सुमित्रानंदन पंत ग्रंथावली खण्ड दो
गुगपय युगवाणी प्राम्या स्वर्णफिरण स्वरापूछि मधुन्याल
राजकाल प्रकाशन
नयी टिनसो. पटना
सूह्प ए० ४० ००
'शाति जोची चरम शप्श्रण १६७६ प्रशाशर राजश्मस प्रशादन प्राइवेट लिपिटड ढ, नेताजी गुमभाष माग, मयी दिल्ली ११०००२ सुगर छान द्रिटम, शाहूल्शा, डिल्ली ११००४२
5ए09ाए7७६७४६०७४ 7७ 57%57«% €6एा €:0"०८९९३ #उ7६६ छा उप्र उबता।धडवडवरंडत गडवा कपात्व ७ 50 00
युगपष युगात
द्रत भरो जगत के जीण पत्र गा कोकिल, बरसा अर पडता जीवन डाली से चचल वग दीप-शिखा के विद्रुम भ्रो' मरकत वी छाया जगती मै जन पथ कानन में बे चहुक रही कुजो में ये ड्व गये
तारो का नभ
जीवन का फल
बढो प्रभय,
विश्वास घरण घर
गजन कर मानव कैसरि | बासो का भुरमुट जग-जीवन म॑ जो चिर महात जो दीन हीन, पीडित
शत बाहु-पाद
ए मिट्टी के ढेले
खो गयी स्वंग की
स्वण क्रिण
सुदरता का आलोक
नव है, नव हे
चाँधों, छवि के नव वबधन मजरित भाम्न वन छाया में वह विजन चाँदनी की घाटी वह लेटी है तर छाया मे खोलो, मुख से घृषट
द्वाभा के एकाकी प्रेमी ग्रंधियाली घादी मे
पिट्टी का गहरा श्र धकार
ताज
मानव
तितली
सष्या
चाप् के प्रति
अनुक्रम
श्र
युगान्तर
श्रद्धा के फूल
गुरुदेव के प्रति
राजबीय गौरव से जाता सो, करता रक्त प्रवाश भाज बार बार झ्रीतम प्रणाम जय है, जय राष्ट्रपिता भारत गीत
स्वृत-त्रता दिवस स्वाधीनता दिवस
जय गान
जागरण गीत
उदबोधन
जागरण
दीपलीक
दीप श्री
दीपावली
मिट्टी के खिलौने
कक्यीद्र रवीद् के प्रति अ्रवनी द्रनाथ ठाकुर के प्रति मर्यादा पुरुषोत्तम के प्रति भावाहन
श्री भ्ररविद के प्रति श्रद्धाजलि
अवतरण
स्वप्न पूजन
बहू मानव क्या
जिज्ञासा
प्रकाश क्षण
करुणा धारा
श्“ंगदो
शोभा जागरण
मानसी
प्रतर घन
श्रमर स्पश
प्रीति परिणय
नव झावेश
स्वप्न गीत
नणी रे मुगषाणी ७६ १२४ मापू घर गुगपाणी घर नये दृष्दि घ्रे माएव घर युग उपररण घर सव सस्पूर्ति ब्दे पुष्य प्रमू घ्रे चीटी दर पतमर 8] लिल्पी ब्ध दो छड्पे द्छ मातवपन घप गगा पी सौ ८ गंगा बा प्रभात ष्६ मुल्यावन ६० उददोषन ६१ फोलो ६१ मावस वे प्रति ध्र भूत दशत घ्रे ६३
म्राजबाद गाघीयाद ध३े सवीण भतियवादियों मे प्रति ्े४ड घतपरति ह्ड मंध्यवग हट शपपव 3 ख्रमजीवी ६ चन नाद ६६ कम का मन ६७ रूप का मत ६७ रूप पूजन ध्द हूप निर्माण ध्प भूत जगत् ध्६ जीवन मास ६६ मानव पशु ६६ नारी ०० नर की छाया १०१ बाद तुम्हारे दार १०१ सुमन के प्रति श्ण्र कवि १०२
प्रव ६७+
आाग्र गिदग उामप छाुमूति
अय मगंराति हरीतिमा अ्रपति में प्रति द्व्इ
राग
राग गापना कप गर्व मुझे स्वप्न दो मत गे स्वत जीयन स्पा मु मे स्वप्न चला
बला में प्रति में लिपोर्तियां पार बदली मा प्रभात दो मित्र
ऋमा में नीम पझोस थे प्रति प्लोस विई
जलद
प्रनामिता ये बवि प्राचाय दिवेदी ने भ्रति पुसुप्त वे प्रति त्रपीत
जीवन-तम
झाप्रो
कुष्णघत
निश्चय
खोज
झावाहन
लेनदेन
बस्तु सत्य
भव मानव
प्रकृति शिु झावेद्
आत्म समपण तुम ईइवर चाणी
झुक श्ण्श श्ण्ष १०४ १०६ १०६ १०३ १०७ १०८ १०८ १०६ १०६ ११९ ११० १११ ११९ ११२ ११२ ११२ ११३ ११४ ११४ ११४ ११५ ११६ ११७ ११७ ११८ ११८ ११८ ११६ ११६ १२० १२०
युग नृत्य
पट प्राम कवि
भारत ग्राम १७ स्विप्त श्रीर सत्य १७ बापु १७; अहिता श्र पतकर (७२ उद्नोधन १७३ गैव हा टिय १७८ कवि क्सिनि श्छ्ड वाणी (७५ सक्षत्र १७५ ग्रयन से १७५ याद १७६ अुलदावदी १७७ विनय १७७ कक किये १७६-२७३ अभिवादन (८३ सम्मोहक १६३ रजतातप श्प्८ हिमाद्ि १८६ दे अघनुय १९० चितन १९४ मत्स्य पाएं ६6९६ अरुण ज्वात १6७ स्व्ण निभर १९८ ज्योति भारत ु १९6 नोग्ाखाली के प्मार्ज]
के प्रत्ति नर 866 जैवाहरणाल- हे के प्रति २०० अगुग्ठिता हु ९०९ च् श्ग्र हिमाद़ि श्रीर समुद्र ३०३ मे प्रेमी २०४ ब्पण २०५ जिनासा २०५ स्वथिम प्राय २०६ ऊपा २०६ हिला २१३ द्वाः २१४ व्यक्त धर विश्व २१५ सअभात का चाद श्र हेरीतिगा श्ल्ट
छाया पट भावाहग
निवेदन
भू सता
यौव में प्रति रात्रमण
नारी पथ
नील घार
मुग प्रभात
सबिता
श्री भ्ररवि द दशन स्वर्णोदिय
झशोव यन
स्थणपूलि स्वणधूलि ज्याति वृषभ प्रग्ति बाल भश्य देवयाव्य देव पुरुषाथ झतगमन एक सत्त् प्रच्छान मन सजन शक्तियाँ ड्द्र वरुण सोमपायी मंगल स्तवन से यासी का गीत भावोमेष आवाहन प्राण काक्षा रस स्रवण साघना प्रेम मुक्सि प्रतीति साथकता कुण्ठिति भ्रात अविच्छि'न
२१७ २१८ २१८ २१६ २२० र२१ २२१ श्श२ २२३ श्र २२५ रे२७ २५७
२७५-३५३ रप१ रेपरे रषर श्प्रे रेप३ स्टोर रद र्ए५ २५८५ २८६ रद र्घ७ र्८पद रेपप र्ध& र्ष६ श्र रध्रे र६्रे र६४ ६४ शुदड २६५ २६६ २६६ २६७ र्ध्८
प्रततर्वाणी मुपित बचने मात् चतया मात घब्िति प्रणाम निर्मेर ज्योति भर प्रीति निमर पग्रतलोंव स्वग घप्सरी चित्रररी प्रतविदास चेतन मुस्युजप सद्मण छाया दपण छायामा प्राद्दात परिणति चौथी भूस भातिम पैगम्बर नरब मे स्वग दिवास्वप्न सावन तालबुल ऋरदटन के प्रति नव वधू वे प्रति झाशका जममूमि युगागम गणपति उत्सव स्वप्न निबल लोक सत्य सामजस्य ग्रामीण झाज़ाद
काले बादल जाति मन क्षण जीवी मनुष्यत्व पतिता परकीया
र्६८ २६६ २६६ ३०० ३०१ ३०३ ग्रे ३०२ ३०३ रै०३ ३०४ ३०४५ ३०५ ३०६ ३०७ ३०८ दण्६ ३१० ३११ ३११ ३१२ ३१४ ३१६ ३१७ ३१८ ३८ ३१६ ३१६ ३२० बेर बेर! शेशर श्२३ श्र४ ३२५ २६ ३२६ ३२२७ शेरे८ ३२६ श्र ३३०
घ्वजा चदता
१६ प्रगस्त /घछ
हैंदय ताएण्य प्रणय कुज मम क्या
गापन
रै३ १ चरद चांदती ३३९ स्वत के ३२ स्वच्न देही ३३३ मानती
२३४ मथुज्वाल
३३४
३३६ ३३७
२५५ ३६४
दर
हुत भरो जगत वे जीण पत्र,
है ग्रस्त घ्वत्त, है धरुप्का दोण।
हिम-ताप-पीत, मधुवात भीत,
तुम बीतराग, जड़, पुराचीन !। निष्याण विगत युग! मृत विहग | जग मनीड द्ाब्द श्री” दवास हीन, अ्युत, प्रस्तव्यस्त प्रखोन््स तुम भरभर प्रनत में हो विलीन [
बबाल-जाल जय में फंले
फिर नवेलत झुषघिर,--पल्लव लाली!
प्रायो वी ममर स॒ मुखरित
जीवन वी मासल हरियाली मजरित विश्व में यौवन ने जग पर जग का विक, मतवाली निज भ्रमर प्रणय-स्वर मदिरा से भर दे फिर नव युग की प्याली!
(फरवरी !३४)
२
गा, कोक्लि, बरसा पावव कण ! नष्ट अप्टद हो जीण पुरातन, ध्वस भ्रश जग के जड बघन ! पावक पथ. धर भावे नूतन, हो पललवित नवल मानवपन गा, कौकिल, भर स्वर में फम्पन | भरें जाति-ुल वण-पण घन, श्रध नीडसे रूढि रीति छत, व्यक्त राष्ट्र गत. राम-द्ेष रण, करें, मरें विस्मति में तत्क्षण ! गा, कोव्िल, गा,---कर मत चितन ! ्ण नंवल रुंघिर से भर पल््लव-तन, नवल स्नेह सौरभ से यौवन, » कर मजरित नव्य जग जीवन, गूज उठे पीन््पी मधु सब जन
*
८
नी
युगपथ / ७
गा, घोविस, नव गा बेर सुजन ते रच मातय मे हित यूशन माल, याणी, गेल, भाव नव चोमन, शाह मुहृदता हो मानम पन, परे मनुजञ नये जीवन यापन गा, शोकिल, संदेश महातन ! माउव दिव्य स्पुलिंग घिरातन, यह ने दहू गा सश्यर रज पण दश बात हैं उसे पं बाबर, मानव भा परिचय मानपन ! वोबिस, गा, मुबु लित हों दिशि-द्ण (एप्रिप्ठ १२५) ३
भार पढ़ता जीवन डाली से मैं पतमड का सा जीण पात +- बेदल, बेदल. जग-कानन में साने फिर से मधु या प्रमात !
मधु या प्रभात --लद-लद जातीं
वैभव से जग वी डाल डास,
कलिन्पलि, किसिलय में जल उठती
सुदरता की स्वर्गीय ज्वाल ! नव मधु प्रभात (--पूजते मधुर उर उर में भव भाशाभिलाप, सुख-सौरभ, जीवन-बलरव से भर जाता सूता महावाश !
भा मधु प्रभात [--जम मे तम में
भरती चेतना भ्रमर प्रवादा,
मुरमाये मानस मुबुलो मे
पाती भव मानवता विकास मधु प्रात ! मुक्त नभ से सस्मित नाचती घरित्री मुबत पाश ! रवि दाशि बेवल साक्षी होते अविराम प्रेम करता प्रकाश !
