गुरु करुणामयी रृष्टिसे देखकर सहसा अभय प्रदान करे । विद्वान्स तसः उपसत्तिमीयुपे „_ अकष साधु यथोक्तकारिणे । प्रशान्ताचत्ताय शमाच्वताय्र तवोपदेशं कृपयैव दरया ॥५४॥ शरणागतिकी इच्छवाले उस सुसु, आज्ञाकारी, शान्तचित्त, मदमादिसयुक्त साधु िष्यको गुरु कृपया [इप प्रकार] तच्वोपदेशा करे च्रायुरुरूवाच मा भेष्ट॒विदस्तव नास्त्यपायः संसारसिन्धोस्तरणेऽस्त्युपायः
१९. उपदेश्-विधि
येनैव याता यतयोऽख पारं तमेव सां तवं निर्दिं्चामि ॥४५॥ गु-हे विदन् ! त् डरे मत, तेरा नाश नहीं होगा । संसार- सागरसे तरनेका उपाय है । जिस मार्भसे यतिजन इसके पार गये है, वही माग म तुन दिखाता दर | अस्त्युपायो सहान्कधित्संसारभयनाशनः । येन॒ वीत्वा सवाम्भोधिं परमानन्दमाप्यसि ॥४६॥ संसाररूपी भयका नार करनेवाख कोई एक महान् उपाय है जिसके द्वारा तू. संसार-सागरको पार करके परमानन्द प्राप्त करेगा । वेदान्ता्विचारेण नायते ज्ञानयुत्तमम् । तेनात्यन्तिकिसंसारटु;खनाशो भवत्यनु ॥४७॥ वेदान्त-वाक्योके अर्थका विचार करनेसे उत्तम ज्ञान होता है, जिससे फिर संसार-दुःखका आत्यन्तिक नारा हो जाता दै । भ्रद्धामक्तिष्यानयोगान्पुयक्षो- क्तरत्वक्ति साक्षच्छुतेगी; । यो वा एतेष्वेव तिषत्यष्ुष्य मोक्षोऽविद्याकटिपितादरेहबन्धात् ॥४८॥ श्रद्धा, भक्ति, ध्यान ओर योग इनको भगवती श्रुति सुसु्षुकी सुक्तिके साक्षात् दहेतु बतखाती है । जो इन्हीमे सित हो जाता है उसका अवि्ाकत्पित देह-बन्धनसे मोक्ष हो जाता है । अज्ञानयोगात्परमात्मनस्तव ह्यनात्मबन्धस्तत॒ एव॒ सुतिः ।
विवेक-चूडामणि २०
तयोविवेफोदितबोधवहि- (< रक्ञानकाथं प्रदहेत्समूलम् ॥४९॥ तज्ञ परमात्माका अनात्म-बन्धन अङ्ञानके कारण ही है ओर उसीसे तञ्को [ जन्म-मरणरूप ] संसार प्राप्त हआ है । अतः उन ( आत्मा ओर अनात्मा ) के विवेकसे उत्पन्न हुआ बोधरूप अनि अज्ञानके कार्यरूप संसारको मूढसहित भस्म कर देगा ।
प्रभ-निरूपण शिष्य उवाच कृपया श्रयतां खामिन्प्रनोऽयं क्रियते मया । तदुत्तरमह शुत्वा ताथः सखा भवन्मुखात् ॥५०॥ शिष्य-हे खामिन् | कृपया सुनिये; मै यह प्ररन करता ह | इसका उत्तर आपके श्रीमुखसे सुनकर मै कृतार्थं हो जाऊँगा । को नाम बन्धः कथमेष आगतः कथं प्रतिष्ठाय कथं बिमोक्षः काऽसावनात्मा परमः क आत्मा तयोविवेः कथमेतदुच्यताम् ॥५१॥। बन्धन क्या ह £ यह वते हआ £ इसकी सिति वैसे है ओर इसते मोक्ष कते निर सक्ता है £ अनात्मा क्या है ? प्रमाता किसे कहते है £ ओर उनका विवेक के होता है £ कृपया यह सब किये । ।
२१ स-प्रयल्क प्रधानता
शिष्य-्रशंसा श्रीगुख्खूवाच धन्योऽसि कृतद्कत्योऽसि पावितं ते इर तया । यद विद्याबन्धञुक्त्या व्रहमीमवितुमिच्छसि ॥५२॥ गुरु-त्. धन्य है, कृतक्रत्य है, तेरा कुक तुञ्जते पवित्र हो गया, क्योकि त् अक्रियाखूपी बन्धनसे द्रृटकर ब्रह्मभावको ग्राप्त होना चाहता है ।
ख-व्रयलकी प्रधानता ऋणमोचनकर्तारः पितुः सन्ति सुतादयः । बन्धमोचनक्ता तु खसादन्यो न कथन ॥५३॥ । पिताके ऋणको चुकानेवठे तो पुत्रादि भी होते टै, पल्तु भववबन्धनसे च्ुडानेवाखा अपनेसे भिन ओर कोई नहीं है । मस्तकन्यस्तभारादे्टुःखमन्यरनिवार्यते | ्वदादिकृतदुःखं त॒ विना स्वेन न केनचित् ॥५४॥ [ जैसे ] शिरपर रते इए वोञ्ेका दुःख ओर भी दूर कर सकते है, परन्त॒ भूख-प्यास आदिका दुःख अपने सिवा ओर कोई नहीं मिटा सकता । पथ्यमोषधसेवा च क्रियते येन _ रोगिणा। आरोग्यसिद्धिर््टाख नान्यानुष्ठितकमेणा ॥५५॥ अयवा जसे जो रोगी पथ्य ओर ओषधका सेवन करता दै
विवेकचूडामणि २२
उसीको आरोग्य-सिद्वि होती देखी जाती है, किसी ओरके द्वारा किये इए करममेसि को नीरोग नहीं होता वस्तुखरूपं स्फुटबोधचक्षुषा स्वेनेव वेद्यं ननु पण्डितेन | चन्द्रखरूपं निजचक्षुषैव ज्ञातव्यमन्येरवगम्यते किम् ॥५६॥ [ वैसे ही ] विवेकी पुरुषको वस्तुका खरूप भी खयं अपने ्ञाननत्रोसे दी जानना चाहिये, [ किंसी अन्यके द्वारा नहीं ] । चनद्रमाका खरूप अपने ही नेत्रोसे देखा जाता है; दूसरोके द्वार क्या जाना जा सकता है ? अविद्याकामकमौदिपाराबन्धं विमोचितुम् । कः शक्ुयाद्िनात्मानं कटपकोटिङतेरपि ॥५७॥ अवरि्या, कामना ओर कर्मादिके जाख्के बन्धनोको सौ करेड कल्पोंमे भी अपने सिवा ओर कौन खोर सकत है १
आस्मज्ञानका मह
न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो न विधया ।
बरह्मत्मेकत्वबोधेन मोक्षः सिद्धयति नान्यथा ॥५८॥
मोक्ष न योगसे सिद्ध होता है ओर न सास्ते, न कर्मे ओर न विद्यास । वह केवर ब्रहमालमेक्य.बोध ( ब्रहम ओर आत्माकी एकताके ज्ञान ) से ही होता है, ओर किसी प्रकार नहीं|
वीणाया सूपसौन्दर्यं तन््रीवादनसोषठवम् ।
प्रजारञ्जनमात्रं तनन साम्राज्याय कल्यते ॥५९॥
रये आत्मज्ञान महत्व
वाग्वैखरी शब्दञ्च शाद्धव्याख्यानकौशषलपू ।
वैदुष्यं विदुषां तद्ये न॒ त॒ पतये ॥६०॥
जिस प्रकार वीणाका खूप-खावण्य तथा तन्त्रीको वजानेका सुन्दर ठंग मुष्के मनोरञ्जनका ही कारण होता है, उससे कुछ साम्राञ्यकी प्रापि नदीं हो जाती; उसी प्रकार विद्रानोंकी वाणीकी कुराक्ता, शब्दोकी धारावाहिकता, शाल्ल-व्याख्यानकी कुराक्ता ओर विद्रत्ता भोगदहीका कारण हो सकती है, ोक्षका नहीं ।
अधिज्ञाते परे ते शा्लाधीतिस्तु निष्फला ।
विज्ञातेऽपि परे तच्वे शाघ्लाधीतिस्तु निष्फला ॥६१॥
परमतच््वको यदि न जाना तो शाराध्ययन निष्फठ ८ व्यर्थं ) ही है, ओर यदि परमतच्को जान च्य तो भी शाखराध्ययन निष्फल ८ अनावद्यक ) ही है ।
शब्दजालं महारण्यं चित्तभ्रमणक्रारणम् ।
अत्; प्रयटनाजज्ञातव्यं तचज्ञात्तवमात्पनः ॥६२॥
राब्द जाट तो चित्तको भटकानेवाला एक महान् वन दै इसल्यि विन्दं तचज्ञानी महासासे प्रयततपूवक आत्मतल्वको जानना चाहिये ।
अज्ञानसषदष्टखय व्रहमज्ञानौपधं विना।
(र भद (^ र किमोषध (भ
किष वेदे शाघ्रेध किमु मन्त्रः किमोषपेः ॥६३॥
अज्ञानखूपी सपमे ईसे इएको ब्र््ञानरूपी ओषधिके बिना वेदसे, शासे, मन्त्रसे ओर ओषधसे क्या खम ए
विवेकचूडामणि २४
अपरोक्षाचभवकी आदद्यकता
न गच्छति विना पानं व्याधिरोषधशब्दतः ।
विनापरोक्षाुभवं व्रहशब्देनं पच्यते ॥६४॥
ओषधको विना पिये केवर ओषध-राब्दके उचयारणमात्रसे रग नहीं जाता, इसी प्रकार अपरक्षालुभवके विना केवट भ्म ब्रह ह" एेसा कहनेते कोई सुक्त नहीं हो सकता ।
अकृत्वा टदर्यविरुयमङ्ञाता तचमात्मनः ।
बाहमश्दे; इतो खक्तिरक्तिमात्रफरेरणाम् ।६५॥
त्रिना दृदय-प्रपन्नका विटय क्रिये ओर अत्मतसको जाने केवर बाह्य राब्दोसे; जिनका फठ केवर उच्चारणमात्र ही है, मनुष्योकी सुक्ति कैसे हो सकती है
अक्त्वा शघुसंहारमगत्याखिलभूभियम् ।
राजाहमिति शब्दान्नो राजा भवितुमर्हति ॥६६॥
विना राका वध किये ओर विना स॒म्परणप्रथिवीमण्डलका शयं प्रात श्िि, भने राजा दर ेसा कहनेसे ही को$ राजा नहीं हो जाता ।
आपतोक्ति खननं तथोपरिशिलाद्ुककर्पणं खीकृतिं
निक्षेपः समपेक्षते न दि बदिःश्ब्देस्ु निगच्छति ।
तदद् , बक्मविदोपदेशमननष्यानादिभिर्लभ्यते
मायाकायतिरोदेत खममखं तचं न दुयक्तिभिः ॥६७॥
[ पृधिधीमे ग़ इए भनक रा केके स्यि जेसे ] रथम किसी ्िश्चसनीय पुरूषके कथनकी, ओर एर् पृथिवीको सोदे, ककाद्
२५ प्रश्च-विचार
पद्य अष्िको हने तथा [ प्राप्त इए धनको | खीकार करनेकीं आवश्यकता होती है--कोरी वातंसे वह बाहर नहीं निकलता, उसी प्रकार समस्त मायिकः-प्रपञ्चसे शून्य निर्मक आत्मत्व भी ब्रह्मवित् गुरुके उपदेश तथा उसके मनन ओर निदिध्यासनादिसे ही प्राप्त होता है, थोधी वातोंसे नहीं । तसात्सै्रयत्नेन भवबन्धविमुक्तये । ` समरे यत्नः कर्तव्यो रोगादाविव पण्डितैः ॥६८॥! इसय्यि रोग आद्िके समान भव-बन्धकी निवृत्तिके चयि विद्रान्को अपनी सम्पूर्णं शक्ति द्णाकर् खयं ही प्रयत्न करना चाहिये । प्रविचार मृस्त्वयाद्य कृतः ग्रश्चो वरीयाञ्छास्विन्पतः । दत्रप्रायो निगूढार्थो ज्ञातव्यश्च सुषुश्चुभिः ॥६९॥ तूने आज जो प्रन किया है, राघज्ञजन उसको बहत रेष्ठ मानते है । वह प्रायः सूत्रङूप ८ संधिप्त ) है, तो भी गम्भीर अरथयुक्त ओर मुमृक्षुओंके जाननेयोग्य है । शृणुष्यावदितो विद्न्यन्मया समुदीर्यते । तदेतच्छरवणात् सद्यो भववन्धादिमोकष्यसे ।७०॥ हे विद्रन् ! जो मै कडता र साव्रधान होकर सुन; उप्तको सुननेसे त् शीघ्र ही भवव्न्धनपे छ्ुट जायगा । मोक्षख हेतुः प्रथमो निगद्यते वैराग्यमत्यन्तमनित्यवस्तुषु ।
विवेक-चूडामणि २६
ततः शमथापि दमस्तितिक्षा न्यासः प्रसक्ताखिलकरमणां भृशम् ॥७१।। ततः श्रुतिस्तन्मननं सत्- ध्यानं चिरं नित्यनिरन्तरं नेः । ततोऽविकर्पं परमेत्य विद्रा- निदैव निर्वाणसुखं सम्च्छति ॥७२॥ मोक्षका प्रथम हेतु अनित्य वस्तुओंम अत्यन्त वैराग्य होना कहा है, तदनन्तर शम, दम, तितिक्षा ओर समरणं आसक्ियुक्त कर्मोका सर्वथा त्याग है । तदुपरान्त सुनिको श्रवण, मनन ओर चिरकाढ्तक नित्य-निरन्तर आत्मत्का ध्यान करना चाहिये । तब .बह विद्वान् परम ॒निर्विकल्पावस्थाको प्राप्त होकर निर्वाण- सुखको पाता है | यद्वोद्धव्यं तवेदानीमात्मानात्मविकेचनम् । तटुच्यते मया सम्यक् श्रुत्वात्मन्यवधारय ॥७३॥ जो आत्मानात्मविवेक अव तुञ्चे जानना चाहिये वह मेँ सम्ञाता द्रः त् उसे भरीमोंति सुनकर अपने चित्ते सिर कर ।
स्थूल शरीरका वर्णन
(४
मजास्थिमेदःपलरक्तचम- त्वगाहयेधातुभिरे ^ (~
1 त्वगाह्यधतुमिरेभिरन्वितम् ।
वकषा्जघृ्ठम्तके- =.
स सस्ाजगरपयुक्तमेतत् ॥७४॥
अहंममेति प्रथितं शरीरं
ोहासदं समतीते इः
२७ स्थूल शारीरका वणेन षय
मजा, अखि, मेद, मांस, र्त चमं ओर तचा-- इन सात धातुओंसे बने इष् तथा चरण, जंघा, वक्षःस्थक ( छाती )› सुजा, पीठ ओर् मस्तक आदि अङ्गोपाङ्खते युक्तः भे ओर मरा" रूपरस प्रसिद्ध इस मोहे आश्रय देहको विद्वान् लोग, स्थूल ररर कहते हं । नभोनमखदहनाम्बुभूमयः द्ष्माण भूताय भवान्त तानि 11७4 परस्परां मिङितानि भूत्वा स्थूलानि च स्थूलशरीरहेतवः । मात्रास्तदीया विषया भवन्ति शब्दादयः पश्च सुखाय भोक्तुः ॥७६॥ आकारा, वायु, तेज, जल ओर पृथिवी ये सूक्ष्म भूत है । इनके अंश परस्पर मिलनेसे स्थूक होकर स्थूढ रारीरके दैत होते है ओर हन्दंकी तन्मात्रा भोक्ता जीवके मोगरूप खुखके च्य शब्दादि पाँच विषय हो जाती है । य॒ एषु मूढा विषयेषु बद्धा रागोरुपाशेन सुहुदमेन । आयान्ति निर्यान्त्यथ उध्व॑ुचैः खकर्मदूतेन जवेन नीताः ॥७७॥ जो मूढ इन विप्रयोँमे रागरूपी सुद एवं विस्तृत बन्धनसे वैध जति है वे अपने कर्मख्धी दूतके द्वारा वेगसे प्रप्त होकर ` अनेक उत्तमाधम योनिम आते-जते है ।
विवेक-चूडामणि ८
द ॥ [वषय-नन्दा शब्दादिभिः पञ्चभिरेव पश्च पञ्चत्वमापुः सखगुणेन बद्धाः । कुरङ्मातङ्कपतङ्खमीन- भृङ्गा नरः पश्चमिरश्चितः किम् ॥७८॥ अपने-अपने खमभावके अनुसार राब्दादि पोच विषयोमेते केवल एक-एकसे घे हए हरिण, हाथी, पतङ्ग, मच्टी ` ओर भैरे भ्रलु- को प्रात होते दै, फिर इन पौँ चोंपे जकड़ा हुआ मनुष्य कौसे क्च सकता है ? 4 दोषेण तीव्रो बिषयः कृष्णसर्पविषादपि। विषं निहन्ति भोक्तारं द्रष्टारं चक्ुषाप्यथम् ॥७९॥ दोपमे त्रिपय कटे सर्पके विषसे भी अधिक तीव्र है; क्योकि रिप तो खानेवालेको ही मारता है, परन्तु विषय तो ओंँखते देखने- वाठेको भी नहीं छेडते । विषयाशामहापाशाद्यो बिभ्चुक्तः सदुस्त्यजात् । स॒ एव कर्पते सक्त्य नान्यः पट॒शाखवेचपि ॥८०॥ जो त्रिपयोकी आराूप कठिन वन्धने छटा हआ है बही मोक्षका भागी होता है ओर कोई नही; चाहे वह छह दर्शनोका ज्ञाता स्योन हो) आपातवेराग्यवतो घन् भवान्धिपारं॑प्रतियातुमुतान् ।
*२९. विष्य-निन्दा
आश्रहो सज्ञयतेऽन्तरले , विगुद्ध कण्डे बिनिवसव्यं वेगात् ॥८१॥ संसार-सागरको पार करनेके व्यि उदयत र् क्षणिक ्रैराष्यवाले मुमुक्षुओंको अारूपी ग्राह अति बेगसे वीच ही रोककर गला पकड़कर इवो देता है । विषयःख्यग्र्े येन॒ सुविरक्त्यसिना इतः । स॒ गच्छति अवाभ्योधेः पारं प्रत्यूहवरजितः ॥८२॥। जिसने वेराग्यूपी खड्गपे व्रिपयैषणारूपी ग्राहको मार् दिया है वदी निर्विन्न संसार-समुद्रके उस पार जा सक्ता है । बिषसविषयमर्गेगच्छतोऽनच्छबुद्धेः म्रतिपदममियाते स्रलखुर्येषप विद्धि । हितसुजनगुरूक्त्या गच्छतः खस युक्त्या प्रमबति फएरसिद्धिः सत्यमित्येव विद्धि ।८२॥ विषय्धपी विषम मार्गमे चल्नेवाटे मछिनबुद्धिको पद्-पदप् मूलय आती है-रसा जानो । ओर य भी व्ि्छुल ठीक समञ्चो कि हितैषी, सन्न अथवा गुरुके कथनानुस्ार अपनी युक्तिसे चलनेवाटेवो फल-सिद्धि हो ही जाती है । मक्षख काह्वम यदि वै तवास्ति त्यजातिदूराद्विषयान् विषं॑यथा । पीयुपवत्तोपदयक्षमाजव- ्रश्ञान्तिदान्तीर्भज नित्यमादरात् ॥८७॥ यदि तञ्च मोक्षकी इच्छा दै तो विषोको विषके समान दर हीसे व्याग दे । ओर सन्तोष, दया, क्षमा, सरढता, इम ओर दमका अपृतके समान निव्य आदरपर्वक सेवन कर । ॥
विवेक-चूडामणि - इव
देहासक्तिकी निन्दा अनुक्षणं यत्परिहूत्य कृत्य- मना्यविदयाकृतवन्धमोक्षणम् । देहः परार्थोऽयमयुष्य पोषणे यः सजते स॒ खमनेन हन्ति ॥८५॥ जो अनादि अग्रि्याकृत बन्धनको दछुडानारूप अपना कर्सन्य व्यागकर प्रतिक्षण इस परार्थं ( अन्यके भोमग्यरूप ) देहके पोषणे ही र्गा रहता है वह [ अपनी इस प्रद्तिते ] स्वयं अपना धात करता है | शरीरपोषणाथी सन् य आत्मानं दिदृक्षति । ग्राहं दारुधिया धृत्वा नदीं तर्तुं स इच्छति ॥८६॥ जो शरीरपोषणमे खगा रहकर आत्मतच्चको देखना चाहता है वह मानो का्ठ-युद्धिसे ग्राहको पकड़कर नदी पार करना चाहता है । मोह _ एव महामतयुधर्पुरादिषु । मोहो विनिर्जितो येन स ुक्तिपदमर॑ति ॥८७॥ शरीरादिभे मोह रखना ही सुसुध्चुकी बड़ी मारी मोत है; जिसने मोहको जीता है बही सुक्तिपदका अधिकारी है । मोहं जहि महामृत्युं देहदारसुतादिषु । यं जित्वा मनयो यान्ति तद्िष्णोः परमं पदम् ॥८८॥
देहः खी ओर पुत्रादिमें मोहरूप महामृह्युको छोड; जिसको जीतकर मुनिजन भगवानूके उस परपदको प्रात होते है |
३९१ स्थू शरीर
स्थूर शरीर
तरांसरूधिरखाथुमेदोमजाखिसंड्रप् |
पूणं मूत्रपुरीषाभ्यां स्थूरं निन्यमिदं वपुः ॥८९॥
लचा, मांस, रक्त, स्नायु (नस); मेद, मला ओर अस्थियोका समूह तथा मल-मूत्रसे भरा इआ यह स्थूढ देह अति निन्दनीय है ।
पञ्चीकृतेभ्यो भूतेभ्यः स्थूरेभ्यः पू॑कर्भणा ।
खञ्चतन्नमिदं स्थरं भोगायतनमात्मनः ।
अवसा जागरस्तस्य स्थृकार्थालुमवो यतः ॥९०॥
पच्चीकृत स्थूल भूतोसे पूव-कमाजुसार उत्पन्न हआ यह शरीर आत्माका स्थूल भोगायतन है; इसकी [ प्रतीतिकी ] अवस्था जाग्रत् है, जिसमे कि स्थू पदार्थोका अनुभव होता है ।
वादेन्द्रियैः स्थूरपदाथसेवां
सक्चन्दनरू्यादिविचित्ररूपाम् । करोति जीवः खयमेतदातमना तसातपरशस्तिवैपुपोऽख जागरे ॥९१॥
इससे तादात्यको प्राप्त होकर ही जीव माख, चन्दन तथा ली आदि नाना प्रकारके स्थूल पदार्थोको वा्न्द्िथोसे सेवन करता दै, इसघ्यि जाग्रत्-अवय्थामे इस ८ स्थूढ ) देहकी प्रधानता है ।
सर्वोऽपि बाह्यसंसारः पुरुषस्य यदाश्रयः ।
विद्वि देहमिदं स्थूरं गृहवद्गृहमेधिनः ॥९२॥
विवेक-चूडामणि दे 9
जिसके आश्रयते जीवको सम्पूर्ण वाद्य जगत् प्रतीत होता हे, गृहस्थके धरके तुल्य उसे ही स्थूठ देह जानो ।
स्थूरख सस्भवजरामरणानि धर्माः
सोल्यादयो बहुविधाः शि्ुताचवखाः । वणाश्रमादिनियमा बहुधा यमाः स्युः पूजावमानबहुमानयुखा विषाः ॥ ९३२
सथू देहके ही जन्म, जरा, मरण तया स्थूलता आदि धर्म है, बाख्कपन आदि नाना प्रकारकी अवस्थां दै; वर्णश्रमादि- के निमित्तते अनेक प्रकारके नियम ओर यम है; तथा इसकी पूना, मानः, अपमान आदि विशेषतां है ।
दस इन्द्रियो बुद्धीन्द्रियाणि श्रवणं त्वगकषि घराणं च जिह्वा विषयावबोधनात् । वाक्पाणिपादं गुदमप्युपखः कर्मेन्द्रियाणि प्रवणेन कर्मसु ॥९४॥ श्रवणः तचा, नेत्रः घ्राण ओर निहा ये पव ज्ञनेन्धियाँ है, क्योंकि इनसे विषयका ज्ञान होता है; तथा वाक्, पाणि, पाद्, गुदा ओर उपस्थ-ये कर्मन्द है, क्योकि इनका कमोकी ओर् ज्लकाव होता है । अन्त्करणचतुष्टय निगदयतेऽन्तःकरणं मनोधी- रदफृतिथित्तमिति खदटृत्तिभिः ।
कष सक्षम हरीर
मनस्तु सङ्कर्पविकटपनादिभि-
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बुद्धिः पदाथाध्यवसायधंसंतः ॥९५॥ अत्राभिमानादहमित्यहडछतिः
खा्थानुसन्धानयुणेन चित्तप् ।॥९६॥
अपनी वरत्तियोके कारण अन्तःकरण मनः, बुद्धिः चित्त ओर अहङ्कार [ इन चार नामस ] कदा जाता है | सङ्कल्प-विकल्पके कारण मन, पदार्थका निश्चय करनेके कारण बुद्धिः (अहं-अहं' ८ सैम ) रसा अभिमान करनेते अहङ्कार ओर अपना इट-चिन्तनके कारण यह चित्त कहलता है |
पुञ्चप्राण म्राणापानव्यानोदानसमाना भवत्यसौ प्राणः; । खयमेवव्रतिभेदादविकृतिभेद त्सुवर्णसलिकादिवत्।। ९७॥ अपने विकायोके कारण सुघर्ण ओर जर आदिके समान खयं प्राण ही वृत्तिमेदसे प्राण, अपान, व्यान, उदान ओर समान--इन पच नामोवाडा होता है |
सुक्ष्म शरीर वागादिपश्च भ्रवणादिपश्च प्राणादिपश्चाभ्रुलानि पश्च । बद्धयाद्यविद्यापि च काम्कमेणी पुय द्ष्मशरीरमाहुः ॥९८॥ वागादि पाच कर्मद्धिर्यो, श्रवणादि पाँच ज्ञनेन्िया, प्राणादि पाच प्राण, आकाशादि पच भूत) बुद्धि आदि अन्तःकरण-
वि 9 चूर ३-
विवेकर-चूडामणि ३४
चतुय; अग्र्या तथा काम ओर कम यह पूर्य्टक अथवा सृक्ष शारीर कहलता है । इदं शरीरं श्रुणु क्षमसंक्ञितं रिङ्क त्वपश्चीकृतभूतसम्भवम् । सवासनं कमेपलालुभाववः स्वाज्ञानतोऽनादिरुपाधिरात्मनः ॥९९॥ यह सुक्ष्म अथवा टिद्गरारीर अपञ्चीकृत भूतोंसे उन्न हआ हैः यह वासनायुक्त होकर कर्म॑फलोका अनुभव करानेवाला है । ओर खखरूपकरा ज्ञान न होनेके कारण आत्माकी अनादि उपाधि है । खप्नो भवत्यसखय बिभक्त्यवखा खमात्रशेषेण बिभाति यत्र। खप्ने त॒ बुद्धिः खयमेव जाग्रत् कालीननानाविधवासनाभिः । कत्रादिमावं प्रतिपद्य राजते यत्र॒ खयंज्योतिरयं परात्मा ॥१००॥ खप्न इसकी अमिव्यक्तिकी अनर्था है, जौँ यह खयं ही बचा हआ भसता है । खप्नमे, जय यह॒खयंप्रकारा परात्मा द्ध चेतन ही [ भिन्मिन पदाथेकि रपे ] मासा है, बुद्धि जाप्रत्काटीन नाना प्रकारकी वासनाओंसि कर्त आदि भावोंको प्रा होकर खयं ही प्रतीत होने गती है | धीमत्रकोपाधिरशेषस्षी न॒ शिष्यते तत्छरतकमलेदः ।
३५ प्राणे घमं
यसादसद्गसलत एव कर्मभि- न लिप्यते किञचिहुपाधिना कृतैः ॥१०१॥ बुद्धि दी जिसकी उपाधि है रसा वह सर्वपाक्षी उस ( बुद्धि) के कयि इए करेसि तनिक भी च्ि नदी होता; क्योकि वह असङ्ध है । अतः उपाधिकृत कमस तनिक भी ठप नही हो सकता । सर्वव्यापृरतिकरणं लिङ्गमिदं स्याचिदात्मनः पुंसः । वास्ादिकमिव तक्ष्णस्तेनैवात्मा मवत्यसङ्गोऽय्।।१०२॥ यह लिङ्गदेह चिदात्मा पुरुषके सम्पूरणं व्यापारोका करण है, जिस प्रकार बद्वा वसूला होता है । इसीष्ि यह आत्मा असङ्ग ह । अन्धत्वमन्द्सखपटुत्वधरमाः सौगुण्यवैगुण्यवक्ञाद्धि चक्षुषः । बाधिर्यमूफलमुखासतथेव भ्रत्रादिधमा न तु वेत्तुरात्मनः ।॥१०३॥ नेतनोके सदोष अथवा निर्दोष होनेसे प्राप्त इए अन्धापनः धघलपन अथवा सपट देखना आदि नेत्रके ही धमं टै; इसी प्रकार बहिरापन, गूंगापन आदि भी श्रोत्रादिके दी धर्मं है; सव॑साक्षी आत्मके नहीं ।
प्रणके धमं उच्छवासनिःश्वप्विजुम्भण्चत् ्रस्पन्दनादयुक्रमणादिकाः क्रियाः ।
विवेक-चूडामणि ३ प्राणादिकमणि वदन्ति तन्ज्ञाः
प्राणखय धर्मावरनापिपसे ॥१०४।॥
ास्रशासः, जयुहाई, छीक, कोपना ओर उषल्ना आदि
करियाओंको तज्ञ प्राणादिका धर्म॑ बतछते है तथा ्षुषा-पिपासा भी प्राणहीके धमं हैं ।
अहकार्
अन्तःकरणमेतेषु चक्षुरादिषु वर्ष्मणि ।
अहमित्यमिमानेन तिष्ठत्याभासतेजसा ॥१०५॥
रीरके अंदर इन चक्षु आदि इद्धिथो ( इन्दियके गोलको ) मे चिदामासके तेजसे व्याप्त हआ अन्तःकरण भरँपनः का अभिमान करता इआ सिर रहता है ।
अहङ्कारः स विज्ञेयः कतां भोक्तामिमान्ययम् ।
सच्वादिगुणयोगेन चावसात्रयमर्नुते ॥१०६॥
इसीको अहङ्कार जानना चाहिये । यही कतत, भोक्ता तथा मैपनका अभिमान करनेवाला है ओर यही सख आदि गुणोकि योगसे तीनों अवस्थाओंको प्रात होता है ।
विषयाणामानुङ्ये र सखी दुःखी विपर्यये |
सुखं दुःखं च तद्रमंः सदानन्द नात्मनः ॥ १०७॥
विषयोकी अनुकूलतासे यह सुखी ओर मतिकूकतासे दुखी होता है । खख ओर दुःख इस अहङ्कारे ही ध्म है, नित्यानन्द खरूप आत्माके नहीं |
३९७ माया-निरूपण
प्रेमी आस्ाथ॑ता आत्माथत्वेन हि प्रेयान् विषयो न खतः प्रियः । खत एव हि सर्वेषामात्मा प्रियतमो यतः ॥१०८॥ विषय खतः प्रिय नहीं होते, किन्तु आत्मके च्य ही प्रिय होते है; क्योकि खतः प्रियतम तो सवको आत्मा ही है । तत आत्मा सदानन्दो नाख दुःखं कदाप्चन । यत्सुपपरौ निर्विषय आत्मानन्दोऽलुभूयते । श्रुतिः प्रत्यक्षमतिद्यमनुमानं च जाग्रति ॥१०९॥ इसल्यि आत्मा सदा अआनन्दखषूप है, इसमे दुःख कमी नहीं है । तभी सुषम विषयोका अमाव रहते इए भी आत्मानन्द्- का अनुभव होता है । इस व्रियते श्रुति, प्रत्यक्ष, रेतिद्य (इतिहास) ओर अनुमान-ग्रमाण जाग्रत् ( मौजूद् ) है । माया-निरूपण अव्यक्तनाम्नी परमेशशक्ति- रनाद्यविद्या त्रिगुणात्मिका परा। कार्यानुमेया सुधियैव माया यया जगत्सवमिदं प्रयते ॥११०॥ जो अव्यक्त नामवाटी त्रिगुणामिका अनादि अविद्या परमेश्वरकी परा शाक्ति है, वही माया है; जिससे यह सारा जगत्. उतनन हआ है । बुद्धिमान् जन इसके कार्थसे दी इसका अुमान करते है । सन्नाप्यसन्नाप्युभयात्मिका नो भिन्नाप्यमिन्नाप्युमयास्मिका नो ।
विवेकचूडामणि ` ३८
साङ्काप्यनज्ाप्युभयात्मिका नो महाद्धतानिव॑चनीयरूपा ॥१११॥ वह न सत् है, न असत् है ओर न [ सदसत् | उमयरूप है; न भिन दैः, न अमिन है ओर न [ भिनाभिनन ] उभयश्प हे; न अङ्गसहित है, न अङ्गरहित है ओर न [ साद्गानङ्ग ] उभयालिका ही है; किन्तु अत्यन्त अद्धुत ओर अनिर्वचनीयदूपा (जो कही न जा सके ेसी ) प्रसिद्ध है । शुद्धाद्यत्रह्मविबोधनाश्या सपभ्रमो रज्जुविवेकतो यथा । रजस्तमः स्वमिति प्रसिद्धा गुणास्तदीयाः प्रथितेः खकार्येः ॥११२॥ रज्जुके ज्ञानसे सर्प-श्रमके समान बह अद्वितीय शुद्ध ब्रहमके ्ञानसे ही न्ट होनेवाटी है । अपने-अपने प्रसिद्ध क्के कारण सत्व, रज ओर तम- ये उसके तीन गुण प्रसिद्ध है । रजोगुण विक्षेपराक्ती रजसः क्रियात्मिका यत; प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी । रागादयोऽस्याः प्रमवन्ति नित्यं दुःखादयो ये मनसो विकाराः ॥११२॥ क्रियारूपा विक्षेपशक्ति रजोगुणकी है जिससे सनातन- कार्ते समस्त क्रियां होती आयी है ओर निसते रागादि ओर दुःखादि, जो मनके विकार है, सदा उख होते है ।
३९. तमोगुण