में ऋरता जीवत डाली से
साह्वाद, शिशिर का शझींण पात
फिर से जगती के कानन में
भरा जाता नव मधु वा प्रमात
(एप्रिल ”३५)
है|
चचल पग दीपशिखा के घर गह, संग, वन में भाया वसस्त !
८ | पत प्रयावली
नह प्राण । हि कोक्सि ! इैसगा उर मे तर वेदना 8 भ्रगार, भाया व्त्त, घोषित दि ग भर कक की भा, प्रिये । निश्चित & कफ रिश्रप्रित र्प्मे स्वर प्रकत रचते सजीक जो त्ि उसकी छाया, श्राक्ा हे (एप्रिल्त १३ ५) ्् विदुम भर! रक्त ३ छाया,
युगपथ / .
“+सो, चित्र शलम-सी, पंश शोस उड़ने वो धवब बुसुमित घाटी,-- पहू है प्रल्मांड वा वसत, खिल पड़ी निसिस प्रवत थाटी ! (मई ३५)
६
जगनी वे जन-पय, यानन में तुम ग्राप्नों विहग ! धनादि गान, दिर तुय रिक्षिर पीढित जग में निज प्मर स्वरो स बरो प्राण जल, स्थल, समीर, नभ मे व्यापक छेडो उर की पावव' पुकार, बहु श्ाजाप्रो वी जगती से बरसा जीवन संगीत प्यार * बवुम बहो, गीत खग | डाला में जो जाग पडी कलियाँ प्रजान, चह विटपों का श्रम-पुष्य नही, मघुऋतु का मुक्त, भनत दाल साथे स्वप्ता बे तम में वे जागेंगे--पह सत्य बात, जो देख चुके जीवन निशीय वे देखेंगे. जीवन प्रभात (मई '३५) ७ बे चहक रही कुजो मे चंचल सुदर बिडियाँ, उर का सुख बरस रहा स्वर स्वर पर ! पत्रों पुष्पो से ठपक रहा स्वर्णातप प्रात समीर के मुदु स्पर्शों से कप कोंव ! शत बुसुभो में हेस रहा कुज उडु उज्ज्वल, लगता सारा जग सच स्मित ज्यों शतदल! है पूण श्राइतिक सत्य कितु सानव जय ! क्यो म्लान तुम्हारे कुज, कुसुम, श्रातप, खग ? जो एक, झसीम शअभ्रखण्ड, मधुर व्यापक्ता खो गयी तुम्हारी चह जीवन साथक्ता लगती विश्वी श्रो' बिह्त आाज मानवाइति, एक्त्व शूय भव विश्व भानवी सम्इति (मई ३५) ] दे डूब ग्रये--सव ड्ब ग्रये दुदम, उदग्र शिर भ्रद्धि शिखर
१० / पत प्रधावलो
३ 5 सर
सृगषय / १३
इसकी मिठास है भअधुर प्रेम, भौ' झमर बीज चिर विश्व क्षेम ! जीवन का फल, जीवन का फल ! इसका रस लो,--हो जम सफल ) तीखे, चमकीले दाँत चुमा चादो इसको, क्यो रहे सलुभा ? मिर्भीक बनो, साहसी, शबत, जीवन प्रेमी,--मत हो विरक्त ! सुदर इच्छा की घरी झाग, प्रिय. जंगती पर दगमितानुराग ' (भई ३५)
श्१ृ
बढ़ो भप्रभवय, विश्वास चरण घर ! सोचो बूधा न भव भय कातर ! ज्वाला के विदव्वांस के चरण, जीवन मरण समुद्र सन्तरण, सुख दुख की लहरो के शिर पर पृय घर पार करो भव सागर ! बढो, बढो विश्वास चरण धर ! क्या जीवन ? क्यों ? क्या जंगे कारण ? प्राप पुष्य, सुख दुख का वारण ? व्यय तक ! यह भव लोकोत्तर बढती लहर, वृद्धि से दुल्तर। प्रार करो विश्वास चरण घर )? जीवन पथ तमिस्मय विजन हरती भव-तम एक लघु किरण प्दि विश्वास हुदय में झणु भर देंगे पथ तुमको गिरि सागर बढो, प्रमरः विश्वास चरण घर! (मई “३५)
श्र
गजन बारे मानव केसरि ! ममस्पूह गजने,-- जय जावे जग में फिर से सोया मानवपत ! काँप उठे मानस वी भा गुहाप्रो. का तम, प्रद्म.. क्षमताशील बनें, जावें दुविधा, भ्रम
१२ | पत प्रधादतो
श्ड
जग जीवन मे जो चिर महान सौदय पूण भो! सत्य प्राण, मैं उसका प्रेमी बनू, नाथ जिसमे मानव हित हो समान !
जिसस जीवन में मिले शक्ति,
छूटें भय सशय, प्रव भक्ति,
में वह प्रकाश बन सक्, नाथ !
प्रिल जावें जिसमे प्रखिल व्यक्ति ! दिशि दिशि मे प्रेम प्रभा प्रसार, हर भेद भाव का पग्रघकार, में खोल सक्ू चिर मुदे नाथ! मानव के उर के स्वग द्वार!
पाकर प्रमु ! तुमसे अ्रमर दान करने मानव का परित्राण, ला सकू विश्व मे एक बार फिर से नव जीवन वा विहान (मई ३५)
श्ब
जो दीन हीन, पीडित, निबल, मैं हैँ उनका जीवन _सम्बल ! जो मोह छिन, जग में विभकत, वे मुभमे मिलें, बनें. सशक्त !
जो प्रहपूण, वे प्रध कप,
जो नम्न उठ बन कीति स्तूप
जो छिन भिन जल कण भ्रसार,
जो मिले, बने सागर श्रपार |
जग नाम + रूपमय ग्रधकार,
मैं चिर प्रकाश मैं मुक्ति द्वार !
(मई ३५)
१६
दात वाहु पाद, शत नाम रूप, शत मन, च्च्छा थाणी, विचार, शत राग द्वेप, शत क्षुघा काम, -- यह जग जीवन का प्राधवार !
दात भिध्या वाद विवाद, तब,
दत रुढि नीति, छत घधम द्वार,
लिशा सस्शति, संस्था, समाज,--
यह पु मानव या प्रहवारा
१४ | पत पग्रपादलो
श्€
सुदरता का शभालोक स्रोत
है फूट पडा मेरे मन मे,
जिससे नव जीवन का प्रभात
होगा फिर जग के प्राँगन में मेरा स्वर होगा जग का स्वर, भेरे विचार जग के विचार, मेरे मानस का स्वग - लोक उतरेगा भू पर नयी बार !
सुदरता का संसार नवल
प्रकुरित हुआ मेरे मन मे,
जिसकी नव मासल हरीतिमा
फैलेगी जग के गह - बन में ! होगा पल्लवित रधिर मेरा बन जग के जीवन का वसत, मेरा मत होगा जग का मन, झ्रौ' मैं हैगा जग का प्रनात !
मैं सध्टि एक रच रहा नवल
भावी मानव के हित भीतर,
सौदय, स्नेह, उल्लास मुझे
मिल सका नहीं जग में बाहर ।
(एब्रिल '३६)
२०
नव हैं नव है, नव - नव सुपमा से मण्डित हो चिर पुराण भव हे! नव हे नव ऊपा सध्या पअभिरना दत नव - नव ऋतुमपि भू, शशि शोभित, विस्मित हो देख मैं प्रतुलित जीवन वैभव हे! नव है! नव धाशव यौवन हिल्लोलित जम मरण में हो जग दोलित, नव इच्छाप्ना का हो यर में भ्ाकुल वि रव है! नव है ! बाँपे रहें मुबित के बाघन ह्दो सीमा प्रसीम - प्रवलम्बन,
१६ | पत् प्रषाद पी
चचल, प्रगल्म, हेंसमुख, उदार, में सलज,--तुम्ह था रहा खोज?!
तुमने झधरों पर
छनती थी ज्योत्स्ना श्श्चि मुख पर, में करता था भुख सुधा पान,-- बूकी थी बोविल, हिले मुकुल, भर गये ग्राध से मुग्ध प्राण! घरे पअधघर,
मैंन्रे कोमल वषु भरा गोद,
था झात्म समपण मिल गये सहज
सरल, मधुर,
मारुतामोद !
मजरित श्राम्र द्रुम ये नीचे
हम पिये, मिले थे प्रथम बार,
मधु वे” कर में था प्रणव बाण,
पिक के उर में पावक पुकार! (मई '३५)
श्र
वह विजन चाँदनी वो घाटी छायी मदु वन तर माघ जहाँ नीयू भाड़, के मुबुलो वे मंद से मलयातिल लदा बहा !
सौरभ श्लथ हो जाते तन मन, बिघते भर भर मदु सुमन क्षयन, जिन पर छत क्रम्पित पत्रों से, लिखती कुछ ज्योत्रना जहाँ-तहा !
भरा कोकिल बा कोमल दुजन उक्साता भावुल उर कस्पन, यौवन का री वह मधुर स्वग, जीवन बाधाएँ वहा कहाँ? (मई, /३५)
श्ड छाया ?ै
वह लेटी है तरु छाया मे, से ध्या विहार को गाया मैं!
१८ | पत प्रधावली
मदू बाह मोड उपधान किये, ज्यों प्रेम लालसा पान विये, उभरे उरोज, कुततल खाले, एक्किनि, कोई क्या बोले ?
स्विष्नमूढ कोई ? भारी कि अ्रप्पर या व केवल तह के छाया ? (एप्रिल्, ही ५) र्५् छाया है गो मुक्त स रपट सता, है प्िर अवगुण्ठनमायि बोलो क्या केवल सिर अवगुण्णण प्रथवा भीतर जीव: फल्पना मात्र प्रा
मद रह का"
» माया विनता
का हर काः नही पता,
हैं दश्य, दृष्टि पर सके बता
पट वर पट क्ेक््ल त्म मपार
पर पट सु , के पता पर र पेसि हटा प्रपरितय भर पक्ार
खोलो रहस्य के जम
अतल खली खत अनेय युद्य, भ्रग जग ह 7 मोहित, सेग संग आदी तुम 3 हकिनि, जग ३३ मोह कि मं रू पत्य, तुम रहो गग
२६
घुक्र ! द्वामां बे एगोवी प्रेमी, नीरव दिगत मे दांब्द मौन, रवि ये जात, स्पत्त पर प्रात महते तुम तम से चरमप--कौन ?
राष्या ये सोने पे नम पर
तुम उज्ज्वल हीौरब सदृश्य जड़े,
उदयाचल पर दीसत प्रात
प्रगुठे वे बल हुए एड़ें। भव सूनी दिद्ि भौ! श्रातत वायु बुम्हलापी प्यण बली सप्टि, तुम डाल विश्व पर वर्ण प्रभा प्रविराम वर रह प्रेम वप्टि! भ्रो छोटे दशि, घाँदी ये उहु | जब जब फले तम वा पिनाश, तुम दिव्य दूतसे उतर टीघ बरसाप्रो निज स्वग्िक प्रगाश
(मई, /३५)
२७
छद्योत
गंधियाली घाठी म सहता
हरित स्फुलिंग सदश फूटा बह |
वह उड़ता दीपक निशीय वा --
तारा -सा झाकर दूटा वह! जीवत दे धन पाधवार में मानव प्रात्मा था प्रकाश बण जग सहसा, ज्योतित बर देता मानस के चिर गुह्मय कुज बन
(मई, ३५)
श्८ सच्डि
मिट्टी का गहरा प्राघवार
डूबा हे उसम एक बीज,
वह खो न गया, मिट॒टी न॑ बना,
कोदो, सरसो से क्षुद्र चीज
२० | पत ग्रथावली
३० मानव
सुदर हैं विहण, सुमन सुदर, मानव ! तुम सवस सुदरतम, निर्मित सबबी तिल सुपमा से तुम निखिल सप्टि मे चिर निस्पम । यौवन ज्वाला से वेध्टित तन, मूदु त्वच, सौ दय प्ररोह ब्रग, नयोछावर जिन पर निल्िल प्रद्वति, छाया प्रकाश के रूप रग !
धावित कृश नील शिराप्ना मं मदिरा से मादक झुंधिर धार श्रांखें हैं दो लावष्यः लावा, स्वर में निसग संगीत सार! पु उर उरोज, ज्यों सर, सरोज, दढ बाहु प्रलम्ब प्रेम बाघन, पीनोर स्क्घ जीवन तरु के, कर पद, अगुलि, नख शिस शो भनो
मौवन की मासल स्वस्थ गंध,
नव युग्मा वा जीवनोत्सग !
आह्लवाद भ्रखिल, सौदय शभ्रखिल,
श्रौ प्रथम प्रेम वा मधुर स्व!
आशाइभिलाव, उच्चावाक्षा,
उद्यम श्रजस्तर, विध्नो पर जय,
विद्वांस, झसदसत का विवेक,
दढ श्रद्धा, सत्य प्रेम अक्षय
मानसी भूतिया ये प्रमद,
सहूदयता, त्याग, सहानुभूति,
जो स्तम्भ सम्यता वे पाथिव,
संस्कृति स्वर्गीय,--स्दभाव पूर्ति ! मातव का सानव पर प्रत्यय, परिचय, मानवता वा विकास, विचान ज्ञान का श्रवेषण, सब एवं, एक सब में प्रवाश ! प्रमू वा अनात वरदान तुम्ह उपभोग क्रो प्रतिक्षण नव नव, क्या कमी तुम्हे हे विशुवतत मे यदि बन रह सको तुम मानव !
(एप्रिल, '३५)
२२ | पत्त प्रधावली
मद अधरो में सघुपालाप, पलक में निर्मिष, पदा में चाप, भाव सकुल बक्मि, हू चाप, मौन, वेंवल तुम मौन ! पु ग्रीवः तियकव, चम्पव थुति गात्त, नयन मुबुलित, नत मु जबजात, देह छवि छाया म॑ दिन “रात, कहाँ. रहती तुम वोन झनिल पुलबित स्वर्णांचल लोल, मधुर नूपुर ध्वनि खग बुल रोल, सीपले जलदों वे पर खोल, उड रही नभ मे मौन ! लाज म॑ अरुण प्रण सुक्पोल, मदिर भझ्धघरा की सुरा अमोल,-- बने पावस घन स्वण हिंदोज, कहो, एवंकिनिं, कौन ? मधुर, मथर तुम मौन (सितम्यर ३०)
३३ बापू के प्रति तुम मासहीत, तुम रवतहीन, हू भ्रस्थिशेप | तुम ग्रस्थिहीन, तुम शुद्ध बुद्ध भ्ात्मा बेवल, है चिर पुराण, हे चिर नवीन ' तुम पूण इकाई जीवन वी, जिसमे प्रसार भव शूय लीग आधार पअ्रमर, होगी जिस पर भावी की सस्कृति समासीन !
तुम मास, तुम्ही हा खत भ्रस्थि --निर्मित जिनसे नव युग का तन, तुम धाय ! तुम्हारा नि स्व त्याग हो विश्व भोग का बर साधन, इस भस्म काम तन की रज से जग पूणकाम नव जग जोवच बीनेगा सत्य अहिंसा के ताने बानां स भानवपन |
सदियों वा द य तमिस्र तूम, घुन तुमन, कात प्रकाश सूत, हे नग्न नग्न पशुता ढेंक दी बुन नव सस्कृत मनुजत्व पुत । जग पीडित छूता से प्रभूत, छ अ्रमृत स्पश से, हे अछूत ! तुमने पावन कर, मुक्त किये सृत सस्क्ृतियों बे विकृत भूत ! सुख भोग खोजने प्रात सब, झ्राय तुम करने सत्य खोज, जग की मिट्टी के पुतले जन, तुम झ्रात्मा के, मन के मनोज ! जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर चेतना, भ्रहिमा, नम्र श्रोज, पश्ुता का पकज बना दिया तुमने मानवता का सराज
पशुबल वी कारा स जय को दिखलाई झात्मा वी विमुवित, विद्वंप, घृणा से लडने को सिखलाई दुजम प्रेम युक्ति,
शरद / पत प्रधावली
चर समप्रसूति र वी इताय पुमने विज्ञार परिषीत उग्ित, विश्वानु खत हृ / पैवस्व त्याग को बना भक्त । पैहयोग पिया पात्ित जन का झासन कय > हैक्र निरस्ण, सत्याग्र, मि ग्रा
बहु भेद विग्रहम में पायी ही जीण जाति क्षय से उ्बार, तुमने प्रकाश को कह प्रकाश, श्री मपवर को श्र धकार ।
पर के चरसेभ जात सुक्षम डग युग का विपय जनित वियाद, श् गयन जय का ॥
उजित ३२ दिया। ये जय कय भर उमन भातमा का निनाद रंग रो प्ैत्ो मे नव जीवन श्र: ५ हा, ब्लाद भानवी क्त्ना के त्रधार, हर लिया गैशल प्रवाद । जडवा: रित जग मं तुम अवतरितत हैए आत्मा महा:
थे वाभिभृत्त शुग मे करते मानव जीव रमाण
हैं छाया विम्बो सोया, काने व्यक्ति, काशवान पि मास प्रतिभाञ्न कने सत्य से प्राण । सैर छोड़कर ग्रहण क्या कर जीवन परमाय सार, प्रपवाद बने, नवता के सु. व नियम का करते अचार, हैं। सावजम्रि ? अजित | तुमले निजत्व निज दिया ह्वार, गे को जीबि रखने तुम द अलौकिक, है उदार । मय पड हि तैह्माण्ड परिधि विलोक) तुम केंद्र जाजन भाये तब के में व्यापक, गत राग शोक पचु पक्षी उप्पो व परित "दाम-काम जम नगति रोक
व
जीवन इच्छा शो क्ात्मा ओे- पेश मे रख, सातित किये लोक !
7 अप्त दिशावध्ि घात आतड़ हास हि विज्द्भवप्माण, बुद्धि,
धुम विश्व हैए उदित बन जय जीवन कै प्रकार, पट पर पट वे से, कर पर चरित्र कक नवीद्धार, आत्मा को धार बना दियनि के दत्यो गे संवार गा गा- एकने, यम हर किये भेद पे भार। पक्ता इष्द निल: ये खोज रहा था जब मता सन ज्य, श्र! » भात्महन अक्षमता हः परतजन रा; विरत २ विरति यतिक्रम भम ममता प्रतिक्रिया क्ष्यि चिद्ध, गत्ति त्ति ! राज्य, श्रजा, रन, साम्य्त-न चासन चालन है डैतत यान, से, मानुदी, विक्यस झार प्मक, सापक्ष
भौतिक विज्ञानां वी प्रसूति, जीवन उपवारण चयन प्रधान, संथ सूक्ष्म स्थृूत जग, बोले तुम-- मानव मानवत्ता वा विधान |
साम्राज्यवाद था कस, बा दनी मानवता पशुवलात्रा-त, अआखला दासता, प्रहरी बहु मिमम शासन पद हावित भ्रातत, बारागह में दे दिव्य जाम मानव प्रात्मा यो मुबत, बात, जन शीपण की बढती यमुना तुमने वी नत, पद प्रणत, शात्त ।
वारा थी सस्कृति विगत, भित्ति वहु धम जाति गत रूप-नाम, बंदी जग जीवन, भू विभवत, विचान मूढ जन प्रद्ृति-वाम, श्राये तुम मुक्त पुरप कहने---मिथ्या जड़ बंधन, सत्य राम, नानत जयति सत्य, मा में , जय चान ज्योति, तुमका प्रणाम ।
(एप्रिल !३६)
२६ / पत प्रंधावली
युगान्तर
२ श्रद्धा फे फूल श्र तर्घान हुआ फिर देव विचर धरती पर, स्वग रुघिर से मत्य लोक वी रज को रेंग कर | टूट गया तारा, भ्राततिम झाभा का दे वर, जीण जाति मन के खेंडहुर का श्र धकार हर ! अतर्मुख हो गयी चेतना दिव्य ग्रनामय मानस लहरा पर शतदल सी हँस ज्योतिमय ! मनुजो मे मिल गया भ्राज मनुजों का मानव चिर पुराण को बना आत्मवल से चिर अभिनव
आशो, हम उसको श्रद्धाजलि दें देवाचित,
जीवन सुदरता का घट मृत को कर अ्रपित,
मगलप्रद हो देव मृत्यु यह हद विदारक
नव भारत हो बाप का चिर जीवित स्मारक | बापू की चेतना बने पिंक का लव कूजन बापू की चेतना वसंत बसलेरे नूतन!
२
हाय हिमालय ही पल में हो गया तिरोहित ज्योतिमय जल से जन धरणी को वर प्लाबित | हा हिमाद्वि ही तो उठ गया घरा से निश्चित रजत वाष्पसा भ्रतनभ में हो झतहित
भ्रात्मा का वह शिखर, चेतना में लय क्षण मे, व्याप्त हो गया सूक्ष्म चादती सा जन मत मे | मानवता का मेरु रजत किरणों में मण्डित, अभी भ्रभी चलता था जो जय को कर विस्मित, लुप्त हो गया लोक चेतना के क्षत पट पर अपनी स्वगिक स्मृत्ति की शाश्वत छाए छाडकर ।
झाझो, उसकी श्रक्षय स्मृति को नीव बनायें,
उस पर सस्झ्ृति का लोकोत्तर भवन उठायें।!
स्वण शुअ्र घर सत्य कलश स्वर्गोच्च शिखर पर
विश्व प्रेम मे खोल अहिंसा के गवाक्ष वर!
युगपथ / २६
३
ग्राज प्रायना स वरत तृण तझ भर ममर,
सिमटा रहा चपत कूला शो निघ्तल सागर |
नम नीतिमा में तीरब, ते सरता चिला,
श्यास रोए्कर ध्यान मग्नन्सा हुप्रा समीरण ! क्या क्षण भगुर ता ये हा जान सा प्राभत मूनेषन मे समा गया यह सारा भूतलरे नाम रूप थी सीमाप्रा सा मोह झुबत मन था प्रस्प थी प्रोर बढ़ाता स्पप्म ये चरण ?ै
भात नहीं पर द्रवीमूत हा दुख या बादल
बरस रहा प्रव नाय चेतना मे हिम उज्ज्यल
बापू के घातीर्याद -सा ही. भास्तल
सहसा है भर गया सौम्य श्राभा गे शीतल पादी के पअ्रगलुप जीवन सौदय पर सरव भावी ये! सतरेंग सपन बोप उठत भजमल |
ड़
हाथ प्रासुप्रा वे' श्राचल से ढक नत झ्ानन तू प्रिपाद की शिला बन गयी प्राज अचेतन भ्रा गाधी की घर, नहीं क्या तू पराय-द्रए २ बीन शास्त्र से भेद सका तरा प्रछेद्य तन?
तू प्रमरो वी जनी, मत्य भू में भी ध्रायर रही स्वग से परिणीता, तप पूत निरतर ! संगल वलशो से तेरे वक्षोजा मे घन लहराता नित रहा चेतना वा चिर यौवन बीति स्तम्भ से उठ तरे कर धम्वर पट पर अजित बरते रहे परमिट ज्योतिमय श्रक्षर !
उठ, प्रो गीता के पग्रक्षय यौवन की प्रतिमा,
समा सकी कब धरा स्वग मे तेरी महिमा!
देख, और भी उच्च हुप्रा ग्व भाल हिम शिखर
वाध रहा त्तेरे अचल से भू को सागर !
४
हिम किरीटिनी मौन झाज तुम झीश भूवाय सौ वसत हो कोमल अगो पर कुम्हलाय बह जो गौरव श्य धरा का था स्वगंज्ज्विल, टूट गया वह?--हुआ्ना भ्रमरता मं निज झोमल | लो, जीवन सौ दय ज्वार पर झाता गाधी उसने फिर जन सागर में श्राभा पुल बाची ।
३० | पत ग्रधावली
वका धरा ही, सवगकिक्षित, धोभा दो भूहे मनुजोचित ।
तय जीवन ६
्ि देफ रह क्या
देव, पड स्वर्योच्च प्िपतर पर 7 नव भारत की जन जीवन सागर ?