कामः क्रोधो रोमदभ्भाद्यघया- हङ्करेष्यामत्सरायस्तु घोराः । धर्मा एते राजसाः पुम्प्रशतति- यसदेषा तद्रजो बन्धहेतुः ॥११४॥ काम, व्रोध, जभ, द्म, असूया ( युणोनि दोप द्रढना ) अभिमान, र्या ओर मत्सर-ये घोर धं रजोगुणकरे दी दै । अतः जिसके कारण जीव कमेभि प्रवृत्त होता है बह रजोपुग दी उपकर चन्धनका हेतु है ।
तमोगुण एपावृतिरनाम तमोगुणख ` शक्तिर्यया वस्त्ववभासतेऽन्यथा । सैपा निदानं पुरषस संसृते- विक्ेपशक्तेः प्रसरस्य रेतः ॥११५)
जिसके कारण वस्तु कुछ-की-कुछ प्रतीत होने ठगती है वह तमोगुणकी आवरणशक्ति है । यही पुरुषके ( जन्म-मरणस्प ) संसार का आदिकारण है ओर यदी विक्षिपदक्तिवे प्रसारका भी हेतु है ।
्जञावानपि पण्डितोऽपि चतुरोऽप्यत्यन्तच्षाथद्क्
व्यालीटस्तमसा न वेत्ति वहुधा सम्बोधितोऽपि स्फुटम् ॥
आ्रान्त्यारोपितमेव साधु कर्यत्यारुम्बते तद्गुणान्
हन्तासौ प्रबला दुरन्ततमसः शक्तिमंहत्याडृतिः ॥११६॥
तमसे ग्रस इआ पुरुष अति बुद्धिमान्? विदान्, चतुर ओर शाके अत्यन्त सुक्ष्म अर्थोको देखनेवाय भी हयो तो भो बह नाना
विवेकचूडामणि ४० प्रकार समञ्नेसे भी अच्छी तरह नहीं समञ्चता; वह भ्रमसे आरोपित किये हए पदार्थोको ही सत्य समञ्षता ` है ओर उन्दके गुणका आश्रय ठेता है । अहो ! दुरन्त तमोगुणकी यह महती अबरण राक्ति बड़ी ही प्रबर है |
अभावना वा षिपरीतभावना-
सम्भावना विगप्रतिपत्तिरखाः । 8 + (~~ (^~ # ससगयुक्त न विषुश्चति धुवं विक्षेपशक्तिः ्षपयत्यजक्चम् ॥११७॥
इस आवरणराक्तिके संसग॑से युक्त पुरुपको अभावना, ्रिपरीत- भावना, अप्तम्भावना ओर विप्रतिपत्ति- ये तमोगुणकी शक्तियो नदी छोडतीं ओर विक्षपशक्ति मी उते निरता उरवोयेर ही रती है ।#
अज्ञानमालखयजडउत्वनिद्रा- प्मादमूढतलयुखास्तमोगुणाः । (१ [+ [3 ~ (0 एतेः प्रयुक्तो न हि वेत्ति फिशचि- निद्रालबत्स्तम्भवदेव तिष्टति ॥११८॥ अज्ञान, आङस्य, जडता, निद्रा, प्रमाद, मूढता आदि तमके गुण है । इनसे युक्त हआ पुरुष कुछ नही सभश्ता; वह निद्रा या स्तम्भके समान [ जडवत् ] रहता है | „ * „ भन्न्हीङनिष्वरगज र्दन नहीं दै" जिसे एेसा ज्ञान हो वह अभावना, कहलाती हे । भ शरीर हू यह 'विपरीतमावनाः दै | किती होने सन्देह असम्भावना? है ओर शे या नही" इ
तहके संशयको विप्रतिपत्तिः ` कहते है । शरपञ्चका व्यवहारः ही मायाकी विक्षेपशक्तिः है।
४९ स्वगुण
स्युण सत्वं विशुद्धं जल्वत्तथापि ताभ्यां मिता सरणाय कर्पते । यत्राटमविस्वः प्रतिविभ्वितः सन् प्रकाशयत्यकं इवाखिं जडम् ॥११९॥ सगुण जल्के समान शुद्ध है, तथापि रज ओर तमसे मिल्नेपर वह॒ भी पुरुषके संसार-बन्धनका कारण होता है; इसमे प्रति- विभ्वित होकर आत्सविम्ब सूर्यकरे समान समस्त जड पदार्थोको प्रकाशित करता है । मिश्रस्य सखख भवन्ति धर्मा स्त्वमानिताद्ा नियमा यमादयः । श्रद्धा च भक्ति सुक्षता च देवी च सम्पत्तिरसनिटत्तिः ॥१२०॥ अमानिल्व आदि, यम-नियमादि; श्रद्धा; भक्तिः मुमु्षुताः दैवी-सम्पत्ति तथा असत्का त्यागं ये मिश्र सच्वगुणके ध्म है । विशद्धसत्चय गुणाः प्रसादः खात्माुभूतिः परमा प्रशान्तिः । तृ्षिः प्रषः ` परात्मनिष्ठा यया सदानन्दरसं सम्रच्छति ॥१२१॥ प्रतता, आत्मानुभव, परमशान्ति, तृक्ति; आत्यन्तिक आनन्द ओर परमातमामे सिति-ये वि्ुद्ध सगुणके धमं है, जिनसे मुमुक्षु नित्यानन्दरसको प्रा करता है ।
विवेक-चूडामणि ४२
कारण-रारीर
अव्यक्तमेतल्निगुणिनिरुक्त तत्कारणं नाम शरीरमात्मनः । सुप॒भिरेतस्य . विभक्तयवखा | प्रीनसरवन्द्ियबुदधवृत्तिः ॥१२२॥ इस प्रकार तीनो गुणक निरूपणसे यह अव्यक्तका वर्णन | इआ । यही आत्माका कारण-शीर है । इसकी अभिव्यक्तिवी | अवस्था सुपति है, जिसमे बुद्धिकी सम्पूणं इक्तियोँ टीन हो जाती है| सवेप्रकारप्रमितिप्रशान्ति- | वीजात्मनावयितिख बुद्धेः। सुषुिरेतस्य किल प्रतीतिः | किञ्चिन्न वेदीति जगत्सिद्धेः ॥१२३॥ | जहां सव प्रकारकी प्रमा ८ ज्ञान ) शान्त हो जाती है ओर बुद्धि बीजरूपसे ही स्थिर रहती है, वहं सुुि-अवस्था है । इसकी प्रतीति भमै कुछ नहीं जानता रेसी टोकप्रसिद्ध उक्तिसे होती है|
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अनातम-निरूपण
देहेन्दरियप्राणमनोऽहमादयः
„ से पिकारा विषयाः सुखादयः । व्योमादिमूतान्यखिरं च विश्व ©
मव्यक्तपयन्तमिदं नात्मा ॥१२४॥
ष आत्म-निरूपण
देह, इन्दिय, प्राण, मन ओर अहङ्कार आदि सारे विकार, सुखादि सम्पूर्णं विषय, आकाशादि मूत ओर अन्यक्तपर्थन्त निखिठ विश्व-ये सभी अनात्मा है ।
माया मायाकार्यं सर्वं महदादि देहपथंन्तम् ।
असदिदमनात्मकं सं विद्धि सरुमरीचिकाकरपम् ॥ १२५
माया ओर महत्तरसे ठेकर देह पर्थन्त मायके सम्पूणं वार्यो को तु मरुमरीचिकाके समान असत् ओर अनात्मक जान ॥
आत्म-निरूपण
अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि श्वरूपं परमात्मनः ।
यद्विज्ञाय नरो बन्धान्छुक्तः केवस्थमच्खुते ॥१२६॥
अव नै तुञ्चे परमात्माका खरूप वताता ह्र जिसे जानकर मनुष्य वन्धनते दछरुटकर् कैवल्यपद् प्रा करता है ।
अस्ति कथित् स्वयं नित्यमहम्रत्ययरम्बनः ।
अवस्ात्रयसाक्षी सन्पश्चकोशविलक्षणः ।१२५७॥
अह रत्ययका आधार, कोई खयं नित्य पदार्थं दै, जो तीनां अवस्थाओंका साक्षी होकर भी पञ्चकोशातीत है ।
यो विजानाति सकं जाग्रतस्रस्सुषुर्षिषु ।
बुद्धितद्वृत्तिसद्धावममावमहमित्ययम् ॥१२८॥
जो जाग्रत्, खम्न ओर सुष्ि-तीनों अवस्ाओ बुद्ध ओर उसकी बृत्तियोके होने ओर न हयोनेको (अहंभावः? से स्थित इआ जानता है ।
विवेक-चूडामणि ४४
| थः पश्यति खयं स्वं यं न प्रयति कथन । | य॒ञ्चेतयति बुद्धयादिं न तु यं चेतयत्ययम् ॥१२९॥ जो खयं सवको देखता है; किन्तु जिसको कोई नहीं देख | सकता । जो बुद्धि आदिको प्रकादित करता है; किन्तु जिसे बुद्धि आदि प्रकाशित नहीं कर सक्ते । येन विश्वमिदं व्याप्ं यन्न व्याभरोति किश्वन । | आभास्पामद् स्वं य भान्तमरुभात्ययम् ॥ १३०॥ जिसने सम्पूणं वधको व्याप्त किया हआ है; किन्तु जिसे कोहं व्याप्त नहीं कर सकता तथा जिसके भासनेपर यह आभासरूप सारा जगत् भासित हौ रहा है । यस्य॒ सन्निधिमात्रेण देहेन्द्रियमनोधियः । विषयेषु स्वकीयेषु वर्तन्ते प्रेरिता श ॥१३१॥ जिसकी सनिधिमात्रसे देह, इन्दधिय, मन ओर बुद्धि प्रसि इए-से अपने-अपने विषयमे वर्तते हैं | अहङ्कारादिदेहान्ता विषयाश्च सुखादयः । | वेदयन्ते धटवद्येन नित्यबोधस्वरूपिणा ॥१३२॥ । अहकारसे लेकर देदपर्यन्त ओर सुख आदि समस्त विषय जिस निव्यज्ञानखरूपके द्वारा घटके समान जाने जाते है | एषोऽन्तरार्मा पूरुषः पुराणो 'नरन्तराखण्डसुखानुमूतिः । सदेकरूपः स प्रतिबोधमात्रो ेनेषरिता बागसवश्रन्ति ॥१२३॥
७५ आत्म-निरूपणः
यही नित्य अखण्डानन्दानुभवरूप अन्तरात्मा पुराणपुरुष है जो सदा एकरूप ओर बोधमात्र है तथा जिसकी प्रेरणासे वागादि इन्िर्या ओर प्राण चरते हैँ । अत्रेव सात्मनि धीगुहाया- सनव्याकरताकश्च उसर्प्रकश्ः । आकाञ्च उच्चे रविवस्प्रकाशचते खतेजसा विश्वमिदं प्रकाश्चयनच् ॥१२४॥ इस सात्मा अर्थात् बुद्धिरूप गुहाम सित अव्यक्ताकाडाके भीतर एक परमग्रकाडामय आकाश सूरयके समान अपने तेजसे इस सम्पूर्ण जगत्को देदीप्यमान फरता हआ बड़ी तीत्रतासे प्रकारामान हो रहा है । ज्ञाता मनोऽहङ्कृतिवि क्रियाणां देदेन्दरियप्राणफरृतक्रियाणाम् । अयोऽग्निवत्तानलुवतंमानो न चेष्टते नो विकरोति किंश्चन ॥१३५॥ वह॒ मन॒ ओर अहंकारखूप विकारोका तथा देह, इन्द्रिय ओर प्राणोकी त्रियाओका ज्ञाता है । तथा तपाये इए लेोहपिण्डके समान उनका" अनुवर्तन करता इआ भी न कु चेष्टा करता है ओर न विकारको ही प्रप्त होता है । न जायते नो भ्रियते न वर्धते न क्षीयते नो विकरोति नित्यः। बिरीयमानेऽपि वयपुष्ययुभ्मिन् न रीयते इुम्भ इवाम्बरं स्यम् ॥१३६॥
| विवेक-चूडामणि ४६।
बह न जन्मता है, न मरता है, न बढता है, न घटता है | ओर न विक्ारको प्रात होता है । वह नित्य है ओर इ शारीरके टीन होनेपर भी घटके दूटनेपर घटाकाराके समान टीन नहीं होता | | ्रकृतिविकृतिभिनः ओद्धबोधखभावः | सदसदिदमरशेषं भासयन्निर्विशेषः । विलसति परमातमा जाग्रदादिष्ववखा- खहमहमिति साक्षात् साक्षिरूपेण बुद्धेः ॥१२७॥ | प्रकृति ओर उसके विकारोसे मिन, शु ज्ञानखरूप, वह निर्विशेष परमात्मा सत्-असत् सव्रको प्रकाशित करता हआ । जाप्रत् आदि अवस्थाओंमे अहंभावसे स्फुरित होता हआ बुद्धिके ' साक्षीखूपसे साक्षात् विराजमान है । | नियमितमनसा त्वं खमात्मानमात्म- | न्ययमहमिति सषाटिदधि बुद्धिप्रसादात्। जनिमरणतरङ्गापारसंसारषिन्ध प्रतर भव छरतार्थो त्रहमूपेण संस; ॥१३८॥ त्. इस आत्माको संयतचित्त होकर बुद्धिके प्रसन होनेपर ध्यह मँ ह"-रेसा अपने अन्तःकरणमें साक्षात् अनुभव -कर । ओर [ इस प्रकार ] जन्म-मरणरूपी तरङ्खोवारे इस अपार संसार सागरको पार कर तया श्रह्मरूपसे सित होकर कृतार्थं हो जा ।
अध्यास । अन्रानात्मन्यहमिति मतिबेन्ध॒एषोऽख पुंसः प्ा्ाज्ञानाजननमरणक्छेशसम्पातदेतु ।
&\9 अध्यास
येनैवायं वपुरिदससत्सत्यमित्यात्मञुद्धया पुष्यद्यु्त्यवति विष्स्तन्तुभिः कौशषदत् ॥१२९॥ पुरुषका अनात्मवस्तुओमे अहम्! इस आत्मलुद्धिका होना ही जन्म-मरणदूपी क्लेोकी प्राति करानेवास अज्ञानसे प्राप्त हआ बन्धन है, जिसके कारण यह जीव इस असत् शरीरको सत्य समञ्चकर इसमे आत्मवुद्धि हो जानेसे तन्तुओंसे रेदामके कीडेके समान, इसका विषयोदयरा पोषण, मार्जन ओर रक्षण करता रहता है । अतसिस्तद्वुद्धिः प्रभवति विमूढस्य तमसा विवेकाभावः सुरति युजे र्जुधिषणा । ततोऽनर्भव्रातो निपतति समादातुरधिक- स्ततो योऽघद्ग्राहःस हि भवति बन्धः शरणुसखे ॥१४०॥ मूढ पुरुषको तमोगुणके कारण ही अन्यमे अन्य-वुद्धि होती है; विवेक न होनेसे दी रज्छमे स्वद्व होती दहै, रेसी बुद्धिवारेको ही नाना प्रकारे अनर्थोका समूह आ चेरता है; अतः हे मित्र | सुन, यह जो असद्ग्राह (असत्को सस्य मानना) है वदी बन्धन दै । अखण्डनित्याद्वयवोधशक्तया सफुरन्तमात्मानमनन्तवेभवम् । समाव्रृणोत्याघरतिक्चक्तिरेषा तमोमयी राहुखिकंविम्बम् ॥१४१॥ अखण्ड, नित्य ओर अद्वय ॒बोध-शक्तिसे स्फुरित शेते हए अखण्डैसवर्थसम्पनन आसतच्को यह तमोमयी आवरणशक्ति इस प्रकार दैक लेती है जैसे सूर्यमण्डल्को रा ।
विवेकचूडामणि ४८ तिरोभूते स्वात्मन्यमलतरतेजोवति पुमा- | ननात्मानं मोहादहमिति शरीरं कलयति । तत्; कासक्रधप्रभ्चाताभरय बन्धनयुणः | पर् विक्षेपाख्या रजस उसर्शक्तव्यंथयात।।१४२॥ अति निर्मल तेजोमय आतमतत्के तिरोभूत ८ अदद्य › होनेप् पुरुष अनात्मदेहको ही मोहसे यँ दरः रेसा मानने टगता है | तव रजोगुणकी विक्षेप नामवाटी अति प्रवर शक्ति कामक्रोधादि अपने धनकारी गुणोंसे इसको व्यधित काने क्गती है । महामोदग्रादग्रसनगलितात्मावगमनो धियो नानावखाःस्वयमभिनयंस्तद्गुणतया । अपारे संसारे विषयविषपूरे जलनिधौ निमज्ज्योन्मञ्ञ्यायं भ्रमति कुमतिःकुस्सितगतिः।।१४३॥ तब यह नाना प्रकारकी नीच गतिरयोवाटा कुमति जीव
विषयरूपी विषसे भरे हए इस अपार संसार-समुद्रमे वता-उछलता महामोहरूप ग्राहके पजेमे पडकर आलगङ्ञानके न्ट हो जनेरे
जो अद्धिके गुणका अभिमानी होकर उसकी नाना अव्यां । अभिनय ( नाट ) करता हआ भ्रमता रहता है ।
भानुग्रभाप्ताजनिताभ्रपङक्ति- |
मानं तिरोधाय विजम्भते यथा । आ डकृतिरात्मतखं
तथा तिरोधाय विजुम्भते स्वयम् ॥१४४॥
७२. वन्य-निरूपण
जिस प्रकार सूर्थके तेजसे उत्पन इई मधमा सूर्यहीको टंक कर खयं पैक जाती है उसी प्रकार अत्मासे प्रकट इ अहङ्कार आताको ही आच्छादित करके खयं सित हो जाता है ।
आवरणशक्ति ओर विक्षपराक्ति कवक्ितिदिननाथे दुर्दिने सा्द्रमेवे- व्यथयति हिमञ्ज््ञावायुरुगरो यथैतान् । अविरततससात्मन्याटते मृटु क्षपयति वहुटु ःखेस्ती व्रविकषेपशक्तिः ॥ १४५ जिस प्रकार किसी दुर्दिनम ८ जिस दिन आंधी, मेघ आदिका विशेष उत्पात हो ) सथन मेधोके द्वारा सूर्थदेवके आच्छादित होने- पर अति भयङ्कर ओर ठंडी-ठंडी अंधी सवको खिन कर देती हे, उसी प्रकार बुद्धि निरन्तर तमोगुणसे आरत होनेपर मूढ पुरुष- को विक्षपदक्ति नाना प्रकारके दु :खोँसे सन्तप्त करती है । एताभ्यामेव शक्तिभ्यां बन्धः पुंसः समागतः । याभ्यां विपोहितो देहं मत्वात्मानं भ्रमत्ययम् ॥१४६॥ इन दोनों ( आवरण ओर विल्षेप ) शक्तियोंसे ही पुरुषको चन्धनकी प्राति इई है ओर -इन्दीसे मोदित होकर यह देहको आत्मा मानकर संसार-चक्रमे भ्रमता रहता है ।
बन्ध-निरूपण बीजं संसृतिभूमिजख तु तमो देहात्मधीरडङ्करो रागः पटटवमम्बु कमं तु वपुः स्कन्धोऽसवः शखिकाः । वि° चू° ४--
हिक |
|
विवेकचूडामणि ५० |
अग्राणीन्दरियसंहतिश्च विषयाः पुष्पाणि दुःखं एर
नानाकर्मसमुद्धवं बहुिधं भोक्तात्र जीवः खगः ॥ १४७।।
संसाररूपी वृक्षका वीज अज्ञान है, देहातबुद्धि उसका अङ्क है, राग पत्ते है, कर्म जल है, रीर स्तम्भ ( तना ) दै प्राण
शाखा है, इद्धया उपराखापं ( गुदे ) है, विषय पुष्प है ओर ।
नाना प्रकारके कर्मोसि उतपन्न हआ दुःख फल है तथा जीव्ूपी पक्षी ही इनका भोक्ता है । अज्ञानमूलोऽयमनात्मवन्धो नेसगिकोऽनादिरनन्त ईरितः । ¦ जन्माप्ययव्याधिजरादिदुःख-
प्रवाहपातं जनयत्ययुष्य ॥१४८॥ | यह अज्ञानजनिंत अनात्वन्धन खाभाविक तथा अनादि | `
ओर अनन्त कहा गया है । यही जीवके जन्म, मरण, व्याधि ओर जरा ८ बरद्धावस्था ) आदि दुःखोका प्रवाह उत्पन्न कर देता है । ., आसानासव्विक नास्त्रनं शस्त्ररनिलेन वद्धिना छन्तु न शक्यो न च कर्मकोटिभिः । पिवेकविज्ञानमहासिना पिना
धातुः प्रसादेन सितेन मञ्जुना ॥१४९॥ |
यड नन्धन विधाताकी विशुद्ध कृपासे प्राप्त हए वितरक.विज्ञान- खूप शखर ओर मञ्जुक महाकदके क्रि ओर किंसी अख, शखः ` वायु, अग्नि अथवा करोड कर्मक्यपोसे भी नहीं काटा जा सकता
५५९ आतमानातमविवेक नत्प्रागा =
श्रुतिप्रमाणेकमतेः खधरम- निष्ठा तयैबात्सविदचद्विरख । विशुदधबुद्ेः परमात्मवेदनं
तेनैव संसारसमूरनाश्ः ॥१५०॥। जिसका शरतितरामाण्यमे दृढ निश्चय होता दै, उसीकी खधर्ममे निष्ठा होती है ओर उसीे उसकी चित्तशुद्धि हो जाती है । जिसका चित्त शुद्ध होता है उसीको परमास्ाका ज्ञान होता है ओर दस ्ञानसे ही संसारूषी वर्षका समूल नाश होता है । को्ोरनमया्ैः पश्चभिरात्मा न संवृतो माति । निजशक्तिसभु्पनरैः रोबारुपटरेरिवाग्वु बापीश्यम् १५१ अन्नमय आदि पच कोशोते आवृत हआ आत्मा, अपनी ही शक्तिते उत्पतन इए रोवाल-पटल्से ठके इए वापीके जछ्की भति नहीं भासता । तच्छवारापनये सम्यक् साटख प्रतीयते शुद्धम् । तृष्णासन्तापहरं स्यः सौख्यप्रद परं पुंस; ॥१५२। पञ्चानामपि कश्चानासपवाद् वभात्य्य शुद्ध नित्यानन्देकरसः प्रस्यग्रपः परः खयंज्यीतिः ॥१५२॥ निस प्रकार उस शौवाठ ( सेवार ) के पूतया दूर हो जानेपर मनुष्योके तृषारूपी तापको दर करनेवाला तथा उन्हे तत्काक ही परम सुख प्रदान करनेवाला जठ स्पष्ट प्रतत होने ट्गता है उसी प्रकार पचो कोशोंका अपवाद करलेपर यड शद्धः नित्यानन्दकरसघरूप अन्तर्याभी, स्वयंप्रकाश परमातमा भासने छता हं ।
विवेकचूडामणि ५२
आत्मानात्मविवेकः; कर्तव्यो बन्धयुक्तये विदुषा । तेनैवानन्दी भवति स्वरं विज्ञाय सचिदानन्दम् ॥१५४॥ बन्धनकी निवृत्तिके ल्य ्द्रानूको आत्मा ओर अनात्माका विवेकं करना चाहिये । उसीसे अपने आपको सच्चिदानन्दरूप जानकर बह आनन्दित हो जाता है । मुञ्ञादिषीकामिव दर्यवगा- सपरत्यश्चमात्मानमसङ्गमक्रियम् । विविच्य तत्र॒ प्रविलाप्य सवं तदात्मना तिष्ठति यः स युक्तः ॥१५५॥ जो पुरुष अपने असंग ओर अक्रिय प्रत्यगात्माको भूजमेसे सीकके समान दइस्य्रगसे पृथक् करके तथा सबका उसीमे कय करके आतमभावमे ही शित रहता है, वही सक्त है |
अन्नमय कोरा देहोऽयमन्नमवनोऽन्नमयस्तु॒ कोश- -आन्नेन् जीवति विनश्यति तद्विरीनः | त्वक्चम॑मांसरुधिराखिपुरीपराशि- यिं ५ ( ¢ [३ न मय खय मवेतुमहेति नित्यशुद्धः ॥१५६॥ अनस उन् हआ यह देह ही अन्नमय कोश है, जे अनसे ही जीता है ओर उसके विना नष्ट हो जाता है | यह
¢ १ ला, नम, मसि, रुमिरः अस्थि ओर मर आदिका समूह स्वयं नित्यञ्ुद्ध आत्मा नही हो सकता ।
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५३ अन्नमय कोरा ,
पूर्व॑ जनेरपि मृतेरपि नायमस्ति जातः क्षणं क्षणगुणोऽनियतखभावः । नैको जडश्च घट्वत्परिदृश्यमानः खारमा कथं मवति भावविकारवेत्ता । १५७॥
यह जन्मसे पूर्व ओर मृदयुके पश्चात् भी नीं रहता, कषणे जन्म ठता है, क्षणिक गुणवाखा है ओर अस्थिरखमाव है; तथा अनेक. तच्रोका संघात, जड ओर घटके समान द्र्य है, पिर यह माव-विकारौका जाननेवाल अपना आत्मा कैसे हो सकता है
पाणिपादादिमान्देहो नात्मा व्यङ्खेऽपि जीवनात् ।
तत्तच्छक्तेरनाद्ाच न नियम्यो नियामकः ॥१५८॥
यह् हाध-रौवाख शारीर आत्मा नीं हो सकता; क्योकि उसके अंग-भंग होनेपर भी अपनी शक्तिका नाश न होनेके कारण पुरुष जीवित रहता है । इसके षिवा जो शरीर खयं शासित ह, वह शासक आत्मा कभी नहीं हो सकता ।
दतद्रम॑ततकमेतद्वखादिसक्षिणः
खत एव खतः सिद्धं तद्रलक्षण्यमात्मनः ॥१५९॥
देह, उसके धर्म, उसके कमं तथा उसकी अवस्थाओंके साक्षी आत्माकी उससे प्रथक्ता खयं ही खतः सिद्ध है ।
कुल्यराशिमासरिप्ठो मरपूर्णोऽतिकःमलः ।
कथं भवेदयं वेत्ता खयमेतद्विलक्षणः ॥१६०॥
हद्योका समूह, मांसे ठ्थिड़ा हआ ओर मल्से भरा हआ यह अति कुत्सित देह; अपनेसे मिल अपना जाननेवाटा खयं ही कैसे हो सकता है
विवेकचूडामणि । ५४ |
तवद्ांसमेदोऽस्िपुरीषराशा- वहंमतिं मूढजनः करोति । बिरु्षणं वेत्ति विचारसीलो. | निजखरूपं परमार्थभूतम् ॥१६१॥
तचा, मांस, मेद्, अस्थि ओर मख्की रारिरूप इस देहम मूढजन ही अहंबुद्धि करते है । विचारञ्ीक तो अपने पारमार्थिक सखरूपको इससे पृथक् दी जनते है । देशीऽहम्त्येव जडखय बुद्धि देहे च जीवे विहुषस्त्वहंधीः। विवेविज्ञानवतो महात्मनो ब्रह्माहमित्येव मतिः सदात्मनि ॥१६२॥ जड पुरुषोकी ^ देह द्व पेसी देहम अहवुद्धि होती है, विद्वान् ( शाखज्न ) की जीवमं ओर विवेकःविज्ञानयुक्त महात्माकी धै ब्रहम हरसी सत्य आतमामे ही अहंबद्धि होती है । अत्रातपुद्धि त्यज मूढबुद्धे „ _ . लञ्मासमेदोऽखिपुरीपराशौ । सवत्मनि ब्रह्मणि निर्विंकसपे
„ इरुष्व शान्तिं परमां भजख ॥१६३॥ क मूं ¦ इस घसचा, मांस, मेद्, अलि ओ सलः समृहमे आत्मुद्धि छोड ओर सवासा निर्विकल्प ब्रह्मे ही आत्म- ` भाव करके परम शान्तिका भोग कर् |
५५ अन्नमय कोरा
देदेन्द्रियादावसति श्रमोदितां विद्वानहन्तां न जहाति यावत् । तावन्न तस्यास्ति विघ्ुक्तिवाता- प्यस्त्वेष वेदान्तनयान्तदश्नी ।॥१६४॥ जवतक विदान् असत् देह ओर इन्द्रिय आदिमे रमसे उत्प्च हर * अहंताको नदीं त्यागता, तवतक बह वेद न्त-सिद्धान्तका पारदर्शी क्यों न हो, उसक्र मोक्षी कोई वात ही नहीं है । छायाशारीरे प्रतिविम्बगात्रे | यत्खप्नदेहे हदि कल्पिताङ्गे । यथात्मवुद्धिस्तव नासि काचि- उजीवच्छरीरे च तथैव मास्तु ॥१६५॥ , छया, प्रतिविम्बः खप्न ओर मनये कल्पित किये इए शरीरोमे निस प्रकार तेरी कमी आत्सवुद्धि नहीं होती, उसी प्रकार जीवित करीरे भी कभी न होनी चाहिये । देहारमधीरव सृणामसिद्धयां जन्मादिदुःखप्रमवख बीजम् । यतस्ततस्त्यं अहि तां प्रयत्ना -च्यक्ते त॒चितते न पुनभेवाशा ॥ १९६] क्योकि देहातम-बद्धि दी असद्वुद्धि मनुप्योके जन्मादि दुःकी उयत्तिकी कारण हे, अतः उसे त् ग्रयलपूवैक छोड दे, उस बुद्धिके छुट जानेपर प्रि पुनर्जन्मकी कई आशंका न रदेगी ।
विवेकचूडामणि । १६ |
प्राणमय कोश
कर्मन्द्रयेः पश्चमिरश्चितोऽयं
प्राणो भवेत्राणमयस्त॒ कोशः । येनात्मबानन्नमयोऽन्नपूणेः
प्रवत॑तेऽसौ सकलक्रियासु ।॥१६७॥
पौँच करमेद्धियोंपे युक्त यह प्राण दही प्राणमय कोरा | कहलाता दहै, जिससे युक्त यह अनमय कोरा अन्नसे तृप्त |
होकर समस्त कर्मोपे प्रवृत्त होता हे । नेवात्मपि प्राणमयो वायुविकारो गन्तागन्ता वायुवदन्तवंहिरेषः । यसखारिफिित्कापि न वेत्तीष्टमनिष्ठं स्वं वान्यं वा किंश्चन नित्यं परतन्त्रः ॥१६८॥ प्राणमय कोश भी आत्मा नहीं है, क्योंकि यह वायुका विकार है, वायुके समान ही बाहर-भीतर जाने-आनेवाला है ओर नित्य॒ परतन्त्र है । यह कमी अपना इ्ट-अनिष्ट, अपना- पराया भी कुछ नहीं जानता ।
मनोमय कोरा ज्ञानेन्द्रियाणि च मनश्च मनोमयः खा-
| त्कोशो ममाहमिति वस्तुविकर्परेतुः । संज्ञादिभेदकरुनाक्तो बलीयां
सतसपूवंकोशमभिपूरयं बिजुम्भते यः ॥१६९॥
५७ मनोमय कोश ्ञनेन्दियोँ ओर मन ही भैः प्राः आदि विकल्पोका हेत मनोमय कोशा है, जो नामादि भेद-कलनाओंसे जाना जाता है ओर बडा बख्वान् है तथा पूर्व-कोरोंको व्याप्त करके सित है । पञ्चेन्द्रियैः पञ्चभिर दोवभिः ग्रचीयमानो विषयाज्यधारया । जाज्वल्यमानो बहुवासनेन्धने- सनोमयागिनर्दहति प्रपश्चम् ॥१७०॥
पञ्चेन्दियरूप पच द्योता ओदारा विषयरूपी घृतकी आह ति्ोसते बढाया इआ तथा नाना प्रकारकी वासनाखूप इंघनसे ्रजयलिति इभ यह सनोमय अग्नि ( यज्ञ ) सम्पूर्णं दस्य-प्रपञ्चको दुग्ध कर देता है । [ अथौत् जिस समय इद्धि वासनाखूपी इनको जलाकर प्रकट क्रिये मनोमय अग्निम विषयोको हवन कर देती है उस समय यह सम्पूणं प्रपञ्च ठीन हौ जाता है ]।
न॒ द्यस्त्यविद्या मनसोऽतिरिक्ता मनो ह्यविद्या भवबन्धहेतुः । तसिन्विनरे सकठं विनष्ट बिजुम्भितेऽसिन्सकलंविजुम्भते ॥१७१॥ मनसे अतिर्कि अव्रि्ा ओर कु नही है, मन ही भव- बन्धनी हेतुभूता अविधा है । उसके नष्ट हयनेपर सव्र नष्ट हो जाता है ओर उसीके जाग्रत् होनेपर सव कुछ प्रतीत होने गता है ।
विवेकचूडामणि ५८
९
भोक्त्रादि विश्वं मन एव सवम् ।
तयैव जाग्रत्यपि नो विशेष सत्सवेमेतन्मनसो विजम्भणम् ॥१७२॥ | निसमे कोई पदार्थं नदीं होता उस खप्नम मन ही अपनी । शक्तिसे सम्पूरणं मोक्ता-भोग्यादि प्रपञ्च रचता हं? उक्ता प्रका | जागृति भी ओर को$ विरेषता नहीं है, अतः यह सब मनका विलासमात्र ही है । ।
सुपुकषिकाठे मनसि प्रलीने नैवासि किंशचित्सकरम्रसिदधेः । | अतो मनःकरिपित एव पसः | संसार एतसय न वस्तुतोऽस्ति ।१७३॥ सुधृि-काठमे मनके टीन हो जानेपर कुछ भी नहीं रहता-- यह बात सबको विदित ही दै । अतः इस पुरुष ( जीव ) का यहं संसार मनकी कल्पनामात्र ही हं, वस्तुतः नही । | वायुनानीयते मेषः पुनस्तेनैव नीयते । मनसा करप्यते बन्धो मोक्षस्तेनैव करप्यते ॥१७४॥ मेघ॒वायुके द्वारा आता है ओर फिर उसीके द्वारा चटा जाता है, इसी प्रकार मनसे ही बन्धनकी कल्पना होती है ओर उसीसे मोक्षकी । देदादिस्वविषये परिकिरप्य रागं बध्नाति तेन पुरुषं पशुवद्गुणेन ।
| खप्नेऽ्धशल्ये सृजति खशक्त्या | | |