इविति हो रहा जाति मन प्राधकार घन
नव अगातत मे स्वणिम पेतन ।
घु चाय हो रह पराजित
हप, विश्वास ध, प्रोदास्य अपरिभ्ित । के अति जन हो रहे जागरित
ते बे: गैय, मुण्छ विभाजित ।
देव, तुम्हारी उप्य स्मत्ति चने ज्यो
ँव्य राष्ट्र कपः
याकण +/
भुका तडित् झ्रणु के अश्वा को, कर स््ारोहण, नव मानवता करती गाथी का जय घोषण !
मानव के ग्रतरतम शुञ्र तुपार कम नव्य चेतना मण्डित, स्वणिम उठे भ्रब निखर !
पर
देव पुत्र था निश्चय वह जन मोहन मोहन, सत्य चरण घर जो पवित्र कर गया घरा कण | विचरण करते थे उसके संग विविध युग वरद राम, कृष्ण, चंतय, मसीहा, बुद्ध, मुहम्मद ! उसका जीवन मुक्त रहस्य कला का प्रागण, उसवा निएछल हास्य स्वग का था वातायन उसके उच्चादर्शों से दीपित ग्रवः जन मन, उसका जीवन स्वप्न राष्ट्र का बना जागरण !
विश्व सम्यता की कृत्रिमता स हां पीडित वह जीवन सारल्य कर गया जन मे जागृत ! यातत्रिकता के विषम भार से जजर मू पर मानव का सौदय प्रतिष्ठित कर देवोत्तर !
आत्म दान से लोक सत्य को दे नव जीवन नव सस्कृति की शिला रख गया मू पर चेतन !
&
देव, प्रवतरण करो घरा मन मे क्षण, पश्रनुक्षण नव भारत के नव जीवन बन नव मानवपन | जाति ऐक्य वे ध्रूव प्रतीक, जग वद्य महात्मन, हि दू मुस्लिम बढें तुम्हारे युगल चरण बन!
भावी बहुती बाना में भर गोपन ममर,--
हिंदू मुस्लिम नही रहेगे भारत वे नर!
मानव होगे वे, नव मानवता से मण्डित,
मध्य युगो वी कारा से भू पर चल विस्तत जाति द्वेव से मुक्त्र, मनुजता के प्रति जीवित, विकसित होगे वे उच्चादशों से प्रेरित ! भू जीवन निर्माण करेंगे शिक्षित जन मत, बापू में हो युक्त, युवत हो जग से युगपत
नव युग व चेतना ज्वार म कर अवगाहन
नव मन, नव जीवन सौदय बरेंगे धारण!
३२ , पत ग्रयवावली
स्वप्ना का चद्रातप तु्र बुन गये क्लाघर, विहेंस वल्पना सभ से, भाव जलद पर रेंगकर, रहस प्रेरणा की तारक ज्वाला से स्पा दत विश्व चेतना सागर को कर रम ज्वार स्मित !
प्राण शक्ति के तडित् मेघ-से मद्र भर स्तनित जन भू को कर गये अग्नि बीजो से गरभित, तृम प्रखण्ड रस पावस का जीवन प्लावन भर जगती को कर अजर हृदय यौवन से उबर!
आज स्वप्न पथ से भ्राते तुम मौन धर चरण, बापू के ग्रुर्देव, देखने राष्ट्र जागरण !
श्र
राजकीय गौरव स जाता श्राज तुप्हारा प्रस्यि फूल रथ श्रद्धा मौन ग्रसरय दगो से ब्रौतिम दशन करता जन पथ ! हृदय सतघ रह जाता क्षण भर, सागर को पी गया ताम्र घट ? घट घट में तुम समा गये, बहता विवेक फिर, हटा तिमिर पट बाघ रही गीले श्राचल में गगा पावत्र फूल ससम्श्रम, मूत मूत में मिलें प्रकृति क्रम रहे तुम्हार संग न देह भ्रम
अभर तुम्हारी प्रात्मा, चलती कोटि चरण घर जन मे नूतन,
कोटि नयन आभा तोरण बन सन ही मन करते प्रभिनदन
भूल क्षणिक भस्मा'त स्वप्न यह, कोटि कोटि उर करते भनुभव
यापू नित्य रहगे जीवित भारत के जीवन में झभिनव ! प्रात्मण होते महापुरुष ये शभ्रगणित तन कर लेते घारण, दा कर पार, पुनर्जीबित हो, मू पर करते विचरण ! राजोचित सम्मान तुम्ह देता युग सारथि, जन मन वा रथ, नव भ्रात्मा वन उसे चलाझो, ज्योतित हो भावी जीवन पथ !
श्ढ लो भरता रन प्रकाश शभ्राज नीले बादल के अचल से, रंग रेंग के उडते सूश्म वाप्प मानस के रश्मि ज्वलित जल से ! प्राणो बे! सिधु हरित तट से लिपटी हँस सोने की ज्वाला, स्वप्ना वी सुपमा भे सहसा निखरा भवचेतन आधियाला ! श्राभा रेखाप्रो के उठते गह घाम, भट्ट नव युग तोरण, रुपहले परो की अप्सरियाँ करती स्मित भाव सुमन बपषण दिव्यात्मा पहुची स्वयं लोव, कर बाल भ्रर्व पर झारोहण, अ्रतमन का चेतय जगत बरता बापू का अभिनादन नव सस्तृति वी चेतना हिला का “ययास्त हुमा श्रव भू मन मे नत्र लाक सत्य का पिश्व सचरण हुप्रा प्रतिष्ठित जीवन मे
३४ | पत्त प्रयावत्तो
गौरव भाल हिमाचल उज्ज्वल हृदय हार गंगा जल,
विध्य श्रोणिवत, सिंधु चरण नत महिमा शतमुख गाता ।
आम्र बौर, तालीधन, मलय पवन, पिक कूजन जन मन नित हर्षाता !
अरुणोदय प्रभ ज्योति छत्र.- नभ ऊपर नील सुहाता !
जय है, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे |
हरे खेत लहरे निमल सरिता सर जीवन शोभा से जन धरणी उधर कोटि हस्त नित विश्व कम हित तत्पर बढते भ्रगणित चरण भ्रडिग ध्रुव पथ पर |
प्रथम सम्यता सस्क्ृत्ति ज्ञाता, साम ध्वनित गुण गाथा जय नव मानवता निर्माता, सत्य भहिसा दाता
सुनो, प्रयाण के विपाण तुरि भेरि बज उठे घनन, पणव पट॒ह प्रचण्ड घोष कर गरज उठे विशाल सत्य सेय वीर युद्ध वेश सज जुठे, भनन, कराल भस्त्र शस्त्र युक्त कुद्ध भुञ उठे। शक्तिस वरूप, ब्रमित बलघारी, वा दत भारतमात” धम चक्र रक्षित तिरण ध्वज उढ अविजित फ्हराता
मंगल वादन जन मन स्पादन देव द्वार भू प्रागण, मुक्त कण्ठ बरते जय कीतन निमय मस्तक वादन जय जाग्रत, चानोनत, जय शिव सुदर शाइवत, जय जन भव भय त्राता ! धर स्वगवत श्रद्धा से नत, जनमत शीश उठाता जय है, जय है, जय है जय जय जय जय है !
(२) जय जन भारत, जन 03 भ्रभिमत, जन गण तात्र विधाता !
गौरव भाल हिमाद्वि तपोज्वल, हत्य. हार गया जल,
क्टि विध्याचल सिघु चरण तल महिमा धाब्वत गाता
३६ [ पत पग्रधाषली
हरे खेत लहरे नंद निझर जीवन शोभा से भू उबर, विश्व कम रत कोटि बाहु कर अगणित पद ध्रुव पथ पर!
प्रथम ममभ्यता ज्ञाता, साम घ्वनित ग्रुण गाथा, जय नव मानवता निर्माता सत्य अ्रहिसा दाता | जय है जय है जय है, जय भव भय त्राता !
प्रयाण तूर शद्भध भेरि. बज उठे घनन॑ घनन पटह् विक्ट गरज उठे, प्रबुद्ध वीर युद्ध वेश सज जुटे विद्याल सत्य सै -य, लौह मुज उठे |
शक्ति स्वरूपिणि, बहु बल धारिणि, वा दत भारत माता | घमचक्र रक्षित तिरग ध्वज श्रपराजित फहराता! जय है जय है जय हे श्ञाति श्रधिष्ठाता |
(३)
जय जन भारत, जन मन अभिमत जन गण तनत्र विधाता!
गौरव भाल हिमालय उज्ज्वल हृदय हार गंगा जल,
क्टि विष्याचल, सिधु चरण तल महिमा शाहइबत गराता |
हरे खेत लहरे नद निभर झशीवन शीभा उबर,
विवव कम रत कोटि बाहु कर श्रगणित पद झ्रुव पथ पर
प्रथम सम्यता ज्ञाता, साम ध्वनित गुण गाथा, जय नव मानवता. वतिर्माता सत्य अहिसा दाता। जय है जय हे जय हे, शातित भ्रधिष्ठाता !
प्रयाण तूय- बज उठे पदहू तुमुल॒ गरज उठे विशाल सत्य सैय, लोह भुज उठे | शक्ति स्वरूपिणि, बहु बल घारिणि, वा दत भारत माता | घमचक्र रक्षित तिरग घ्वज झपराजित फहराता | जय हे जय हे जय हु, बअ्रभय, अजय, बचाता !
7. यरुगपथ [| हे७
श्षद स्वताञता दिवस
विजय ध्वजा फ्टराग्रो, बादनवार वंधाप्रो, आ्नो हे, स्वातत्य मनाग्रा !
श्राज तिरंगे से रे क्म्बर रुग तरगित, हप ध्वनि से भुग्ध समीरण चचल, पुलकित, जन समुद्र. उद्देलित, हरित दिशाएँ हृथित, जन धरणी वा अचल स्वणिम श्यामल कम्पित ! जय निनाद कर गाप्नो, जन गण सैय सजाप्रा, आओो हे, स्वातात्य मनाप्रो !
यह विराट रे देश, विशाल जहाँ जन समुदय, यहा हुमा था प्रथम सभ्यता का स्वर्णोदिय, यही श्रात्म उमेष हुम्ना मानव वो निश्चय, मत्यु भीत नर बना श्रमर, मू जीवन निमय ! गौरव भाल उठाप्नो, मंगल वाद्य बजाओ्ो, आ्नो हे, स्वातत्य मनाझ्नो
सर्द्ध हृदय के द्वार, वीर, खोलो भन भन भन, युग युग का अभ्वसाद बहाप्रो आज मुक्ति क्षण, नव जीवन का रण प्रागण हो जन जन वा मन, प्रमरो से ला छीन पुन अ्रपतगा खोया घन! स्वग रुधिर में हाम्रो
वाद विवाद. डुवाग्रो आाप्रा हू स्वातत्य मनाप्नो
ब८ | पत ग्रयावलो
२१ जागरण भीत जागो पचशील वी घरणी, जीवन शौय जगाप्रो, मू की प्रपराजेय चेतने, नव युग चरण बढाओ्मा ! तेरे ठमद पद चालन से कपे मृत्यु भय सशय, अग भगि से जीवन गरिमा फू चिर मगलमय हाव भाव में विजय हप, नव जनोत्कप बरसाओं ! तेरे श्वासो भें ज्वाला हो, प्रधरो में भघु मादन, अर विलास बलिदान, दोप्त चितवन हा नव सजीवन ! इंगित पर जन शीश भुवें, जन शीश उठें, तुम प्राग्नो | तेरी हिंता रहे प्रहिसक जग जीवन के रण बजे सत्य की भेरी दुविधा मौन चोर जन मन में! मृत्यु भीति हर, प्रात्म तेज भर, जन मन देय मिठाओ्री रूदि रीति के मुण्ड हृदय में, ज्योति खडग हो कर म॑, पद तल पर नत युग दानव हो, अरि का रुधिर अघर में | रक्त पात्र से फिर नव चेतन अमृत ज्वाल छलकाझ्नो युग युग का निष्कम्य, नियति भय जीवन विरति तमस हर, आत्मा का शभ्रमरत्व जगा फिर
क
है युग युग सम्भवे, विश्व को नव संदेश सुनाझो देख रहा मैं काल दश,-- कट रहे युगो के बंधन, उर उर मे मच रहा महाभारत +>यह युग परिवतन !