५९ मनोमय कोश, : ~ : वैरस्यमत्र विषवत्सु विधाय पा- देनं विमोचयति तन्मन एब बन्धात् ॥१७.५॥ यह मन ही देह आदि सव विषयमे रागकी कल्पना करके उसके दार रस्सीसे पञ्की भति पुरुषको रवोधता है ओर फिर इन विषवत् विषयेमि विरसता उत्पन्न कसक इसको वन्धनसे मुक्त कर देता है । तसखान्मनः कारणमख जन्तो- ४९ न [> ्वन्धख मेक्षख च वा विधाने । (~ = बन्धञ्च देतुमलिनं रजायुण मशुखय शुद्धं विरजस्तमस्कम् ॥१७६॥ इसय्यि इस जीवके जन्धन ओर मेोक्षके विधानम मन ही कारण है, रजोगुणसे मलिन ई यहं बन्धनका हेतु होता है तथा रज-तमसे रदित शद्ध साचिक होनेपर मोक्षका कारण होता है । ` विचेकवैराग्यगुणातिरेका- । च्ुद्सलमासाद्य सना ।वषुक्त्य | अवत्यतो बुद्धिमतो क्षः
म
स्ताभ्यां दटाभ्यां भवितनव्यसग्रे ॥१७७॥
विवकरैरायदि गुणोके उत्पत जुद्धताको प्राप्त इंआ मन मुक्तिका हेतु होता है, अतः पहले बुद्धिमान् सुपुश्चुके वे ( ज्ान- वैरम्य ) दोनो दी द्द् होने चाहिये ।
मनो नाम महाव्याघ्रो विषारण्यभूमिषु ।
चरत्यत्र न॒ गच्छन्तु साधवो ये य॒घक्षव; ॥१७८॥
/
विवेकचूडामणि ९७. मन॒ नामका भयङ्कर व्याघ्र विषयषूपं वनमें धूमता-रिरत,
दै । जो साघु सुयक्षु है, वे वहौँ न जाँ । | मनः प्रते विषयानशेषा- रस्धूलात्मनादषष्मतया च भोक्तुः । =! शरीखणाश्रमजातिभेदान् , ॥ गुणक्रियाहेतुफलानि नित्यम् ॥१७९॥ |
मन ही सम्पूणं स्थूलसू विषयोको, सरीर, वर्ण, आश्रम | जाति आदि भेदको तथा गुण त्रिया, हेतु ओर फलादिको भक्ता | के लिये नित्य उन्न करता रहता है । |
॥
असङ्घचिद्रूपमघं विमोद्य देहेन्द्ियप्राणगुणेनिवध्य | अहंममेति भ्रमयत्यजघं
॥ | | मनः खढ़ृत्येषु एलोपथुक्तिषु ॥१८०॥ | स अपङ्ग चिद्रूप आमाको मोहित कारके तथा इसे देह, । इन्द्रिय, प्राणादि गुणोंसे वोधिकर्, यह मन ही इसको भै-मेरा' | भावसे अपने वम ओर उनके फलोपगं निरन्त मटकाता है | | जन्यासदपत्पुरूषख संसति- रन्यासवन्धस्त्ुनेव कल्पितः । रजस्तमोदोपवतोऽविवेक्षिनो । जन्मादिदु;खख नि न ५ नेदानमेतत् ॥१८१॥
नभमरणरूपम संसार होता दै ओर यह अध्यासका बन्धन इं
का कल्पित विया इ है
| ५ ६१ मनोमय कोश्च
तथा रज-तम आदि दोषयुक्त अविवेकी पुरक ठ्य यह ( अध्यास ) ही जन्मादि दुःखका मूढ कारण है । अतः ्राहर्मनोऽविदयां पण्डितास्त्वदर्चिनः । येनैव आम्यते विश्वं वायुनेषाभ्रमण्डलम् ।१८२॥ अतः तदी विद्वान् मनको ही अविद्या कहते है; जिसके. दवारा वायसे मेव-पण्डककी भाति यह सम्पूणं विश्च रमाया जा रहा हे । तन्मनःशोधनं कायं प्रयत्नेन यथश्चणा। विद्धे सति चैतसिन्ुक्तिं करफरायते ।॥१८३॥ उस्त मनका भुुक्ुको प्रयतनपूैक शोधन करना चाये, उसके शद्ध हो जानेपर मुक्ति करामठकवत् हो जाती है | मोक्षैकसवत्या विषयेषु रागं । निस्य सन्यस च सवेकमं । सच्छरद्रया यः श्रवणादिनिष्टो रजःखभावं स धुनोति बुद्धे; ॥१८४॥ मोक्षकी आसक्तिसे जो विष्योभं रागका निरप्रूटन करके तथा सर्ववर्मोको व्यागकर, शुद्ध श्रद्धासे युक्त इ श्रवणादिमे तत्पर रहता है, वह वुद्धिके रजोमय (चच्नर) खमावकरो न कर देता है । मनोमयो नापि भवेत्रात्मा याचन्तवखात्रिणामिमावात् । दुःखास्मकत्वाद्विषयत्वहेतो- र्ट दि दश्यात्मतया न ट्टः ॥१८५॥
|
विवेक-चूडामणि र मनोमय कोश॒ भी आचन्तवान्, परिणामी, दुःखालकः ओ, विषयख्प होनेके कारण पराता नहीं हो सकता, क्योकि द कभी दद्यरूप नहीं देखा गया |
॥ विज्ननमय कोश | द्धिुद्ीन्ियैः सार्थं सधृत्तिः करतरक्षणः ¦ | विज्ञानमयफ्ोशः खातपंसः संसारकारणम् ॥१८६॥ ्ञनेन्धियोके साथ वृत्तिधुक्त बुद्धि ही कर्तापनके खमाववाख ।
विज्ञानमय कोरा है, जो पुरुषके [ जन्म-मरणषूप ] संसारका | कारण है |
अनुव्रजचित्प्रतिषिम्बक्ति-
विज्ञानसज्ञः प्ररतेर्विकारः । ज्ञानक्रियावानहमित्यजघ्न 4
देदेन्द्रियादिष्वभिमन्यते भृशम् ।॥१८७॥
चित्त ओर उन्दियारिका अनुगमन करनेवाटी चेतनकी `
्रतिवरिमबरक्ति ही विज्ञानः नामकं प्रकछतिका विकार दै । वह भौ
ज्ञान ओर् क्रियावान् र रसा देहइनदिय आदिते निरन्तर अभिमान किया करता है । ।
अनादिकालोऽयमहंखमावो
, जीव, समस्तव्यवहारषोटा । करोति कर्माण्यपि पूवंवासनः
~ ष्यन्युण्यानि च तत्फलानि ॥१८८॥ अक्तं विचित्राखपि योनिषु वरन- |
ननायाति निर्यात्यध उर्वमेषः ।
६३ अ-त्माकी उपाधिसे असङ्गता
अस्यैव विज्ञानमयस्य जाग्रत्
खप्नाद्यवखः सुखटु :खभोगः ॥१८९॥ देहादिनिष्टा्रमधमकम-
गुणाभिमानं सततं ममेति । विज्ञानक्छोशेऽयमतिग्रकाश्चः
श्रकृष्टसान्निष्यवश्षात्परात्मनः । अतो भवत्येष उपाधिरख
यद्ातपधीः संसरति भ्रमेण ॥१९०॥
यह अहंखभाववाटा विज्ञानमय कोश ही अनादिकाटीन जीव ओर संसारके समस्त व्यवहारो का निर्वाह करनेवाा है । यह अपनी पूर्व-वासनासे पुण्य-पापमय अनेकों कुर्म करता ओर उनके फक भोगता है । तथा विचित्र योनिम भ्रमण करता इंआ कभी नीचे अता ओर कभी ऊपर जाता है । जाग्रत्, खप्न आदि अवस्था सुख-दुख आदि मोग, देहादिमे आत्मामिमान, आश्रमादिके धर्मकर्म तथा गुणका अभिमान ओर ममता आदि सत्रदा इस विज्ञानमय कोशम ही रहते है । यह आस्माकी अति निकटतके कारण अयन्त प्रकाशमय दै अतः यह इती उपाधि है, जिषे चरते अत्मबुद्धि करके यहं
जन्म-मरणरूप संसारचक्रमे पड़ता है ।
आत्माकी उपाधिसे असङ्गता
योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हदि स्फुरखयंज्योतिः। करटः सन्नात्मा कती मोक्ता भवलयुपाधिखः ॥ १९१॥
| विवेकचूडामणि ` ४
॥ यह जो खयप्रकाश विज्ञानखरूप हृदयके भीतर प्राणादि | सरित हो रहा दै, वह कटस्य ८ निर्विकार ) आत्मा होनेपर मी | उपाधिवा कर्ता-मोक्ता हो जाता है । | खयं परिच्छेदमुपेत्य बुद्धे स्ाद्तम्यदोषेण परं मृषात्मनः । सर्वात्मकः सन्नपि वीक्षते खयं | सतः पृथक्तवेन खदो षटानिव ॥१९२॥ | बह परात्मा मिध्या-बुद्धिसे परिच्छिन होकर उससे एकीमूत | हो जनेके दोषसे खयं स््रामक होते इए भी मिद्धीसे धडेके समान अपनेको अपनेहीसे पृथक् देवता है | उपाधिसम्बन्धवश्ात्परात्मा हपाधिधर्मानचु भाति तद्गुणः । अयोविकारानविकारिहिष- स्पदेकपोऽपि प्रः खमावात् ॥१९३॥ अह परात्मा सरूपसे तो सदा एकप ही है तथापि उपाधिके सम्बन्धे उसके गुणत युक्त सा होकर उसीके धमति साध प्रकारित होने ठणता है, जिसं प्रकार लेहेके विकारोमे व्याप्त “ आ अविकारी अग्नि उन्हीकते समान प्रकारित होता है |
मुक्ति केसे होगी ! शिष्य उवाच ४ भ्रमेणाप्यन्यथा बास्तु जीवभावः परात्मनः । तदुपाधेरनादितवान्ानादेनाश इष्यते ॥१९४॥
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आत्मक्षान दी मुक्विका उपाय छे
रिष्ये गुरुदेव ! भ्रमसे हो अथवा किसी अन्य कारणसेः वरमास्माको ही जीव-मावकी प्राति दईं दैः ओर उसकी उपाधि अनादि है तथा अनादि वस्तुका नादा हो नहीं सकता ।
अतोऽस्य जीवभावोऽपि नित्यो भवति संसृतिः ।
न नि्र्तेत तल्सोक्षः कथं मे श्रीगुरो वद ॥१९५॥
इसल्यि उस आत्माका जीवमा भी नित्य है ओरं रेता होनेखे इसका जन्स-मरणरूप संसार-चक्र कभी निवृत्त नहीं हो सकता; तो फिर, दे श्रीगुरूदेव ! इसका मोक्ष कमे
जञोगा, सो कषये
® \ भ आत्पत्नान दीं मुक्छ्का उपाय ह श्रीगुखुख्वाच सम्यक्पृष्टं त्वया विद्रन्ावधानेन तच्ण । प्रामाणिकी न सवति भ्रान्त्या मोहितकल्पना ॥१९९॥ रुरु--ह वत्स ! त् वड़ा बुद्धिमान् हे, तते वहत ठीक बात पू है । अच्छा, अब सावधान होकर खन । देख, मोहयुक्त पुरुषोंकीं -जमवदा की दई कल्पना माननीय नदीं हआ करती | भ्रान्तिं विना त्वसङ्गस्य निष्कियस्य निराक्तेः । न षरेतार्थसम्बन्धो नभसो नीरतादिवत् ॥१९७॥ जो असङ्ग, निष्रिय ओर निराकार हे, उस आत्माका उदाथेसि, नीता आदिते आकाशे समान श्रमके अतिरिक्त ओर किसी प्रकार सम्बन्ध नहीं हो सकता ।
~ वि० चू० ॥ 7
शविवेक-चूडामणि ६६।
सस्य द्रष्डुर्निगुणस्याक्रियस्य | ्रत्यग्बोधानन्दसूपस्य बुद्धः । | भ्रान्त्या प्राप्नो जीवभावो न सत्यो | मोहापाये ना्त्यवस्तुस्वभावात् ॥१९८॥
साक्षी, निगुणः अक्रिय ओर प्रत्य्ञानानन्दखरूप उसु | आत्मामे बुद्धि भ्रमसे ही जीव-भावकी प्राप्ति हई है, वह । वास्तविक नष्टं टै; क्योकि वह अ्स्तुरूप होनेसे, मोह दूर हो जानेपएर खभावसे ही नहीं रहता । |
यावद् प्रान्तिस्तावदेवास्य सत्ता मभ्याज्ञानौज्जाम्भतस्य प्रमादत् । रज्ज्वां सर्पा भ्रान्तिकारीन एव ्रा्तेनारो नैव सर्पोऽपि तदत् ।१९९॥ | जसे रमक सितिपर्यनत ही रज्जुमे सर्पी प्रतीति होती दैः भमके नार होनेपर् किर सपं प्रतीत नह्य होता, वैसे ही
जबतक म ठं) तभीतक प्रमादवा मिथ्या ज्ञानसे प्रकट इए इ { जीव-भाव ) की सत्ता है |
अनादित्वमविदयायाः कार्यस्यापि तथेष्यते । उत्पन्नायां तु॒विचायामाविद्यकमनायपि | २००॥ भवाथ खप्नवरपय सहमूलं विनश्यति ।
सोकं अव्या ओर उसके कार्य जीव भावका अनादित्व माना जाता हं । किन्तु जग पङड्नेष् जसे सम्पूणं खप्न-ग्रपन्
2७ आत्मज्ञान ही सुच्छिका उपाय है अपने मूढसहित नश हो जाता है उसी प्रार् ज्ञानोदय होनेपर | अप्रियाजनित जीव-भावका नाश हो जाता है । अनाद्यपीदं नौ नित्यं प्रागभाव इव स्फुटम् ॥२०१॥ अनादेरपि विध्वंसः प्रागभावस्य वीक्षितः ।
यह जीव-भाव अनादि होनेपर भी प्रागभावके समान नित्य नहौं हे, क्योकि अनादि प्रागमावका भी ध्वंस होना देखा ही गया दं ।
यदुबुद्धयपाधिसषम्बन्धास्रिकिल्यितमारमनि ॥२०२॥ जीवत्वं न ततोऽन्यत्तु स्वरूपेण विलक्षणम् । सम्बन्धः खात्मनो बुद्धया मिथ्याज्ञानपुरःसरः ॥२०३॥ विनिवत्तिभवेततस्य सम्यण्ज्ञानेन नन्यथा । ब्रह्माल्मेशलषिज्ञानं सम्य्ज्ञानं श्रुतेमेतम् ॥२०४॥
अतः जिस जीवत्वकी बुद्धिखूप उपाधिकं सम्बन्धसं € आत्ममे कल्पना इई है, वह खरूपे उस ( अत्मा ) से प्रथक् नहीं हो सकता । वुद्धिफे साथ यहं अत्माका सम्बन्ध मिथ्या ्ञानके दी कारण है । इसकी निडृत्ति ठीकटीक ज्ञान हो जानेसे ही हो सकती है, ओर किसी प्रकार नही; तथी ब्रह्म ओर आत्माकी एकताका ज्ञान ही वास्तव्रक ज्ञान है -रेसा श्रुतिका सिद्धान्त है [अत ्रहमा्मैक्य ज्ञान हो जनेसे जीव-मावकी निदृतति हो जाती ह | ।
तदातमानात्मनोः सम्यग्विवेकेनैव सिध्यति । ततो विवेकः कर्तव्यः प्रत्यगस्मसदात्मनोः ॥२०५॥
'चवेक-चूडामणि ८ |
॥
उस बहातमैकय-ज्ञनकी सिद्धि आस्मा ओर अनात्माका भी | परनोर् रिवेक । पार्थक्य-्ञान ) हो ` जानेसे ही होती है | इसल्यि प्रत्यगात्मा ओर् तिध्यात्ाका भटी प्रकार विवेचन करना चाहिये | जरं पङ्वदत्यन्तं पङ्कापाये जलं स्फुटम् । | यथा भाति तथात्मापि दोषाभावे स्फुटगप्रभः ॥२०६॥ अत्यन्त गँद्टा जल भी जिस प्रकार कीचके वरैठ जानप् च्छ जलमत्र रह जाता हं उसी प्रकार दोषसे रहित हो जानेपर भात्मा भी स्पष्टतया प्रकाशित होने कगता है ।
असात्नचरत्ता तु सदात्मना स्फुट परतीतिरेतस्य भवेत्मतीचः । तता निरासः करणीय एवा- सदात्मनः साष्वह्मादिवस्तुनः ॥२०७॥ सत्य आ्माकं विचारसे असत्की निवृत्ति होनेपर् इस प्रत्थक् 6 आन्तर ) आत्माकी स्प प्रतीति होने लगती है । अतः अहंकार आदि असदास्माओका भटी प्रकार ब्राध करना ही चाहिये । अता नाय परात्मा स्याद्रज्ञानमयश॒ब्दभाक | विकारित्वाञ्जटत्वाच परिच्छिन्नत्वहेतुतः । ईयत भिचारिलान्नानित्यो नित्य इष्यते ॥२०८॥ अतर ज्ञानमय रब्दसे कहा जानेवाडा यह विज्ञानमय करा आ विकारी, जड, परिच्छिन तथा दृश्य ओर व्यभिचारी
होनेके कारण परमातमा नहीं हो सकता | क्योकि यह अनित्य है | ओरं अनित्य वस्तु कमी निलय नहीं हो सकती ।
3 आनन्दमय कोष्ट
आनन्दमय कोश आनन्द प्रतिषिभ्बचुम्बिततनुष्रेत्तिस्तमाजाम्भता | स्यादानन्दमयःप्रियादिगुणकः स्वेष्टाथरुमादयः । | पण्यस्यानुभषै बिभाति कृतिनामानन्दरपः स्वयं भूत्वा नन्दति यत्र साधु तनुभृन्मात्रः प्रयल्नं विना | २०८॥ आनन्दस्वरूप आमक प्रतिविम्वसे चुज्वित तथा तमोगुणसं प्रकट इई वृत्ति आनन्दमय कोश है । वह प्रिय आदि ( प्रिव मोदं ओर प्रमोद--इन तीन ) गुते युक्त ह ओर अपने अभीष्ट पदारथके प्राप्त होनेपर प्रकट होती है । पुण्यकर्म परशपिक होनेपर उसके फररूप घुखका अनुभव कते समय माग्यत्रान् पुरूषोको उस आनन्दमय कोका स्वयं दी मान होता हैः जिसे सम्पूणं देहधारी जीव विना प्रयलनक्रे ही अति आनन्दित होते दै । आनन्द्मयकरोशस्य स॒प्तो रफ़तिसन्कटा । स्वप्नजाग्रयोरीषदिष्संद्नादिना ॥२१०॥ आनन्दमय कोराकी उत्कट ८ तीव्र ) प्रतीतितो खुष्म ही होती है, तथा जाग्रत् ओर स्प्नमे भी इष्वस्ठुक दरान अ उसका यकिञ्चित् भान होता है । नैवायमानन्दमयः प्रात्पः । सोपाधिकल्वाखकङृतेविकागन् । कार्यत्वहेतोः सुकृतक्रियाया विकारसङ्गातसमाहितत्वात् ।॥२१६॥
'वितरेक-चूडामणि ७०
यह॒ आनन्दमय कोश मी परात्मा नहीं है, क्योकि यह उपाशरिधुक्त है, प्रकृतिका विकार है, शुभकर्मोका कार्य है ओर ्रकृतिके व्रिकारोके समू ( स्थूठ शरीर ) के आश्रित है । पथ्चानामपि कोशानां निषेधे युक्तितः श्रुतेः । तन्निषेधावधिः साक्षी बोधरूपोऽवशिष्यते ।॥२१२॥ . शृतिके अनुकूढ युक्तियोपे पाचों कोका निषेध कर देनेपर उनके निषिधक्री अत्रधिूप बोधस्वरूपं साक्षी आत्मा जच रहता है । योऽयमात्मा खर्ंञ्योतिः पश्च़्ोशबिरक्षणः अवस्थात्रयसाक्षी सन्निरविकारो निरञ्जनः , सदानन्दः स विज्ञेयः स्वात्मत्वेन विपथिता ॥२१३॥ इस प्रकार जो आतमा स्वयंप्रकारा, अन्नमयादि पाँच कोशोपे एयम् तथा जा्त्, खन ओर सुपति तीनों अवस्याओंका सक्षी होकर भी निर््िकाए निर्म ओर नित्यानन्दस्वरूप है उसे ही विद्रान् पुरुषको अपना वास्तविक आला समञ्लना चाहिये । आलसखरूपतिषयक् प्र शिष्य उवाच सिष्यालेनं निषिद्रेषु कोशेषयेतेषु पञ्चसु । सवाभाव विना चिन्न प्याम्यत्र हे शुरो | ववक्ञय कि वस्त्रति स्वत्मनघ्र विपश्चिता ॥२१४॥
॥ र ध.
। आत्मस्वरूपनिरूपणः. `
निव्य-हे गुरो ! इन पौँवों कोके मिथ्यारूपसे निग्र हो
जानेपर तो सुञ्े सर्वीमाव्र ( यन्य ) के अतिरिक्तं ओर दु भी
प्रतीत नहीं ह्येता, फिर [ आपके कथनानुसारं | वुद्धिमान् पुरुष किस वस्तुको अपना अत्मा माने
आलमखह्पनिरूपण श्रीगुरुरुवाच
सत्यघुक्तं सया विद्ननिपुणोऽमि विचा । `
अहमःदिविकारास्ते तद मामोऽयसप्यज्ु ॥ २१५
गुरु -हे द्रन् ! तू वहत ठीक कता है; तरिचार् करनेभे तू. बहत कुशल है । अरे ! जैपे अहंकार आदि तेरे विकार है तरसे ही उनका अमाव भी है|
सर्वे येनानुभूयन्ते यः स्वथं नानुभूयते ।
तमत्सानं वे देतःरं विद्धि बुद्धया सुभरक्ष्य ॥२१६॥
ये सवर जिसक्रे द्वारा अनुभव विये जाते हँ ओर जो स्वयं अनुभव नहीं क्रिया जा सक्ता, अपनी स्म बुद्धिके दास उस सवके पताक्षीको दी तू अपना आत्मा जान ।
तसा किक मवे्तचथदयेनानुभूयते । `
कस्याप्यनतुमूता्थ सकष नोपयुज्यते ॥२१५॥
` ` जिस-जिस द्वारा जो-जो अलुभव क्रिया जाता है वह सव ,
उसीके साक्षित्मे कहा जाता है; तिना अनुभव कयि पदार्थे किसीका भी साक्षी होना नहीं माना जाता । भि
न क~~ `
विवेक-चूडामणि ७२ ।
असो स्रसाधिको भावो यतः स्वेनालुमूयते। अतः परं स्वयं साक्षा्प्रत्यगात्मा न चेतरः ।।२१८॥ अपना तो यह आत्मा स्वयं ही सक्षी है, क्योकि यह स्तं अपने-आपसे दी अनुमव किया जाता है । इसल्ि इससे ए । कौ ओर अपन साक्षात् अन्तरात्मा नहीं है । जाग्रतस्रमसुषृिष स्फुटतरं योऽसो सर्ज म्भे ्रत्यगरुपतया सदाहमहमित्यन्तःस्फुरन्नकधा । नानाकारविकारभागिन इमान्प्यन्नहधीयुलान् नित्यानन्द चिदात्मना स्फुरति तं विद्वि खमेतं हदि ।२१९॥ जाग्रत्, स्वन ओर घुपु्ति-इन तीनों अवस्था जो अन्तः. ` कएणके भीतर सदा अहं-अहं ( भैम ) रूपसे अनेक रकार स्फुरति होता हआ ्रत्ग्रपसे स्प्टतया प्रकारित होता हैं ओर अहंकारसे लेकर प्रकृतिके इन नाना विकारोको सक्षीरूपते देखता हआ नित्य विदनन्दरूपसे स्फुरति होता है, उसीको त॒ अपने अन्तः. करणम विराजमान अपना आपे समञ्च ।
षरोदके विभ्वितमकंविम्ब- मााक्य मूटो रविमेध मन्यते| तथा चदाभासञचपाधिसंस्थं
शान्त्याहमित्येव जडोऽभिमन्यते ॥ २२०
निप प्रकार मूढ पुरुष धके जले परतिविम्वित सूर्यविम्बरको
देक उसे मुं ही समहता है, उती प्रकार उपाधिमे स्थित विदाभासको अज्ञानी पुरुष भ्रमसे अपना-आप ही मान वैल्ता है |
७३ आत्मखरूपनिरूपण
घटं जलं तद्वतमकविम्वं
विहाय सर्व॑ विनिरी्यतेऽकं; । तटस्ध एतसिरितयावभासकः
खयंभ्रकाशो विदुषा यथा तथा ॥२२१।। देहं धियं चित्प्रतिविम्बमेतं
विसुज्य बुद्धौ निदितं गुहायाम् । द्रष्टारमास्पानमखण्डबोधं
स्वप्रकाशं सदसदिरक्षणम् ॥२२२ नित्यं विथु सवगतं सुक्ष्म
अन्तर्बहिः शल्यमनन्यमान्मनः ।
विज्ञाय स॒म्यङनिजरूपमेत-
त्पुमान्वपाप्सा विरजा ।२२२॥}
विद्वान् पुरुष धड़ा, जल ओर उपमं खित सुका प्रतिविम्ब-- इन सबको छोडकर जैसे इन तीनोके प्रकारक इनसे पृथक् ओर चखयंप्रकारषप सूर्यको देखता है, उसी प्रकार चेह, बुद्धि ओर चिदाभास---ईइन तानक छोडकर बुद्धि गुहाम सित साक्षीरूप इस आत्माको अखण्डवोधखरूपः सवके ग्रकादराक ओर सत्-असत् दोनोसे भिन्न, निलयः विभु, सवगत सूक्ष्म, भीतरबाहस्के मदसे रहित ओर अपने-भापर सर्वधा अमिन इस ( आत्मा ) को मरीमोति अपना निजरूप जानकर पुरुष पापरहितः, निर्म ओर अमर हो जाता € ।
विवेक-चूडामणि ७४ |
विश्चोक आनन्दघनो विपधि-
त्स्वयं ङुतधिन्न िभेति कथित् । नान्योऽस्ति पन्था भवबन्धपुक्ते
विना सखतच्चावगमं युयुक्षोः ॥२२४॥ वह॒ अति बुद्धिमान् पुरूष शओोकरहित ओर आनन्दघनस्प
हो जानेसे कमी किसीसे भयभीत नहीं होता । सुमृश्चु पुरुषे । छ्य अल्मतच्वके ज्ञानको छोडकर संसारन्धनसे दटनेका ओर |
कोई माग नहीं है ।
व्र्ाभिननतवविज्ञानं मवमोक्षस्य कारणम् ।
येनाद्ितीयमानन्दं ब्रह्म॒ सम्पद्यते बुधैः ।॥२२५॥
ब्रहम ओर आत्माके अभेदका ज्ञान ही मववन्धनसे मक्त होनेका कारण है, जिसके द्वारा बुद्धिमान् पुरुष अद्वितीय आनन्द. सख्य ब्रह्मपदको प्राप्त कर केता है |
्रहममूतस्त॒संघत्ये विदानावर्तते पुनः ।
विज्ञातव्यमतः सम्यण्बह्माभिन्नखमात्मनः ॥२२६॥
ब्रह्मभूत हो जानेपर् विद्वान् प्रिर जन्म-मरणरूप संसार चक्रमे नहीं पडता । इसलिये आत्माका ब्रह्मते अभिन्नल भटी प्रकार जान ठेना चाहिये ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं ह विशदं परं सतःसिद्धम् ।
नित्यानन्द करस प्रत्यगभिन्नं निरन्तरं जयति ।!२२७॥
बरह्म सस, ज्ानखरप ओर अनन्त है; बह दध, प्र, खतः- सिद्धः निघ, एकमात्र आनन्दखर्प, रत्य ( अन्तरतम ) ओर अभिन्न है तथा निरन्तर उन्नतिशाटी है |
७५ बरह्म ओर जगत् एकता
ब्रह्म ओर जगत्की एकता सदिदं परमाद्ेतं स्रखादन्यस्य वस्तुनोऽभावात् । न हछयन्यद् स्ति फिश्चित्सस्यक्परमाथतखव्राध 1 | २२८॥ यह परमापरेत ही एक सत्य परार्थ है, क्योक्रि इस खात्मासे अतिरि ओर को$ वस्तु है ही नदीं । इस परमाथ-तत्छका पर्ण बोध हो जानेपर ओर कु भी नदीं रहता ।
यदिदं सकं विश्वं नानारूपं प्रतीतमज्ञानात् ।
तत्सर्व वरश्चैव प्रत्यल्तःशेषभावनादोषम् । २२९॥।
यह सम्पूर्णं विश्व, जो अज्ञानसे नाना प्रकारका प्रतीत हा र्दी ह, समस्त भावनाओं दोषवे रदित [ अयातु निर्विकन्प | तह ही हे ।
मृत्कायबूताऽषप म्रदा न नः कुष्भाञस्तसवत्र तु स्रत्स्वरूपात् । न॒ कुभ्भरूप परथगस्ति ङ्म्भः कुतो मृषा कलिितनाममघ्रः ।२३०॥। मद्रका कायं होनेपर भी घडा उसप पृथक् नहा होता, क्योकि -सत्र ओरसे मृत्तिकारूप होनेके कारण धडका रूप मृर्तिक्राते प्रथक् नहीं हे, अतः मद्र मिथ्या ही कल्पित नाममात्र घड्का सता ही कहाँ है केनापि मरद्धिन्रतया स्ष्प घटस्य सदशेयतु न सक्यते ।
अतो धटः कल्पित एव माहा नमरदेव सत्यं परमाथसूतम् ।९२१॥
,
विवेक-चूडामणि ७६ | ५ ^ ~ = ॥ मिद्रीसे अख्ग घडेका रूप कोई भी नही दिखा सकता | इसय्यि घडा तो मोहसे ही कन्पित है; वास्तवमे सत्य तो त. | खरूपा मृत्तिका ही हे । | सद्रह्यकायं सकटं सदेव तन्मात्रमेतन्न॒ ततोऽन्यदस्ति | अस्तीति यो वक्ति न तस्य मोहो (~ (~ 0 विनिगंतों निद्रितवत्प्रजर्पः ॥२२२॥
सत्-त्रह्मका कायं यह सकल प्रपञ्च सतखरूप ही है, क्यो यह सम्पूणं वही तो है, उससे भिन्न कु भी नहीं है | जो कहता है कि [उससे पथक् भी कुछ ] दै उसका मोह दूर् नहीं हआ; उसका यह कथन सोये इए पुरुक प्रलापके समान है । ब्रह्मवेद विधमित्येव वाणी ॥ बरतेऽ्थवैनिष्ठा घरि । तसादेतद् व्रह्ममात्रं॑हि विच्वं नाधिष्ठानाद्िन्नतारोपितस्य ॥२२३॥ “यह सम्पण विश ब्रहम ही हैः एता अति त्ष अथर श्रति कहती है । इसच्यि यह वि त्रहममत् 8 ल, ककि अधिष्ठानसे आरोपित वस्तुकी पृथक् सत्ता हआ ही
सत्यं यदि स्याजगदेतदात्मनो- नन्तत्यहानिनिगमाप्रमाणता । असत्यवादेत्वमपीशितुः स्या-
ने ८ हितं त्य साधु हितं महात्मनाम् २३२४
श ~
द नह] करती ।
^ ब्रह्य ओर जगतूकी एकता
यदि यह जगत् सत्य हो तो अत्माकी अनन्तता दोष आता है ओर श्रुति अप्रामाणिक हो जाती है तथा ईर ( मगवान् श्रङृष्णचन्द्र ) सी मिथ्यावादी ठहरते है । ये तीनों ही वातं ससुररतरे व्यि छम ओर हितकर नहीं है ।
ईश्वरो वस्तुतज्ञो न चाहं तेष्ववस्थितः ।
न च सट्थानि भूतानीत्येवमेव उ्यचीकखपत् ॥ २२५॥
प्रमाभ॑-तच्छके जाननेवले भगवान् कृष्णचन्द्रने यह निश्चित किया डेकिध्नतोदी भूमि खित द जजीरन वेदी सुक्षमे सित हं ।'
यदि सत्यं भवेदिदं सुपुप्रावुपरभ्यताम् ।
यन्नोपलस्यते किश्चिदतोऽसत्खप्नवन्पषा ॥२३६॥
य॒दि विश्र सत्व होता तो सुपूतम भी उसकी प्रतीति होनी चहिये शी; किन्तु उस समय सकी डुक मी प्रतीति नही जोत; इसलिये यह लधके समान असत ओर मिध्याहै।
अतः प्रृथडनास्ति जगत्परात्मनः
पुथक्प्रतीतिस्तु गपा गुणादिवत् । आरोपितस्वास्ति किम्ेवत्ा- .िष्ठानसाभाति तथा श्रमेण ॥२३९७]
इसच्ये परभात्मासे प्रथक् जगत्. हे ही नी, उसकी पृथक् प्रतीति तो गुणीसे गुण आदिकी प्रभ वरतीतिके समान मिथ्या ही है; आरोपित वस्तुकी वास्तविकता ही क्या १ बह तो अधिष्ठान ही श्रमसे उस प्रकार भास रडा है ।
॥
विवेक-चूडामणि ७८: |
भ्रान्त यद्यद्भ्रमतः प्रतीतं ब्रह्मैव तत्तद्रजतं हि श॒क्तिः । इदंतया बह्म सदेव रूप्यते | लारोपितं ब्रह्मणि नाममात्रम् ॥२३८॥ । अज्ञानीको अन्ञानवशच जो कु प्रतीत हो रहा है, वह सब | ब्रहम ही है, जिस प्रकार भ्रमते प्रतीते हई चरी वस्ततः सीपी ही है । [ इदं जगत् ( यह जगत् है )--इसमे ] इदं ( यह ) रूपसे सदा ब्रह; | ही कहा जाता है, ब्रहम आरोपित [ जगत् ] तो नाममात्र ही है| `
ब्रह्म निरूपण अतः प्रं ब्रह्म सदद्वितीयं विशुद्धविज्ञानधनं निरञ्जनम् । ग्रशान्तमादयन्तविहीनमक्रियं . निरन्तरानन्द्रसखरूपम् ॥२३९॥' इसट्ये परत्रहम सत्, अद्वितीय, शुद्धः विज्ञानघन, निर्भक,. शान्तः आदि-अन्तहित, अक्रिय ओर सदैव आनन्दरसलदूप हे । निरस्तमायाक्ृतसर्वभेदं नित्यं सुखं निष्कलमप्रमेयम् । अरूपमव्यक्तमनाख्यमनव्ययं ज्योतिःखयं फिंशचिदिदं चकास्ति ॥।२४०॥ ऋ समस्त माधिक भेदोसे रहित है; नित्य सुखखरूपः कलारहित ओर प्रमाणादिका अग्रिय है तथा वह को$ अरूप,.
७९२. महावाक्य-विचार
अन्यक्त, अनाम ओर अक्षयतेज है जोखयं ही प्रकाशित हो रहा ह । ज्ञातृज्ञेयज्ञानशर्यमनन्त निर्विकस्पकम् । केवराखण्डचिन्सात्रं परं तं हबुधः ।२४१॥ बुधजन उस परम तत्कर ज्ञाताः क्न ओर जेय इस त्रिपुटी
रहित, अनन्त, निर्विकल्प? केवट आर अखण्ड चैतन्यमात्र जनते ह । अहेययतुपादेयं मनोबाचामगाचरय् ॥
अप्रमेयमनाद्यन्तं व्रह्म पण महन्महः ॥२४२॥ वह॒ ब्रह्म व्याग अधवा ग्रहणके अयोग्य, मन-वाणीकः
अविषय, अप्रमेयः आदि-अन्तरहितः परिपू तथा महान तेजोमय हं
महावाक्यावचार तच्च यदाभ्ासभिधीयमानया- ब्रह्मात्मनोः शोधितयोयदात्थम् । शरुत्या तयोस्तत्वमसीति स्यः गेकत्यमेव प्रतिपाद्यते गुहः ॥२४९॥। नतखमति" ८ छन्दो° ६।८ ) अदि वाक्योके तत्. ओर वव पदोसे शोधन करके कदे इ वरस ओर आत्माका श्रतिके द्रा बारम्बार पूर्णं एकत प्रतिपादन किया गया हे । रेक्यं तयोकधितयोनं वाच्या निंगदयतेऽन्योन्यविरुद्धरमिणोः
खचोतभान्बोखिि राजभृत्ययोः कूपाम्बुरादयोः परमाणुमरवोः ॥२४४॥
विवेक-चूडामणि <० | उन सूर्यं ओर खचोत ( गन्. ), राजा ओर सेवक, समुद ओर कूप तथा सुमेरु ओर ॒परमाणुके समान परस्पर विरुद धेवालोंका एकत्व कस्यार्थे ही कहा गया है, वाच्यार्थे नहीं । तयोविरोधोऽयमुपाधिकष्पितो न॒ वास्तवः कथिदुपाधिरेषः । ईशस्य माया महदादिकारणं जीवख कायं श्रृणु पञ्चकोशम् ॥२४५॥ उन दोनोका, यह विरोध उपाधिके कारण टै ओर यहं उपाधि डु वास्तविक नहीं है । ईशरकी उपाधि महत्तखादिवी कारणरूपा पाया है तथा जीवकी उपाधि कार्यरूप पञ्चको है । एताबुपाधी परजीवयोस्तयोः सम्यडनिरासे न परो न जीवः । राज्यं नरेन्द्र भटख खेटक- श्योरपोहे न भटो न राजा ॥२४६॥ पे परमाला ओर जीवकी उपाधि है; इनका भटी प्रकार नाध हो जानेपर न परमात्मा ही रहता है ओर न जीवातमा ही। जस शरक रज्य राजाकी उपाधि है तथा दा सैनिककी इन दोनो उपाधियोके न रहनेप्र न कोई राजा है ओर न योद्धा । अथात आदेश्च इति श्रतिः खयं निषेधति ब्रह्मणि करियतं यम् । शरुतग्रमाणानुगृदीतयुक्त्या
तयोनिरासः करणीय एव |२४७।
< मदावाक्य-विचार
ब्रह्मम कल्पित दवैतको “अथात आदेशौ नेति नैति ( ब्रह ० २। ३।६) इत्यादि श्रुति खयं निषेध कप्ती है; इसलिये श्रुति-प्रमाणा- नल युक्तिते उपर्युक्त उपातिगरोका वध करना ही चाहिये ।
सेदं नेदं कल्पितत्वान्न सत्यं
रज्जौ ष्टव्यारवत्खश्वच । इत्थं दृश्यं साधुयुक्त्या व्यपोद्य सेः पञ्चदिकमावस्तयोयंः ।॥२४८॥ यह द्ृदय कल्पित होनेके कारण रञ्जुमे प्रतीत दोनेवले सप ओर खप्नमे मासनेवाटे विविध पदार्थोकी मति सय नहीं है; रेसी ही प्रवर युक्तियांसे सयका निषेध करनेपर पीछे उन (जीव ओरश्घर ) काजो एक मव वच रहता ह वही जाननेयोग्य है । ततस्तु तो रक्णया सुर्यो तयोरखण्डेकरसत्यसिद्धये ।
नारं जहत्या न॒ तथाजहतया
किःन्तूमया्थीत्सिकयैव भाव्यम् ॥२४९॥
जीवात्मा ओर परमा्माकी अखण्डेकरसताकी सिद्धिके स्यि
महावाक्ये ठक्षणा करएनेसे ही उनका ज्ञान होता ह । उनकी टीक-
दीक ज्ञान न तो जहती-रक्षणसे होता ह ओर न अजहतीसे ही इसच्ि इस जगह जइत्यजहती लक्षणाका प्रयोग करना चाहिये ।
स॒ देवदत्तोऽयमितीद चैकता
८२
विरुद्वधमाद्मणास्य कथ्यते ।
यथा तथा तखमसीति वा र विरुदधधमीुभयत्र दिता ॥२५०॥
वि० न्च द
विवेकचूडामणि <२
` वह देवदत्त यह हैः इस वाक्ये [ “वह” शब्दका परोक्ष ओर (यहः रब्दका अपरोक्षत्व इन दोनों ] विशुद्ध ॒धर्मोका वाध करके जिस प्रकार देवदत्तकी एकता ही बतटायी जाती है, उसी प्रकार् ^तत्तमति" इस वाक्ये [ (तत्? पदके वाच्य दशरकी उपाधि भमायाः ओर ध्वं पदके वाच्य जीवकी उपाधि अन्तःकरण--इन ] दोनोके विरुद धर्मोका वाध करकैः [ खुद चैतन्यांशाकी ] एकता कही जाती है ।
संलक्ष्य चिन्मात्रतया सदात्मनो- रखण्डभावः परिचीयते बुधैः । एवं महावाक्यशतेन कथ्यते ब्रहमात्मनोरेक्यमखण्डभावः ॥२५१॥ इस प्रकार लक्षणाद्वा जीवात्मा ओर प्रमात्माके चेतनांराकी एकताका निश्चय कर बुद्धिमान् जन उनके अखण्डभावका पस्विय ( ज्ञान ) प्राप्त करते हैँ । रसे ही सैकड़ों महावाक्योंसे ब्रह्म ओर आत्माकी अखण्ड एकताका स्पष्ट वर्णन किया गया है ।
ब्रह्मभावना अस्थूलमित्येतद सन्निरस्य < सिद्रं खतो व्योमवदग्रतकर्यम् । यता सृषामात्रमिदं प्रतीतं जहीहि यत्खात्मतया गृहीतम् | ब्रह्माहमित्येव बिष्युद्धबुद्धया
^
वद्धि खमात्मानमखण्डबोधम् ।२५२॥१
८२ व्रह्य-भावना
“अस्यूलमनण्व हस्वमदीषम् (वृह० ३।८।७) इत्यादि श्रुति से असत् स्थूकता आदिका निरास करनेसे आकाशके समान व्यापक अत्यं वस्तु खयं दी सिद्ध हो जाती हं । इसलिये आध्प्पसे गृहीत र देह आदि मिथ्या दी प्रतीत होते है, इनं आत्मनुद्धिको छोड; ओर बरह्म! इद्र ुद्धिते अखण्ड वोधस्थरूप अपने आत्मको जान ।
मृत्कायं सकलं धटादि सततं सृन्पात्रसेवाभित-
सतद्रत्सज्ञनितं सदात्मकभिदं सन्मात्रमेवाखिरम् । यखान्नास्ति सतः परं किमपि तत्सत्यं स॒ आत्मा खयं
त्ात्तसखमसि प्रशान्तममलं ब्रह्मदधयं यत्परम् । २५२
जिस प्रकार पृ्तिकरावेः कायं घटं आदि हर तरहसे मृत्तिका ही हे उसी प्रकार सते उत्पन्न इआ यह सस । सम्पूरणं जगत् सन्मात्र ही है; क्योकि सते परे ओर कुक भी नदीं है तथा वही सत्य ओर स्वयम् आत्मा भी है, इसल्यि जो शन्त, निर्मल ओर अद्ितीय परत्रह्म है वह तर्द हो ।
निद्राकल्पितदेशकारविषयज्ञत्रादि सर्व॑ यथा
मिथ्या तद्वदिहापि जाग्रति जगत्ाज्ञानकायेत्वतः।
यखदेवमिदं ्रीरकरणश्राणाहमाचप्यसत्
__ तत्त्वमसि प्रवान्तममठं वराम ्रज्ान्तममलं व्रह्मद्वयं यत्परम् २५४
% लक्ष्मीनारायणप्रेस मुरादावादकी प्रतिमे इसके पश्चात् बह इलोक ओर दै--
यत्र श्रान्त्या कल्पितं तद्विवेके तत्तन्मा्रं नैव तस्सद्विमिन्नम् ।
खप्ने नष्टे खप्नविद्वं विचित्र खस्माद्धि्नं विन्तु दृष्टं पर्ोधे ॥
जिसमे कोई वस्तु श्रमसे कल्पित होती दै विचार होनेपर वह तद्रूप दी प्रतीत होती छि उससे प्रथक् नदी । खप्के नष्ट दो जानेपर जाग्रदवस्थामे क्या विचित्र सखन पच्च अपनेते पृथक् दिरलामी देता दे १
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विवेक-चूडामणि ८४ ४9
जिस प्रकार खप्नमे निद्र-दोषते कल्पित देश, काठ, विषय ओर शाता आदि सभी मिथ्या होते दहै, उसी प्रकार जाग्रदवस्था भी यह् जगत्? अपने अज्ञानका कार्यं होनेके कारण, मिथ्या ही है | इस प्रकार क्योकि ये शरीर, इन्धि्यो, प्राण ओर अहंकार आदि सभी असत्य है, अतः तुम वही परह हो जो शान्त, निर्मल ओर अद्वितीय है । जातिनीतिङलगोत्रदूरगं नामरूपगुणदोपवजितम् । देशकारविषयातिवतिं यद् ब्रह्म त्वमसि भावयात्मनि ॥२५५॥ जो जाति, नीति, कु ओर गोत्रसे परे है; नाम, खूप गुण ओर दोषते रहित दै तथा देश, काठ ओर वस्तुसे भी प्रथक् है तम वही ब्रहम हो- रेसीअपने अन्तःकरणमे भावना कसे । यत्परं सकलवागगोचरं गोचरं विमलबोधचक्षुषः । शद्धचिद्घनमनादिवस्तु यद् बरहम तमसि भावयात्मनि ॥२५६॥ जो प्रकृतिसे परे ओर वाणीका अविषय है, निर्मल ज्ञानचक्षुओ- से जाना जा सकत। है तथा दर चिद्धन अनादि वस्तुहै, तुम वही जहम हो-- एसी अपने अन्तःकरणे भावना करो | षडमिरू्भिभिरयोगि योगिहद्- भावितं न कर विभावितम् । बुद्धयवेद्यमनवद्मूति यद्
बरह्म तत्वमसि भावयात्मनि ॥२५७॥
८५ ब्रह्म-भाक्ना
्षुधा-पिपाप्ता आदि छः ऊरमियोसे रहित योगिजन जिसका हृदयमे ध्यान करते दै, जो इन्दियोते ग्रहण नहीं किया जा सकता तथा बुद्धिसे अगम्य ओर स्तुत्य रधर्थशाटी है तुम वही ब्रह्म हो-एेसी चित्तम भावना करो । ्रान्तिकखिपितजगत्फराश्रयं स्वाश्रयं च सदसद्विलक्षणम् । निष्कं निरूपमानस्रद्धिमद् ब्रह्म त्चमसि भावयात्मनि ॥ २५८॥ जो इस शान्तिकल्पिति जगद्रूप कटका आधार है, खयं अपने ही आश्रय सित है, सत् ओर असत् दोनँसे भिन्न है तथा जो निरवयव, उपमारहित ओर परम रेशर्यसम्पन है, बह परत्रह्म दी तम हो--रेसा चित्तम चिन्तन करो । जन्मवृद्धिपरिणत्यपक्षय- व्याधिनाशनविहीनमव्यथम्। विश्वसष्टयवनधातकारणं ब्रह्म तखमसि भावयत्मनि ॥।२५९॥ जो जन्म; वृद्धि ( बढना ), परिणति ( बदलना ), अपक्षयः व्यापि ओर नाश शरीरके इन छं विकारोसे रहित ओर अविनारी है तथा विश्वकी सचि, पाटन ओर विनाराका कारण है वह ब्रह्म ही तुम हो-रेसी अपने मनम भावना करो ।
अस्तमेदमनपास्तलक्षणं निस्तरङ्गजलरारिनिश्वलम् ।
विवेक-चूडामणि <६
नित्यगुक्तसविभक्तमूतिं यद् बरह्म त्वमसि भावयात्मनि ॥२६०॥ जो भेदरहित ओर अपरिणामिखरूप है, तरङ्गहीन जल्रारिके समान निश्चल है तथा नित्यमुक्त ओर विभागरहित है वह ब्रह्म ह्ली तुम हो-एेसा मनमें प्रिचारो । एकमेव सदनेककारणं कारणान्तरनिरासकारणम् । कायंकारणविलक्षणं स्वयं ब्रह्म तत्वमसि भावयात्मनि ॥२६१॥ जो एक होकर भी अनेकोका कारण तथा अन्य कारणोकि निषधका कारण है, वितु जो स्वयं कार्य-कारणमावसे अल्ग है बह ब्रह्म ही तुम हो- रसा मनप मनन करो । निरविंकल्पकमनरपमक्षरं यतक्षराक्षरविलक्षणं परम् । नित्यमन्ययसुखं निरञ्नं व्रह्म तमसि भावयात्सनि ॥२६२॥ जो निविकलप्, महान् ओर अविनाशी है, क्षर ( शरीर ) ओर अक्षर ( जीव ) से भिन है तथा नित्य, अव्यय, आनन्द- खर्प ओर निष्कल््क है वह त्रह ही तुम हो- रेस हदयमे भावना करो । यद्विभाति सदनेकधा भमा- नामरूपगुणविक्रियात्मना ।
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<~ व्रह्म-भ।वना
हेमवत्स्वयसविक्रियं सद्ा ब्रह्म॒ त्वमसि मावयात्यनि ।२६३॥ जो सर्वदा सत्. ओर सुवर्णके समान श्वं निर्विकार है तथापि श्रमवश [ उसर््ेःविकार कटकुण्डलादिवेः समान ] नाना नाम, रूप, गुण ओर विकारौके रूपये भासता है वहं व्रह्यदही तुम हो--रेसा अपने चित्तम चिन्तन करो । यच्चकास्त्यनपरं परात्परं म्रत्यगेकरसमातपरक्षणम् ` । सत्यचित्सुखमनन्तमन्ययं व्रह्म तखमसि भावयात्मनि ॥२६४॥ जो अनपररूपसे [ अर्थात् जिससे परे ओर कोई न हो इस प्रकार ] प्रकाशमान है, पर् ( अव्यक्त प्रकृति ) से भी परे हैः म्रतयव्, एकरस ओर सवका अन्तराहमा है तथा सचिदानन्दसवरूप्, अनन्त ओर अव्यय है वह ब्रहम ही तुम हो--४सी अपने अन्तः- करणमे भावना करो ।
उक्तमथमिममात्मनि स्वयं _ भावय प्रथितयुक्छिमिर्धिया । संशयादिरदहितं कराम्बुवत्
तेन॒ तखनिगमो भविष्यति ॥२६५॥
इस पूरवक्तं विषयको अपनी वुद्धिसे [ वेदान्तकी 1 प्रसिद्ध
युक्तियोद्रारा अपने चित्तम स्यं विचारो । इससे हस्तगत जल्के स्षमान संशय-विपर्ययसे रहित त्ववोध हो जायगा ॥
विवेक-चूडामणि <८ स्वं बोधमात्रं परिशुद्धतं र विज्ञाय सङ्षे सृपवच्च सैन्ये । तदात्मनेवात्मनि सर्वदा सितो विङपय ब्रह्मणि दर्यजातयर ॥२६६॥ सेनाके वीचमे रहनेवाठे राजके समान भूतोके संघातरूष शरीरके मध्यमं स्थित इस स्ववंप्रकारारूप विञ्युद्ध॒ त्को जानकर सद्। तन्मयमावसे स्वरूपमे सित रहते हर सम्पूर्णं ददयवगैको उस ब्रहम ही टीन करो । बुद्धौ गुहायां सदसद्विलक्षणं नास्ति सत्यं परमद्वितीयम् । तदात्मना योऽत्र वसेद् गुहायां । पुनन तस्या्गुदापवेशः ।।२६७॥॥ वह सत्-अक्ततसे विरक्षण अद्वितीय सत्य पर्रह्म बुद्धिरूष य॒मे विराजमान है । जो इस गुहाम उससे एकरूप होकर एहता है, हे वत्स ! उसका फिर शरीररूपी कन्दरामे प्रवेशा नही होता [ अर्थात् वह पिर जन्म ग्रहण नहीं करता ] ।
वासनात्याग
ञाते वस्तुन्यपि बलवती वासनानादिरेषा । कत। भाक्ताप्यहमिति ठा यास्य संसारहेतुः ` प्रत्यण्टष्टयात्मनि निवसता सापनेया प्रयला- क्ति प्राहस्तदिह यनयो वासनातानवं यत् ॥२६८॥
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८२ वासना-त्याग
आत्म-बस्तुका ज्ञान हो जनेपर भी, जो भमै क्ता ओर भक्त ट" इस खूपसे द्द होकर [ जन्म-मरणरूप | संसार्का कारण होती है, उस (5 अनादि-बास्तनाको प्रत्यक् ( आन्तरिक } दष्ट से आत्मस्वरूपमे सित होकर प्रयतपू्वक दूर् करना चाहिये; क्योकि इस संसारम वासनाकी क्षीणताको ही सुनियोने सुक्ति कहा टे । अहमयेति ओ मावो देहाक्षादाघनात्मनि । अध्यासोऽयं निरस्तव्यो विदुषा स्वात्मनिष्टया ॥२६९॥ ` देह-इन्द्रिय आदि अनात्प-वस्तुओंमे जीवका जो अहं अथवा मममाव है यही अध्यास है । विद्रानूको आत्मनिषठाद्रारा इसे दूर कर देना चाहिये । ज्ञात्वा स्तं प्रत्यगात्मानं बुद्वितद्वत्तिसाक्षिणम् । सोऽ्दमित्येव सद्व्च्यानात्मन्यात्ममतिं जहि ॥२७०॥ ्रत्मगातमरूप॒ अपने-भपको बुद्धि ओर उसकी वत्तियोका साक्षी जानकर क्षौ वही द्रः रेसी समीचीन वृत्तिसे अनात्-वस्तुओमे कठी इई आत्मवुद्धिका व्याग करो । 1 (3 ¢ ` लोकानुबतेनं त्यक्तवा त्यक्तवा देहायुबतनम् । शाखालुबतेनं त्यक्त्वा स्वाध्यासापनयं इर् ॥२७१॥ लोकवासना, देहवासना ओर शाखवासना ईन तीनोंको छोडकर आत्मामे इए संसारके अध्यासका व्याग करो । लोकवासनया जन्तोः शासवासनयापि च । देहवासनया ज्ञानं यथावन्तव जायते ॥२७२॥
विवेक-चूडामणि ९० रोकवासना, शाखवासना ओर देहवासना इन तीनोके कारण डी जीवको टीक-ठीक ज्ञान नहीं होता | संसारकारागरहमोक्षमिच्छो- रयोमयं पादनिबद्भभृह्लय् । वदन्ति तज्ज्ञाः पट्वासनात्रयं योऽखाद्वि॒क्तः सुपेति, य॒क्तिम् ॥२७३॥ संसाररूप कारागारसे मुक्त होनेवी इच्छावाले पुरुषके ट्यि ब्रह पुरुष इस प्रबल वासनात्रयको पैरोम पड़ी इई छोहेकी वेडी बतखते ड जो इसे चछुटकारा पा जाता है वही मोक्ष प्रात कर् ठता है | जलादिसम्पकुवशातरूत- र दुगेन्धधूतागरुदिव्यवासना । सङ्घषणेनेव विभाति सम्य- जिभूयमाने सति बाह्गन्धे ॥२७४॥ अन्तःत्रितानन्तदुरन्तवासना- धूरीविलिषना परमात्मवासना । ्ज्ञातिसद्गषणतो विशुद्धा प्रतीयते चन्दनगन्धवतसफुटा ।|२७५॥ जिस प्रकार जल आदिव संसर्गवदा [ किसी अन्य ] अत्यन्त इगेन्धयुक्त वस्तुका टेप चदु जानते दवी हई अगरी दिन्य सुगन्ध सद्ख्षण ( धिसने ) के द्वार ही बाह्य दुर्गन्धके दूर देनपर किर उच्छी तर प्रतीत होती है; उसी प्रकार अन्तः-
~+
९१ अध्यास-निरास करणम स्थित अनन्त ुर्वासनाखूपी धूट्सि टकी ट परमत्म- वासना वुद्धिके अयन्त सङ्घ्षसे शद्ध होकर चन्दनकी गन्धके समान ही स्पष्ट प्रतीत होने क्गती है ।
अनात्स्ासनाजारैस्तिरोभूतात्मवासना = । नित्यात्मनिष्ठया तेषां नारे भाति स्वयं स्फुटा ॥२७६॥ अनालवासनाओकि समूहसे आत्मवासना छप गयी है; इस-
स्यि निरन्तर आत्मनिष्ठमे स्थित रहनेसे उनका नारा हो जनेपर्
बह स्प भासने खगती है ।
यथा यथा प्रत्यगवस्थितं मनः स्तथा तथा युश्चति बाद्यवासना । निशेषपरक्षे सति बासनाना । मात्मालुषूतिः ग्रतिवन्धशूल्या ॥२७७] मन जैसे-जैसे अन्तर्मुख हो. जाता हे, वैसे-वैसे दी वह जह्य वासनाओंको कोडता जाता हे । जिस समय वासनाओंसे पूर्णतया छुटकारा हो जाता हे, उस समय आत्माका प्रतिबन्धय्य अनुमव होने खगता है । अध्यासनिराष स्वात्मन्येव सदा स्थित्या मनो नश्यति योगिनः । वासनानां क्षयश्चातः स्वाध्यासापनयं रु ॥२७८॥ [ चिततदत्तियोको रोककर निरन्तर आप्मस्वषूपमे दी स्थिर रहनेसे योगीका मन =£ हो जाता है ओर उसकी वासनाओंका ओ क्षय हो जाता है इसव्यि अपने अध्या्तको दूर करो ।
विवेकचूडामणि ९२
तमो दवाभ्यां रजः स्वात्सच्चं शुद्धेन नर्यति । तसात्सत्वमवष्टभ्य खाध्यासापनयं रू ॥२७९॥ रजोगुण ओर सचगुणसे तम, सत्वगुणसे रज ओर जुद्ध स्स सच्वगुणका नारा होता है इसस्यि शुद्ध सका आश्रय लेकर अपने अध्यासका त्याग करो । प्रारब्धं पुष्यति वपुरिति निधित्य निरः । धे्यमालप्न्य यत्नेन स्वाध्यासापनयं रु ।॥२८०॥ प्रारब्ध ही शरीरका पोषण करता है; ेसा निश्चय कर निश्चल्मावसे धैय धारण करके यतपू्वक अपने अष्यासको छोड़ो । नाहं जीवः परं ब्रह्यत्यतद्व्याृततर्वकम् । वासनावेगतः प्राप्तस्वाध्यासापनयं रु ॥२८१॥ मै जीव नहीं हः परत्र ह, इस प्रकार अपने जीवभावका निषेध करते इए, वासनात्रयके वेगसे प्राप्त इए, जीवल अध्यासका त्याग करो । शत्या युक्त्या स्वानुभूत्या ज्ञात्वा सारबातम्यमात्मनः । कचिदामासतः प्ासवध्यासापनयं ङु ॥२८२॥ शति, शुक्ति ओर अपने अनुमवसे आत्माकी सर्वात्मताको जानकर कभी भ्रमसे प्राप्त इए अपने अध्यासका त्याग करो । अनादानविसगाम्यामीषन्नास्ति क्रिया मुनेः । तदेकनिष्ठया नित्यं खाध्यासापनयं कुरु ॥२८२॥ नीभवान् सुनिको को भी ब्त प्रादय अथवा त्यज्य न
होनेसे छु भी. कर्तव्य नहीं है इसव्यि निरन्तर आत्मनिष्ठाद्रारा आत्मामं इए अध्यासको त्यागो ।
९३ अध्यास-निरास तत्वमसखादिवाक्योत्थत्रहमासरैकत्वयोधतः । ्रहमण्यात्सत्वद्वीय खाध्यासापनयं डुर ॥२८४॥ “त्वमि ८ छन्दो° ६ । ८) आदि सहावाक्योँसे हए ब्रह्म
ओर आत्माके एकलज्ञानसे ब्रह्मे अत्मबुद्धिको द्द करनेके चयि
अपने अध्यासको दूर करो । अर्हभावख देहेऽसिन्निःशेषविकयावधि । सावधानेन युक्तात्मा खाध्यासापनयं इर् ।॥२८५॥ इस देहम जो अहंभाव ( मैपन ) हो रहा है, उसका जव्र-
तक पूर्णतया ख्य न हो जाय तवतक सावधानतापूर्ैक युक्त-
-चित्तसे अपने अध्यासको दूर करो । ग्रतीतिजीवजगतोः खप्नवद्धाति सावता । तावन्निरन्तरं विदरन्खाध्यासापनयं इर् ।२८६॥ जवतक स्वप्नके समान जीव ओर जगत्की प्रतीति हो रदी है, तवतक हे विद्वन् ! अपने आत्मामे दए इतत अध्यासका निरन्तर त्याग करते रहो । निद्रया ोकवातीयाः शब्दादेरपि विस्फतेः । क्रचिन्नावसरं दसा चिन्तथात्मानमात्मनि ॥२८७॥ निद्रा, ठोकिकि बातचीत अथवा शब्दादि किसीसे भी आत्मविसमृतिको अवसर न देकर अर्थात् किसी भी कारणसे
-स्वरूपालुसन्धानको न भूटकर् अपने अन्तःकरणमे निरन्तर आत्मा- -का चिन्तन करो । ^
विवेकचूडामणि
मातापित्रोमलोदधुतं मलमांसमयं वुः ।
त्यक्त्वा चाण्डालवदूरं ब्रह्मीभूय कृती भव ॥२८८॥
माता-पिताकेः मल्से उत्पन्न तथा मल-मांससे भरे इर रसः रारीरको चाण्डाठके समान दूरसे ही त्यागकर ब्रह्मभावे सितः होकर कृतकृत्य हो जाओ ।
घटाकाशं महाकाश्च इवात्मानं परात्मनि ।
विलाप्याखण्डमवेन् तूष्णीं भव सदा मुने ॥२८९॥
हे सुने ! [ घटका नाश होनेप्र ] जैसे घटाकाश महाकामे मिक जाता है, वैसे ही जीवासाको प्रमात्मामे छीन करके सर्वदा अखण्डमावसे मोन होकर सित रहो ।
खप्रकाशमधिष्ठानं खयम्भूय सदात्मना ।
बह्याण्डमपि पिण्डं त्यज्यतां मलभाण्डवत् ॥२९०॥
जगत्क। अधिष्ठान जो खयंप्रकाा पर्रम है, उस सत्खरूप- से खयं एक होकर पिण्ड ओर ब्रह्माण्ड दोनों उपाधियोंको मलस भरे हए भाण्डक समान त्याग दौ । चिदात्मनि सदानन्दे देहारूढामहंधियम् ।
निवेस्य लिङ्गुतयृज्य केवलो मव सर्वदा ॥ २९१॥
देहम व्याप्त इई अदहुद्धिको नियानन्दखशूपम चिदात्मा खित करके ल्ङ्ग-शरीरके अभिमानको छोडकर सदा अद्वितीय रूपसे सित रहो ।
यत्रैष जगदाभासो दर्पणान्त; पुरं यथा ।
द्रहाहमिति ज्ञात्वा कृतकृत्यो मविप्यसि ॥२९२॥
९४.
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९५ अदहंपदाथै-निरूपण' निसमे यह जगत्का आमास दपंणमे प्रतिव्रिभ्वित नगरके. प्रतीत हो रहा है, वह ब्रह्मदीमें र, एेसा जान छेनेपर तुम
कृतक्रत्य हो जाओग ।
यत्पत्यभूतं निजरूपमादं चिदद्वयानन्दमरूपमक्रियस् । तदस्य भिथ्यावपुङ्त्यृजत- च्छट्षवद्रेपमुपात्तसात्सनः ॥ २९२॥। जो चेत्तन, अद्वितीय) आनन्दखरूप आ निच्िय व्रह्म स्य रूप तथा अपना आच ( पहल मूर ) खर्प €? उसका प्रात होकर नवके समान धारण कयि इस शरीररूपी ध्वा वेषकी, आस्था व्याग दो । (4 ¢ अदंपदाथं-निरूपण सर्वात्मना दृश्यमिदं मषैव नैवाहमर्थः श्षणिकत्वद्ोनात् । जानाम्यहं सर्वमिति प्रतीतिः कुतोऽहमाद्ः; क्षणक सिभ्यत् ॥२९४॥।' यह दृदय-जगत् सर्वथा मिथ्या हौ € । इसकी क्षणिकता देखनेभे आती है, इसल्यि यह अहं पदाथ नह हो सकता । अत इन क्षणिकं अहंकारादिको भै सव इ जानता द्र देसी प्रतीति कैसे हो सकती है £ अहंपदाथैस्त्वहमादिसाश्षी 6 नित्यं सुपुसषावपि भावरदशेनात् ।
विवेक-चूडामणि ९.६
नरृते यजो ` नित्य इति श्रुतिः खयं ` ततप्त्यगात्मा ˆ सदसद्विलक्षणः ॥२९५॥ अहंपदाथं तो अहंकार आदिका साक्षी है, क्योकि उसकी सत्ता सु््तिमे भी देखी जाती है । खयं श्रुति भी उसे “यजो नित्य? -एेसा कहती है । अतः वह प्रत्यगात्मा है ओर सत्-असतसे विलक्षण है | विकारिणां , सवंविकरारवेत्ता नित्योऽविकारो भवितं समहंति । मनोस्थखप्नसुषुशषिष स्फुटं पुनः पुनद्टमसत्वमेतयोः ॥२९६॥ अहंकार आदि व्रिकारी वस्तुओंके समस्त विकारोको जानने अला नित्य तथा अत्रिकारी ही होना चाहिये । मनोरय-खप्न ओर् सुधति-कालमे इन स्थूल-सूक्षम दोनों शरीरे फा अमाव वार् वार स्प देखा गया है [ अतः ये अहंपदा्थं असमाः कसे हो सकते है £ ] अतोऽभिमानं त्यज मांसपिण्डे पिण्डाभिमानिन्यपि वबुद्धिकल्यिते । कालत्रयावाध्यमखण्डवोधं ज्ञत्वा खमात्मानयुपेहि शान्तिम्, ॥२९७॥ ईसञ्यि इस मस.पिण्ड ओर इसके वुद्धि-कल्पित अभिमानी जीवम अबुद्धि छोड़ो ओर् अपने आत्माको तीनों कालम अबाधित ओर अखण्ड ज्ञानखरूप जानकर शान्ति-खम करो |
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२.७ अहंकार -निन्दा
त्यजाभिमानं दुरगोत्रनास्- सपाभरमे्वाद्रशव भितेषु । > >) ©. ^+ ठङ्स्य धृसनाप् कृतृतादा- स्त्यद्त्मा भवाखण्डसुखस्वसूपः ॥ २९८॥ इसव्यि दिवल्वि मांसपिण्डे आश्रित रहनेवाले, कुक गोत्र, नाम, रूप ओर् आश्रमका अभिमान छोड़ो तथा कतौपनः मक्तापन आदि छिङ्गेहके धर्मोको भी व्यागकर् अखण्ड आनन्दखरूप हो जाओ । ५ ~. अहकारनन्दया सन्त्यन्ये प्रतिन्धाः पुंसः संसारहेतवो दृष्टाः । तेषासेकं मूं प्रथमविकारो भवत्यहङरः ॥२९९॥ पुरुपको इस संसार-बन्धनकी प्रा्िके कारणल्प ओर भी अनेक श्रतिबन्ध है; किन्तु उन सवरका मू प्रथम विकार अहंकार ही है, [ क्योकि अन्य समस्त अनात्मक ्रादरमाव इसी होता है | । यावत्स्यात्खस्य सम्बन्धोऽहङ्कारेण दुराटमना । तावन्न लेशमात्रापि शुक्तिवातां बिरक्षणा ॥२००॥ जवतवः इस दुरात्मा अहङ्कारे आ्माका सम्बन्ध है, तत्रतक सुक्ति-जैसी विलक्षण वातकी लेशामात् मी आशा न रखनी चाहिये । अदङ्ारग्रहान्धुक्तः खरूपुपपद्यते । [> © ~~ नै ट) चनदरवद्विमरः पूणः सदानन्दः ख्यपरमः ॥९० १॥ विण न्चू९ ५)
विवेक-चूडामणि
अहंकाररूपी प्रह ( राह ) से मुक्त हो जानेपर चन्द्रम समान आत्मा निर्मल, पूरणं एवं नित्यानन्दखरूप खयंप्रकारा होकर अपने खरूपको प्रप्त हो जाता है ।
यो वा पुरे सोऽहमिति प्रतीतो बुद्धया विक्छप्तस्तमसातिमृटया । तस्येव निःरोपतया विनाशे ब्रहमास्ममावः प्रतिबन्धश्चूल्यः ।३०२॥ अज्ञानसे अव्यन्त मोहित बुद्धिकी कल्पनासे इस शरीर हीजो यही मँ हरसी प्रतीति हो रही है, उसका सर्वथा नारा हो जानेप ब्रहम निर्बाध आलभाव हो जाता है । ब्रह्मानन्द निधिरमहावलवतादङ्रघोराहिना सवे्टयारमनि रक्ष्यते गुणम्येश्डेखिभिर्मसतकः । विज्ञानाख्यमहासिना दयुतिमता विच्छिद्य शीत्रयं निमूलयादिमिमं निधि सुखं धीरोऽतुमोक्त क्षमः ३०२ बरह्ानन्दरूपी प्रमधनको अर्हकाररूप महामयङ्कर सरन ` अपने स, रज, तमरूप तीन प्रचण्ड मस्तके ल्पेव्कर छिपा रक्ला है; जव विवेकी पुरुप अनुमज्ञानरूप चमचमाते हए महान् खड्गसे इन तीनो मस्तकोको काट्कर इ सर्पका नारा कर देता है, तभी वहं इस परम आनन्ददायिनी सम्पत्तिको भोग सकता है ।
यावद्वा यक्किच्रिद्धिषदोषसफूतिरसि वेदैदे । कथमारोग्याय भवेत्द्रदहन्तापि योगिनो युक्त्यै ।॥ ३०४।॥
ह
९९ अहंकार-निन्दा
जबतकः देहमे विषका थोडा-सा भी दोप रहता है, तवतक बह उसे नीरोग कैसे रहने देगा १ उसी प्रकार योगीकरी मुक्तके मर्म अहकारका यक्विश्चित् केशा भी भारी प्रतिबन्धक होता है ।
अहमोऽसन्तनिव्ररया तत्कृ तनानाविकससंहुत्या।
्रत्यवतःयविवेशरादथमहमसी ति विन्दते तचम् ।॥२०५॥
अहंकारकी निःलेष निन्त्तिपे उससे उत्पन्न इए नाना प्रकार करे विकन्पका नादा हो जनेपर आस्मतचक्रा विवेक दहो जनेसे वयह अला ही तै ह देता तबोध प्रात होता है ।
अहृ्कत्यसिन्नहमिति मतिं यश्च सहसा विकारात्मल्यातमप्रतिष्ठरजञपि स्वखितिष्पि । यदध्यासासप्ाप्षा = जनिग्रतिजराटुःखबृहख प्रतीचधिनपूरतेसतव सुखतनोः संखतिरियम् ॥२०६॥ इस विकारात्मक, आतप्रतिविम्बुक्त ओर खरूपको दिपनेवले अहंकारम अहंबद्धिको शीघ्र ही वयग दे । इसके अध्यासते ही तञ्च चैतन्यभूर्तिं, आनन्दखर्प ्र्यगात्माको जन्मः मरण, बुदापा आदि नाना प्रकारके दुः्खोसे पूणं॑यह॒ संसार बन्धन प्राप्त इआ है । सदैकरूपस्य चिदात्मनो विमो- रानन्दमूर्तरलवकीतेः | नैवान्यथा कवाप्यविकारिणस्ते विनाहमध्यासमपुष्य संसतिः ॥२०७॥
विवेक-चूडामणि
१० । इस अहंकारख्य अध्यास तरिा तज्ञ सर्वदा एकरूप, चिदात्मा, व्यापक, आनन्दखरूप, पक्त्रिकीति ओर अविकारी आत्माकौ ओर किसी प्रकार संसारबन्धनकी प्राप्ति नहीं हो सकती | तसादहङ्कारमिमं बु भीक्तुगले कण्टकवत्प्रतीतप् । विच्छिद्य विज्ञानमहासिना स्फुटं अडकष्ासस।म्रञ्यसुखं यथेष्टम् ।॥३०८॥ इसघ्यि हे विदन् ! भोजन करनेवले पुरुषे गठेमे कोधे समान खटकनेवलटि इस अहंकारूप अपने द्रुको विज्ञान्य महाखङ्ग- सं भटी प्रकार छेदन कर् आम-सम्राव्य-सुलका यथे भोग करो | ततोऽहमादेविनिवत्य वृत्ति सन्त्यक्तराणः परमाथलभात् | तूष्णीं समास्खात्मसुखानुमूत्या पूर्णात्मना बरह्मणि निर्विकल्पः ॥२०९॥
किर अहंकार आदिकी कर्ती, भोक्तृ आदि वृत्तियोवो ह- कार परमाथ-तच्वकी प्राति रागरहित होकर आत्मानन्दके अनुभवे ब्रह्मभाव पूणतया सित होकर निर््िकल्प ओर मोन हो जाओ ।
समूलढरचोऽपि महानहं पुन-
्य्लेषितः स्वादि चेतसा क्षणम् । सञ्ीव्य विकषेपशतं करोति
नभखता प्राहरृषि वारिदो यथा ॥२१०॥
१०१ क्रिया, चिन्ता ओर वासनाका त्याग
यह् प्रवर अहंकार जड-मूरसे न्ट कर दिया जनेपर भी यदि एक क्षणमात्रको चित्तका सम्भकी प्रपत करके तो पुनः प्रकट होकर सैकड़ों उत्पात खडे क देता है; जैसे करि वपीकाव्मे बयुसे संयुक्त हआ मेव ।
~ [ मो क्रिया, चिन्ता ओर बासनाका साग निगृह्य शात्रोरहमोऽवकाशः क्चिनन देयो विपयानुचिन्तया । स॒ एव सञ्जीवनहेतुरस्य ्र्षीणजम्बीरतरोयिम्बु । २११॥ इस अहंकारखूय रातुका निग्रह कए लेनेपर फिर विषयचिन्तनके दारा इसे शिर उठनेका अव्रत कभी न देना चाहिये, क्योंकि न हए जम्बीरे वृक्षक व्य जक्के समान इततके पुनरुत्ीवन ( फिर जी उठने ) का कारण यह् व्िय.चिन्तन ही है । देहात्मना संखित एव कामी विलक्षणः कामयिता कथं स्यत् । अतोऽर्थसन्धानपरलमेव ` मदप्रसक्त्या भववन्धदेतः ॥२१२ ॥ जो पुरुष देहात्मद्धिे स्थित है वही कामना होता दै । जिसका देहसे सम्बन्ध नहीं है, बह विरुक्षण जला केसे सकाम हो सकता है; इसव्यि मेदासक्तिका क्ण होनेते वरिय-चिन्तनमे गा रहना ही संसास-बन्धनका सुष्य काण है ।