४० / पत्त प्रधावली
महू थू जीवा का थे दुशर छप्ति जमस थो. क्षत्र तिरणर, गुम कयाहा रा गिवत था गया पार, ब्राता मं शद में ! गुछ धाए। ब्यक्ति मे बापर, घुए सायूद्ित हित न॑ राग, गुम चुहार ० श्दर्प मूड मंद सारर स्यायों के २० में! रसाग्य वहीं र मात्र पघारम पर डयविंते बियर में सेंग है इयर तुम दपाद रह मी वलदिएत सु दर पर हसे भर में हुम्हें बराहिए प्राणा रा पट, तुम्हे सापर मे प्रति घारध/ सु ईशा मे प्रति घास्माप, विद्वारी. रह मर) जसूध में मगर, वितिश सवझा में |
२३
जाएरण
प्राप्ता, जन स्वताव भारत गो
जीवन उबर मूमि यातयें
उसके धभात स्मित पघरावन से
तम या गुण्डन भार उठायें ! भट, इस सोन भी परतो थे खुले प्ाज सदिया या बाघन मुकत्र हुई चेतना घरा मी, ग्रुकत था प्रव भू के जागण !
भ्रगणित जन सलहरा स मुखरित
उमड़ रहा जग जीवन सागर
इसके छोरहीन पुप्तिमा में
भ्राज डुबाएँ युग व॑ भ्रतर !। भ्रश्ु स्वेद स॑ ही सीजेंगे जन क्या जीवन वी हरियाली ? सस्ट्ृति मे मुबुलित स्वप्नी से क्या न भरेंगे उर वी डाली?
४२ / पत्त प्रयावत्ती
क्या इस सीमित घरती ही मे समा सवेगा मानव का सन, मोत स्वण खझूदड्भा के ऊपर कौत करेगा तब आ्रारोहण ?
धरती के ही कदम मे सन
नहीं फूलता फ्लता जीवन,
उसे चाहिए भुक्त समीरण,
उसे स्वण क्रिणो के चुम्बन ! समाधान भू के जीवन का मू पर नही,--वुथा सघपण, मू मन स ऊपर उठकर हम बना सकेंगे भू को झोभन |
मानवता निर्माण करें जन
चरण मात्र हां जिसके भू पर,
हुदय स्वग में हो लय जिसका,
मन हो स्वग क्षितिज से ऊपर | यास्तिकता के विषम भार से झ्ाज डूबने को जन घरणी, महा प्रलय के सागर में क्या भारत बन न सकेगा तरणी ?
शभ्राधधार के महा सिंधु में
ड्बी रह न सकेगी धरती,
किरणें जिसमे श्रग्ति बीज बो
यौवन की हरियाली भरती | मिट्टी से ही सटे रहगे क्या भारत भू के भी जनगण, क्या न चेतना शस्य करेंगे दे समस्त पृथ्वी पर रोपण ?
आ्राज रक्त लथपथ मानव तन
द्वेध कलह से मूछित जन मन
भारत, निज श्रतप्रकाश का
पुन पिलाश्ी नव सजीवन | भूत तमस में खोये जग को फिर झ्तपथ प्राज दिखाग्रा, मानवता के हृदय पञ्म को पक मुक्त कर ऊध्व उठाप्नों !
र्४ड दोप लोक
झाज सहस्रो नगन खालकर सोच रहा ज्यो भ्रधकार घन,---
सुगपध / ४३
इस प्रतर सा भालारित
होगा जंग जीया गा प्रांगण ! गम प्रम्बर वी प्राठ स्मिति झवित होगी मूं मे मुग पर, स््वग टिपता से हाग द्वोमित कय ये मृण्मय दोपन सुदर।!
एवं ज्योति पी ऊघ्यग सौस
बच सौ-सो उर होवर दीपित
धरती वे जड़ रज मे! तम भा
प्राभा स बर देंगे विस्मित | गृहू तोरण गुम्बद मीनारें दीपा की रंसा छवि मे स्मित हँसतीं,--मानव उर वा मादर कब से भीतर थे तमसावृत !
प्रसगठित जग जीवन या तम
ध्राज घतुदिक रहा ज्यों विगर,
अंधियाले या दुर्गें बना देव
जीण जातिगत मन या सेंडहर | छत सहूस्न दीपा सा भी, परह, बन ने सबंगा जन पथ विस्तृत, दीप शिखा बहती सिर गम जब तब होगा हृदय न ज्योतित
नव जीवन मे ज्योति चरण धर
क्य भू पर विचरेगा मानय,-
तारामा के नभ वे नीचे
दीपो बा नभ बहता नीरव ! इस घरती के रज वे तम में भ्रस्ति बोज रे दबे चिरुतन फूर्ट ज्योति प्ररोहा में थे पा जागति का लोक समीरण !
कंपती स्वप्न शिखाप्मोम जग
हो मानव चेतना पललवित,
नव॒ जीवन शोभा से जग्रमग
घरणी का प्रांगण हो दीपित !
रर
दीप थी प्राभा के धब्बो से भर भू भ्रेँधियाली का अभ्रचल, हँसती किरणों की दीपा जन पथ में बरसा मगल
४४ / पत ग्रयावली
२७ प्रिटटी मे शिसोौने
सतुमत प्रतनम गा यमभव मिटटी मे बाँध दिया जीवित, तुम रपरार, उर गा प्रगाश रण ये तम मे गरते दोति। ! में भाव चिरतन जा मन ये जो मूंग सिलोता में मूत्ित, ये मानवीय बने श्रवण नयन, नागा मुफ्त प्रया स॒ झाभित !
मरा पर स्थण रजत बिरीट, बर म मुरली, माला, धउु हाण, पट नील पीत पहन तन पर युगन्युगस ये मन लेत हर ! गणपति हैं, दश्मुज दुर्गा हैं, गौरी गगा युत दिव छबर, वे गरड पीठ पर बरद विष्णु जिनके संग जश्मी जी सुदर ! ये राम एप्ण मीता, राघषा गाधी जी बुद्ध, जवाहर हैं,-- हम मात्र मूर्तियाँ हैं बाह खेतन प्रकाश कण भीतर हैं तुम कस रह सकक्त केवल अतर प्रताश ही में सीमित तुम मूतिमान बनत जग में क्षय रूप धाय होता निश्चित ! ये प्रतिमाएँ चलती फिरती जन वे मन में घर स्वप्न चरण, तुम युग युग मे घर रूप नवल मानव मन को करत धारण !
रश्द्ध
कबीज रवीद्र फे प्रति श्रद्धाजलि स्वीश्ार बरें गुरुदेव शिष्प की आज श्राद्ध वासर के वाष्प तयन प्रवसर पर पुष्य सस््मति से मेघ सजल लोचन बरसाते स्नेह द्रवित भानाद प्रश्नु पावन चरणों पर,-- मौन स्वप्न पथ स बढते जो चरण हृदय मे !
४६ | पत ग्रयावली
देव शिखर,--भपने न रे नव हक! ग॒प्रभात रग, लुप्त हो गये | -मुक्त हो ग सम्वोधन करते थे जो गुरुदेव आपको
रूप मास थे श्राप, प्रात्म पजर थे वे दृढ़ ऊध्व रीढ ही, शात्तिनिकेतन की पृथ्वी पर, जिसे चाहते थे दोनो ही स्थापित करना स्वप्नो से, कर्मों से, जग के रण प्रागण में जन मगल के हित प्रह, दोनो चले गय तुम
मुक्त नही हो सका भ्रभी जन भारत वा मन+- मध्य युगो की क्षुद्र विकृतियाँ शीश उठावर नव्य राष्ट्र को बना रही निशवत, क्षीण हैं। विविध मतो में, विविघ दलो, व्यूहो मे बेंटबर दश ग्रांज निर्वीय, निबल, निस्तेज हो रहा, घणित साम्प्रदायिक बबरता से पीडित हो | -- शोणित वी नदियाँ बहुती अब तपोभूमि में | !
नही भलकता मानेव गौरव जन के मुख पर रुद्ध हृदय है उनका, मन स्वार्थों मे सीमित, श्रात्म त्याग से हीन, ग्रभी वे नहीं वन सके महाराष्ट्र के _ उपादान,--गम्भीर, घोर, दृढ़ युग प्रवुद्ध, निर्भीक, वज्च संयुक्त परस्पर |
रहने दू यह कदु प्रसंग मैं नहीं चाहता फिर विषण्ण भू मन वी छाया पड़े श्राप पर | -- भारत यदि स्वाधीन हो गया तो निश्चय ही छूट गयी भोतिक परवशता भ्राज घरशा की, उसके प्राणो बे! स्तर अव चैतन्य हो गये। पशु बल का खल झ्ह मिट गया 'ात हो गयी अवचेतन की निम्न वृत्तियाँ घणाद/ेप की।
प्रतजग मे,--बाहर भझभी भले सक्रिय हो मद पड गयी कु स्पर्धो, भ्रधिकार लालसा, जीवन की प्राकाक्षा मे सतुलन झा गया,--
दीप्त हो गया तामस का मुख | ---
यह भारत की विश्व विजय है । जयी हुई इस स्वण घरा वी अमर चेतना ! सफल हुए उसके तप साधन, अधकार, भिथ्या, हिंसा के बबर स्थल पर विजयी हुप्रा प्रवाश,-प्रहिंसा प्रात्म सत्य का ! निश्चय, मानव का भविष्य अरब चिर उज्ज्वल है, पभ्र्सादे्ध मू का मगल,/--निमय हो जय मन
व्रिचरण करते हागे कवि गुरु, श्राप प्रतीरटद्रिय स््वग लोक में सम्प्रति-देवा से भी सुदर
४८ / पत प्रयावलो
मानव देव समान, अमर निज यश काया में पारिजात मदार प्रमृति सुमनो की स्वगिक स्वप्नित सौरभ नासा द्वारों से प्रवेश कर आरदालित रखती होगी प्राणों को नित बव भावों से, स्वप्नों से, सुर सौदर्य बोध से-- नदन का अ्रविरत वसत्त ज्यां गुजित रहता मुकुल भ्रधर मधुपायी स्वणिम भुग बुदसे |
प्रथवा बढे होगे श्राप रहस्य शिखर पर
अमर लोक के, निभृत मौन मे ध्यानावस्थित्त,
बहती होगी थ्याश्वत सुदरता की सरिता
नीचे, स्वणिम छाया की सत्तरेंग घादी मे,
कल कल छल छल गाती झनादिता श्रमरा की | वहा विजन मे श्राप दिव्य उमेष से सुफ्रित सष्टि रच रह होगे अश्रुत भ्रमर स्वरों की, सूक्ष्म चेतना वी छाया शोभा से गुम्फित, मौन मग्न हो भ्रतल सृजन झ्रानाद सित्घु में !
सुर सुदरियाँ भ्राता होगी पास श्राप के
ध्यान भंग करने को, ईष्यकुल तिज मन मे
त्यक्त, उपेक्षित, विस्मृत अपने को है भव कर !
क्षण भर को भ्रपलक रह जाते लोचन
सुरागनाओशो का सौदय विलोक भपरिमित |
देह शिखाप्रों से भ्रनत यौवन की प्राभा
फूट - फूटक्र विस्मय से भरती होगी मन
सृण सुरंग छाया - पट से छन तन वी शोभा
भलका करती होगी सौष्ठव रैखाप्रो मे,
स्तिमित शश्द घन मे कम्पित विद्युल्लेखा - सी,---
भदत वर भ्रतरतम सत्ता वे! तारों को!