विवेकचूडामणि १०२
का्प्रवर्धनाद्वीजप्बरदधिः परिदस्यते | ` का्यनाशद्वीजनाशस्तसात्का्यं निरोधयेत् ।३१३॥
कारके बदढुनेसे उसके वीजकी वृद्धि होती भी देखी जाती है ओर का्यैका नाश हो जनेसे वीज भी नष्ट हो जाता है इसय्यि कार्यका ही नाश कर देना चाहिये ।
वसनवरद्धितः कायं कायेव्रदरया च वासना ।
वर्धते स्वंथा पुंसः संसारो न निवर्तते ॥३१४॥
वासनाके वढृनेसे कायं वढता है ओर कार्थके बढृनेसे वाक्षना दती है; इस प्रकार मनुष्यका संसारबन्धन बिलकुल नहीं टता |
संसारन्धविच्छित्ये तद्दरयं॑प्रदहेयतिः ।
वासनावृदधिरेताभ्यां चिन्तया क्रियया बहिः ॥३१५॥
इसलिये संसारवन्धनको काटनेके व्यि सुनि इन दोरनोका नाश करे । विषयोंकी चिन्ता ओर वाहय-करिया इनसे ही वासनाकी बृद्धि होती है ।
ताभ्या प्रवधमाना सा घते संसतिमात्मनः ।
वरयाणां च क्षयोपायः सर्वाबखासु सर्वदा ॥३१६॥
सवत्र सवतः सवं बरह्ममात्रावलाकनम् |
सद्धाववासनादारव्यात्तत्रयं लयमस्नुते ॥२१७॥
ओर इन दोनोसि ही वढकर् वह वासना आत्मके लिये ससर्प बन्धन उत्पल करती हे । इन तीनोके क्षयका उपाय सव अवस्याओंमे सदा सब जगह सव ओर् सवद ब्रह्मात्र देखना ही
३०३ क्रिया, चिन्ता ओर वाखनाका त्याग ड | इस ब्रह्ममय वासनके दद् हो जनेपर् इन तीनंका ख्य हो जाता हे । क्रियानाल्ञे सवैच्िन्तानाश्ोऽसाद्रासनाष्षयः । वासनप्रक्षयो सेष्टः सा जीवन्पुक्तिरिष्यते ।॥३१८॥ करिये नष्ट ह्यो जानेसे चिन्ताका नाश होता है ओर {चिन्ताके नासे वासनाओंका क्षय होता है; इस वक्नाक्षयका नाम ही मोह है ओर यदी जीवन्धुक्ति कहलाती है । सदसनासछूर्िविजम्भणे सति दसौ विलीना तहमादिवासना । अतिप्रकृष्टाप्यरुणग्रभायां विलीयते साधु यथा तमिस्रा ॥३१९॥ सूर्यकी प्रमाके उदय होते ही जैते अत्यन्त घोर अँधेरी रातका भी सर्वधा नाशाहो जाता है उसी प्रकार ब्रह्-वास्तनाकी स्छर्ति- ` का विस्तार होनेपर यह अहंकारादिकी वासनां कीन हौ जाती है ।
तमस्तमःका्थमन्थंजारं न॒ दृश्यते सद्युदिते दिनेश । तथाद्वयानन्दरसलुमूतौ
सैवास्ति बन्धो न च दुःखगन्धः ॥२२०॥ त | सू्थके उदय होनेपर जते अन्धकार ओर उसमे होनेवाले { चो आदि ] अनर्थसमूह कहीं दिखलयी नदी देते, वैसे दी ङ्स अद्वितीय आत्मानन्द रका अनुभ होनेपर न तो संसार- बन्धन रहता है ओर न दुःखका ही गन्ध एता है।
विवेक -चूडामणि १०४ प्रमाद-निन्दा
दृश्यं प्रतीतं प्रविङापयन्स्यं सन्मात्रमानन्दधनं विभावयत् | समाहितः सन्बहिरन्तरं वा कारं नयेथाः सति कर्मबन्धे ।॥३२१॥ यदि तम्हारा कर्मबन्धन अभी रोष है तो इस प्रतीयमान दृद्यका ख्य करते इृ९ तथा वाहर-भीतरसे सावधान रहकर अपने सत्तामात्र आनन्दघन स्वरूपका चिन्तन काते हए कालक्षेप करो ॥ प्रमादो ब्रहमनिष्ठायां न कर्तव्यः कदाचन | प्रमादो स्तयुरित्याह मगवान््ह्मण; सुतः ॥३२२॥॥ ब्र्मविचारमभं कमी प्रमाद ( अपवधानी ) न करना चाहिये, ` क्योकि ब्रह्माजीके पुत्र ( भगवान् सनक्कुपमारजी ) ने ध्प्रमाद मृद्यु हे"-पेसा कहा है । न प्रमादादनर्थोऽन्यो ज्ञानिनः खस्वस्यतः । ततो मोहस्ततोऽदंधीस्ततो बन्धस्ततो व्यथा ॥ ३२३॥ विचारान् पुरुषके च्यि अपने स्वरूपानुसन्धानसे प्रमाद केसे वकः ओर कोई अनर्थं नहीं है, वथो इसीसे मोह होता दै ओर मोहसे अहंकार, अहंकारसे बन्धन तथा बन्धनसे क्लेदाकी श्राति होती है । विपरयामिषुलं द्र विद्वांसमपि विस्मृतिः । विक्षेपयति धीदोपैर्योपा जारमिव प्रियम् ॥२२४॥
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०५ प्रमाद्-निन्दा
जिस प्रकार कुल्य स्री अपने प्रेमी जार-पुरुषको उसकी बुद्धि विगाड़कर पाग बना देती है उसी प्रकार विद्वान् पुरुषको भी विषयो प्रवृत्त होता देखकर आसव्िस्परति बुद्धिदोषोसे विक्षिप्त कर देती है ।
यथापदरष्टं रेबालं क्षणमात्रं न॒ तिष्टति ।
आद्रृणोति तथा माया राज्ञं घापि पराङ्मुखम् ॥२२५॥
जिस् प्रकार शोबाक्को जल्परसे एक वार् हटा देनेपर वहं क्षणभर भी अख्ग नहीं रहता, [ तुरंत ही फिर उसको टंक ठेता है ] उसी प्रकार अआत्पविचारहीन दवानूको भी माया पिर चेर् लेती है ।
रक्ष्यच्युतं सय्यद चित्तमीषः
द्रिं सन्निपतेत्ततस्ततः । प्रमादतः प्रच्युतकेलि्न्दुकः सोपानपडङ्क्तौ पतितो यथा तथा ॥३२६॥
तेते असावधानतावश्च ८ हायते द्ुटकर ) सीदियोपर गिरी इई खेलकी गेंद एक सीदीसे दूसरी सं दीपर गिरती इई नीचे चटी जाती है वैसे ही यदि चित्त अपने रक्ष्य ( रह) से हटकर योड़ा-ता भी वहिरभुल हो जाता है तो फिर वरावर नीचेदीकी ओर गिरता जाता दै ।
बिषयेष्वाविक्षच्चेतः सङ्कल्पयति तद्गुणान् ।
सम्यक्ङ्कखनात्कामः कामत्पुसः प्रवतेनम् ॥३२७}
विवेकचूडामणि १०६
विषर्ोमे लगा हुआ चित्त उनके गुणौका चिन्तन करता है, फिर निरन्तर चिन्तन करनेसे उनकी कामना जाग्रत् होती है ओर कामनासे पुरुषकी विषयमे प्रवृत्ति हो जाती है ।
ततः स्वसूपविभ्रंो विभ्रष्टस्त॒ पतत्यधः ।
पतितस्य विना नाशं पुननारोह श्ष्यते ।
सङ्कटपं वजयेत्तसात्स्वान्थंख कारणम् ।३२८॥
विषयोकी प्रवृत्तिसे मनुष्य आत्खरूपसे गिर जाता है ओर्
जो एक वार खरूपसे गिर गया, उसका निरन्तर अधःपतन होता `
रहता है तथा पतित पुरुषका नाशके सिवा फिर उत्थान तो प्रायः कभी देखा नहीं जाता । इसलिये सम्पूर्णं अनेक कारणह्प सङ्कल्पको व्याग देना चाहिये । । अतः प्रमादान्न परोऽस्ति मरत्यु- विवेकिनो ब्रह्मविदः समाधौ । समाहितः सिद्धेति सम्यक् समाहितात्मा भव सावधानः ॥३२९॥
इसलिये विवेकी ओर ब्रहवेतता पुरुपके ल्यि समाधये प्रमाद "
अरनेसे बढ़कर ओर कोई मृयु नीं है; समाहित पुरुष ही पूर्ण आत्मसिद्व प्रात कर सकता है; इसव्यि सावधानतापूर्वक चित्तको समाहित ( सिर ) करो |
असत्-परिहार जीवतो यख कंवल्यं बिदेहे स॒ च केवलः । यक्किश्चित्पश्यतो भेदं भयं चरते यजुःशुतिः ॥३२०॥
2 असत्-परिहार
जिसने जीते हए ही कौवल्यपद प्राप्त कर ल्या है उसकी देहपातके अनन्तर भी कौवल्यसुक्ति ही होती है, ( मेददर्शीकी नदीं )
क्योकि जो थोडा-सा भी भेद देखता ह उसके छ्यि यजुरवेदकी श्रुति भय बताती है |
यदा कदा वापि विपश्चिदेष बरहमण्यननतेऽप्यणुमात्रमेदम् । प्यत्यथायष्य भयं तदेव यद्वीकषितं भिन्नतया प्रमादात् ॥३३१॥ जब कभी यह विद्वान् अनन्त ब्रह्ममे अणुमात्र भी मेद्-दषटि -करता है तभी इसको भयकी प्राप्ति होती है, क्योकि खरूपके अ्रमादसे ही अखण्ड आत्मामं मेदकी प्रतीति इई है । भ्रतिस्मृतिन्यायशतेनिषिदध द द्ये यः स्वात्ममतिं करोति । उपैति दुःखोपरि दुःखजातं निषिद्धकता स मलिम्डुचो यथा ॥३३२॥ श्रुति, स्पृति ओर सैकड़ों युक्तियोे निषदि इए इस चस्य ( देहादि ) म जो आतमबुद्धि करता है वह निषिद्ध वामं करनेवाले -चोरके समान दुःख-पर-टुःख मोगता है । सत्यामिसन्धानरतो विषक्तो मह्वमात्मीयश्ुपैति नित्यम् । मिथ्यामिसन्धानसतस्त॒ नष्येद् दष्ट तदेतद चोरचोरयोः ॥३३२॥
विवेक-चूडामणि १०९
जो अद्वितीय ब्रह्मरूप सव्य पदार्थकी खोज करता है वही सक्त होकर अपने नित्य महचको प्राप्त करता है ओर जो मिष्या दद्य पदाथेकि पीछे पड़ा रहता है वह नट हो जाता है; देसा ही साधु ओर चोरके विषयमे देखा भी गया है | यतिरसदनुसन्धिं बन्धहेतुं विहाय स्वयमयमहमखीत्यात्मद्टयैव तिष्ठेत् । सुखयति नु निष्ठा ब्रह्मणि स्वातुभूत्या हरति परमविद्याकायंदुःखं प्रतीतम् ॥३३४॥ यतिको चाहिये किं असत्-पदार्थोका पीदा छोडकर “यह साक्षात् व्रह्म ही मै ह" रेसीः आत्मदष्टिपे ही सिर होकर रहे । अपने अनुभवे उत्पन्न हई ब्रहनिष्ठा ही अविचाके कार्थभूत इस प्रतीयमान प्रपञ्चक दुःखको दूर के परम घुख देती है । बाह्याुसन्धिः परिवर्थयेत्फलं दुरवासनामेव ततस्ततोऽधिकाम् । ज्ञाता विवेकैः परिहूत्य वाद्यं स्वातमायुसन्धिं विदधीत नित्यम् ॥३३५॥ इस प्रसंगका छन्दोग्योपनिषद् ( ६ । १६ | १-२ ) भें इस प्रकार वर्णन क्रिया दै किं जित व्यक्तिर चोरी करनेका सन्देह होता है उसे राजपुरुष तपाया हुमा परय देते ह । यदि उसने चोरी की होती है ओर बह भ्मँने चोरी नदीं कीः एसा ककर मिथ्या भाषण करता है तो उससे दग्ध दो जाता दै ओर तत्र राजपुरप्र मी उसे मार डाके रह; ओर यदि वह॒ वास्तवमे चोर॒नहीं होता तो सत्यसे सुरक्षित रहनेके करण बह उस परते दग्ध नहीं होता ओर उसे राजपुरुष भी छोड़ देते दै ।
0
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१.4
( | ॥
१०९ असत्-परिहार
बाह्य वरिषोका चिन्तन भपने दुर्व्तनाख्प फल्को दी उत्तरोत्तर वदढाता है इट्य वरिवेकूर्वकः आत्मखरूपको जानकर्
बाह्म विषयो छोडता हआ निव्य आत्मानुसन्वान ही कता रहे ।
वाह्ये निर्दर मनसः प्रसन्नता मन्रसादे प्रमत्मदशेनम् । तसिन्युच््ट भवघन्धनाशो वहिनिरोधः पदवी विक्त: ॥२३६॥ बाहा पदार्भोका निषेध कर देनेप् मनते आनन्द होता है जीर मनम आनन्दका उद्रेक होनेपर परमासमाता साक्षात्कार होता है ओर उत्तका सम्यक् सक्षातकभर होनेपर॒संसार्- जन्धनका नाच हो जता है । इस प्रकर ब्य वस्तुओका निषेध ही मुक्तिका मग है । कः पण्डितः सन्सदसदविवेकी श्रुतिप्रमाण प्रमाथदर्ी । जानन्हि दर्याद्षतोऽवरम्वं खपातहेतोः यिशवन्ुणश्चः ।॥२२॥ सुत्-असत् वस्तुका क्रविकी) श्रृतिप्रमाणक। जाननेवाखा, परमार्थ.तखका ज्ञता रेता कौन बुद्धिमान् होगा जो मुक्तिवी इच्छा रखकर भी जान बृ्ञकर वबाठ्कके समान अपने पतनकेः हेतु असत् पदार्थोका प्रण करेगा । देहादिसंसक्तिमतो न सक्तिः | क्तस्य देदहा्भिमत्यमावः ।
ह, विवेक-चूडामणि ११० । सप्तस्य नो जागरणं न जाग्रतः
सप्नस्तयोर्भिन्नगुणाभ्रयत्वात् ॥३ ३८॥ जिसकी देह आदि अनात्मवस्तुओंते आसक्ति है उसकी सुषि नहीं हो सकती ओर जो मुक्त हो गया है उका देहादि अभिमान नहीं हो सकता । जसे सोये हृ पुरुषको जागृतिका अनुभव नहीं हो सकता ओर जाग्रत् पुरुषवो खप्नका अनुभव नहीं हो सकता, क्योकि ये दोनो अवस्थां मिनन गुणोके आश्रय रहती है |
आत्मनिष्ठा विधान अन्तवहिः स्वं सिरजङ्गमेषु = ्ञानात्मनाधारतया पिरोक्य | त्यक्तखिलोपाधिरखण्डस्पः; ` । ूणात्मना यः सित एष॒ युक्तः ॥२३९॥ जो समस्त स्थावर-जङ्गम पदाथेकि भीतर ओर बाहर अपनेको कञानखरूपसे उनका आधारभूत देखकर समस्त उपाधियोको छोड़कर अखण्ड परिपूरणसे सित रहता है, वही सक्त है ।
स्वात्मना बन्पव॒क्तिेतः ६ सर्वात्मभावान्न परोऽस्ति कथित् । दर्याग्रह सत्युपपद्यतेऽसौ
सर्वात्मभावोऽस्प सदातमनिष्टया ॥ ३४०॥ संसार-बन्धनसे सर्वथा मुक्त होने सवत्मि-भाव ८ सबको आत्मारूप देखनेके भाव ) से बढ़कर ओर कोई हेतु नहीं है ।
` १.
आत्मनिष्टाका विधान्
निरन्तर आसमनिष्ठामे सित रहनेसे द्दयका अग्रहण ८ बाध ) होनेपर इस सर्वातममावकी प्राप्ति दोती दै । दृरयस्यागरदणं कथं चु घटते देहात्मना तिष्ठतो वा्या्थालुभवप्रसक्तमनसस्तत्त्कियां कुतः | संन्यस्ताखिलधरमकर्मविपयनित्यात्मनिषटपर सतचवञकरणीयमात्सनि सद नमदेच्छुमियेललतः॥ २४१ , जो छोग देहासबुद्िसे धित रहकर वाद्य पदारथोकी मने आसक्ति रखकर उन्दीवेः टियि निरन्तर कामे गे रहते है; उनको ददयकी अप्रतीति कैसे हो सकती है १ इसट्यि नित्यानन्दे. दिये कि वह समस्त धर्म, कर्म ए विषयो-
इच्छुक तचज्ञानीको चा रते तत्पर हो अपने आसाम प्रतीत
को व्याग कर् निरन्तर अत्मनि होनेवले इस द्द्यःप्रपञ्चकां ्रयह्ूरवक बाध करे । तार्बल्यसिदधये , भिक्षोः दृतश्रवणकमेणः । समाधिं विदधाल्येषा शान्तो दान्त इति श्रुतिः ॥२४२॥ वान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः ( घ्र° ४। %। २३) यह श्रुति यतिके चि वेदान्त-श्रवणके अनन्तर सार्वाल्यमावकी सिद्धिके ल्यि समाधिका विधान कती है । आरूढशक्तेरदमो विनाशः कर्तु न शक्यः सहसापि पण्डितैः
ये निविकटपाख्यसमाधिनिश्वला- स्तानन्तरानन्तभवा हि वासनाः
१1
॥ ३५३४
र रररनजगनन न १ ` च
विवेक-चूडामणि ११२ "
अहंकारकी शक्ति जवतक बद्ी-चदरी रहती है तवतक को विद्वान् उसका एकाएकी नारा नहीं कर सकता, क्योकि जो निर्धिकल्प-समाधिमें अव्रिचर-मावते शित ह्यो गये हैँ उनके अंद्र भी वासनाएं देखी जाती हैं । अरहबुद्धयैव मोहिन्या योजयिववावतेर्वलात् । विक्षेपशक्तिः पुरुप विक्षेपयति तद्गुणः ॥३४४॥ मोहित कर॒ देनेवाटी अहबुद्धिके साथ अपनी अआ्ररण- शक्तित दवारा पुरुका संयोग कराकर विक्षेपशक्ति उस ८ अहंबुद्धि } के गुणोंसे मनुष्यको विक्षिप्त कर देती है । विक्षपशक्तिविजयो विषमो विधातुं निःशेषमवरणशक्तिनिवृस्यभवे । इण्दस्ययोः स्फुटपयोजलवद्विभागे नदयेत्तदावरणमात्मनि च खभावात्। निःसंशयेन भवति प्रतिबन्धशल्यो विक्षेपणं न हि तदा यदि चेन्मृषार् ।३४५॥ सम्यग्विवेकः स्फुटबोधजन्यो । „ _ विभज्य दृ्श्यपदाधेत्म् । छन्त मायाकृतमाहबन्ध यसखादवि॒क्तस्थ पुननं संघृतिः ॥ ३४६॥ अवरणराक्तिकी पूर्णं निच्रत्तिके त्रिना विक्षेप-शक्तिपर विजय श्राप करना अत्यन्त कठिन है । दूध ओर जल्के समान द्रा ओर दश्यके अखग-अख्ग होनेका स्पष्ट ज्ञान हो जनेपर आमामे छायी इई वह॒ अवरण-राक्ति अपने आप ही नष्टदहो जाती है ।
१११ आत्मनिष्टाका विधान
यदि मिथ्या दीनेवले [इन बुद्धि आदि | पदार्थेमि दरश ओर दद्य पदा्ेकि खरूपको पृथक् पथक् करके, स्प बोधके कारण होनेवाखा निःसन्देपूरवक बाधरहित पूरणं विवेक हो जाय तो फिर निक्षेप नहीं होता ओर वह विवेक मायाजनित मोहवन्धन- को भी काट डाल्ता है; जिससे सुक्तं इए पुरुक किर [ जन्म- मरणरूप ] संसारकी प्राति नदीं होती । प्रावरैकत्वविवेकवद्ि- दहत्यविद्यागहनं दयशेषम् । किं स्यात्पुनः संसरणस्य बीज- मदरैतमावं सयुपेधुषोऽख ॥२४७॥ ब्रह्म ओर आत्माका एकलज्ञानरूप अग्नि अवियारूप समस्त जनयो मस्म कर देता है । [ अव्रियाके सवैथा न हो जानेपर | जब जीवको अदरैत-मावकी प्राति हो जाती दहै तब उसको पुनः संसार.प्रापिका कारण ही क्या र जाता हैट आवरणस्य निवृत्ति ष भेवति च सम्यक्पदाथदश्ेनतः । मिथ्याज्ञानविनाश्च- सतदरद्िकषेपजनितदु ःखनिवृत्तिः ॥३४८॥ | आत्मवस्तुका टीक-ठीक सश्षात्कार् हो जानेसे आवरणका नारा हयो जाता है तथा मिथ्याज्ञानका नारा ओर विक्षिपजनित दुःकी निदृत्ति हो जाती है । `
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च विवेक-चूडामणि ११४
अधिष्टाननिरूपण । एतलितथं दष्टं संम्यग्रन्ुखरूपविज्ञानात् । तसाद्रस्तु सतचं ज्ञातग्यं बन्धघ्ुक्तये विदुषा ॥३४९॥ [ र्जुमे मके कारण सर्पकी प्रतीति होती है ओर उस मिथ्या प्रतीतिसे ही भय, कम्प आदि दुःखोकी प्राप्ति होती है किन्तु दीपक आदिके द्वारा जिस प्रकार ] रञ्जुके खरूपका यथार्थ ज्ञान होते ही [ रज्जुका अज्ञान ८ आवरण ); अङ्ञानजन्य सपं ८ मल ) ओर सर्षप्रतीतिसे होनेवाले मयः, कम्प आदि ८ विक्षेप ) | ये तीनों एक साथ निवृत्त होते देखे जति है [ उसी प्रकार आत्मघरूपका ज्ञान होनेपर॒ आत्माका अज्ञान, अज्ञानजन्य प्रपञ्चकी प्रतीति ओर उससे होनेवले दुःखकी एक साथ ही निवृत्ति हो जाती है] इसट्िये संसार-बन्धनसे दटनेके लिये विद्वानूको तच्वसहित आत्मपदार्थका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । अयोऽग्नियोगादिव सत्समन्वया- न्मत्रादिरूपेण विजुम्मते धीः । तत्काय मेतद्द्वितयं यतो मषा दष्टं भ्रमख्ममनोरथेषु ॥३५०॥ अग्निक संयोगसे जैसे खहा [ दाक आदि नाना प्रकारके रूपोको धारण करता है ] उसी प्रकार आत्मके संयोगसे बुद्धि [ शब्द, स्पशे, रूप, रस ओर गन्ध आदि ] नाना प्रकारके विषयमे प्रकाशित होती है । यह दैतम्पच्च उस बुद्धिका दी कार्यं है, इसख्यि मिथ्या है; क्योकि चम, खप्न ओर मनोरथके समय इसकी प्रतीतिका मिथ्यात्व स्पष्ट देखा है ।
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११५ अधिष्ठान-निरूपण
ततो विकाराः ब्रकृतेरहयुला देहावसाना विषयश्च सर्वै क्षणेऽन्यथामावितया द्यमीपा- म्षखमारमा तु कदापि नान्यथा ॥३५१॥ इसल्यि अहंकारसे ठेकर देहतक प्रकृतिके जितने विकार अथवा विषय दहै वे सभी क्षण-क्षणमे बदलनेवाठे होनेसे असत्य है, आत्मा तो कमी नहीं वदल्ता, वह तो सदा ही एकरस रहता है । नित्याद्याखण्डचिदेकसूपो बुद्धयादिसाक्षी सदसदिटक्षणः । , अह॑पदप्रत्ययलकषितार्थः ग्रत्यक्सदानन्दघनः परात्मा ॥३५२॥ जो (अह पदकी प्रतीतिसे लक्षित होता है वह नित्य आनन्दघन परमातमा तो सदा ही अद्वितीय, अखण्ड, चैतन्यखरूप, बुद्धि आदिका साक्षी, सत्-असतसे मिनन ओ, प्रत्यक् ( अन्तरतम ) है । इत्थं विपश्ित्सदसद्िभज्य निश्चित्य तं निजबोधदृष्टया । ज्ञात्वा खमात्मानमखण्डवोधं तेभ्यो विभक्तः खयमेव शाम्यति ।॥२५३॥ विद्वान् पुरूष इस प्रकार सत् ओर असत्का विमाग करके अपनी ज्ञान-दषिसे तवका निश्चय करके ओर अखण्ड भोध- खरूप आत्माको जानकर असप्पदार्थेसि मुक्त होकर खयं दी शन्त हो जाता है ।
श
विवेकचूडामणि ११६ |
समाधिनिरूपण
अन्ञानहदयग्रन्थरनिःरेषविर्यस्तदा ।
समाधिनाविकल्पेन यदद्रैतात्मदशेनस् । ३५४॥ |
अज्ञानरूप हृदयकी ग्रन्थिका स्व॑था नारा तो तभी होता है जब निर्विकल्प समापिद्रारा अद्वैत आत्मखखूयका साक्षात्कार कर् छया जाता है ।
त्वमहमिदमितीयं करपना बुद्धिदोषात्
प्रभवति परमातमन्यद्वये निवि्ेषे। प्रविलसति समाधावस्य सर्वो विकल्पो विलयनुपगच्छेद्रस्तुतत्वावधृरया ॥ ३५५॥
अद्वितीय ओर निरविरोष परमात्ामे बुद्धिके दोषसे त्, मे, यह'- एसी कल्पना होती है ओर वही सम्पूरणं विकल्य समाधिमे विन्नखूपसे स्फुरित होता है; किन्तु तत्व-वस्तुका यथावत् ग्रहण होनेसे बह सब रीन हो जाता है ।
शान्तो दान्तः परयुपरतः क्षान्तियुक्तः समार्धि
्न्नित्यं कलयति यतिः खस्य सर्वात्मभावम् ।
तेनाविद्यातिमिरजनितान्साघु दग्ध्वा विकल्पान्
जह्याकृत्या निवसति सुं निष्कियो निर्विंकट्पः ॥२५६॥
योगी पुरुष चित्तकी शान्ति, इन्द्रियनिग्रह, विषयो उपरति ओर क्षमासे युक्त दोकर समाधिका निरन्तर अम्यासं करता इआ अपने सवौत्मभावका अनुभव करता है ओर उसके द्वारा अविवा- रूप अन्धकारसे उत्पन्न इए समस्त विकल्पोका भटीमाति ध्वंस
११७ समाधि-निरूपण
करके निष्छिय ओर निर्विकल्प होकर आनन्दपूर्वक ब्रह्मकार्- वत्तिसे रहता है । समाहिता ये प्रविराप्य वाद्य
श्रो्ादि चेतः खमहं चिदात्मनि । त॒व शक्ता भवपाशबन्धैः नन्यितु पारोक्ष्यकथाभिधायिनः ॥३५७॥ जो लोग श्रोत्रादि इन्दरियवगै तथा चित्त ओर अहंकार इन बाह्य वत्तुओंको आत्मामे रीन कके समाधिमे सित होते है वेदी संसारबन्धनसे सूक्त है, जो केवर पतेक्च त्रहज्ञानकी बातें बनाते रहते है वे कमी सुक्त नदीं हो सक्ते । उपाधिमेदात्स्वयमेव भिद्यते चोपाध्यपोहे खयमेव केवलः । तसखादुपाघेविंरुयाय विद्रा न्वसेत्सदाकल्पसमाधिनिष्ठया ॥२५८॥ उपाधिके मेदसे दी आतमामे मेदकी प्रतीति होती है ओर
, उपाधिका ख्य हो जानेपर वह केवर खयं ही रह जाता हैः
इसख्यि उपाधिका च्य करनेके ल्यि विचाखान् पुरुष सदा निविकल्प-समाधिमे सित होकर रहे ।
सति सक्तो नरो याति सद्भावं चेकनिष्टया ।
कीटको भ्रमरं ध्यायन्ध्रमरताय कल्पते ॥३५९॥
एकाभ्रचित्तसे निरन्तर सत्छ र ब्रह्मम लित रहनेसे मनुष्य ब्रह्मरूप दी हो जाता है, जैसे श्नमरका भयपूर्वैक ध्यान करते-करते कीडा भ्रमरखसरूप ही हो जाता है ।
क्रियान्तरासक्तिमपाख कीटको ध्यायन्यथालिं द्यलिभावमृच्छति । तथैव योगी परमात्मतचं ष्यात्वा समायाति तदेकनिष्ठया ॥३६०॥ जिस प्रकार अन्य समस्त क्रियाओंकी आसक्तिको छोडकर केवल भमरका ही ध्यान करते-करते कीड़ा भमररूप हो जाता है उसी प्रकार योगी एकनि् होकर परमात्मत्वका चिन्तन करते. करते परमासममावको ही प्राप्त हो जाता है | अतीव क्ष्मं परमात्मत्वं त न स्थूलदृष्टया प्रतिपत्तुमहंति । समाधिनात्यन्तसुषक्ष्व्र्या ज्ञातव्यमार्येरतिशुद्रबुद्धिमिः ॥३६१॥ परमात्मत अत्यन्त सुक्ष्म है, उसे स्थूर दृष्िसे कोई भी प्रात नीं कर सकता, इसव्यि अति डद बुद्धिवले सपपुरुषोको उसे समाधिद्रारा अति सृक्ष्मटृत्तिसे जानना चाहिये । यथा सुवणं पुश्पाकशोधितं त्यक्त्वा मल खात्मगुणं समृच्छति । तथा मनः सखवरजस्तमोमलं ध्यानेन सन्त्यज्य समेति त्म् ॥३६२॥ (जिस प्रकार [ अग्रिमे ] पुटपाक-विधिसे सोधा इआ सोना सम्पूणं मल्को त्यागकर् अपने खामाविक खरूपक्रो प्राप्त कर छेत है उसी प्रकार मन ध्यानके दरा सव-रज-तमरूप मट्को व्याग- कर् आत्मतच्वको प्राप्त कर ऊेता है । 1
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११९ समाचि-निरूपण
निरन्तराभ्यासवशात्तदित्थं ` पक्वं सनो बह्मणि रीयते यदा । तदा समाधिः स विकर्पवजितः खतोऽद्रयानन्दरसानुभावफ़ः ॥३६३॥ जिस समय रात-दिनके निरन्तर अभ्यासमे परिपक्त होकर मन ब्रह्मम टीन हो जाता है उसं समय अद्वितीय ब्रह्मनन्दरसका अनुभव करानेवाटी वह निर्विकल्प-समाधि खयं दी सिद्ध हो जाती है । समाधिनानेन समस्तवासना- । ्रन्येविनासञोऽखिरुकमनाशः । अन्तर्महिः सर्वत एव सव॑दा स्वरूपविस्छ्षिरयतनतः स्यात् ॥३६४॥ इस ॒निर्विकल्प-समाधिसे . समस्त वासना-ग्रन्थियो का नाश ¡ जाता हे तया वासनाओके नाशते सम्पू कर्मोका भी ना जाता है ओर फिर वाहर-भीतर सर्वत्र विना प्रपत्नके ही निरन्तर खरूपकी स्फर होने गती है । श्रुतेः शतगुणं विचयान्पननं मननादपि । निदिध्यासं रक्ष्ुणसनन्तं निर्विकट्पकम् ॥ ३६५) वेदान्तवे; श्रवणमात्रसे उसका मनन कए सौगुना अच्छ है ओर मतनसे भी ठखगुना प्रयस्कए निदिध्यासन ( आत्ममावना- को अपने चित्तम स्थिर कना ) है । तथा निर्िष्यासनसे मी अनन्तगुना निरविवत्प-समाधिका महस है [ जिसपे चित्त कर आत्मखरूपसे कथी चायमान दी नही ता । । (स
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विवेकचूडामणि १२० निविंकर्पकसमाधिना , स्फुटं ब्रहमतवमवगम्यते धुवम् । नान्यथा चलतया मनोगतेः ्रत्ययान्तरविमिधितं भवेत् ॥३६६॥ निर्विकल्प समाधिके यारा निश्चय ही ब्रह्मतखका स्पष्ट ज्ञान होता है; ओर किंसी प्रकार वैसा बोध नहीं हो सकता; क्योकि, अन्य अवस्थाओंमे चित्तरत्तिके चञ्चल रहनेसे उससे अन्यान्य प्रतीतियोका भी मेक रहता है ।
अतः समाधत्सख यतेन्द्रियः सदा निरन्तरं शान्तमनाः प्रतीचि । विध्वंस्य ध्वान्तमनाद्यविद्यया कृतं, सदेकत्वविरोकनेन ।२६७॥ इसलिये सदा संयतेन्दिय होकर शान्त मनसे निरन्तर प्रत्य- गात्मा ब्रह्मे चित्त स्थिर करो ओर सच्विदानन्द ब्रह्मे साथ अपना रेक्य देखते हए अनादि अविवासे उत अज्ञानान्धकारका ध्वंस करो |
योगख प्रथमं द्वारं बाड्निरोधोऽपरिग्रः ।
निराशा च निरीहा च नित्यमेकान्तशीरुता ॥३६८॥
वाणीको रोकना, दव्यका संग्रह न करना, लोकिकं पदार्थो की आशा छोडनाः कामनाओंका त्याग करना ओर नित्य एकान्तमे रहना-- ये सन योगका पहला द्वार है ।
१२९ समाधि-निरूपण
एकान्तखितिरिन्द्रियोपरमणे हेतु्दमश्चेतसः संरोधे छरणं शमेन विलयं यायादहंवासना । तेनानन्दरसालुभूतिरचला ब्राह्मी सदा थोगिन- स्साचित्तनिरोध एव सततं कार्यः प्रयलान्ुनेः ॥३६९॥ एकान्ते रहना इन्दरिय-दमनका कारण दै, इन्दरिय-दमन चित्तके निरोधका कारण है ओर चिनत्त-निरोधसे वासनाका नाशा होता है तथा वासनकि नष्ट हयो जानेसे योगीको ब्रह्मानन्दरसका अविचल -अनुमव होता है; इसलिये मुनिको सदा प्रयतनपू्वक चित्तका निरोध ही करना चाहिये । वाचं नियच्छात्मनि तं नियच्छ
बुद्धौ धियं यच्छ च बुद्विसाक्षिणी । तं चापि पूर्णात्मनि निर्विकल्पे
विराप्य शान्ति परमां भजख ॥३७०॥ वाणीको मनमे ठ्य करो, मनको बुद्धिम ओर बुद्विको बुद्धि- के साक्षी आत्मामे, तथा बुद्धि-साक्षी ( कृषटस्थ ) को निर्विकल्प पूर्णबरहममे छ्य करके परमशान्तिका अनुभव करो । देहम्राणिन्द्रियमनोबुद्धयादिमिरुूपाधिभिः । येयेशरततेः समायोगस्तत्तद्धाबोऽख योगिनः ॥३७१॥ देह, प्राण, इन्दिय, मन ओर बुद्धि इन उपाधियेमेसे जिस- निसके साथ योगीकी चित्त-वृ्तिका संयोग होता है उसी-उसी मावकी उस्तको प्राति होती दै ।
विवेकचूडामणि षर् तननिष्र्या यने: सम्यक्सर्वोपरमणं सुखम् । संस्यते सदानन्दरसाजुभवविषवः ॥३७२॥ जव उस सुनिका चित्त इन सब उपाधियोंसे निचृत्त हो जाता है तो उसको पूणं उपरतिका आनन्द स्प्टतया प्रतीत होने क्गता है। जिससे उसके चित्तम सचचिदानन्द्रसानुभवकी वाढ अने गती है ।
१ वेराग्य-निरूपण अन्तस्त्यागो बहिस्त्यागो विरक्तस्यैव युज्यते । 0 + (~ त्यजत्यन्तबाह;सङ्् व्रक्तस्तु॒ अक्षया ॥२७३॥ विरक्त पुरुषका ही आन्तर्कि ओर वाश्च दोनों प्रकारका स्याग करना ठीक है । वही मोक्षकी इच्छसे आन्तरिक ओर वाश्च संग त्याग देता है । बहिस्तु विषयः सङ्खं॑तथान्तरहमादिभिः। विरक्त एव शक्रोति त्यक्तुं बरह्मणि निष्ठितः ॥२७४॥ इन्दरियोका विषयोके साथ वाह्य संग ओर अहंकारादिके साथ अन्तरि संग--इन दोनोका ब्रह्मनिष्ठ विरक्तं पुरुष ही व्याग कर सकता है | वैराग्यबोधौ पुरुषस पिवत् न विजानी (~ ^ 1 पक्षा जानीहि विचक्षण त्वम् । विथुक्तिसोधाग्रतलाधिरोहणं +. ताभ्यां विना नान्यतरेण सिध्यति।२७५॥
१२३ वैराम्य-निरूपण
हे विदन् ! वैराग्य ओर बोध इन दोनोको पक्षीके दोनो पके समान मोक्षकामी पुरुषके पंख समञ्चो । इन दोनोमेसे किसी मी एकके विना केक एक ही पंके दरा को$ सुक्तिरूपी महट्की अटारीपर नहीं चढ सकता | अर्थात् मोक्षप्रा्िके व्यि वर्य ओर बोध दोनोकी दौ आवद्यकता है ] । अत्यन्तवेराग्यवतः समाधिः समाहितस्यैव दृटप्रबोधः । रबदधतत््ख हि बन्धमुक्ति- ्क्तारमनो नित्यसुखालुभूतिः ॥२७६॥
अल्यन्त तैराग्यवान्को ही समधि-खम होता है, समाधिस्थ पुरुषको दी दढ बोध होता है तथा सुदृढ बोधवानका दी संसार- बन्धन छ्रटता है ओर जो संसार-बन्धनसे छुट गया है उसीको नित्यानन्दका अनुमव होता दे ।
तरराग्यान्न परं सुखस्य जनकं पश्यामि वरयात्मन-
स्तच्चेचछुदवतराटमबोधस हितं खाराञ्यसाम्राज्यधुक् ।
एतदुदरारमजसषटक्तियुवते्यसाखमसात्पर
सरवत्ासयृहया सदात्मनि सदा परज्ञा डर भ्ेयसे २७७)
जितिन््िय पुरुपके व्यि वैरग्यसे वदृकर सुखदायक सु ओर कु भी प्रतीत नहीं होता ओर बह यदि कहीं शद्ध आत्म- ्ञानके सदित हो तत्र तो सर्माय साम्राञ्यके सुखका देनेवाख ` होता है | यह सुक्तिरूप कामिनीका निरन्तर खुख इआ द्वार है; इसघ्यि हे वत्स ! तुम अपने कल्याणक व्यि सव ओते इच्छारहित होकर सदा सचिदानन्द ब्रह्मं दी अपनी बुद्धि सिर करो. |.
ऋ
विवेक-चूडामणि १२४ आसां छिन्धि विषोपमेषु विषयेष्वेषैव मृत्योः सृति- स्त्यक्त्वा जातिङलाश्रमेष्वमिमतिं सुश्वातिद्रात्कियाः । देहादावसति स्यजात्मधिषणां प्रज्ञां ङरुष्बात्मनि त्व दर्टायमलोऽसि निदवेयपरं ब्रह्मासि यदरस्तुतः ॥२७८॥ वरिषके समान विषम विषयौकी आशाको छोड दो, क्योकि
यह [ खरूपसरतिरूप ] मृत्युका मागं॒॑है तथा जाति, ऊुढ ओर आश्रम आदिका अभिमान छोडकर दूरसे ही कर्मोको नमस्कार कर दो । देह आदि असत् पदारथोभि आममबुद्धिको छोडो ओर आत्मामं अहंुद्वि के; क्योकि तुम तो वास्तवमे इन सवके द्र ओर मल तथा द्रैतसे रहित जो परब्रह्म है, वही हो ।
` ध्यान्-बिधि
लक्षये बरह्मणि मानसं चतरं संस्याप्य बाद्येन्द्रियं
ख्याने विनिवेश्य निश्वलतनुश्ोपेक्षय देहयितिम् ।
ब्रह्मालमेक्यमुपेत्थ तन्मयतया चाखण्डवृच्यानि्चं
ब्रहमानन्द्रसं पिबात्मनि दा शल्यः किमन्ये भरमेः॥ २७९॥
चित्तको अपने खकष्य ब्रह्मम दृदतापूर्क स्थिरकर बाह्य इन्द्रियोको [ उनके विषयोसे हटाकर ] अपने-अपने गोख्कोमे स्थिर करो, ररीरको निश्वर रखो ओर उसकी स्थितिकी ओर ध्यान मत दो । इस प्रकार ब्रह्म ओर आत्माकी एकता करके तन्मयमावसे अखण्ड-वृत्तिते अहनिंशा मन-ही-मन आनन्दपूर्वक ब्रह्मानन्दरसका पान करो ओर योधी बातोसे क्या लेना है
१२५ ध्यान-विचि
अनात्मचिन्तनं त्यक्तवा कमलं दुःखकारणम् । चिन्तयाल्मानसानन्दरूपं य्॒पुक्तिकारणम् ॥३८०॥ दुःखके कारण ओर मोहरूप अनात्म-चिन्तनको छोडकर आनन्दखरूप आत्माका चिन्तन कसे, जो साक्षात् सुक्तिका कारण है। एष खय॑ञयोतिरशेषसाक्षी विज्ञानकोके विलसत्यजक्षम् । रक््यं विधायेनमसद्विरक्षण- मखण्डवृ्यात्मतयायुभावय ।॥२८१॥ यह जो खयंप्रकाश सवका साक्षी निरन्तर विज्ञानमय कोरामे विराजमान है, समस्त अनित्य पदार्थ पथक् इस परमात्माको ही अपना कक्ष्य बनाकर इसीका [ तैलधारावत् | अखण्ड-वृत्तिसे, आत्म-मावसे चिन्तन करो ।
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एतमाच्छनया यृन्त्या ग्रत्ययान्तरशल्यया ।
उदेखयन्विजानीयात्खखरूपतया स्फुटम् ॥३८२॥
अन्य प्रतीतिेसे रहित अखण्ड-वृत्तिसे इस एकदीका चिन्तन करते इए योगी इसीको स्परतया अपना खूप जाने ।
अत्रातमलयं द्दीकयैनहमादिषु सन्तन ।
उदासीनतया तेषु तिष्ठेद् घटपटादिबत् ॥३८२॥
इस प्रकार इस परमात्मा ही आत्ममावको च कता इजा ओर अहंकारम आत्मबद्ध तोडता इभ उनकी ओरते शरीरसे भिन्न घटर-पट आदि वस्तु ओके समान उदासीन हो जाय ।
विवेक-चूडामणि १२६
आत्-हष्टि विशयुद्धमन्तःकरणं खरूपे निवेश्य साकषिण्यवबोधमात्रे | छनः शनेरमिथरतापुपानयन् पूणं खमेवारुविलोकयेत्ततः ॥३८४॥ सवके साक्षी ओर ज्ञानखरूप आत्मामे अपने ञद्र चिन्तको खाकर धीरेधीरे निश्वल्ता प्राप्त करता इआ अन्तम सर्वत्र अपनेहीको परिपूर्ण देखे । देहन्दरियप्राणमनोऽहमादिभिः खाज्ञानक्रप्तेरखिलेरुपाधिभिः । विशुक्तमात्मानमखण्डरूपं पं महाकाशमिवावलोकयेत् ॥३८५॥ अपने अज्ञानसे कल्पित देह, इद्दिय, प्राण, मन ओर अहंकार आदि समस्त उपाधियोते रहित अखण्ड आत्माको महा- कारकी भाति सर्वत्र पयिुरणं देखे | घटकरुशक्शलघ्विगुर्यै- म॑गनषपाधिशतेिुक्तमेकम् । भवति न विविधं तथेव शुध परमहमादिविथुक्तमेकमेव ` ॥३८६॥
जिस प्रकार आकाश घट, कडा, डय (अनाजका कोठा ), सूती (घु) आदि सैकड् उपाधियोपे रहित एक ही रहता है; नाना
१२७ आत्म-दष्टि
उपाधियोके कारण वह नाना नहीं हो जाता । उसी प्रकार अहंकारादि उपाधियोसे रहित एक ही शुद्ध परमात्मा है । ब्रह्मादिस्तम्बपथ॑न्ता मृषामत्रा उपाधयः | ततः पूणं खमात्मानं पश्येदेकात्मना सितम् ॥ ३८७ ्रहमसे ञेकर स्तम्ब ( तृण ) पर्यन्त समस्त उपाधियोँ मिथ्या ह इसध्यि अपनेको सदा एकरूपसे खित परिपूणं आत्मखरूप देखना चाहिये ।
यत्र प्रान्त्या कल्पितं यद्िवेके तत्तन्मात्रं नेव तसखादिभिनम् । भ्रान्तेनशि भ्रान्तिद््टाहितखं रञ्जुस्तदवद्विखमात्मखरूपम् ॥३८८॥ जिस वस्तुकी जँ (जिस आधारम) भमसे कल्पना हो जाती हे उस आधारका टीक-टीक ज्ञान हो जानेपर वह कल्पित वस्तु तद्रूप ही निश्चित हयोती है, उसे पथक् उसकी सता सिदध नी होती । जिस प्रकार ्रान्तिके न होनेपर रञ्जमे श्रान्तिवश प्रतीत होनेवाख स रज्जुरूप ही प्रत्यक्ष होता है वैसे ही अज्ञानके न्ट होनेपर सम्पूर्णं विश्च आत्मखरूप ही जान पडता है ॥ खयं त्र्या खयं विष्णुः खयमिन्द्रः खयं शिवः । खयं विश्वमिदं सर्वं खसादन्यन्न किथ्वन ॥२८९॥। लयं आत्मा ही ब्रह्मा, वही विष्णु, वही इन्र वही शिव ओर । बही यह सारा विश्च है, आत्मासे भिन ओर कुछ भी नहीं है ।
विवेकचूडामणि १२८ अन्तः खयं चापि वहिः खयं च खयं पूरस्तात्खयमेव पञ्चात् । स्वयं ह्यवाच्यां स्वयमप्युदीच्यां तथोपरिष्टातस्वयमप्यधस्तात् ।२३९०॥ आप ही भीतर है, आप ही बाहर हैः आप दी अगे है आप ही पीछे है, आप ही दाये दहै, आप ही वाये है ओर् आप ही ऊपर है, आप ही नीचे है । तरङ्गफेनभ्रमबुद्बुदादि सवं॑स्वरूपेण जलं यथा तथा । चिदेव देहाद्यहमन्तमेतत् सबं चिदेवैकरसं बिशद्धम् ॥२९१॥ जेसे तदङ्ग फेन, भवर ओर बुद्बुद आदि खरूपते सब जही हैः वैसे ही दहसे ठेकर अहंकारपर्यनत यह सारा विश्च भी अखण्ड शद्धचैतन्थ आत्मा ही है | सदेवेदं सष जगदवगतं वाडमनसयोः सतोऽन्यन्नारत्येव प्रकृतिपरसीभ्रि स्थितवतः प्रथक् रिं सृत्लायाः कलशघरङुम्भायवगतं वदत्येष भरान्तस्त्वमहमिति मायामदिरया ॥३९२॥ मन ओर वाणी प्रतीत होनेवाला यह सारा जगत् सतखरूप ही है, जो महापुरुष ग्रकृतिसे परे आत्मखरूपमे सित है उसकी दृशिमे सतूसे पृथक् ओर वु भी नहीं है | मिद्रीसे प्रथक् धट, कलश ओर कुम्भ आदि क्या है ? मनुष्य मायामयी मदिरासे उन्मत्त होकर ही भै, तू. ेसी भेदबुद्धयुक्त वाणी बोरुता है ।
१२९. अआत्त-षटष्टि
क्रियासमभिहारेण यत्र॒ नान्यदिति श्रतिः । त्रीति ब्रेतरादित्यं भिथ्याध्यासनिवर्ये ॥२९२॥। कार्यप दरेतका उपसंहार कप्ते हर् (जौँ ओर कुछ नदीं देखता? देसी अदैतपरवः श्रुति मिथ्या अध्यास निनर्तिके लिये वारनार दैतका अभाव वतलछती हे । | आकाशवनिमसनि्चिकस्प- निःसीमनिष्पन्दननि्विकरारम् । अन्तवंदिःशल्यमनन्यमद्वयं स्वयं परं ब्रह्म किमसि बोध्यम् ॥३९४॥ जो परतरह्न खयं आकाराके -समान निर्भर, निर्विकल्पः निःसीम, निदचरः निर्विकार, बाहर-भीतर सब ओरसे उूल्य, अनन्य जोर अद्वितीय हे वह क्या ज्ञानका विषय हो सकता हे वक्तव्यं किष विद्यतेऽत्र बहुधा ब्रहैव जीवः खयं र्नैतजगदाततं लु सकरं ब्रह्ाितीयं शतः । ्रसवाहमिति परुद्रमतयः सन्तयकतवरादयाः स्फुटं ब्रह्मीभूय वसन्ति सन्ततचिदानन्दात्मनेव धुवम् ॥ २९५ इस विषये ओर अविक क्या वना है १ जीव ते स्प्रयं ब्रहम ही हे ओर ब्रह दी यह सम्पूणं जगत्-रूपते फैला इंआ है क्योकि श्रुति [1
& ध्यत नान्यत् पदयति ` नान्यच्छरगति नान्यद्विजानाति स भूमा? ; \. ( छान्दोग्य०, ७ । २४ । १)
वि ५ चू९ ९--
विवेकचूडामणि १३०
भी कहती है कि बरहम अद्वितीय है । ओर यह निश्चय है, जिनको यह बोध हआ है करभे ब्रहम हीरे बाह विषयो सर्वथा लयाग- वर् ब्रह्मावति सद्। सच्िरानन्दखरूपपे ही सित रहते हैं | जहि मरमयकोशेऽ्हधियोस्थापितःशां भ्रसभमनिलकर्पे िद्ददेऽपि पथात् । निगमगदित पीतिं नित्यमानन्दूतिं स्वयमिति परिचीय ` ब्रह्मरूपेण तिष्ट ।।३९६॥ इ मल्मय कोशम भहबद्धिसे इई आसक्तिको छोडो ओर इसके पश्चत् वायुरूप लिङ्गदेह भी उसका दृढतापूर्क त्याग करो, तथा जिसकी कीरतका वेद बलान करते है उस आनन्दखरूप
बहयको ही अपना खूप . जानकर सदा व्रह्मह्पते हो कर रहो ।
शवाकारं यवद्भजति मनुजल्तावद शुचिः परेभ्यः खातलेशो जननमरणव्याधिनिलय्ः यदात्मानं शधं करयति शिवा्ररमचलं तदा तेभ्यो क्तो भवतिं हि तदाह श्रुतिरपि ॥२९७॥ शति भी यही कहती है किं मनुष्य जत्रतक इस्त मृतकतुल्य देहम आसक्त रहता है तबतक्र वह अत्यन्त अपवित्र रहता दै ओर जन्म, मरण तया व्याधियोका आश्रय बना रहक९ उसकी दूसरोते अप्यन्त क्लेशा भोगनापडता है | किन्तु जव वह अपने कल्पाणखरूप, अचर ओर् शुद्ध
र भत्माका साक्षात्कार क् केता है ` तो उन समस्त क्टेशोषे भक्त हो जाता है |
ही स्थिर
१३९ ग्रपञ्चुका बाध
प्रपञ्चक वाध
खात्मन्यारोपिताङ्ञेषाभार्पस्तुनिरासतः
खयमेव परं व्रह्म पूणेमद्रयमक्रियम् ॥३९८॥
अपने आमामे आरोपित समस्त कलित वस्तु ओंक्रा निरासं कर देनेपर मनुष्य खयं अद्वितीय, अक्रिय ओर् पूणं प्रद ही है ।
समादितायां सति चित्तवृत्तौ परात्मनि व्रह्मणि नि्विंक्पे। न॒ दश्यते कशिदयं विक्रयः प्रजल्पमात्रः परिशिष्यतं ततः ॥२३९९॥ निर्विकल्प परमातमा पररहमने चित्तदृत्िकरे ख्िर्हो जानेपर् यह द्र्य विक्रस्प क्डींम। दिखायी नहीं देता । उस सप्रय यह केवर वाचारम्भण ८ बाणीकरी वकवाद ) मत्र ही रह जातां है ।
असकस्पो विकरपोऽयं विधमित्येक्वस्तुनि । ,
निर्विकारे निराकारे निविशेषे भिदा इतः ॥४००॥॥
उस एक वस्तु त्रे यहं संसार मिथ्या वस्नुकरे सदा कल्यनामातर है । मखा निर्विकार, निराकार ओर निर्विशेष वस्ते भद करसि आया
द्रष्टदशेनदश्यादिमावशल्यकवस्तुनि ।
निर्विकारे निराकारे निर्धिंरेषे भिदा इतः ॥४०१॥
उस द्वश, द्य ओर दशन आदि मारते शल्य, निर्विकार
निराकार ओर निर्विशेष एक वस्तुमे भला भद् कर्टोसे आया १.
"विवेकचूडामणि १३२
कृरपारणव इवात्यन्तपरिपू्णेकवस्तुनि ।
निविंकारे निराकारे निविंरेपे भिदा कतः ॥४०२॥
प्रययकरार्के समुदके समान अत्यन्त परिपूर्णं एक पदार्थ जो निकार, निराकार ओर निर्विशेष है, भला मेद कहि भा गया? तेजसीव तमो य॒त्र प्रलीनं भरान्तिकारणम् ।
अद्वितीये परे तत्वे निरविरेषे भिदा इतः ॥४०३॥
प्रकाशे जेते अन्धकार टीन हो जाता है वैते ही जिसमे चरमका कारण अज्ञान रीन होता है उस अद्वितीय ओर निर्विष , परमतत्त्रमे भख भेद कसि आ गया ९
एकात्मके परे तरवे भेदवातां कथं मवेत् ।
सुषु्ो सखमात्रायां भेदः केनावशोकितः ॥४०४॥
एकात्मकं अद्वितीय परमत्मे भला भेदकौ बात ही क्य हो सकती है ? केवट सुखखरूपा सुषृप्तिमे किंसने विभिनता देखी है £
न॒ द्यस्ति विं परतत्वमोधात्
सदात्मनि ब्रह्मणि निवि । कारत्रये नाप्यदिरीकषितो गुणे न॒ इम्बुविन्ुरुंगटष्णिकायाम् ।।४०५॥
प्ररमतत््वके जान लेनेपर सर्लख्य निगक्त्प प्रयते वि्ठ- क की पता भी नही चल्ता; तीनों कारे भी कभी किसीने रज्ज सपं ओर मृगतृष्णा जठ्की वद नदीं देखी ।
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१९३ आत्मचिन्तनका विश्नः
मायामात्रमिदं दतमदैतं परमार्थतः । इति चते शरुतिः साधषाससुुपावलुभूयते ॥४०६।॥ शति साक्षात् कहती है कि वह दैत मायामात्र है, वास्त तोभैतदही है; ओर रेसा ही सुपर अनुभव भी होता है । अनन्य॒त्वमधिषटानादारोप्यस्य निरीकषतपू । पण्डिते शज्जुसर्पादौ विकल्पो भ्रान्तिजीवनः ॥४०५७॥ रज्ु-सपं आदिमे बुद्धिमान् पुरुपोंने अव्यक्त वस्तुका अपिष्ठान- से अभेद स्पष्ट देखा है; इक्थ्यि [ ब्रहममे अध्यस्त यह संसारखूप' ॥ विकल्प अज्ञानजन्य ्रमके कारण ही जीव्रित ( सित ) है |
आत्चिन्तनका विधान चित्तमूलो बिकटपोऽयं चित्तामावे न कथन । अतधित्तं॑समाधेहि प्रत्यगरुपे परात्मनि ॥४०८॥ यह विकल्प चित्तमूलक है । चित्तका अमाव होनेपर इसका कहीं नाम-निखान भी नहीं रहता । इसल्यि चिन्तको प्रत्यक् चैतन्यखशूप आत्मामे स्थिर करो । किमपि सततबोधं केवरानन्दशूपं निरुपममतिवेलं नित्ययुक्त निरीहम् । निखधि गगनाभं निष्कलं निर्विकल्पं हदि कलयति षिद्रान्त्रह् पूणं समाधौ ॥४०९॥ किसी नित्यत्रोधखरूप, केवखनन्दरूप, उपमारहित, कतीतः, नित्यमुक्त; निरचेष्ट, आकाराके समान निःसीम, कल-
विवेक-चूडामणि १९४
रहित निर्विकल्प पूर्ण ब्रसकरा श्िदरान् समापि-अवस्थामं अपने अन्तः- करणम साक्षात् अनुभव करते हैं । ` प्रकृतियिृतिश्यं भावनाती तभावं समरसमसमानं मानसम्बन्धदूरम् । निगमवचनसिद्धं नित्यमसस्सिद्ध हृदि करयति विद्ान््रह्मपूणं स माधो ।४१०॥ कारण ओर का्य॑से रहित, मानवी भावनासे अतीत, समरस, उपमारहित, प्रमाणो की पचसे परे, वेद्-वाक्योसे सिद्ध, नित्य, अस्मत् ( मै ) रूपमे स्थित पूरणं ब्रहमका रिद्रान् समाधि-अवस्थामे अपने अन्तःकरणमे अनुभव करते हैँ । अजरममरमस्ताभासवस्तुखस्ूपं स्िमितसलिलराशिप्रस्यमाख्याविदीनम् । ` .. शमितगुणविकारं शाश्वतं शान्तमेकं हदि करयति विदान्त्रह् पणं समाधो ॥४११॥ ` अजर्, अमर, आभासशन्य, वस्तुरूपः, निक्चङ जल-रारिके समान, नाम-हूपसे रदित, गु्णोके विकारसे शून्य, नित्य, ओान्त- खरूप ओर अद्वितीय पूर्णं ब्रहका विद्वान् समाधि-अवस्यामे हृदयम साक्षात् अनुभव करते है । समादितान्तःकरणः वत्य ` _ _ षिलोकयात्मानमखण्डवेभवम् । विच्छन्धः बन्ध मवगन्धगन्धितं यत्नेन पुसं सफलीडरष्व.॥४१२॥
१३५ दखद्यकी उपेक्चा
अपने ख्यं चित्तको स्थिर ` करके अखण्ड रेशर्बसम्यनन आतमाका तान्तत्कार करो, संसार-गन्धसे युक्त बन्धनको काट उदो ओर यलनपूर्वक अपने सनुष्य-जन्मको सप्र करो ।
सर्वोपाधिषिनि्ुक्तं सचिदानन्दमदयम् ।
भावयरतमानसःत्मस्थं न भूयः कस्पसेऽध्वने ॥४१३॥
सपस्त॒उपराधियोते रहित अद्वितीय सचिदानन्दखख्प अपने अन्तःकरणे सित आसाका चिन्तन कते रदो; इसते ` तुम भिर संसार-चक्रन नहीं पडोगे ।
दर्यकी उपेक्षा छाये पुंसः परिटश्यमान- सामाससूपेण फराुभूत्या । रारीरमाराच्छबवननरस्तं पुनने सन्धत्त इदं मदात्मा ॥४७१४॥ मनुष्यकरी छयाके समान केवल आमासष्पसे दिखटायी देनेवाले, इस शगीरका इ्क्रे फलका विचार करके, रावके समान एक वार वाध करं देनेपर् मंहात्मागण इसे किर करर नहीं करते । सततविमलबोधानन्दस्ूपं समेत्य त्थज जडमररूपोषाधिमेतं सुदूरे । ~ 0. ~क अथ पुनरपि नष सयता वान्तवस्तु खरणविषधधूतं कर्पते इत्सनाय ॥४१५॥ अपने नित्य ओर निर्मल चिदानन्दमय खरूपवो प्राप्त करके इष मलरूप्र जड उपारिको दूरदीते सर्वथा व्याग दो ओर शिरि `
विवेकचूडामणि १
कभी इसकी याद भी मत करौ, क्योकि उगी द्रई वस्तु तो याद् कनेपर उच्टी जी विगाड्नेवाली ही होती हे । समूलमेततपरिदह्य ,. . बहौ सदात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे । ततः खयं नित्यशदधबोधा- नन्दात्मना तिष्ठति विदरः ॥४१६॥ , विचासवानोमे श्र महातमाजन इस स्थूल-सूकम जगतुको इसके मूल-कारण मायाके सहित निर्विकल्प सःवरूप ब्रहमागिनिमे भतम करके किर खयं नित्य व्ि्ुद् बोषानन्दखरूपते सित रहते ड प्ाख्धघ्ग्रथितं ` शरीरं प्रयातु वा तिष्ठतु गोखि घक् । न तत्पुनः पश्यति तखवेत्ता- नन्दातमनि ब्रह्मणि रीनव्रततिः ॥ ४१७] गो अपने गले पड़ी ,हई मालक ‹ रहने अथव। गिरनेकी ओर जसे कु भी ध्यान नहीं देती, इसी प्रकार प्रारव्धकी डोरी पिरेया इआ यह शरीर रहै अथवा जाय, जिसकी चित्तवृत्ति आनन्दखरूप ब्रहम रीन हो गथी है वह त्वेता पिर इसकी ओर नहीं देखता । अखण्डानन्दमात्मानं विज्ञाय . खखरूपतः किमिच्छन् कल बा हेतोदेह ष्णात त्चवित् ॥४१८॥ जलण्ड भानन्दसस्प आत्मकः शी अपना खरप जान
लेनेपर किस इच्छा अथवा किस्त कारणसे तचवेत्ता इस रारीरका पोषण करे ? ।
१३७ आत्मन्ञानक्ा फक
अबिज्ञानक् फट
संपिद्धसय एलं त्वेरज्ञीवन्पुक्तखय योभिन्ः |
बहिरन्तः सदानन्दरसास्वादनमात्मनि ॥४१९॥
आत्मज्ञानमे सम्यक् सिद्धि प्राप्त किये हए जीवन्मुक्त योगीको यही फर मिटत। ट कि अपने आत्माके निव्यानन्द्रसका बाहर भीतर निरन्तर आघादन किया करे ।
वर्यस्य एट बाधा ब्घपरातः फलम् ।
स्वानन्दानुभवच्छान्तिरेपेवोपरतेः फलम् ॥४२०॥
वरराग्यका फर बोध है ओर बोधका फक उपरति ८ विषयोंसे उदासीनता ) है तथा उपरतिका फर यही है कि आत्मानन्दके अनुभवसे चित्त शन्त हो जाय ।
यदयुत्रेत्तराभावः पूर्वपूर्वं त॒ निष्फलम् ।
निव्रत्तिः प्रमा तव्िरानन्द्ाऽचुपमः स्वतः ॥४२९।
यदि पिछटी-पिटी वस्तुओंकी प्राप्ति न हो तो पहटी बाते निष्क है, [ अर्थात् आलशान्तिके धिना उपरति, उपरतिके बिना बोध ओर ब्रोधके विना वैराग्य निष्फक टै | वरिषयोसे नित्त हो जाना ही प्रम तृपति है ओर वही साक्षात् अनुपम आनन्द है । । ृष्टदुःखेष्वनुद्धेगो विचयायाः प्रस्तुतं फलम् ।
यत्कृतं श्रान्तिवेसायां नाना कमं जगुप्सितम् ।
पश्चान्नरो विवेक्षन तत्कथं कतुमहति ॥४२२॥
प्रारब्धवश प्राप हए दुःखौसे परिचित न होना ही आल. ज्ञानका सबसे पहल फल है । शान्तिके समय पुरुषने जो नाना `
विवेक-चूडामणि १३८ प्रकारके निन्दनीय कर्म॒क्िये है उन्हींको ज्ञान हो जनेके उपरान्त वह विवेकपूर्चक वैसे कर सकता है ?
विद्याफलं खादसतो निव्त्तिः
्रवृत्तिरज्ञनफरं तदीक्षितप् । तन्जाज्ञयोयन्रगतष्णिकादौ नो चेद्विदो द्टफं करिमखात् ॥४२३॥
व्रि्याका फल असते निधत्त होना ओर अत्रियाका उसमे प्रदृत्त होना है । ये दोनों फठ ज्ञानी ओर अज्ञानी पुरपोकी मृगतृष्णा आदिकी प्रतीतिमे उसे जानने या न जाननेवालोपे देखे गये है । नहीं तो [ यदि पू पुरुषे समान व्रिद्ान्की भी असत् पदाथेभिं ्रदृत्ति बनी रही तो ] वियाका प्रत्यक्ष फट ही क्या हआ
अज्ञानहृदयग्रन्थेविनाशो यद्यरोपतः ।
अनिच्छोविषयः किन्नु प्रत्ते; कारणं स्वतः ॥४२४॥
यदि ज्ञानरूप हृदयकी म्रन्थिका सर्वधा नाड हो जाय तो उस इच्छरहित पुरुषके च्यि सांसार्कि विषय क्या खतः दी भ्बरत्तिके कारण हो जार्येगे ९
वासनानुदयो भोग्ये वैराग्यखय परोऽवधिः ।
अ्॑माबोदयामाबो बोधख परमोऽवधिः ।
रीनवत्तेरलतयत्ियादोपरेस्त॒ . सा ॥४२५॥
मण्य वस्तुओं वासनाका उदय न होना वैराग्यद चरम अवधि है, चित्तम अकारक सर्वथा उदय .न होना दी दोधवी चरम सीमा है ओर शन हई इतिोका पुनः उत्प्न न होना-- यह उपरामताकी सीमा है । `
१६९ जीवन्मुक्तके क्षण.
जीवन्पुक्तके टक्षण
ब्रह्माकारतया सदा सिततया निथक्तवाह्ाथधी-
रन्य बे देतभोग्यमोगकलनो निद्रावद्वाखवत् ।
स्वप्रालाकितलोकवञ्जगदिदं पश्यन्कचिछन्धधो-
रास्ते थिदनन्तपुण्यफरयुग्धन्यः स मन्यो यवि ।४२६। .
निरन्तर ब्र्मकारवृत्तिते सित रहनेके कारण जिसकी -बुद्धि ` बाह्य व्रिषयोंनेप्े निकक गयी है ओर जो निद्राटु अथवा बाठ्कके समान दूसरोके निवेदन किये इए ही मेग्य पदारथोका सेवन करता है तथा कभी त्रियो बुद्धि जानेपर जो इस्त संसारको खप्न- प्रपञ्चके समान देखता है, वह॒ अनन्त पुण्योके फक्का मोगनेवा को$ ज्ञानी महापुरुष इस प्र्ीतर्मे धन्य है ओर सवका माननीय है ।
स्यितप्रज्ञो यतिरयं यः सदानन्दमद्लुते । व्रहमण्येव विटीनात्मा निधिंकारो विनिष्कियः ॥४२७] जो यति प्रहत चित्तको ठीनकर विकार ओर क्रियाका त्याग करके सदा आनन्दलर्प ब्रह्म मग्न रहता है बह स्थितप्रज्ञ कहलाता है । बरह्म त्मनोः जो धितयोरेकभावावगाहिनी । निरविकसा च चिन्मात्रा वृत्तिः प्रज्ञेति कथ्यते । सुखिता सा भवेयख्य जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥४२८॥
[ (त्वमि आदि महात्रा्योे | रोधित ब्रह्म ओर आत्माकी एकताको ग्रहण करनेवाी विकल्परहित चिन्मात्रदृत्तिको प्रज्ञा
विवेकचूडामणि श -कहते है । यह ॒चिन्मातर-इत्ति जिसकी स्थिर हो जाती है वहीः
जीवन्मुक्त कहा जाता हे । यस्थ स्ता भवेत्प्रज्ञा यस्यानन्दा निरन्तरः । प्रपश्चो विस्मृतप्रायः स॒ जीबन्पुक्त इष्यते ।४२९॥
जिसकी प्रज्ञा स्थिर है, जो निरन्तर आत्मानन्दका अनुभवः करता है ओर प्रपन्चको मूला-सा रहता है वह पुरुष जीवन्मुक्त.
कहखाता है । लीनधीरपि जागतं यो जाग्रद्र्मब्ितः। बोधो निवांसनो यस स जीवन्मुक्त इष्यते ।४३०॥ वृ्तिक्े टीन रहते हए भी जो जागता रहता है; किन्तु वास्तवमे जो जागृतिके धर्मेसि रहित है# तथा जिसका बोधः सर्वया बासनारहित है बह पुरुष जीवन्मुक्त कहढाता है । शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः । यः सचित्तोऽपि निच्चिन्तः स॒ जीवन्ुक्त इष्यते ।॥४२१॥ जिसकी संसारवासना शान्त हो गयी है, जो कलावान्
होकर भी कखहीन हे अर्थात् व्यवहारदष्टिमे ऊपरसे विकारान्
&्तिके टीन रहते दरुए भी जो जागता रहता ३ । इसका अभि पराय यहं दै क्रि यद्यपि उसका चित्त सम्पूर्णं दृश्य पदार्थोका वाध ` करके. निरन्तर ब्रह्मम रीन रहता है तथापि वह सोये हए पुरुषके समान सजा्यन्य नह हा जाताः सव॒ व्यवहार यथावत् करता रहता है । किन्तु व्यवहार करत हए. भा उ सखप्नवत् समञ्चनेके कारण उसकी अन्य
पुरुषोके समान दद्य पदार्थोम आखा नही होती । इसल्यि प्वास्तवमे वह जागरतिके धमेसि रहित
१४१ जीवन्सुक्तके लक्षण
प्रतीत होता हआ भी जो निरन्तर अपने निर्विकार खरूपमे ही सित.रहता है तथा जो चिन्तयुक्त होनेपर निधिन्त है वह पुरुष -जीवन्मुक्त माना जाता है ।
वतेमानेऽपि देदेऽसिज्छायाबदनुवर्तिनि ।
अहंताममतामावो जीबन्युक्तसख लक्षणम् ।४२२॥
प्रारब्धकी समापिपर्यन्त छायाके समान सदैव साथ रहने- - वले इस रारीरके वतंमान रहते ए मी इसमे अहं-ममभाव ८ मै- -मेरापन ) का अभाव हो जाना जीबन्मुक्तका लक्षण है ।
अतीताननुसन्धानं भविष्यद विचारणम् ।
ओदासीन्यमपि प्राप्ते जीवन्युक्तसख रक्षणम् ॥४३३॥
बीती इई वातको याद न करना, मविष्यकी चिन्तान -करना ओर वत॑मानमे प्राप्त इए सुख-दु :खादिम उदासीनता- यह -जीवन्सुक्तका लक्षण है |
गुणदोषविशिषटेऽखिन्स्वभावेन विलक्षणे ।
सर्वत्र समदि जीवन्धुक्तख लक्षणम् ।४२४॥
अपने आत्मखरूपसे सर्वया प्रथक् इस गुण-दोषमय संसारम -सर्वत्र समदरीं होना जीवन्धुक्तका लक्षण है |
इष्टानिष्टाथसम्परप्त समदरिीतयात्मनि ।
उभयत्राषिकारित्वं जीबन्पुक्तखय लक्षणम् ॥४२५॥
इष्ट अथवा अनिष्ट वस्तुकी प्रापिते समानभाव रखनेके कारण दोनों ही अवस्थाओंत चित्ते कोई भी विकार न होना जीवन्मुक्त पुरुषका लक्षण है |
विवेकचूडामणि १४२ ब्रहमानन्द्रसास्वादासक्त चित्ततया यतेः । अन्तर्वहिरविज्ञानं जीबन्धुक्तल रक्षणम् ॥४३६॥ ब्रञ्मनन््रसाछलादमे चित्ती असक्ति रहनेकरे कारण वाञ्च ओर
आन्तरिक वस्तुओंका को ज्ञान न होना जीवन्मुक्त यतिका क्षण है । देेन्दरयादौ कतेव्ये ममाहंभावदजितः । ओदासीन्येन यस्तिष्ठेत्स जीबन्युक्तरक्षणः ॥४३५७॥ देह तथा इद्दिय आदिमे ओर कर्तव्ये जो ममता ओर अहंकारसे
रहित ह्येकर उदासीनतापूर्वक रहता है वहं पुरुष जीवन्सुक्तके. लक्षगते युक्त है । विज्ञात आत्मनो यख बह्मावः श्रत्बलात् । मवबन्धविनिशक्तः स॒ जीवन्ुक्तरक्षणः ॥४३८॥ तरिसने श्रुति-प्रमाणसे अपने आत्माका ब्रह्म जान च्या है ओर जो संसारबन्धनपे रहित है बह पुरुष जीवन्मुक्ते लक्षणों ते सम्पन है । देहे न्द्रयेष्वहंभाव हदं मावस्तदन्धरके । यस नो भवतः कापि स जीवन्मुक्त इष्यते ॥४३९॥ निसका देह ओर इन्दि आदिम अहंमाव तथा अन्य वस्तुओ इदं ( यह ) भाव कभी नहीं होता वह पुरुष जीवन्सुक्त माना जाता है । न प्रत्यश्रहणोमेदं कदापि ब्रह्मसर्गयोः । रज्या यो विजानाति स॒जीवन्ुक्त इष्यते ।४४०॥
जो अपनी त्ावगाहिती बुद्धिते आत्मा ओर बरह्म तथा ब्रहम ओर संसारभं को$ भेद नहीं देखता वह पुरुष जीवन्मुक्त माना जाता है ।
+ + ~ म पो स या
१४६ जीवन्मुक्तके छश्चणः
साधुभिः पूज्यमानेऽसिन्यीञ्यमानेऽपि दुजनैः ।
सममाबो मवेधल स जीबन्युक्त इध्यते ॥४४१॥
साधु पुस्पोद्रारा इस इारीरके सत्कार किये जानेपर ओर दुप्रजनोते पीडित होनेपर भी जिसके चित्तका समानभाव रहता है वह मनुष्य जीवन्मुक्त माना जाता है ।
यत्र॒प्रविष्ट विषयाः परेरिता
नदीप्रवाहा इव बारिराशो। रिनन्ति सन्मात्रतया न विक्रिया-
युत्पादयन्त्येष यतिर्विुक्तः ॥४४२॥ समुद्रम मिक जानेपर जैसे नदीका प्रवाह ससुद्ररूप हो जाता है वैसे दी दूसरके द्वारा प्रस्तुत किये विषय आत्मस्रूप प्रतीत होनेते जिप्तके चित्तम किसी प्रकारका क्षोम उत्पन्न नहीं करते वह यतिश्रष्ठ जीवन्मुक्त है । विज्ञातव्र्तखश्य यथापूपम॑न संसृतिः । अस्ति चेन्न स विज्ञातत्रह्ममावो वदि्थखः ॥४४३॥ ब्रह्मते जान लेनेपर विद्रानूको पूर्वत् संसारी आसा नहीं रहती ओर यदि किर भी संसारकी अस्था बनी रदी तो समञ्चना चाये करि वह तो संसरी ही है। उसे ब्रह्मतका ज्ञान ही नही हज । ।
ग्राचीनवसनावेगादसौ संसरतीति चेत् ।
` न॒ सदेकलविज्ञानान्मन्दीभवति बासना.-॥४४४॥
:विवेक-चूडामणि १४४ यदि कहो कि पूर्ववासनाकी प्रबल्तासे फिर भी इसकी -संसारमे प्रवृत्ति रह सकती है, तो एेसी बात नहीं है, वयक जह्यके एकलक्ञानसे इसकी वासना क्षीण हो जाती है । अत्यन्तक्रायुकखापि वृत्तिः इण्ठति मातरि । [> (भ [> तथैव ब्रह्मणि ज्ञाते पूणानन्दे मनीषिणः ॥४४५॥ जिस प्रकार अत्यन्त कामी पुरुषकी भी कामच्ृत्ति माताको देखकर कुण्ठित हो जाती है उसी प्रकार पूरणानन्दस्वरूप ब्रहमको जान लेनेपर विद्रानकी संसारमे प्रवृत्ति नहीं होती ।
प्ारब्धःविचार
निदिष्यासनशीलख बाहयप्रत्यय ईयते ।
वीति शुतिरेतसख प्राख्धं फलदशनात् ॥४४६॥
निदिष्यासनशीर ( आत्मचिन्तनमे गे इए ) पुरुषको बाह्य पदार्थोकी प्रतीति होती देखी जाती है, फल-मोग देखा जानेके -कारण श्रुति उसे उसका प्रारब्ध बतलती है ।
सखाद्यनुभवो यावत्तावस्प्रारब्धमिष्यते ।
फलोदयः करयो निष्कियो न हि उुत्रचित् ।४४७॥
[ युक्तित भी ] जबतकं सुख-दुःख आदिका अलुमव है तबतक परार्ध माना जाता है, क्योंकि फलका मोग क्रिया पूर्वक होता है, त्रिना कर्मके कहीं नही होता ।
अदं होति विजञनातकर्पकोटिशताजितम् ।
सञ्चितं विरुयं याति प्रबोधात्खप्नकर्मत् ।।४४८॥
१४७५ प्रारब्थ-विचार
जग जनेपर जैसे खवप्नावश्थके कर्म टीन हो जते टै वैसे हीन ब्रह्म ह रसा ज्ञान होते दी करोड़ कल्पोके सञ्चित कम नष्ठहो जाते है|
यत्छृतं स्वश्रवेखायां पुण्यं वा पाप्मुखणम् ।
सुप्रोप्थितख विः तस्खात्छगौय नरकाय वा ॥४७९॥
खप्नावस्थामे जो वडे-से-वडा पुण्य अथवा पाप किया जाता है, क्या जग पडनेपर् वह खरग अथवा नरककी प्रा्तिका कारण हो सक्ता है ९
खमसङ्धमुदासीनं परिज्ञाय नमो यथा|
छिष्यते यतिः किञ्ित्कदाचिद्धाविकमभिः ॥५५०॥
जो यति अपनेको आकाशके समान असङ्ग ओर उदासीन जान ठेता है बह किसी भी आगामी कर्मे कभी थोडा-सा भी च्छति नदीं हो सकता ।
न॒ नभो षट्योगेन सुरागन्धेन किप्यते।
तथात्मोपाधियोगेन तदधर्मर्नैव प्यते ॥४५१॥
लेते घड़ेके सम्बन्धसे धडेमे रक्खी हई मदिराकी गन्धरसे आकाराका को$ सम्बन्ध नहीं होता उसी प्रकार उपाधिके सम्बन्धसे आत्मा उपाधिके धमि टिक् नहीं होता ।
ज्ञानोदयात्पुरार्धं कमं॒ज्ञानान्न न्ति ।
अदसवा खफरं रक्ष्यमुदि्योत्सृषटयाणवत् ॥७५२॥ व्याघ्रबुद्धया बि्नयक्ता बाणः पश्चात्तु गोमतो | न तिष्ठति छिनच्येव रक्ष्यं॑वेगेन निभेरम् ॥४५२॥
वि ० चू९ १०-
विवेक-चूडामणि १७६
लक््यकी ओर छोड दिये गये बाणके समान ज्ञानके उदयम पूव ही आस्म हआ कर्म अपना पढ दिये विना ज्ञानसे नष्ट नहीं होता, जैसे व्याघ्र समश्षकर गौकी ओर छोडा इआ बाण पीछे उसको गौ जान लेनेपर भी बीचमे नहीं रोका जा सकता, वह तो तुरंत अपने ल्श्ष्यको वेध ही देता है |
प्रारब्धं बलवत्तरं खल विदां मोगेन तस्य क्षयः
` सम्यश्ञानहुताशनेन विलयः प्राक्सश्चितागामिनाम् ।
्रहमसमेक्यमवेकष्य तन्मयतया ये सर्वदा संखिता-
स्तेषां तलितयं न हि कचिदपि बरहमव ते निगुंणम् ।४५४॥
विद्वन्का प्रारव्ध-कमं अवश्य ही वल्वान् होता है । उसका क्षय भोगनेसे ही हो सकता हे । उसके अतिरिक्त परवसचचित ओर आगामी कर्मका तो तचज्ञानूप अधित क्षय हो जाता है; किन्तु जो श्रम ओर आसाकी एकताको जानकर सदा उसी भावम स्थित रहते है उनकी द्म तो वे ( प्रा, सञ्चित ओर अगामी ) तीनों प्रकारके ही क्म कहीं नहीं है, बे तो मानो सक्षात् निर्गुण ब्रह्म ही है ।
उपाधितादात्म्यविदीनकेवल-
बरहमात्मनेवारमनि तिष्ठतो य॒नेः । प्रारन्धसद्धावकथा न युक्ता खमाथसम्बन्धक्येव जाग्रतः ॥ ४५५
जो सुनिश्ेठ उपाधिके सम्बन्धको छोडकर कवठ ब्रह्मात्म-
भावस ही अपने सूपे स्थित रहता है उसके प्रारव्ध-करमोकी
२४७७ प्रारन्य-विचार
स्थितिकी बात खप्नमे देखे हए पदार्थो जगे इए पुरुषका सम्बन्ध जतानेके समान अनुचित है । न॒हि ब्रबुद्धः प्रतिभासदेहे देहोपयोभिन्यपि च प्रपञ्चे । करोत्यहन्तां समतामिदन्तां किन्तु स्वयं तिष्टति जगरेण ॥४५६॥ जगा हुआ पुरुष स्वप्नके प्रातिभासिक ठह तथा उस देके उपयोगी स्वप्न-ग्रपञ्चमे कमी अहंता, ममता ओर इदंत ( मैपन; मेरापन ओर यपन ) नहीं कता । वह तो केवङ जाग्रत् भावसे ही रहता है । न॒ तस्य॒ मिथ्यार्थसमथनेच्छा न॒ सङ्ग्रहस्तज्गतोऽपि ष्टः । तत्रालुवरत्ति्यदि चेनमूपार्थ न निद्रया भुक्त इतीष्यते धुवम् ॥४५७॥ उसको न तो मिथ्या वस्तुओंको सिद्ध करनेकी इच्छ होती है ओर न उसके पास सांसाकि पदार्थोका संग्रह दी देखा जाता है | यदि फिर भी उसकी पिध्या पदार्थोपि प्रवृत्ति रहे तो यह निश्वय है कि वास्तवे उसकी नीद टूटी ही नहीं है । तद्वत्परे ब्रह्मणि वतमानः सदात्मना तिष्टति नान्यदीक्षते । स्ृतिर्यथा सखम्नविलोकिताथं तथा विदः प्राशनमोचनादौ ॥४५८॥
विवेक-चूडामणि १७८
इसी प्रकार सदा ब्रह्ममावमे रहनेवाल पुरुष व्रह्रूपतसे ही स्थित रहता है वह [ ब्रहके सिवा ] ओर कुछ नहीं देता । जैसे स्वप्नमे देखे हए पदार्थोकी याद् आया करती है वैसे ही विद्वान् की भोजन करना ओर छोडना आदि क्रियाँ स्वभाववदा अपने आप हआ करती है ।
कर्मणा निर्मितो देहः प्राख्ं तस्य कप्यताम् ।
नानादेरात्मनो युक्तं नैवात्मा कर्मनिभितः ॥४५९॥
देह कर्मोहीसे बना हआ है, अतः प्रार्य भी उसीका समञ्चना चाहिये, अनादि आसाका प्रार्य मानना ठीक नही क्योकि आत्मा कमेसि बना हुआ नहीं है ।
अजो नित्य इति चूते श्रुतिरेषा तवमोषवाक् ।
तदात्मना तिष्तोऽस्य इतः प्रार्धकस्पना ॥४६०॥
“आत्मा अजन्मा, नित्य ओर अनादि है टेसा यथार्थं कथन करनेवाटी श्रुति कहती है, फिर उस आत्मस्वरूपसे ही सदाः स्थित रहनेवाठे विद्वान् प्रारव्धकर्मं रेष रहनेकी कल्पनाः वसे हो सकती है ?