स्वप्नो के शिखरा - से उठ - उठ श्वप्तित पयोधर टकराते हांगे, श्राकाक्षा के भुवनों - से, जिन पर धर बल्पना श्रात शिर कविमनीपी लेते होगे, क्षण विराम, फिर स्वप्त मग्त हो ! भप्सरिया की पीन श्रोणि, लाबण्य चूडन्सी, घनीमूत वर निज उभार में पमरो वा सुख, मुखरित रहती होगी प्राणों के गृजन से त्रिदिव लालसा की वाँची से भ्रहरह दोलित | स्वगिक दोभा स्वम्भो - से पेशल जघनो पर बेंपनी होगी कोश जलद छाया भोभन हो, जिसमे दिप दिप तडित चकित मगर देती होगी बधि लोचन, लज्जा लोहित लावण्य राधिसे क्षमा बरें, गुरदेव, भ्राप जो मू जीवन वे रसोल्लास मे प्रति सदव जीवित जाग्रत चे,
युगपय | ४६
जो रस सिद्ध कवीश्वर बन विचरे पृथ्वी पर, आज प्राप भी वहा ऊवबसे होगे निश्चय अमरो के उस भ्रनाद्रत श्रानद लोक मे और, चाहत होगे फिर से मत्य धरा पर आ्ाकर, जीवन श्रम के शोभा सुख को वरना |
एक बार झाये थे जहाँ स्नेहवश प्रेरित देवो का ले दिव्य रूप, हे कवियो के कवि, पअरमरो की वीणा घर कर में भुवन मोहिनी, भू जीवत सागर को करने रग उच्छवसित,--- गीति छद की तीव्र मधुर शत भकारो से प्राणो का जल लहरा, ज्वार उठा प्लाशा वा, फेंग के शिखरों पर लोक बसा स्वप्नो का इदु रश्मि के सम्मोहत से माया दीपित ! आ्राय थे भू रोदन को सगीत बनाने इलदण मधुर स्वर श्रूतियों बे शत प्रावर्तों से भावों के छाया पुलिनों को स्वप्न ध्वनित कर!
आये थे तुम जीवन शांभा के शिल्पी बन, मानव उर की प्राशाझ्रो, झ्भिलापाशो को सूक्ष्म स्व॒रों मे पुन ऊध्व मुख ऋड़त करने, निज विराट प्रतिभा की श्रदुभुत रहस् शक्ति से स्वग घरा के बीच वल्पना का रमस्मित इद्गघनुष प्रभ सेतु बाँधो सुर नर मोहन, भ्प्सरिया के' रणित पदों से मौन गुजरित )
युग द्रष्टा बेन भाये श्राप यहाँ, जन गायक, देश बाल वा तमस चीर निज सूक्ष्म दृष्दि से, पंठे जन जीवन के निस्तल भततस्तल में घरती वे! अवसाद भरे जन गण को देते उद्बोधन का गान, जागरण भत्र, मनोबल ! मानव थी चेतना रश्मि को भ्रतल गुहा से बाहर ला, मन में प्रभितव पह्लालोक भर गये, रुग रंग की आभा परखड्दिया को बिखरा नव जीवन सोदय गये वरसा धरतो पर गीतो से, छदा से, भावों से, स्वप्मासे
एवं बार फिर प्राप्रो कवि, इस विधुर देश को अपनी भमर गिरा से नव पझ्राइवासन देने आभाज और भी लोक प्रतीक्षा यहाँ पभ्राषकी, वाणी दे वर पुत्र, घरा बी महा मृत्यु को प्रमर स्वरो से जगा, विश्व को दो जीवन बर ।
आध्रो हे फिर अपने भारत के मानस से मध्य यु्ों वा घणित जान जम्बाल हटा कर
५० | पत प्रयायलो
दिशा वाल म फूट रहीं, शत सुर धनुप्नो के
रमो की ग्लालोक क्राति से दष्टि चक्षित कर भर-कर पड़ते सतत सत्य शिव सुदर उनसे महाकाल झौ” महा दिशा को चेतनता से मुग्ध चमत्कृत कर,--रोमाचित दिव्य विभव से ! आज घरा के भूतो के इस तमस क्षेत्र में जीवन तुष्णा, प्राण क्षुधा भो' मनोदाह से क्षुब्ध, दग्ध, जजर जन गण चीत्वार कर रहे, घृणा द्वेष स्पर्धा से पीडित, वन पशुओं से | बिखर गया मानव का मन प्रणुवीक्षण पथ से बहिजगत मे, स्थूल भूत विज्ञान से भ्रमित ! अतर्दष्टि विहीन मनुज निज प्रन्तजग के वैभव से प्रनभिजश, हृदय से शूय, रिक्त है
आज भ्रार्मघाती वह, भ्रपने ही हाथों से
मनुज जाति का महा मरण निर्माण वर रहा
भौतिक रासायनिक चमत्कारों से भगणित
तक नियात्रित यात्रिकता के पद प्रहार से
घ्वस्त हो रहे प्रतमन के सूक्ष संगठन
सत्यो के, भादशों के, भावो, स्वप्नो के,
श्रद्धा विश्वासों के, सयम तप साधन के,--
मनुष्यत्व निमर है जिन ज्योतिस्तम्भो पर! ऐसे मरणोमुख जग को, कहता मेरा मन झौर कौन दे सकता नव जीवन, आश्वासन, शान्ति, तप्ति,--निज भन््तर्जीवन के प्रवाह से भारत के अ्तिरिवत प्राज ?--जो शादइवत, प्रक्षर प्रतर ऐश्वयों का ईश्वर है वसुधा पर ! कहता मेरा मन, भारत ही के मगल मे भू मंगल, जन मंगल, देवो का मगल है | +-- +-देव, झ्लाप भ्राशीर्वाद दें जन भारत को!
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श्री ग्रवनीद्धनाथ ठाकूर की ७५वाँ यं गाँठ पर
आज झापवी व गाँठ के शुभ भ्रवसर पर
करते हम समवेत प्राथना, वृद्ध चित्र कवि,
फिर फिर ऐसे हप दिवस प्रार्ये, दे जायें
नवल सुनहली गाँठ श्राप के वयस सूत्र में । पवव वयस के रजत मास झो! स्वण वष नव भक्ति पनुक्षण बरें काल के पट पर प्रक्षय दारद इंदु स्मित बीति छुञ्न व्यक्तित्व भ्रापका,--- केश इमश्रभो वी थछोमा रंग शुभ्र, शुअतर, स्वप्न सूलि से शभ्पनी, हे रगो के गायक,
४२ | पत प्रषाषलो
भ्रमर 8 ॥ माधाजाक्षात्रा मे नेव्य रत रुचि समति सिनि छा अक्षक्ष भर भाप चेतना पट पर जम जन के रत जायें मनुष्यत्त क) पाभा रेखा छ्बि देवोपम,....
३, दीघ भागु हे ।
मर्यादा पुरुषोत्तम | बहिूसी ७ दा छीशों। वो मनोभूमि पर विया रश्मि शुत्न चेतना तीर से, घीर बैंदेही सी मनश्वेतना वो धिदेह प्रथम विजय भी वह जीवन पर मानव मन थी तर्ण अम्ण-से बिहँसे थे तुम मनइचूड पर सूप मनस वे स्वण विम्ब ! जब भजित वासना हुई सपमित सम्झत नव जीवन मानो मे ऊध्व प्रस्फुटित, विकसित हो, मनुजोचित बन घर पूण विया वह वृत्त दृष्ण युग मं प्राणों म जब हुए प्रवतरित तुम मर्यादा थे पुलिना पर जीवन दिव्य ज्वार लहूरा,-भ्रतर ये रह जीवन का प्रानद, प्रेम, सौ“दय --वहू विकास परिणति था स्वणिम वैभद एक बार फिर उतरा, श्रतमन वे सारथि भू की झाकाक्षा के नव विकसित शतदल पर, झ्राज मनोजीवन, प्राणों बे! जीवा के स्तर जीण, विरस, विश्री लगते, सोदय हीन हा ! (विगत चेतना ,--बं भी विशाल शुघ्र सरपिज सी,-- मूद रही अ्रव मन के दल युग थी संध्या मे,-- खोतहीन पुलिनो सी. नीरस रीति नीतिय सीच नहीं पाती जीवन की उबरत्ता को! आज शभौर भी नीचे उत्तरो प्राण जीवन के ततम वे भीचे उज्ज्वल ! स्वण शुभ्र दो रेख खीच, नव प्रतिपत ' विहेंस उठे स्वप्नों से उपचेतन घरा स्वग बेंध जायें एक शक्षितिज के एक नव्य पभ्राध्यात्मिकता पधालोक मज्जित कर दे जीवन मन की सी सीमा 'रहेत चेतना वी नव झ्ोभा बहे एक भ्रविराम घार में स्व चेतन देह प्राण मन मे मुवनों में सजीवन भर मनुज और भी निज ग्र-तरतम म श्रवश वा ऊध्व, गहन, व्यापक बन, निकले भ्रधिकः वहिमुख ' घरा चेतना वी काले धरम की पफुल्ल स्वण लोहित रजित हो युग नव जीवन सौदय पद्म से विहेंस अतर में भर अतिवेतन पावक पराः प्राणो वी सौरम विद्युत से हपित व >---हूदय बमल में भ के फिर उत्तरो, ९
पदक केचन भ्ग क, को करता जब पेन दुकल । पह भस्म रेत, यह नाश हि फ़्रि साधु वेश धर तह भी होने
फिर उसे परास्त परां मन में, जन जीवन हो सयुबत, सफ्ल | बदहों सी हो विरह मुक्त चेतना, चूम प्रिय चरण बमल, प्र राज्यारोहण बरो, राम, हृदयासन में, हो जन मंगल !
इ्२ श्री भरवित्व के प्रति
(भर) शाज जबबि नोरस भ्रसार विश्वी लगता जग जीवन, मानस का सौंदय फूलसा मुरभा रहा सुरक्ि क्षण, बिखर गया जब सतरग बुदबुद उर वा स्वप्न भचानव, जीवत सधपण से लोहित, गये मत्य के पग थब जीण युंगो की नेतिकता जब करती जन मन छोपण, क्षुद्र प्रह की दासी बन, स्वार्पों को कयिे समपण, अन्तविश्वासों के उन्नत खघ्ूग रहे ढहू भू पर सूख गया चिर स्रोत प्रेरणा वा, उर हुआ भनुवर ! झ्राज जब कि मन प्राण ईईद्रयों के क्षत विक्षत श्रेंग भेग, पुन चाहती वे गत्ति -लय में बेधना देवों वे सेंग, घ्वसः अरश हो गये विगत झ्रादर्शों के जब खेंबहर, कुचल रहा मानव भात्मा को जड भौतिक आाडस्बर | --- आज जब कि बुक गयो चेतना, भ्राघवार से उर भर, चुण हो गया हृदय सभ्यता का, भीरव सरइति स्वर (ब) तुम्हे पुकार रहा तब पभ्रतर, भावी मानव ईइवर, भव्य चेतना, नव मन, नव जीवन का भू को दो वर | स्वण चेतना द्ववित जनद तुम, रजत तडित रुचि स्पा दित रलच्छाय सजन, रहस्थप्रम घात -शात सुरघनु मण्डित, दिव्य प्रेरणा को जगमप किरणों से घचिर गुम्फित, मनस पख में ज्वलित अझ्रमर पिण्डो को क्ये तिरोहित ! स्वर्मानस से उठ, उतरो, प्रमु, जन मन के शिखरो पर, सूक्ष्म चेतना वाष्प कणों भें लिपटा मानव भातर, नव जीवन सौदय मे बरस, करों घरा मुख सस्मित, भ्रमत चेतना के प्लाचन में मत्य झोक कर मज्जित है भअतिचेतन, नव मानस वसनों में हो नव भूषित नव आदेश बनो तुम, जिसमे नव जीवन हो बिम्बित ! जीवन मंत्र से ऊपर तुम नद जीवन में नव भन में मानवता क्रो बाँधों श्रभिनव ऐवय मुकित बाघन से
५६ | पत प्रयावली
मनश्चेत्तना के ज्योत्स्ना जीवी इस जग म बिखराते लघु तारक झ्राभा जिसके भग में, नत मस्तक ६ » प्यान मग्त यह पद्म भ्रन््िचन मानस जल में रह प्रलिप्त, नित प्ररता चि-तन,-- निज शोभा स्वर्णिम प्रभात में उसके लोचन देव खोल दें, बरुणा-बर से ज्योतित बर भन,-- बरता श्रद्धा प्रीति से नमन !