शरां सिष्यति तदा यदा देहात्मना स्थितिः ।
देहात्मभावो नेवेष्टः प्ाख्धं त्यज्यतामतः ॥४६१।।
रर तो तमीतक सिद्ध होता है जवरतक देहम आत्म-
भावना रहती है ओर देहामभाव सुमुश्चके व्यि इ नहीं है इसच्यि प्रारव्धकी अवस्याको मी छोड़ देना चाहिये |
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२४९. प्रारब्ध-विचार
शरीरस्यापि प्राख्धकल्यना भ्रान्तिरेव हि। अध्यस्तसखय इतः सखमसखसय इतो जनिः । अजातख कुतो नाशः प्रारब्धमसतः इतः ॥४६२॥
ओर वास्तवमे तो शरीरका भी प्रार्थ माननाभ्रम ही है, क्योकि वह तो खयं अध्यस्त ( भमसे कल्पित ) है ओर अध्यस्त वस्तुकी सत्ता ही करटा होती दहै ? तथा जिसकी सत्ता हीन दहो, उसका जन्म भी करमते आया ओर जिसक्रा जन्म ही न हो, उसका नाश भी कैसे हो सकता है । इस प्रकार जो सर्वथा सत्ताशुन्य है उसका प्रार्य कैप हो सकता है ए
्ञनेनाज्ञानकायय समूरुख लयो यदि । तिष्ठत्ययं कथं देह इति शङ्कावतो जडान् । समाधातुं बाद्यदष्टया प्रारब्धं बदति श्रुतिः ॥४६२॥ न तु देहादिसत्यत्रबोधनाय विपधिताम् । यतः भ्रुतेरभिभ्रायः परमारथैकगोचरः ॥४६४॥
जिनको रेसी रङ्का होती है किं यदि ज्ञानसे अज्ञानका मूलसदहित नाश हो जाता है तो ज्ञानीका यह स्थूल देह कैसे रहता है, उन मूर्खोको समञ्ञनेके च्य श्रृति ऊपरी द्ृषटिसे प्रारन्धको उसका कारण वतढा देती है । बह विद्रानको देहादिका सत्यत्र समञ्चनेके स्यि रेसा नदीं कहती; क्योकि श्रुतिका अभिप्राय तो एकमात्र परमार्थवस्तुका वर्णन करनेमे ही है ।
विवेकचूडामणि १५० ९ अ नानालनषध परिपूणंमनाचन्तमग्रमेयमविक्रियम् । एकमेबादयं ब्रह्म नेह नानास्ि कश्चन ॥४६५॥ [शति कहती है] वास्तवे स्न परिपूर्ण, अनादि, अनन्त, अप्रमेय ओर अविकारी एक अद्वितीय ब्रह्म ही है; उसमे ओर कोई नाना पदार्थ नहीं है । सद्घनं चिद्घनं नित्यमानन्दधनमक्रियम् । एकमेवादयं व्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन ॥४६६॥ जो घनीभूत सत्, चित् ओर अनन्द है; एेसा एक नित्य, अक्रिय ओर अद्वितीय ब्रह्म ही सत्य वस्तु है, उसमे कोई नाना षदा्थं नहीं है । । प्रत्यगेकरसं पूणेमनन्तं सर्वतोुखम् । एकमेवाद्ययं ब्रह्म नेह नानास्ति कश्चन ॥४६७॥} जो अन्तरात्मा, एकरस, परिपूर्ण, अनन्त ओर सर्वव्यापक हे एेसा एक अद्वितीय ब्रहम ही है; उसमे नाना पदार्थं को$ नहीं है । अहेयमलुपादेयमनाधेयमनाश्रयम् । एकमेवादयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंश्चन ॥४६८]॥ जोन त्याज्य हैः न ग्राह्य है ओरन किसीमे सित होने योग्य है तथा जिसका कोह अन्य आधार भी नहीं है, एेसा एक अद्वितीय ब्रह ही सव्य है; उपम नाना पदार्थ को$ नहीं है । निगुणं निष्कलं घ्म निविकसपं निर्ननस् । एकमेवाद्वयं वहन नेह नानास्ति रिश्चन ॥४६९॥
१५१ आत्माभवका उपदेशं
जो गुण ओर कलसे रहित है, स्मः निर्विकल्प ओर सिमल हे, रेखा एक अद्वितीय त्रच दी सत्य हैः उसमे नाना पदार्थ कुर भी नदीं है । अनिरूप्यखरूपं यन्मनोवाचामशोचरम् । एकसेवाहययं चह नेह नानास्ति किश्चन ॥४७०॥ जिसका खूप वर्णन नहीं क्रिया जा सकता तथा जो मन ओर वाणीका मी विषय नही हे, रेषा एक अद्वितीय ब्रह्न ही है; उसमे नाना वस्तु को$ भी नहीं दै। सत्यगदं खतःसिद्धं शुद्धं बुद्धमनीच्छम् । एकमेवाद्वयं व्रह्म नेह नानास्ति किथ्चन ॥५७१॥ । जो सव्य, वैभवपूरण, खतःसिद्ध, उदः बोधघ्ठरूपम ओर उपमारहित है रेखा एक अद्वितीय व्र ही सव्य है; उसमे नाना पदार्थं कुछ भी नही है । जासानुमवका उपदेश निरस्तरागा निरपास्तमोगाः ६५४ शान्ताः सुदान्ता यतयो महान्तः । विज्ञाय तं परमेतदन्ते र्षः परां निदैतिमात्मयोगात् ।॥४७२॥ जिनका किसी भी वस्तुम राग नहीं है ओर भोगका भी सर्वथा अन्त हो गया है तथा जिनका चित्त शान्त एवं इन्द्र्यो संयत ह वे महाता संन्यसीजन ही इस परप तत्को जानकर अन्तमं इस अध्यास्मयोगके द्या परम शान्तिको प्राप्त इए है ।
विवेकचूडामणि १५२
मवानपीदं परतवमात्मनः स्वरूपमानन्दघनं विचायं । विधूय मोहं स्वमनः प्रकर्षितं युक्तः कृतार्थो भवतु प्रबुद्ध; ।५७३॥ अतः; हे वत्स ! तुम भी आत्माके इस परम तत्व ओर आनन्द्- चनखरूपका विचार करते हए अपने मनःकल्पित मोहको छोड़कर मक्त हो जाओ ओर इस प्रकार अज्ञान-निद्रासे जगकर कृतार्थ हो जाओ । समाधिना साधु विनिश्वलात्मना परयात्मत्खं स्फुटयोधचक्चपा । निःसंशयं सम्यगवेक्षितश्चे- चुतः पदार्थो न पुनर्विकरप्यते ॥४७४॥ समाधिके द्वारा भटी प्रकार निर्च इए चित्त ओर विकसित ज्ञान नेत्रोसे इस॒ आत्मतखको देखो; क्योकि यदि सुना इआ पदार्थं निःसन्देहं होकर भटी प्रकार देख च्या जाता है तो उसके विषयमे फिर कोई संशय नहीं होता है । स्वस्याविदयाबन्धसम्बन्धमोक्षा- द त्त्यज्ञानानन्दरूपात्मरन्धौ । । शास्रं युक्तिदंशिकोक्तिः प्रमाणं ४" चान्तःसिद्धा खालुमूतिः प्रमाणम् ४७५॥ अपने अज्ञानरूप वन्धनका संसग छट जानेसे जो सचिदा- नन्दखरूप आत्माकी प्रपि होती है, उसमे शाख, युक्ति, गुरु- क्य ओर अन्तःकरणे सिद्ध होनेवाला अपना अलुमव प्रमाण है ।
१५ अआत्मालुभवका उपदेश
बन्धो भोक्षश्च वधिश्च चिन्तरोग्यक्चुधादयः । तैनैव ५ + ^
स्वेनैव वेया यज्ज्ञानं परेषामालुमानिकम् ॥४७६॥
वन्धन, मोक्ष, तृपति, चिन्ता, आयेय ओर भूख आदि तो अपने आप दही जाने जाते है, दूसरोंको उनका जो ज्ञान होता दै वह तो केवढ आनुमानिक दही है ।
तटखिता बोधयन्ति गुखः श्रुतयो यथा ।
न, दविद्रानी
ज्येव तरेदिद्वानीश्वरावुगृदीतया ।॥४७७॥।
श्रुतिके समान गुरु भी ब्रह्मका केवट तटस्थरूपसे ही बोघ कराते है, विद्वान्को चाहिये कि अपनी ही ईशरानुगृहीत बुद्धिसे [ उसका साक्षात् अनुभव करके ] इस संसार-सागरके पार हो जाय ।
खालुभूत्या खयं ज्ञात्वा खमात्मानमखण्डितम् ।
संसिद्धः ससुखं तिष्ठेनिनर्विकर्पात्मनात्मनि ॥४५८॥
अपने अनुभवसे अखण्ड आत्माको खयं जानकर सिद्ध इआ पुरुष निर्विकल्प मावसे आनन्द्पूर्वक सदा आसाम ही सित रहे ।
© व्रह्मका साक्षात् निरूपण कोई मी नहीं कर सकता? क्योकि वह शब्द् ाक्तिवृत्तिसे बाहर दै--रब्द् वर्होतक पर्हुच दी नीं सकता । उसका ज्ञान तो लक्षणाृत्तिसि ही हो सकता दै । अतः व्रह्मका साक्षात्कार केकरे लिये उसकी उपाधिरूप इस निखिर प्रपञ्चका वाध करना पड़ता दै; क्योकि दीने उसक्रे खरूपको अच्छादित किया हु हे । किन्तु दृश्यका वाध उसमे मिथ्या बुद्धि हए विना हो नदीं सकता ओर ेसी बुद्धि शिप्यको ईशर-कृपके प्रमावसे ही प्रास्त होती ३ । इसल्यि बोध देनेके व्यि ाख्ङकृपा ओर रुरूकृपाके समान भगवत्कृपा भी अत्यन्त आवदयक है ।
विवेक-चूडामणि ९५४
वेदान्तसिद्धान्तनिरुकितरेषा ब्रहैव जीवः सकटं जगच । अखण्डरूपस्ितिये मोक्षो ब्रह्माहितीये श्रुतयः प्रमाणम् ॥४७९॥! वेदान्तका सिद्धान्त तो यही कहता है कि जीव ओर सम्पू जगत् केवल ब्रह ही है ओर उस अद्वितीय ब्रह्मम निरन्तर अखण्ड- रूपसे सित रहना ही मेक्ष है । ब्रम अद्वितीय है--इस विषयमे श्रुतिर्यौ प्रमाण है ।
वोधोपटन्धि
इति गुरुवचनाच्छरतिप्रमाणा- त्प्रमवगम्थ सतच्वमात्मयुक्त्या । प्रश्मितकरणः समाहितात्मा कचिदचलादृतिरात्मनिष्टितोऽभूत् ॥४८०॥ इस प्रकार गुरुके श्ुति-प्रमाणयुक्त वचन ओर अपनी युक्तियो- दवारा परमासमतच्वको जानकर चित्त ओर इन्दियोके शान्त हो जानेसे छोई एक शिष्य निश्वठ वृत्तिसे आतसखखूपमे सित हो गया । कञ्चित्कालं समाधाय परे बरह्मणि मानसम् । व्युत्थाय परमानन्दादिदं वचनमव्रवीत् ॥४८१॥
ओर ङु देरतक परन्रहममे चित्तको समाहितकर फिर उसं परमानन्दमयी स्थितिसे उठकर ये वचन बोला ।
१५९५ बोधोपरच्धि
सुद्धिर्धिन्ट गलिता प्रवृत्ति- बह्यात्मनोरेकतयाधिभत्था ।
इदं न॒ जनेऽप्यनिदं न॒ जने किंवा कियद्वा सुखमस्त्यपारम् ॥४८२॥
अहो ! ब्रह्य ओर आत्माकी एकताका ज्ञान होनेपर मेरी बुद्धि तो एकदम नष्ट ह्यो गयी, सारी प्रवृत्ति दूर हो गयी, अवसद न इदं (प्रत्यक्ष वस्तु ) का ज्ञान है ओर न अनिदं (अप्रत्यक्ष) का ओर न मै यही जानता द्र कि वह अपार आनन्द् कैसा ओर कितना है ।
वाचा वक्तमशक्यमेव मनसा मन्तुं न वा शक्यते खानन्दृतपूरपूरितपरह्याम्बुधेवं मवम् । अस्भोराश्िविक्षीणंबापिकशिरामावं भजन्मे मनो यस्यांशांशलवे विकीनमधुनानन्दात्मना निदैतम्।।४८२॥ जलराशि ( समुद ) मे पड्क्र गे हए व्षाकाठ्कि ओखोकी अवस्थाको प्राप्त हआ मेरा मन जिस आनन्दामरृतसमुद् ॐ एक अंशके भी अदाम डीन होकर अवर अति आनन्दरूपसे धित हो गया है, उस आत्मानन्दरूप अरतप्रवाहसे पयण पर्र्मसमुद्रका वैभव वाणीसे नहीं कहा जा सकता ओर मनसे मनन नहीं किया जा सकता ।
क्व गतं केन वा नीतं कत्र रीनमिदं जगत् । अधुनैव मया च्ष्टं नासि फं महदद्ुतम् ॥४८४।॥
विवेक-चूडामणि १५६ वह संपार कँ चटा गया £ उसे कौन रे गया यह कहौ छीन हो गया १ अहो ! वडा आश्व है जिस संपारको पै अभी देख रहा था बह कहीं दिखायी नदी देता । किं हियं कियुपदेयं किमन्य विलक्षणम् । अखण्डानन्द्पीयूपपूे ब्रहममहाणैवे ॥४८५॥ इस अखण्ड आनन्दाृतपूर्णं बहम-समुद्रमे कौन वस्तु त्याज्य है १ कौन ग्राह्य है ? कौन सामान्य है £ ओर कोन विलक्षण है ? न किञ्चिदत्र पश्यामि न शृणोमि न वेद्म्यहम् । खात्मनेव सदानन्दरूपेणासि विलक्षणः ॥४८६॥ अब मुञ्चे यहाँ न कुछ दिखायी देता है, न सुनायी देता है ओर न मै कुछ जानता ही द्रं । मे तो अपने नित्यानन्दस्वरूप आत्मामं यित होकर अपनी पहटी अवस्थासे सर्वथा व्रिलक्षण हो गया द्र । नमो नमस्ते गुरवे महात्मने विगुक्तसङ्गाय सदुत्तमाय । नित्याद्रयानन्दरसखरूपिणे भूम्ने सदापारदथाम्बुधाम्ने ॥४८७॥ ¦ यत्कटाक्षशरिान्द्रचन्दरिकापातपूतमवतापजश्रमः । प्रापवानहमखण्डवेभवानन्दमात्मपदमक्षयं क्षणात् ४८८ जिनके कृपाकटाक्षरूप चन्द्रकी स्निग्ध चन्दरिकाके संस्गते संसार-ताप-जन्य श्रमके दूर् हो जानेसे मेने क्षणभरमे अखण्ड रेद्रय ओर आनन्दमय अक्षय आत्मपद प्राप्त किया है, उन संगरहित,
१५७ वोधोपर्न्ि
संतरिरोमणि, नित्य-अद्धितीय-आनन्द्रसलरूप, अति महान् ओर निव्य-अपार-दयासागर महात्मा गुरुदेवको वारंवार नमस्कार है । धन्योऽहं कृतघ्रत्योऽहं विणुक्तोऽ्ं भवग्रहात् । नित्यानन्दखरूपोऽं पूर्णोऽहं तदनुग्रहात् ॥४८९॥ | उन श्रीगुरुदेवकी कृपासे आज भै धन्य द्र कतक््य द | संसारवन्धनसे रहित # तया निव्यानन्दस्वरूप ओर सर्वत्र परिपू द्र असद्धोऽहमनङ्गोऽहमलिङ्गोऽहममङ्खरः | प्रशचान्तौऽहमनन्तोऽहमतान्तीऽह चिरन्तनः ॥४९०॥ मै असंग ह, अधीर द्रु अलिङ्ग द्र ओर अक्षय द्र तथा | अव्यन्त शान्त, अनन्त, अतान्त ( निरीह ) ओर पुरातन दरं । अकर्ताहममोक्ताहमविकारोऽहसक्रियः । शद्बोधखशूपोऽहं केवलोऽहं सदाशिवः ॥४९१॥ मै अकर्ता ई, अमोक्ता ह, अविकारी द, अक्रिय द्रः जुदध- बोधस्वरूप ह! एक द्र ओर नित्य कल्याणरूप द्रं | द्रष्टुः श्रोतुक्तुः कतुर्भोक्तुविभिन्न एवाहम् । नित्यानरन्तरानाष्क्रयन ;सीमासङ्खपूणबोधात्मा ॥०४९२॥ र्ट, श्रोता, वक्ता, कर्ता, मोक्ता- मँ इन सभीसे भिन हः मै तो नित्य, निरन्तर, निष्िय, निःसीम, असंग ओर पूर्णवोध- खखूप द्रं । नाहमिदं नाहमदोऽप्युभयोरवमासकं परं शुद्धम् । बाद्याभ्यन्तरश्यं पूण ब्रहमादितीयमेवाहम् ॥४९३)
विवेकचूडामणि १५८
मैन यहुः न वह द्र, बल्कि इन दोनों ८ स्थूल-सुष्षम जगत् ) का प्रकाशकः बाह्याभ्यन्तरूनय, पूर्ण, अद्वितीय ओर शुद्ध प्रह ही द्रं | निरुपममनादितचं त्यमहमिद मद् इतिकल्पना दरम् । नित्यानन्देकरसं सत्यं ब्रह्मा्वितीयमेवाहम् ॥४९४॥ जो उपमारहित अनादितय (त्, भ, यह, वह" आदिकी कल्पनासे अत्यन्त दूर है वह॒ निव्यानन्दैकरसस्वरूप, सत्य ओर अद्वितीय ब्रह ही महू | नारायणोऽहं नरकान्तकोऽहं पुरान्तकोऽहं पुरूपोऽहमीशः । अखण्डवोधोऽहमशेषपसाक्षी निरीश्वरोष्दं निरहं च नि्॑मः ॥४९५॥ म नारायण द्र, नरकासुरका विधातकः ४ त्रिपुरदैत्यका नादा करनेवाला द्र, परम पुरुष ह ओर ईर ई । भै अखण्डनोधस्वरूप ह सवका साक्षी द्र खतन््र द तथा अहंता ओर समतासे रहित द्वं [ यह समी वर्णन चुद्र॒ आसतका पररह परमात्मासे भभेद् प्रतिपादन कटनेके व्यि है |] सर्वेषु भूतेष्वहमेव संखितो ्ञानात्मनान्तवेदिराश्रयः सन् । भोक्ता च भोग्यं खयमेव सर्व यद्यरथग्षटमिदन्तया पुरा ॥४९६॥ ्ानखर्पते सवका आश्रय होकर समस्त प्राणियोके बाहर ओर भीतर मे ही सित द तथा पहले जो-नो पदार्थं ददंवृत्तिद्ारा
१५९ वोधोपरन्ि
मिन-भिन्न देखे गये ये वह भोक्ता ओर भोग्य सब कु स्वयं भैदीद्। सय्यखण्डसुखाम्भोधौ वहुधा विश्ववीचयः । उत्पद्यन्ते विरीयन्ते मायामारुतविश्रमात् ।॥४९७॥ सुश्च अखण्ड अनन्द्-सपुद्रमे विश्वरूपी नाना तरङ्गं माधा- रूपी वायुके वेगसे उठती ओर टीन होती रहती हैँ । स्थृलादिभावा मयि कल्पिता भ्रमा- दारोपिता जु स्फुरणेन रोकं: । काले यथा कस्पकवत्सराय- नत्वादयो निष्कखनिर्विंकर्पे ॥४९८॥ जैसे निष्कछ ओर निर्विकल्प कार्म सखरूपसे कोई कल्प, वर्षे, अयन ( उत्तरायण-दक्षिणायन ) ओर ऋतु आदिका विभाग नहीं है उसी प्रकार छोगोने ्रमवरा केवल स्फुरणमात्रसे दी आरोपित करके सुञ्मे स्थूलसूक्ष्म आदि भावोकी कल्पना कर टी है | > आरोपितं नाश्रयदृपकं भवे- त्कदापि मूहे्मतिदोषदूषितेः । नद्रीकरोदयृपरभुमिमागं सरीचिक्रावारिमहाप्रवाहः ॥४९९॥ बुद्धि-दोषते दूषित अज्ञानियोदयरा अरोपित की इई वस्तु अपने आश्रयको दूषित नहीं कर सकती; जैसे पृतृष्णाका महान् जल-प्रवाह अपने आश्रय ऊषर मूमि-खण्डको [ तनिक भी ] गीला नहीं करता ।
विवेकचूडामणि १६०५
आक्राश्षवस्लेपविद्रगोऽह- मादित्यवद्भाखविलक्षणोऽहम् । आहायवभित्यनिनिशलोऽ- मम्भोधिवत्पारविवजितोऽहम् ॥५००॥ भ आकाशके समान ॒निरठेप र, सूर्यके समान अध्रकाई्य र परवैतके समान नित्य निर्चर टँ ओर समुद्रके समान अपार हू | न मे देहेन सम्बन्धो मेषेनेव विहायसः । अतः इतो मे तद्धर्मा जाग्रखप्नसुपुप्रयः ॥५०१॥ जसे मेषसे आकाराका कोई सम्बन्ध नहीं है वैसे ही मेरा भी शरीरस कोई सम्बन्ध नहीं है, तो फिर इस शरीरके धर्म जाग्रत्; स्वन ओर सुपि आदि सुक्ष कैसे हो सकते है ? उपाधिरायाति स एव गच्छति स एव कमणि करोति यङ्क । स॒ एव जीर्थन्प्रियते सदाहं लाद्विवन्निल एव संखितः ॥५०२॥ उपाषि ही आती है, बही जाती है तथा वही कर्मोको करती ओर उनके पल भेगती है तथा बृद्रावसाके प्रात होनेपर वही रती है । भ तो दुल पर्वतके समान नित्य निर्चल.भावसे ही रहता््र। न मे श्रवृत्तिनं च मे निव्रतिः सदेकरूपख निरंशकसख । एकात्मको यो निविडो निरन्तरो । व्योमेव पूणः स कथं लु चेष्टते ॥५०३॥
२६ बोधोपकबन्धि
मञ्च तदा एकरस ओर निरवयवरकी न विसी विषयमे प्रवृत्ति है ओर न किसीसे निवृत्ति । भला जो निरन्तर एकषूथ घनीभूत ओर आकादाके समान पूर्णं है वह किस प्रकार चेश कर सकता हं ।
पुण्यानि पापानि ` निरिन्द्रियख
नित्चेतसो नि्विकृतर्निराकृतेः । ङती ससाखण्डसुखाुमूते- व्रते ह्यनन्यागतमित्यपि श्रुतिः ॥५०४॥
इन्द्रिय, चित्त, विकार ओर आछ्ृतिसे रहित सुक्ष॒ अखण्ड आनन्दखदूपको पाप या पुण्य कैसे हो सकते दै? ओर -अनन्वायतं पुण्येनानन्वागतं पापेन # ( ब्रह० ४ ।२। २२) यह श्रुति भी रेता ही वतलाती दै ।
छायया स्पृषटथुष्णं वा शीतं वा सुष्टु दुष्ट वा ।
न स्पृशत्येव यक्किञ्चि्पुरुषं तद्विलक्षणम् ॥५०५॥
न साक्षिणं सक्ष्यधमीः संस्परशन्ति विलक्षणम् ।
अविकारथदासीनं गृहधमौः प्रदीपवत् ॥५०६॥
जते उष्ण-स्ीत, अच्छी-खुरी-- कैसी ही वस्तु यसे छ जानेपर॒भी उससे सर्वया प्रथक् पुरुषका तनिक भी सस नहीं कर सकती तथा धरको प्रकाशित करनेवाटे दीपकपर जैसे धरके [ सुन्दरता, मलिता आदि | किसी धर्मका को$ प्रभाव नहीं होता वैसे ही शरीर आदि दृश्य पदा्ोके धमं उनसे विरुक्षण या तल जवं) जर पप ( सनि शाखरनिषिदध कर्म ) से असम्बड़ दै ।
वि० चृ १६-
विवेकचूडामणि १६२ उनके सक्षी अल्माको जो त्रिकाररडित णवं उदासीन दै, तनिक भी नहीं छर सकते । स्था कर्मणि ` साक्षिमावो वहेयथा. वयसि दाहकत्वम् । रजो्थारोषितवस्तपङ्ग | स्तथेव कूटखचिदात्मनो मे ॥५०७।॥ मनुप्योके कर्मोमिं जैसे स्का साक्षीमाव है, देके जलानेमे जैसे अग्निकी दाहकता है ओर आरोपित सर्पादिसे जसे र्जुका सङ्ग है वैसे ही मुञ्च करूटस्थ चेतन आत्माका विषयो साक्षीमाव है । अर्थात् जैते उनकी प्रदृति्यों खामाविक है, क्रियमाण नही, वैसे ही आ्माका साक्षीभाव भी विषयोकी अपेक्षासे स्वामाधिक दै, बह उसकी क्रिया नहीं है । ` ` कतौपि वा कारयितापि नाहं भोक्तापि वा भोजयितापि नाहम् । द्र्टापि बा द्शेयितापि ` नाहं सोऽहं स्वरयंज्योतिरनीदगात्मा ॥५०८॥ भै न करनेवाया र, न'करानेवाखा दरः न॒ भोगनेवाल ह्न सुगतानेवाखा ह्वै ओर न द्वेवनेवाखा र, न ॒दिष्वनेबाखा । म तो सनते विक्षण स्कार आमा ही कर । चरुत्युपाथौ प्रतिविम्बलोरख मोपाधिक्रं मूढधियो नयन्ति । ` खविम्बमूतं रव्िव्रदविनिष्कियं कतौसि भोक्तासि हतोऽस्मि देति ॥*५०९॥
१६३ बोधोपलन्वि
जि प्रकार [ जकल्य ] उपाधिके चञ्चक होनेपर मूढबुद्धिं पुरूष ओपाधिक प्रतित्रिम्बकी चच्चल्ताका व्िम्वभूत सूर्ये आरोप करते है उसी प्रकार वे सूरयवेः समान निष्किय आत्माभे [ चित्तकरी चञ्चल्ताका आरो ] भ कर्ता ईः भोक्ता द्रः हाय मारा गया" रसा कहा करते हं ।
जले वापि ले वापि छत्वेषृ जडात्मकः ।
नाहं विरिप्ये तद्धषटधनेभो यथा ॥५१०॥
घडेके धर्मेति जैसे आकाशका कोई सम्बन्ध नदीं होता वैसे दी यह जड देह जलमे अथवा स्थरे कहीं भी लोटत रहे मँ इसके धरमेसि रप्ति नहीं हो सकता ।
कःठत्वभोक्तृत्वखलत्वमत्तता-
जडत्ववरद्त्व विघरुक्तताद्यः । बुदधधिंङृस्पा न तु सन्ति वस्तुतः खसिन्परे ब्रह्मणि केवलेऽदये ॥५११॥
कर्तापन, भोक्तापन, दुता, उन्मत्ता, जडता, बन्धन ओर मोक्ष- ये स्तब वुद्धिकी ही कल्पना है; ये प्रकृति आदिसे अतीत केवर अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप स्वातमामं वस्तुतः नहीं है ।
सन्तु विकाराः प्रकृतेदशधा शतधा सहस्रधा वापि ।
क्कि मेऽषङ्कचितेस्तनं धनः कचदम्बर स्पृशति ॥५१२॥
्रङृतिमे दसो, सैकडं ओर हजारों विकार क्यों न हौ उनसे मुञ्च असङ्ग चेतन आत्माका क्या सम्बन्ध ‹ मेव कमी भी
आकाराको नहीं छर सकता ।
विवेक-चूडामणि १६४ अव्यक्तादिस्थूलपर्यन्तमेत- द्विखं यत्राभासमात्रं प्रतीतम् । व्योमप्रख्यं ष्ष्ममाचयन्तदीनं ` ब्रह्मादेतं यत्तदेवाहमसि ।५१३॥ अन्यक्तसे ठेकर स्थूलमभूतपर्न्त यह॒ समस्त विश्च जिसमे आभासमात्न प्रतीत होता है तथा जो आकाराके समान सृष्ष्म ओर आदि-अन्तसे रहित अद्वैत ब्रहम है, वही यै | सर्वाधारं सवंवस्तुप्रकाशं ५ ¢ # ¢ स्वाकारं सर्वगं स्वंशल्यम् । नित्यं॒॑श्द्धं॑निश्वलं निविकल्पं ब्रह्माद्वैतं यत्तदेवाहमसि ।५१४॥ जो सव्रका आधार, सत्र वस्तुओंका प्रकाशक, स्वरूप, सृर्व्यापी, सबसे रहित, नित्य, शुद्ध, निश्वक ओर विकल्परहित यद्रेत ब्रहम है, बही मे हं | यतपरत्यस्तारोषमायाविरोषं प्रत्यग्रं प्रत्ययागम्यमानम् । सत्यज्ञानानन्तसानन्दसूपं र + ~ यत्तदेवाहमसि ब्रह्मादेतं यत्तदेवाहमसि ॥५१५॥ जो समस्त मायिकः भेदोसे रदित, अन्तरातमाूप ओर
साश्चात् प्रतीतिका अवषिय तया अनन्त सचिदानन्दस्वरूप अद्रैत जहम है, वही मै
१६५ वोयोपलन्धि
निष्कियोऽस्म्यविकारोऽसि निष्करोऽखि निराकृतिः ।
निर्विकल्पोऽसि नित्योऽसि निराम्बोऽसि निरयः ।1
म क्रियारहित, विकाररदित, कलारत ओर निराकार रद्र तथा निर्विकल्प, नित्य, निरालम्ब ओर अद्वितीय दर |
स्वात्मकोऽहं सर्वोऽहं सर्वातीतोऽहमद्यः ।
केवराखण्डवोधोऽहमानन्दोऽहं निरन्तरः ॥५१७॥
मै सवका आत्मा, सरव॑रूपः, सव्रते परे ओर अद्वितीय द्र तथा केवर अखण्डज्ञानखरूप ओर निरन्तर आनन्द्रखूप दर| ।
खाराज्यसाम्राज्यविभूतिरेषा
भवत्कृपाश्रीमहिमप्रसादात् । ` म्राप्ना मया श्रीगुरवे महात्मने नमो नमस्तेऽस्तु पुननंमोऽस्तु ॥५१८॥
हे गुरो ! आपकी कृपा ओर महिमाके प्रसादसे सुञ्चे यह खाराव्य-सा्राज्यकी विभूति प्रप्त इई है । आप॒ महात्माको मेरा बारंबार नमस्कार हो ।
महाखप्ने मायाकृतजनिजरामृत्युगहने
भ्रमन्तं ह्धिष्यन्तं बहुरुतरतापैरलुदिनम् ।
अहङ्कारव्यापघ्रव्यथितमिममत्यन्तकृपया
ग्रनोध्य प्रख्चापात्परमवितवान्मामसि गुरो ॥५१९॥
नै मायासे प्रतीत होनेवाटे जन्म, जरा ओर मृद्युके कारण अत्यन्त भयानक महाखप्नमे भटकता इभ दिन-दिन नाना प्रकार- कै तापोसे सन्तप्त हो रहा था, हे गुरो ! ` अहंकारखूपी व्याप्रसे
` विवेकचूडामणि १६६ अत्यन्त व्यथित मुञ्च दीनको निद्राते जगाकर आपने मेदी बहत जड़ी रका की है| प नमस्मै सदेकस्मै कस्मेचिन्महसे नमः । यदेतद्विखरूपेण राजते गुरुराज ते ॥५२०॥ हे गुरुराज ] आपके किसी उस महान् तेज को नमस्कार है, जो सत्खरूप ओर एक होकर भी व्रिश्वरूपसे विराजमान है ।
उपदेशका उपसंहार इति नतमवरोक्य चिष्यवरयं समधिगतात्मसुखं प्रवुद्धतच्वम् । रुदितहदयः स॒ देरिवेन्द्रः पुनरिद माह वचः परं महात्मा ॥५२१॥ इस प्रकार आत्मानन्द ओर तच्ोधको प्राप्त इए उस शिष्य प्रणाम कते देख महात्मा गुरुदेव अति प्रसन्नचित्से फर इस प्रकार श्र वचन कहे रगे । बरहप्रत्ययसन्ततिजंगद तो ब्रह्मैव सत्सर्वतः प््याप्यारदशा प्रशान्तमनसा सर्वाखवस्थाखपि । सूपादन्यदवेक्ितु मरिमभितश्ु्मतां विद्यते तदद् रहमिद्ः सतः किमपरं बुदधेविंहारास्पदम् ।५२२। हे वत्स | अपनी आघ्यािक दश्सि शान्तयित्त होक सत्र अस्याओमिं पूसा ही देख भि यह संसार ब्रह्मपतीतिका ही रवाह है इसण्यि यह सर्वया सत्यघस्य ब्रह ही है । ेत्रयुक्त भ्यक्तिको चारं ओर देखनेके च्य रूपके अतिर्कि ओर क्या
१६७ उपदेशक्रा उपक्वंदार
च्स्तु है? उसी प्रकार ब्रहमज्ञानीकी बुद्धिका व्रिपय सत्यस्य जदाते अतिच्क्ति ओर याहो सक्ता है £ कस्तां परानन्द्रसानुभूति- मुस्सुज्य शून्येषु रमेत विदान् । चन्द्रे महाह्वादिनि दीप्यमाने चितरन्ुमालोकयितुं क इच्छेत् ॥५२३॥ उस परमानन्द्रसङे अनुभवको छोडकर अन्य थोधे विप्रयो कौन बुद्धिमान् रमण करेगा £ अति आनन्ददायक पूर्ण वनद्रओेप्रकाशचित रहते हए चित्रडिखित चन्द्र माको देखनेकी इच्छ कौन करेगा ? असत्पदार्थानुभवे न किञ्चि श्न ब्त बत्रनच दःखदानः। तदद्वयानन्दरसानुभूत्या तृ्रः सुखं तिष्ठ सदात्मनिष्ठया ॥५२४॥ असत् पदाथकि अनुभवते न तो कुछ त्ति ही होती है ओर न दुःखका नारा ही; अतः; उस . अद्वयानन्दरसरे अनुभवसे तृप्त होकर सत्य आलनिष्ठमावते सुखपूवक स्थित हो । खयमेव सवथा पयन्मन्यमानः खमद्रयम् । स्वानन्दमनुथञ्ानः कड नय महामते ॥ धरेव हे महाबुद्धे ! सत्र ओर् केवल अनेको ही देखता इ आ, ` अपनेको अद्वितीय मानता इ, ओर आलानन्दका अनुम करता हआ कालक्षेप कर । £
विवेकचूडामणि १६८
अखण्डबोधात्मनि ‡ निर्विकस्पे विकल्पनं व्योभ्नि पुरःप्रकस्पनम् । तदद्वयानन्द् मयात्मना ; सद्ा शान्ति परामेत्य भजस्व मौनम् ॥५२६॥ अखण्डवोधखरूप निर्विकल्प आल्मामे किसी विकल्पा होन आकादामे नगस्की कल्पनके समान है । इसखिये अद्टितीयः आनन्दमय अत्मचरूपसे स्थित होकर परमदान्ति सभ कर मोन धारण करो । तूष्णीमवया क परमोपश्चान्ति- बुद्धरसत्कस्यविकर्पटेतोः | ब्रह्मात्मना ब्रह्मविदो महात्मनो यत्राहयानन्दसुखं निरन्तरम् ॥५२७)। महातमा ब्रहवे्ताके मिथ्या विकल्पोकी देतुभूता बुद्धिकी जो ब्रह्मभावसे मौनावस्था है वही परम उपशम है, जिसमे किं निरन्तर अद्रयानन्द्रसका अनुभव होता है । ` नास्त नवसनान्मानात्पर सुखज्रदुत्तमम् । विज्ञातात्मस्वरूपसख ˆ स्वानन्दरसपायिनः ॥५२८॥ जिसने आत्मखरूपको जन य्या है उस खानन्दरसका पान कएनेवाले पुरुषके ल्य वासनारहित मोनमे बदकरं उत्तम सुखदायक ओर कुछ भी नहीं है } गच्छसतष्ठनतुपविरज्छयानो वान्यथापि वा| यथेच्छया वसेदिद्ानारमारामः सदः मुनिः ।५२९॥
१६९ उपदेश्का उपसंहार
व्रिद्रान् सुनिको उचित है कि चरते-फिरते, बेठत-उठ्तः सोते.जागते अथवा किसी ओर अवसाम रहते निरन्तर आत्माम रमण करता दओ इच्छनुकूर रहे ।
न देशषकारासनदिग्यमादि- लक्ष्यादयपेक्षा म्रतिबद्धवृततेः । संसिद्रतस्य मंहात्मनोऽस्ति खवेदने का नियमाच्पेक्षा ॥५२०॥ जिसकी चित्तव्रत्ति निरन्तर आत्मखरूपमे गी रहती है तथा जिसे आत्मतच्की सिद्धि हो गयी है उस महापुरुषको , देरा, कार, आसन, दिशा, यमः नियम तथा लक्ष्य आदिकी कों आवश्यकता नहीं है । अपने-आपको जान ठेनेपर भला नियम आदि- की क्या अपेक्षा हे? घटोऽयमिति विज्ञातुं नियमः का न्वपेक्ष्यते । चिना प्रमाणसुष्ट्ल् यसिन्सति पदाथेधी |५२१। प्यह॒ धड़ा हैः रेसा जाननेके व्यि, जिससे वस्तुका ज्ञान होता दै, उस प्रमाण-घोषवके अतिरिक्तं भटा ओर किंस नियम- की आवद्यकता हं ‡ अयमात्मा नित्यसिद्धः प्रमाण सति भासत । न दें नापि वा कालं न शद्विं बाप्येकषते ॥५२२॥) आत्मा नित्यसिद्ध है, प्रमाण होते ही वह स्यं भासने ख्गता है । [ अपनी प्रतीतिके टिय ] वह देश, काक अथवा शुद्धि आदि किंसीकी मी अपेक्षा नीं रखता ।
विवेकचूडामणि २७०. देवद्तोऽहमित्येतद्िज्ञानं निरपेक्षम् । तद्वद्रहमविदोऽप्यख ब्रह्माहमिति वेदनम् ।॥५२३॥ जिस प्रकार भे देवदत्त हः इस ज्ञानमे किसी नियमकी
अपेक्षा नहीं है उसी प्रकार ब्रह्रत्तको भँ ब्रह्म हः यह ज्ञान
स्वतः ही होता है । भानुनेव जगत्सर्वं भासते यख तेजसा । अनात्मकमसनुच्छं फं जु तस्यावभासङ़म् ।५३४॥
सूयसे जेते जगत् प्रकशित होता है वैसे ही जिसके ग्रकाशसे समस्त असत् ओर तुच्छ अनात्मपदार्थं भासते है उसको भासित कटनेवाटा ओर कौन हो सकता है ?
वेदशास्पुराणानि भूतानि सकलान्यपि ।
येना्थवन्ति तं षिः नु विज्ञातारं प्रकारयेत् ॥५२५॥
वेद, शाक्ञ, पुराण ` ओर समस्त भूतमात्र जिसते अरान् हो रदे है उस सर्वसाक्षी परमात्ाको ओर कौन प्रकारित करेगा £
एष खयज्योतिरनन्तराक्ति- रात्मापरमेयः सङ़लानुमूतिः । यमेव विज्ञाय विमुक्तबन्धो जयत्ययं भरहमविदुततमोत्तमः ॥५२६॥ यह [सव॑साक्षी ] आत्मा स्व्प्रकारा, अनन्तशक्ति, अप्रमेय ओर सर्वायुभवस्रूप है, इसको ही जान लेनेपर वह ब्रहवेत्ताओ सर्शरष्ठ महात्मा संसार-बन्धनते सुक्त होकर धन्य हो जाता है ।
१७१ उपदरेशका उपसंहार
न॒ खिद्यते नो विषयैः प्रमोदते न सज्जते नापि विरज्यते च। खसिन्सदा क्रीडति नन्दति स्वयं निरन्तरानन्दरसेन त्तः ॥५३७॥
विषयक प्राप्त होनेपर् वह न दुखी होता है, न अनन्दित होता है, न उने आसक्त होता है ओर न उनसे विरक्त होता हे । बह तो निरन्तर आत्मानन्दरससे त्त होकर स्वयं अपने- आपत ही क्रीडा करता ओर आनन्दित होता है ।
षां देहव्यथां त्यक्ता बालः क्रीडति वस्तुनि ।
तयैव विद्वान् रमते निर्ममो निरहं सुखी ॥५३८॥
जिस प्रकार लिढौना मिलनेपर॒बारुक अपनी भूख ओर शारीर्कि व्यथाको भी भूढ्कर उससे खेखनेमे गा रहता है उसी प्रकारं अहंकार ओर ममतासे शून्य होकर विद्वान् अपने आलामे आनन्दपू्वैक रमण करता रता है ।
चिन्ताशल्यमदैन्यभेक्षमशमं पनं सरिदरारिपु
खातन््येण निरडङु्ा यितिरभीनिद्र स्मशाने वने।
वं ्षालनशोषणादिरहितं दिग्वास्तु शय्या मही
सश्चारो निगमान्तवीथिषु विदां क्रीडा परे ब्रह्मणि ॥५२९॥
्रहरेत्ता विद्वानूका चिन्ता ओर दीनतारदित भिक्षा ही जजन तथा नदिरयोका जल दी पान होता है | उनकी सिति खतन्त्रतापूर्वक ओर निर्ङ्शा ( मनमानी ) होती है । उन किसी प्रयारक्ा मथ नहं होता, वे वन भयवा इमान सुखकी नीर
विवेक-चूडामणि | ९७२् सोते है । षेने-खंखने आदिकी अपेक्षासे रहित दिशा [ अथवा वल्कलदिं | ही उनके वल्ल ठै, प्रथिवीही विद्टोना है, उनका „ आना-जाना वेदान्तवीथियोमे ही हआ करता है ओर पररह ही उनकी क्रीडा होती है ।
बिमानमालम्ब्य शरीरमेतद् शुनक्त्यशेषान्विषयानुपस्ितान् । परेच्छया बालवदात्मवेत्ता
योऽव्यक्तलिङ्गोऽननुपक्तबाह्यः ॥५४०॥
बद आसज्ञानी महापुरुष इस. शरीररूप विमाने तरेठकरं अथीत् अपने स्ाभिमानन्य शरीरका आश्रय ठेकर दूरके दरा उपस्थित किये समस्त विपरयोको वाठ्कके समान भोगता है; किन्तु वास्तवं चङ प्रकट.विहरदित ओर बाह्य पदार्थेति आसक्ति- रहित होता हे ।
दिगम्बरो वापि च सम्बरो वा स्वगम्बरो वापि चिदम्बरखः । उन्मत्तवद्वापि च बालबद्रा ` पिंञाचदवापि चरत्यवन्याम् ॥५४१।। चैतन्यसप वचसे युक्त वह महामाग्यवान् पुरुष॒ वसरहीन, बलयुक्तं अथवा गूगचमादि धारण करनेवाखा होकर उन्मत्तक
समान, बाख्कक्रे समान अथवा पिशाचादिके समान स्ेच्छानुकूर भूमण्डलमे विचरता रहता है ।
| १७ उपदेश्षक्ा उपसंहार
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कामान्नी कामरूपी संशर्येकचरो मुनिः ।
खात्मनेव सदा तुष्टः स्वयं सवात्मना सितः ।५४२॥
स्वयं सर्वात्मभावसे सित, सदा अपने अत्मामे ही सन्तुष्ट ओर अकेला विचरनेवादा बह सुनि अपने इच्छनुसार ८ जब ` इच्छा हो तब ) अन्न ग्रहण करता है ओर मनमाना खूप धारण कर् विचरता रहता है ।
कचिन्मूढो विद्वान्कचिदपि महाराजविभवः क्रचिद्भरान्तः सौम्यः कचिद्जगराचारककितः क्रचि्पात्रीभूतः क्चिदवमतः कराप्यविदित- शवरत्येवं प्राज्ञः सततपरमानन्दसुखितः ॥५४२॥ ब्रह्मवेत्ता महापुरुष कहीं मूढ, कहीं विद्रान् ओर कहीं राजा- महाराजाओंके-से ठाट.ाटसे युक्त दिखायी देता दै । वह कीं भ्रान्त, कहीं शान्त ओर करीं अजगरके समान निङचट भावसे धड़ा दीख पडता है । इस प्रकार निरन्तर परमानन्द मग्न हआ विद्वान् कहीं सम्मानित, कीं अपमानित ओर कीं अज्ञात रहकर अलक्षित गतिसे विचरता है । निर्धनोऽपि सदा तष्टोऽप्यसहायो महाबरः । नित्यतप्तोऽप्यथञ्ञानोऽप्यसमः समदशनः ॥५४४॥ । बह निर्धन होनेपर भी सदा सन्द, असहाय होनेषर भी महाबलवान्, भोजन न करनेपर भी नित्यतृक्त ओर विषमभावसे बर्तता ह भी समदं होता है ।
विवेकचूडामणि १७४
अपि दुव॑न्न्वाणधामोक्ता फरभोग्यपि । शरीयप्यशरीर्ेष॒परिच्छिन्नोऽपि सर्वगः ।।५४५॥ वह महात्मा सव्र कुछ करता हआ भी अकर्ता है, नाना ्रकाएके फल भोगता हआ भी अभोक्ता है, शरीरधारी होनेपर भी अशरीरी है ओर परिच्छिन्न होनेपर भी सर्न्यापी है । अरारीरं सदा ॒सन्तमिमं व्रहमविदं कचित् । प्रियाप्रिये न स्पृशतस्तथैव च शुभाशचभे ॥५४६॥ सरा अरारीर-भावमे शित रहनेसे इस ॒बरहतेत्ताको प्रिय अथवा अग्रिय तथा म अवा अज्म कमी छ नहीं सकते । स्थूलादिसम्बन्धवतोऽभिमानिनः सुखं च दुःखं च शमाद्यमे च । विध्वष्त्न्धसखय सदात्मनो भनेः । ङतः शमं वाप्यशचमं फलं वा ॥५४७॥ ` जिस देहाभिमानीका स्थूर-सू्म॒ आरि देहोते सम्बन्ध होता है, उसीको सुख अथवा दुःख तथा शुम अथवा अल्युभकी प्रति होती है; जिसका देहादि बन्धन दरट गया है, उस सतलरूप सुनिको म अथवा अश्म फल्वी प्रापि कैसे हो सकती है £ तमसा ग्र्वद्भानादग्रष्तोऽपि रत्रिजनैः । ग्रत इत्युच्यते भ्रान्त्या दा्ञात्वा वस्तुरक्षणम् ॥५४८॥ तदवेहादिवन्धेभ्यो विपुक्त ब्रह्मवित्तमम् । पदयन्ति देदिवन्मूढाः शरीराभासदशंनात् ॥५४९॥ बासतव्रिक बातको न जाननेके कारण जैसे रासे ग्रस्त न होनेपर भी ग्रस्त-सा प्रतीत होनेके कारण लेग भ्रमवरा सूर्यको
१७५ उपदे्ाका उपसंहार
गाहु-ग्रस्त कहते है; वैसे दी देहादिबन्यनसे छट हए त्रह्वेत्ताका आभासमात्र शरैर देखकर अज्ञानीजन उसे देहयुक्त-सा मानते है । अहिनिरभ्यनीवायं यक्तदेहस्त॒ तिष्टति । इतस्ततश्वास्यमानो यक्किखितप्राणवायुना ॥५५०॥ ` यह मुक्त पुरूपका शरीर तो सोँपकी कांचुटीके समान प्राण- बयुदवारा कुछ इधर-उधर चलायमान होता इं पडा रहता है । [ उसमे कर्त॑लराभिमानका अत्यन्तामाव होनेके कारण ॒वास्तवमे क्रिया नही होती ] । स्रोतसा नीयते दारु यथा निभ्नन्नत्रम् । देवैन नीयते देहो यथाकालोपथुक्तिषु ॥५५१॥ जैसे जख्के प्रवाहसे लकड़ी ऊँचे-नीचे स्थानम बहा ले. जायी जाती है, उसी प्रकार दैवके द्वारा ही उसका रारीर समया- नुदरल भोगकर प्राप्त करता है । ्रारन्धकमेपरिकत्पितवासनाभिः संसारिवच्चरति शक्तिषु युक्तदेहः । सिद्धः खयं वसति सा्ष्दत्र तूष्णीं चक्रख मूलमिव कल्पविकस्पशूल्यः॥५५२।॥ मुक्त पुरुषका शारीर प्रारण्धकमंसे कल्पित वासनाओं्ारा संसारी पुरषके समान नाना भोगोको भोगता है । सिद्ध पुरुष तो लयं कुखल-चक्रके मूखकी ति संकल्प-विकल्पसे रहित होकर साक्षी-भावसे मौन होकर रहता है । सैवेन्दरियाणि विषयेषु नियुक्त एष नैवोपयुङ्क उपदशनलक्षणसः ।
"ण
यिय क ह = न
विप्रे क-चूडामणि | २७द
नेव॒क्रियाफलमपीषदवेक्षते स खानन्दसान्द्ररसपानसुमत्तचित्तः ॥५५३॥
ब्रहर्ता पुरुष अत्यन्त सधन अआत्मानन्दरसके पानसे मतवा "होकर साक्षीखूपसे सित इआ इन्दरियोको न तो विषयमे क्गाता है ओर न उन विषयोंसे हटाता है | वह॒ अपने कमेक फट्की ओर तो देखता भी नहीं है |
लक््यारक्ष्यगरतिं त्यक्तवा यस्तिष्टेत्केवलात्मना ।
शिव एव॒ खयं साक्षादयं ब्रह्मविदुत्तमः ॥५५४॥।
जो स्य ओर् अर्क्य दोनों इृषटियोको त्यागकर केवर एक आत्मस्वरूपसे सित रहता है वह ब्रह्मवेत्ता श्रे महापुरुष साक्षात् शिवे ही है । [ अर्थात् अन्य वस्तुके अमावके कारण जिसका कोई रक्ष्य ( प्रात्य ) नहीं ह्येता ओर जड अथवा सोये इए ॒पुरषके समान जो ज्ञानशयन्य भी नहीं होता वह पुरुष ही ्रष्तम आसनिष्ठ है | ] ।
जीवन्नेव सदा युक्तः कृतार्थो ब्रह्मवित्तमः ।
उपाधिनाशार्ैव सन् ब्रहमाप्येति निर्दयम् ॥५५५॥
एसा ब्रज्ञानी जीता हआ भी सदा मुक्त ओर कृतार्थं दी ` दै, शरीररूप उपाधिके न्ट होनेपर वह बरहमावमे खित हुआ ही अद्वितीय ब्रहम छीन हो जाता है ।
शेर वेपसद्धावाभावयोध युथा पुमान् ।
तथव ब्रह्मविच; सदा ब्रहैव नापरः ॥५५५६॥
नट जैसे विचित्र वेषविन्यास् धारण किये रहनेपर अथवा उसके अमावम भी पुरुष दी है, वैसे ही ठता उपाधियुक्त
| १७७ ` उपदेशषका उपसंहार `
। हो अथवा उपाधिसुक्त, षदा व्रह्म ही है; ओर कुछ नहीं ।
यत्र कापि विकीर्णं सत््णमिव तरोवैपुःपतनात् ।
ब्रह्मीभूतख तेः प्रगेव हि तचिदभ्निना दग्धम् ॥५५७॥
जर तहँ गिरे हए बृषे सूखे पत्तौके समान ब्रहीभूत यतिका शरीर वहं ी गिरे बह तो पहले ही चैतन्यम्निसे दग्ध इं रहता दे ।
सदात्मनि ब्रह्मणि तिष्ठतो घनः
पर्णाद्यानन्द मयात्मना सदा । न देशकालाघयुचितप्रतक्षा „ त्वञ्ांसविट्पिण्डविसजेनाय ॥५५८॥
, सस्खरूप ब्रह्मम सदैव परिपूर्णं अद्वितीय आनन्दखरूपसे सित -रहनेवले. मुनिको इस वचा, माप्त ओर मल-मूतरके पण्डको व्यागनेके च्यि किसी योग्य देशकाठ आदिकी अपेक्षा नहीं होती ।
देहस्य मोक्षो नो मोक्षो न दण्डख कमण्डरोः ।
अविद्याहृदयग्रन्थिमोक्षो मोक्षो यतस्ततः ॥५५९॥
क्योकि मोक्ष हृदयकी अविदारूप भ्रन्थिके नारको ही कहते है | इसलिये देह अथवा दण्ड-कमण्डटुके त्यागका नाम मोक्ष नहीं है ।
दुटयायामथ नद्यां वा शिवक्षत्रऽपि चत्वरे ॥
पर्ण. पतति चेत्तेन तरोः किं ज छमाद्भम् ॥५६०॥
रक्षका सूकर जड़ा आ पत्ता नाठीमेः नदीम, शिवाङ्यमे अर्थं किसी चनरूतरेपर कहीं भी गिरे, उससे बरक्षका क्या हानि- छम. हो.सकता है £ 2. = ६
वि०चू° शर
विवेकचूडामणि १७८
पत्र पृष्पखय फठलसख नाशवद् देहेन्द्ियप्राणधियां वषिनाशः । नेवात्मनः खख सदात्मकखा- =. नन्दाढरृतेवक्षवदसि चषः ।५६१॥ क्के पत्त, एक ओर फलोके समान नाशा तो जीवके देह, इन्द्रियः, प्राण ओर बुद्धि आदिका ही होता है, सदानन्दखख्प खयं आत्माका नारा कभी नहीं होता, वह तो वृक्षके समान नित्य निश्वर है | ज्ञानघन इत्यात्मलक्षणं सत्यघ्चकम् । अनूद्योपाधिकस्येव कथयन्ति विनाशनम् ॥५६२॥ श्रज्ञानधन" यह आत्माका रक्षण उसकी सत्यताका सूचक है-विज्ञजन रसा अनुवाद ८ वर्णन ) करके उपाधि-कल्पित वस्तुक ही विनाशा बतखते है । ` अविनाशी वा अरेऽ्यमात्मेति भ्रुतिरात्मनः । ्रनवीत्यविनाशित्यं विनर्यत्सु विकारिषु ॥५६२॥ “अरे, यह आत्मा अविनाशी है" यह शरुतिशरमी विकारी देह आदि- का नारा होनेपर आत्माके अवरिनाशिलका ही प्रतिपादन करती है । पषाणब्रक्षतणघान्यकटाम्बरा्यया (॥९;; दग्धा भवन्ति हि मृदेव यथा तथैव । ;; . देहेन्द्रियासुमनभादि समसतद्यं ज्ञानामिदग्धगुपयाति -- ---हानामदभष्याति परातममावम् ।॥५६४॥ & (अविनाद्री वा अरऽयमासानष्ठिततिधमाः ( इह० ४।५। (८;
१७९ उपदेश्ाका उपसंहार
निस प्रकार पत्थर, वृक्ष, तृण, अन्न, मूसा ओर वश्च आदि जल्नेपर मिद्व ही हो जति है उसी प्रकर देहः, इन्दियः प्राण ओर मन आदि सम्पूर्ण दय पदार्थं ज्ानाप्नित्े दगध हो जानेपर परमातखरूप ही हो जते है| |
विरक्वणं यथा ध्वान्तं लीयते भावुतेजसि ।
तभैव सकं दध्यं ब्रह्मणि प्रविलीयते ॥५६५॥
जैसे सूर्यका प्रकाश होनेपर उससे विपरीत खभाववाढा अन्धकार उसीमे छीन हो जाता है वैसे ही सम्पूणं दश्य्रपचच ज्ञानोदय होनेपर ब्रह्मे दी टीन हो जाता है ।
घटे नष्टे यथा व्योम् व्योमैव भवति स्फुटम् ।
तथैवोपाधिविर्ये बहव व्रहमवित्खयम् ॥५९६॥
धडेके न होनेषर जैसे धटाकादा महाका ही हो जाता है वैसे ही उपाधिका ठ्य होनेपर ब्रह्मवेत्ता खयं ब्रह्म ही हो जाता है ।
शीरं क्षीरे यथा किप तैरं तेरे जरं जके ।
संयुक्तमेकतां याति तथात्मन्यात्मविन्धुनिः ॥५६७॥
जैसे दृधे भिख्कर् दूध, तैम मिख्कर तै ओर जकमे मिख्कर जल एक दही हो जति दै वैसे दी आसज्ञानी सुनि आत्मामं ठीन होनेपर आमखरूप दी हो जाता है । , ए
एवं विदेहकेवल्यं सन्मात्रतयमखण्डितम् ।
रहमावं प्रपयैष यतिनावतंते पुन; ॥५६८॥
अखण्ड सत्तामात्रसे सित होना ही विदेह-केवल्य है । इस प्रकार वरहम-भावको प्रात होकर यह यति फिर संसार-चक्रमे नहीं पड़ता।
विवेकचूडामणि १८०
सदात्मैकत्वविज्ञानदग्धाविदादिवष्मणः ।
अयुष्य नह्मभूतत्वाद् ब्रह्मणः इत उद्धवः ॥५६९॥
ब्रह ओर आत्मके एकलज्ञानरूप अग्निते अविदाजन्य ` शरीरादि उपाधिके दग्ध हो जानेप्र तो यह ब्रह्मवेत्ता ब्रहम्प ही हो जाता, है ओर ब्रहमका पिर जन्म कैसा ?
मायाक्लपौ बन्धमोक्षौ न सतः खात्मनि वस्तुतः ।
यथा रज्ञो निच्छियायां सर्पाभासविनिर्भमौ ॥५७०॥
बन्धन ओर मोक्ष मायासे ही हए है; वे वस्तुतः आस्मामे नही है; जसे त्रियाहीन रज्लमे सर्प-प्रतीतिका होना न होना श्रममात्र है, वास्तवमे नहीं ।
` आहृते: सदसच्वाभ्यां वक्तव्ये बन्धमोक्षणे ।
नातृतिव्र॑हमणः काचिदन्यामावादनात्रतम् ।
यद्य््यद्रेतहानिः खाद् दैत नो सहते श्रतिः ॥५७१॥
अज्ञानकी आबरणराक्तिके रहने ओर न रहनेते ही क्रमशः बन्ध ओर मोक्ष कहे जति है ओर ब्रह्मका कोई आवरण हो नहीं सकता, क्योकि उससे अतिरक्त ओर कोई वस्तु है नही; अतः वह अनादृत है । यदि त्रहका भी आवरण माना जाय तो अद्वैत सिद्ध नहीं हो सकता ओर दवेत शरुतिकषो मान्य नहीं है |.
बन्धं च मोक्षं च षेव मूढा ८... बदधेगुणं वस्तुनि . कटपयन्ति । ~ ¦ दगावृतिं मेषटृतां यथा खौ | यतोऽ्यासङगविदेकम्षरम् ॥५७२॥
` " नन
५ उपदेशका उपसंहार बन्ध ओर मोक्ष दोनों बुद्धिके गुण है । जैसे मेधके द्रारा दष्टिके दैक जानेपर सूर्यको का हआ कहा जाता है उसी प्रकार मूढ पुरुष उनकी कल्पना आत्मतच्मे व्यथं ही करते है; क्योकि ब्रहम तो सदैव अद्वितीय, असङ्ग, चैतन्यस्वखूप, एक ओर अविनाशी है ।' अस्तीति प्रस्ययो यश्च यथ नास्तीति वस्तुनि । यद्रे गुणावेतौ न॒ तु नित्यश्च वस्तुनः ॥५७२॥ पदार्थका होना ओर न होना-एेसा जो ज्ञान है वह बुद्धिका ही गुण है; नित्य वस्तु आतमाका नहीं । अतस्तौ मायया क्छ बन्धमोक्षौ न चातमनि । निष्ठे निच्छये शान्ते नखे निर्जने । अद्वितीये परे त्वे व्योमवत्कस्पना इतः ॥५७४॥ इसच्यि आत्ममं ये बन्ध ओर मोक्ष दोनों मायासे कल्पित है वस्तुतः नहीं है; क्योकि अकाडके समान निरयत्र) निच्ियः शान्त, निर्मल, निरञ्जन ओर अद्वितीय परमत कल्पना कैसे हो सकती है ? न निरोधो न चोतपत्तिनं बद्धो न च साधकः । न यश्चन वै शक्त इत्येषा परमाथता ॥५७५॥ ` अतः परमां ८ वास्तविक ) बात तो यदी है कि न किसी- का नाच है, न उत्ति है, न बन्धन है ओर न कोई साधक है तथा न मुमुक्चु ( सक्त शोनेकी इष्वा ) है, न सक्त दै । सकरनिगमचूडाखान्तसिद्वान्तरूपं परमिदमतिगुदयं दशितं ते मयाद्य ।
ना यि ---~-
विवेकचूडामणि १८२ अपगतकलिदोषं कामनिर्थक्तवुदि
स्वखतबदसकृत्वां भावयित्वा युष्म् ॥५७६॥
ह वस ! कर्कि दोषो रहित, कामनाशून्य त्च मुसुश्चुको
-अपने पुत्रके समान समञ्चकर मैने बरवार सकर राल्लोका सार-
रिरोमणि यह अति गुह्य परम सिद्रान्त तेरे सामने प्रकट किया है|
^. रिष्यकी विदा इति शरुत्वा गुरोर्वाक्यं प्रश्रयेण कृतानि; । स॒ तेन समनुज्ञातो ययौ निर्ुक्तन्धनः ॥५७७॥ गुरुदेवके देसे वचन सुन शिष्यने अति नग्रतासे उन्हे प्रणा किया ओर संसार-बन्धनसे सक्त हो उनकी आज्ञा पाकर चद गया | गुरुरेव सदानन्दसिद्रौ निर्मरमानसः । पायन्वसुधां सवा विचचार निरन्तरम् ॥५७८॥ ओर गुरुजी भी सचिदानन्दसणुदरमे मग्नमन हए सम्पूर्ण धयिवीको पवित्र करते निरन्तर विचरने लगे | अनुबन्ध-चतुष्टय इत्याचा्यस्य॒रिप्यख संबादेनात्मलक्षणम् । निरूपितं पमां सखवोधोपयत्तये ॥५७९॥ ईस प्रकार गुरु ओर शिष्यके संबादखपते सुमुश्ुओंको सुगमता- । से बोध होनेके ण्यि यह आसम्ञानकां निरूपण किया गया है क निग सिला भवा है ।#. | # इस इलोकमे श्रीशंकराचार्यजने गर अनुवन्ध-चतुषटयकरा वणन करिया है । इस अन्थका अधिकारी सुसु पुरुष हैः विषय आत्मज्ञान है
सम्बन्ध ॒निरूप्यनिरूपक है ओर पयोजनं 'सुमुक्षुओंको सुगमतासे सिद्धि [> < र आत्मज्ञानकौ सिद्धि" हे ।
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१८३ भ्रन्थ-पररंसा
हितमिमयुपदेशमाद्रियन्तां “विहितनिरस्त्षसस्तचित्तदोषाः । भवसुखविरताः प्रशान्तचित्ताः श्रुतिरसिका यतयो भधुक्ष्बो ये ॥५८०॥ वेदान्तविहित श्रवणादिके द्वारा जिनके चित्तके समस्त दोष निकर गये हैँ ओर जो संसारषुखसे विरक्त, शान्तचित्त, श्रुतिरहस्यके रसिक ओर मोक्षकामी दै वे यतिजन इस हितकारी उपदेशका आदर करं । ्रन्यप्ररासा संसाराध्वनि तापभालुकिरणग्रोदतदाहव्यथा- खिन्नानां जरकाष्चया मरुभुवि श्रान्त्या परिभ्राम्यताम् । अत्यासन्नसुधाम्बु्धिं सुखकरं ब्रह्मादमयं दर्शय- न्त्येषा शङ्करभारती विजयते निर्घाणसन्दायिनी ।५८१। संसार मागमे नाना प्रकारके क्लेशूपी सूर्यकी किरणोंसे उतनन इए दाहकी व्यथसे पीडित होकर मरुस्थल्मे जल्की इच्छसे भटकते इए थके-मेदि पुरुषोको अति निकटमे ही अद्धितीय ब्रह्मरूप अत्यन्त आनन्ददायक अगरृतका समुद्र॒ दिखानेवाटी यह श्रींकराचार्यजीकी निर्वाणदायिनी बाणी निरन्तर जयको प्राप्त हो रही है ।
ह्यति श्रीमलरमहंसपसिवाजकाचा्यगोषिन्दमयवलून्यपाद्- िष्यश्रीमच्छङ्करभरवत्तो विवेकचूडामणिः समाप्तः ।
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सृती कछ मूर तथा सानबाद पुस्तके
भीमद्धगवद्वीता-तत्वविवेचनी ष ६८५ चित्र ४, सजिर्द् मूल्य ४) ीमद्धगवद्वीता-शाङ्करमभाष्य-सानवाद प्रष्ठ ५२०, चिच ३, मूल्य २॥) शरीमद्धगवद्मीता-रामायुजमाप्य-सानुवाद्, 8४ &०८› चित्र ३,स०२॥) श्रीमद्भगवद्रीता [ बड़ी ]-एषठ ५७२; चित्र ४, सजिर्द्, मूर्य॒ १|) देशात्रास्योपनिषद् -सानवाद शङ्करभाष्यसहितः सचिव पृष्ठ ५ ॥ =) भीमद्भागवतम हापुराण-(दो खण्डं ) सटीकः पृष्ठ २० ३२० चित्र तिरंगे २५ सुनेहरा १, सजिर्दः 1 ६५ --". ९५ भीमद्धागवतमहापुराण-मूल, मोटा गाइपः पष्ठ ६९२, चित्र १, सजिद; मूल्य ००० ००० धि ६) श्रीमद्धागवतमह पुराण मूल गुटका, सनिस्दः पष्ठ ७६८, सचिव मू० द) अभ्यात्मरामायण-सानुवादः पष्ठ ४००, सचित् ? कपड़ेकी जिद, मू° ३) वेदन्त-द्रान-हिदौ.वयायासहित, ४ ४१६० सचिनः सजिल््ः मूल्य २) पातज्जज्योगद्र्शन -सटीकः पथ १९२, र चित्र, मू० ||); सजिष्द् ९) भीटुगासप्शाती -तानुवाद, धृष २५०, शचि मूलय ॥।);सनिव्द् २) सूक्ति-खुधाकर-सुन्द्र रेक संगरहःसानुवाद्ष् २६६ मूर्य ॥|=)ऽस०१) स्तोत्ररलावली ी-सानुवाद्, सचिवः श्छ ३२०) मूस्य ॥) सजिल्द् ॥1=) रम दशन-नारद-भक्ति की निस्त दीका सचितर, रष ९९ २मू० ।-) बिवेक-चूडामणि-सातवाद, सचिव स् ०) अप रोकषालभूति-गङ्करलामिक्त, वालवाद एष्ट ४० सचिव मू =)|| मनुस्म्रति-द्वितीय अध्यायः सार्थः मूख्य ~“
-)॥
स्तानम्--सानुवादः पृष्ठ ९६, । अ)
` पानुवादः सचितः पूष २४० मूल्य ० =) गोविनद्-दामेोदर सतोत्र-सानबार, सचिन धृष्ट २२ भूर्य --- -)
संध्योपासनविधि-सानुवाद, ष्ठ २४ मूल्य च) शारीरकमीमांसाद शंन मू, ष्ठ ५८; मूल्य ०५
) -( अध्यातरामायणान्तर्गत ) सानुबाद पृष्ठ ८०, मूर )॥ शीविष्णसहस्नामस्तोजम् मूल, प्रष्ठ ४८; मूल्य (
प्रोत्तरी- शीशङ्करस्वामिकतः जवाद्, रष ३२ मूल्य ~“. )॥ सध्या-मूः विधिसहित पृष्ठ १६; |
तता-गीताप्रेस, पो० गीतापेख ( गोरख ) ॥ ज
क ५ च ५
॥ 4144114 11411416 ॥॥॥॥॥ 14111
८ = । 0: १. क बहमवेता विदठान्का भोजन चिन्ता ओर दीनतरषित ` भिक्षा दी होता है, नदियोका जल ही पान होता, स्वतन्त्रता ओर खच्छन्दतपूंक उनकी खिति होती है, धन अथवा समशानमे निभय होकर सुखकी नीद सोना हेता धोने खलानेकी अपकषासे रहित दिशा ही उनका षल्र हे ओर थिवी ही उनका विष्ठौना है । वेदान्तधीथियोमे ही उनका आनाजाना हभ करता हे ओर पत्रमे ही उनकी क्रीडा हभ करती है ।
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