गीत प्रस बंदी प्रलि उसके प्रतर भे स्थित
मुविति माँगता, प्रतमघु बरने को सचित,--
लिज स्वर में भर वर स्वगिक मधु बेभव नूतन,
गागा, वह वर सब देव को हृदय समपर्ण.--
स्वीकृत हो यह प्रणत निवेदन
इ्श
स्वप्त-पूजन
स्वप्नो बे यौवन से भर दो हे,
शोभा थी
मेरे भावा के सतरेंग स्तर
बाधें स्व्थ घरा का पग्रतर
जीवन वी शभावुल लहरो पर
भ्यान स्थित हो भेरा आसन!
अमर स्पश से खोलो ह् उर का वातायन,
प्राणों के सोरभ से पुलकित कर मेरा तन ।
मेरा मन, प ज्वाला म लिपदा मेरा जीवन !
श्रद्घानत'। मेरा मन निश्चित
करे शिसर-सा ऊधष्ब गमन नित,
बरतें झ्ाशोवाद - सी पग्रमित
उस पर तेरी रघण स्मित क्रिण |
मेरे कम वचन मन हो शुचि पूजन,
म्वप्नो से दीवित कर दो हे उर का प्रागण |
रे
बह मानव क्या ?
जिस प्रात्मा म हो नही प्रेंभ वी प्रमर घार, बहू झात्मा क््यारी जा काट न सके मत्यु बाघन।!
४८ / पत प्रधावली
जिस मन में तय 3, मत्ति मं प्रतिभा वी के घार, वे म्त्ति मत क्या ? जो अर तक सं सत्यावाचन ! जिन प्राणा में, ज॑ तिवन मे इच्छा की के पार,
हह जीवन कया ४ जे कर के
भव सपपण । यदि भरते गे
बा इंड्रिया मे विचार, यदि मत्त जाये जीवन या प्राथकार, यल् प्रात्मा को दे डुबा प्राण वासना ज्वार जीवन निरी; 5 विः री; निरफ्चार । तब ये सक्ध बया ? इनका के अयोजन । यही मरण । मानव क्या ? जो करेक भगरो सतत विचरण । रे७ जिन्ञाता क्सिको
पृ बर । फोन सहाद्व्य तुम जिम गरडि हमे महा विजय बदल भू; कर जिदिल पराचर । क्सिये- क््त््फ्े रच भृत्त के परत किम में तत्पर? शब्दित नभ, चल श्रनित्, डवित जल, दीप्त प्रर्नि, भू वर। पर तुहिक स्वप्न - का हेस: चल छ्दर किसने जीवन कप सम्मोहन दिया मत्य में भरा कीन मू, यू ५ तमस को भ्रमृत छू. कर स्वण चेतना से भर, जग कण क्र्त नः स्पातर ?
युगपय / ६ &
इन प्रइनों का सुके नहीं इब्दां में दो प्रिय, उत्तर,
तदाबार बर दूँवय सहज समभा दो हे कदणाप'र इे८ प्रकाश क्षण
जान मैं क्यो देखा करता जो जन मन में घिर सुदर चहू किय युग का था खब प्रह किन खुंग सीमाझो का विश्वम ? अभ्रव भेद विवतन युग का तम आते प्रकाश क्षण निखर निखर!
वह व्यक्ति समाज जनित ग्रातर भू मन का स्थूल विभाजन भर, बहू एक चेतना रे अभकूल जो बनी बिदु भुम्फित सागर ! प्रव सूक्ष्म हो रहा नव विकसित, प्रव॒ व्यवित विश्व भी परिवरतित, हो रहा रजत मन स्वण द्रवित प्रा रह्मा घरा पर स्वर्ग उतर! चेतन हिरण्य से परत स्मित हो व्यक्ति समाज नवल कल्पित, गत भ्रह नव्य में हो मज्जित चेतना कऊध्व विचरे भू पर
2 करुणा धारा झाज उठा लो जन मन से दुस्मृति का भ्रचल, मनुज चेतना से मू सन की छाया इपामसल अतल मौन नयनों मे डूबें निखिल बिह्व जीवन के भतर, विहेस उठे श्रालोक कमल - सी मुख शोभा मानस के जल पर, आ्राज बखेरों निज समिति की पखडियाँ निएछल !
६० / पत प्रधादली
शोभा वे! शिखरो पर उतरे प्राणो वी भ्रभिलापा निस््वर, भाव गौर चूडो पर बिचरें रहस स्वप्त प्रातर के सुदर, श्राज खोल दो नवल चेतना का वक्षस्थल मनुज प्रेम की बाँहां मे बंध विस्मृत हो जगती के सुख दुख, आज तुम्हारी कशष्णा घाश मत्य घरा के प्रति हो उमुख, श्रद्धात जन भाल उठे पद रज से उज्ज्वल, जीवन सुदरता से रक्तिम रंग दे पद तल !
ड०
स्गवो
रंग दो हें, रंग दो प्राकुल मन |
अमर रूप स्रष्टा, किरणी की
तूली से रंग दो उड़ते घन शह्थि से रण छाया प्रभु झतर, क्षणप्रभा से इच्छा के पर, बरसा दो उर के अश्रम्बर में शोभा वा नीरव सम्मोहन
भ्राशा वा हो इद्र चाप वर इंद्र चाप मे स्वप्नों के' शर, बिरह भ्रथु का भाव जलद हो, रग रहस्यो के हो गोपन रंग दो नव शोभा से लोचन, प्रीति मघुरिमा से स्वरणिम मन, गीति चुम्ननो से मदिराधर स्वण रुधिर से रंगो कर चरण ! उलट रश्मियो के सतरेंग घट रंग दो मेरा प्राणो का पट, रंग रंग वी पखडियो में हंस फूट पडे भ्रतर का यौवन रेंग जाये जो मेरा अतर गोचर तुम बन सको भ्रगोचर, नव्य चेतना वे पावक कण में कर सकू घरा पर वितरण !
युगषथ / ६१
४१ भोभा जागरण
बरसा है शोमा चेतन द्षपर | विश्व रामीरण मे स्पादन में लहराये सौदय विरातन शोभा सा ग्रादोलित हो जग, शोभा में गुमुमित जीवन मग, शोभा वे स्मित छामातप या त्रीडा रथल हो मन या प्रांगण ! घुलें निस्ित मूं मन थे बल्मप, मुकत बने णीवन में परवन, इच्छाप्रो ये रण म विजयी भा पर हो भरत प्रवाश क्षण ! सूजन बरें नव भू शोभा जन, जो श्रपृथ वहू बने पृणतम, जीवन छोभा हा जन चितन, भन्तर शोभा स्वप्न - जागरण !
डर
मानती
रंग उठते भावों ये बादल, रेखा दाशि सा दिखा सलज मुख फिर फिर हो जाती तुम भोमन | तुहिन भश्वु वाष्पो में बोमल कु द कली - सी लिपटी उज्ज्वल, भरती तुम भावुल भ्रतर में सुधा द्ववित ज्वाला समिति निशछल ! बरस रहा नीरबव सम्मोहन, भ्रेंगडाता मन स्वप्नो का वन, मधुर गुजरण भर, भ्रब बहता प्राण समीरण सुख से चचल उतर रहस्य विचरते गोपन, पद चापो से कंपता निजन तद्रत् छाया की घादी में गा उठता शभ्रतर जल क्ल-क्ल । मौन मधुरिमा से भर शझतर, भ्राश्मो, मानसि, हृदय में उतर, म्लान वेदना के प्रानन से उठा करण श्राँसू का अचल
६र | पत ग्रथावली
१ भोभा जापरण
यरसा हे दोमा चेतर दाण विश्व समीरण मे स्पादन में खहराये सौदप्र चिरतन! शोभा से आदोखित हो जग, इोभा में युसुमित जीवन मंग, शोभा वे. स्मित छायातप वा भ्रोड़ा स्थल हो मत या प्रांगण! घुर्ले विधित् भूं मत के मल्मप, मुक्त बनें जीवन में परवश, इच्छाप्रो थे रण में विजयी र मन पर हो प्रात प्रवाश क्षण ! सजन बरें नव भू दोभा जन, जो प्रपूण वहू बने प्णत्म, जीवन शोभा हो जन चितन, झतर शोभा स्वप्न - जागरण !
४२ मानसी
रंग उठते भावों बे बादल, रेखा दाशि- सा दिया सबलज युख फिर फिर हो जाती तुम प्रोभव ! तुहिन पस््रश्ु बाप्पो मे बोमल कूद कली सी लिपटी उज्ज्वल, भरती तुम भावुल अतर में सुधा द्ववित ज्वाला समिति निश्छल बरस रहा नीरव सम्मोहन, ऑंगडाता सन स्वप्नों का वन, मधुर गुजरण भर, श्रव बहुता प्राण समोरण सुख से चंचल उतर रहस्य विचरते गोपन, पद चापों से कॉप्ता निजन त+द्रल छाया की घादी मे गा उठता भ्रतर- जल क्लबन्क्ल मौन मधुरिभा से भर भतर, आाप्ो, मानसि, हृदय में उत्तर, सलान वेदना के प्रानन से उठा करुण भासू का अचल
६२ | पत ग्रथावली
सर परिष्रय, मुमस वरिधिय।
दृगरक / ६३
तुम सुदर स बन भति सुदर
प्राप्त प्रतर म प्रतरतर,
तुम विजयी जो, प्रिय, हो मुझ पर वरदान, पराजय हा निश्चय |
है2.4 प्रोति परिणय ब्रिय, बनत तुम विरह् प्रणय मे, प्रलय सूजन वे गीत द्वृदयम! उर के वाप्प जलद बण भर भर हँस उठते मोती बन सुदर, तुहिन कणों वा हार गूथतों प्रातः किरण तुम्हारी जय में! जीवन या उठ बातर क्रादन प्राणो बो छू बनता गायन, सुन मधघुबर वा भात गुजरण पिलते भुकुल मौन विस्मय में वन शूलो स विधा मृदुल प्रेंग फूलों के तन मन उठते रंग, विवश बक्र दिये तुमने सुख दुख लाँघ प्रीति के चिर परिणय में! नीचे. सागर भरता गजन, हंसता ऊपर चढद्र विमोहन, बढती जाती जीवन बेला प्रमर प्रतीक्षा बे विनिमय में
डेट नव झावेश जाग्रत मन से पहिले तुममे 5 मिल जाता प्रतमन
जब तम भे डूबा रहता जग, दृग अपलक तकते निजन मंग तुम स्वप्ता के पथ धर पाते प्रतपथ से गोपन |
बजते निस्वर नूपुर ममर,
सुन पडते भ्रभ्ुत वशी स्वर,
बुद्धि चकति रहती, बज उठता
उर में स्वागत गायन ! मू क्दन बन जाता कूजन, शात निखिल जीवन सघपषण,
६४ | पत ग्रयावली
झ्राप्रो, पितता कमल नाते पर, प्रॉस खोलती वली डाछ पर, झाती नव मजरि रसाल पर फूल संदेश मुंढा दिशलाप्रों! हुजआ रेख से उगो ग्रगन पर, ओस बूदसे उतरो, सुदर, जगो. प्रात तारा स दुृग हर, नव बालाएण से मुसवाप्रो | वादल से स्वातिज बन भ्राभो, पपीहरे मी प्यास बुमाप्ो, कोयल चाहेगी, सेंग. गाप्रो, मना, प्यारा नाम. बताप्रो वापी मे भव तारक उज्ज्वल, सीपी बे उर में मुक्तापल, सुरंग फूल वे प्रचल म फ्ल, तुम गोदी में लाल, सुहाप्रो। सुदर तन स सुदर तन घर, दीपक स दीपक लौ-स बर, लहरी से लहरीस उठ बार फिर नव जीवन त्रम दृहराष्त्रा | शाश्वत सं, लघु तन में सीमित, रवि से, हिंमकण मे प्रतिविम्बित, जगसे नयन वक्नी मे अवित, पूनो से प्रतिपत बन भश्राप्नो। तुम भदम्य योवन की भ्राशा, नारी जीवन वी प्भिलापा, प्राणो की. ममता-परिभाषा, मूतिमान नव तन धर लाप्रो| श्राश्रो, तुम देखोगे गाघधी, जिनसे हमे मिली पाज़ादी स्पातू. तुम्ह पहनावें खादी, झ्राओ, भ्रब न भ्रधिक बिलमाझों ! तुम स्वतत्र भारत मे प्राश्रो, मुक्त तिरंगे को फहराो, फिर फिर गाधी की जय गाझओझ्नो, नव युग के सेंग चरण बढाप्रो नहे. प्राप्नो | ८ दर धैर्य बाबू को पाश्रोगे बादर मा को चित्र लिखी-सी सुदर श्राओ तुम विकसित नर बनकर कुल दीपक, कुल रत्न कहाओो।!
६६ | पत प्रयावली
झ्राधो राजा, ग्राग्रो. रानी, तुम्ह बुलाती मोसी नानी तुम सच हो,--तुम नहीं कहानी, पापा को झा नाच नचाग्रो आधी भवन, _ भुवारकबादी ! कल कौ-सी घटना है शादी खुश होगी पर सुनकर दादी, तुम पोते को ग्रोद खिलाझो ! मुने झाग्मों
डप अ्रिवेणो (तापसी )
तीथराज जो जन संस्कृति का केद्व प्रतिष्ठित उस प्रयाग से वौन नहीं भारत में परिचित ?
शुभ नील लहरा का जहाँ स्फुरताभ सगम, प्रक्षयवट, ऋषि भरद्वाज वा विश्रुत झाश्रम |
गगा यमुना सरस्वती की निमल वेणी मिलकर बनती जहा पुण्य जल ग्रथित तरिवेणी !
रश्मि चपल शत छायाभाप्नों से जो गुम्फित, युग युग के, मूं मानस पटसी लगती जीवित
ऊंमि मुखर भ्रव गगा यमुना भौर श्याम तन सरस्वती के संग गोपव करती सम्भाषण !
लीक तारिणी गया अपनी कहती गाथा, ताप हारिंणी, हरती जो जन - मत की बाधा
लो, वह भ्राती, वजते चल किरणोज्वल पायल, टकराती सगीत लहरियाँ कल्न कलर छल छल्न !
(गगा) मैं विष्णदी, मैं सुरसरिता, मैं हरि चरणों से भायी, मैं पुण्य तिपथगा, स्वग्रगा की सुधा घार हैं लायी!
शत रश्मि ज्वलित निमर सी उठरी में शक्र के शिर पर शोभा मे लहरी, जठा शकरी कवियो स॒ कहलायी |
युगपय /६७
मैं सगर वद्ध हित, विदित, भगीरथ श्रम स पग्रायी भू पर स्वर्गीय. तानसी जहुनु श्वण में
पैठ. सहज विनमायी |
मै हिम तनया, मैं भेरूभ्रात्मजा मनोरमा की दुहिता मेरी धारा में जन- मन वी घारा अविराम समायी !
मेरे पुलिनों पर दस प्रथित जन तीय, ग्राम, _ पुर जनपद, मेरे अचल में मुवित मनुज ने जम मरण से पायी !
मेरी लहरो के बम्पन में शत शत हृदयों का स्प दन,
रविं शशि वी बकिरणें भरतो जिनमे प्रमरो वी तरुणाई
मैं उबर रखती धरती का उर
मम मृत्तिकां भरकर,
भेरी करुणा, ग्रचल-सी गीवन
हरियाली में छायी।!
आग्मी हे, प्रतस्तल में डूबा,
हे घोप्रो मन के वल्मप,
मेस्तल अकूल जीवन की
शाश्वत घारा यह लहरायी |
(तापसी )
बदल गया सहसा जल का फेनिल छाया पट, छप छप टूट रहा चादी -सा बालू का तद! वेगवती यमुना अब झाती रगस्थल पर निशछल ग्रभा लेती उसको बाँहो में भर!
क्र दन करता रह - रह उसका झ्रावुल प्रतर, सुनिए उसके अश्रु द्रवित वच्ची केसे स्वर !
(यमुना ) मैं सूथ सुता, मैं यम भगिनी बहलाती मैं तुमसे मिलते, घीरे आज लजाती !
भेरे तठ पर थे रास रचे मोहन ने, अब तक अस्फुट क्किणियो वी ध्वनि झाती
६८ | पत प्रयावली
ल्मे वडित्त चेताओ - ७) पे दरिया तिरती थी, क्रीडा क#। री, रेलाती । जिनके देखी & चचल रे शोभा ग्रीवा काती, कुटि नचाती भरे फैलरक गूज उरली स्कर स्वप्नो की या आच के छहराती । बुग युग की के चीरवक संगीत हिचोरे मेरे उर म हा-ह्य भर हुढ़। ५ (गया) दि, धीर ते, तुम धात करते अपना मन, छुमः मिलकर परिषृ ह्ग्रा भू जीव । इस पुत्तिको मर नत्त कार पेशवर जम मे अविनश्वर यात्री । परिवर्तित विकसित है।वा जग जीवन कम, विपदा सम्पदा रहती कभी चिरतम तैरे बहता थुग का सच्य पह जिस्तल नील ग्रम्भी घार बतलाती । य्ता सस्कृति प्रोतस्विन्न, जीवन उक्ता, भैयुत्ता, अीक्ि परमिधि। मम 5 र्भू एस सकल निछावर
यमुना भर के भाव सेखी के ट्री छिपाती बह भ्रपने आकोश रोक के कया चुनाती ।
उसके इर चुलग रही प्रक्ष दारुण ज्वाला, वह विदोहि।ण, कैय के जाता उम्र संभाला । (यमुना) स्धि । ऐमको के अतक्त्य हुआ प्रेस मन वह सुस्त उबर हिलोर नही | पाती मैं पार ३. इकी वर फ्रात्र, बीहड बन फूलों की ॥, मामो ७ ५ चोर परिषो य तिमम वक्ष सकल अवचेतन ऑषियाजी _ प्तीज;
गजन भरता भहरह यह. उद्देलित मन, भेरे भप्रतर मे तब्राति चतुदिव गाती ! दोनो दुखियों बे मनस्ताप से मायत मैं प्रलय बाढ़ बनमुग के पुलिन डुबाती ! में सुख स्पर्शों म॑ पत्नी, मम - भाहत हो, नागिन - सी उठ, फेनो थे फन फैसाती ! युग सगम हो जन - जन वे मन वा समम मैं भू मन मे फिर ज्वार भदम्य उठाती ! (तापसी ) गगा जी गम्भीर गिरा वहतो यह सुतवार हरि चरणा का प्रीति स्रोत है उनके भीतर ! (गा) तुम दुदम सूथ सुता हो, सन्ना - जाता, दीनो का दुख कब तुमसे देखा जाता?
भ्रमरो को शासि लिये यह मेरी धारा, तुम मेरे उर में नव प्रेरणा जगाती !
मैं सुनती हूँ प्रपे भीतर प्रश्ुत स्वर स्वोणम नूपुर ध्वनि भरती निस्वर ममर ! वह सुनो, मौन प्रम्बर में जगता गुजन, यह कौन - उपा सी नव भ्ररुणोदय लाती ?२ (तापसी ) गगा यमुना के संगम वा घर पावन तने सरस्वती का होता झत स्फूरित भवतरण वह प्रददय, बेवल जन मन सगम में गोचर, विश्व समागम से प्रतीत, शाश्वत, लोकोत्तर ! सुनिए उर उर भे झ्रब उसके चिर नीरबव स्वर, वह इद्रिय भग्राह्मय, भनिवचनीय, सूक्ष्मतर । (सरस्वती ) मैं श्रतत सलिला, चिर विमला, भतमुंखः घारा हूँ भ्नचपल, मैं मम शिखर से स्वत निखचर बहती निस््वर, भर प्रतजल ! घर ऊध्व चरण, दात गूथ क्रिण, करती रहस्य पथ से विचरण,
७० | पत प्रयावल्री
प्रसलर प्लावन भरती प्रतिक्षण मैं ज्ञान -गहन कर भन्तस्तल !
चेतना ज्वार - सी दुनिवार
मैं विश्व पुलिन करती मज्ज्ति, लहराकर, डुवा निखिल अन्तर,
बढती झकूल निस्तल तिमल !
(त्तापसी ) कालिदी की क्षुब्ध तरगें क्रोप से सिहर प्रशय पूछती, सरस्वती को सम्बाधन कर!
(ममुना) तुम छाया हो भथवा माया ? मैं तुमको समझ; ने पाती! हुम सच कहती, क्या तुम बहती ? क्यो प्रकट नहीं हो जाती ?
फेनिल उच्छल, बढ़कर कल कल
क्यो गरज न तुम लहराती ? गिरि गहन चौर गति से प्रधीर
भू पथ क्यो नहीं बनाती?
ऋजु कुचित जग क्य मग निश्चित, पंग पग पर बाधा प्रमणित, छिपती भीतर, भाकर बाहर जन दुख क्यो नही बेढाती * (सरस्वती ) में बहने भावी, रुक, रुको, गति ही भे मत बह जाभो, भो इच्छा से पागल सरिते, सोचो, मन को समझराप्रो!
तुमने बाहर बाहर बढ़कर हो पार किये गिरि कानन, पर बढता भीतर हृदय रुदन, मुझसे मत भेद छिपाभों ! तुम उद्वेलित, भाकुल, भ्द्ञात, शत झावेशो से मात, तुम पावतों में घूम रही, मुझको मत माय सुमामो | तुम ऋुद्ध रुद्ध नित उफनाती, टकराती, रंग रंग जाती,
युगपय [ ७१
मुभवोी भय है, तुम प्रतल गत मं बहीं तहीं गिर जाप्रा।
भीतर देसो, भीतर है मति, हु बाहर गति, पाधी गति है, तुम धात धीर गंगा मे मिल गति को गम्भीर बनाप्नो!
(गगा) मेरी भी यह घखिर प्रभिलापा
जन संगम बने सनातन, हूं विश्व रामागम, हिल मिलबर
विबसित यद्धित हो जन मन | इस हृदय मिलन म भ्रवगाहन बर
भू मन हो बिर पावन, बाहर भीतर जह चेतन मय
जीवन हो पूण प्रतिक्षण गंगा यमुनी जीवन. पारा
नित वबहे प्रवाध चिरन्तन, सयुक्त हृदय, सम्ुवतत वम हो
जन मगल वे साधन!
(दापसी ) गगा यमुना गाती जीवन मंगल गायन, फेन हार रच, सरस्वती को वरतीं प्रपंण!
(गगा यमुना )
मूं मगल हो, भव मगल हो जीवन शोभा से उबर जग, प्रीति द्रवित जन अ्रन्तस्तल हो
जन मगल हो, जग मगल हो ! जब जब पकिल हा जीवन तठ, तमस रुद्ध मानव उर के पट, करुणा धारा -सी पतर से
फूटो तुम भू मग उज्ज्वल हो ! बिस्तत मुक्त मिले पथ बाहर, पृण प्रगाध बहे जल भीतर, मुखरित जग जीवन प्रवाह नित,
इयामल धरणी का अचल हो ! सकल ख्रोत मिल एक घार हो लोक समागम झार -पार हो चान शक्ति सचय अपार हो,
युग का युद्ध भ्नल शीतल हो !
७२ | पत ग्रथावली
यगवाणी
>> [प्रथम प्रकाशन वप १६३६)
कवि श्री निरालाजी को
दृष्टिपात्त
मुगयाणो' गाय तीसरा सस्तरण पाठरा ये सामा प्रस्तुत है। इसमे मैंन 'युगवाणी' दे बलापक्ष मे सग्ब'् में दो दब्द सिसवर, पाठरों वी सुविधा बे लिए, युग दशन पे प्रमुग तत्यों पर भी भवाश डाला है ।
मुण्वाणी मो मैंते गोौत गध इसलिए नही कहा हैं वि उसमें पाच्या र्मयता या प्रभाव है, प्रत्युत्त, उगया यार्य प्रप्नच्छत, भनलइत तथा विचार भावना प्रपान है । युग पे राण्डहर पर युगवाणी पा बाय सौददर्य प्रमात वे ईएत स्वर्णिम प्रालप थी तरह विछरा हुप्ा है, जिम बला प्रेमी, ध्वग ये देर से दृष्टि हटाएर, राहुज ही टप सबते हैं।
'पुगवाणी' ये भाषा सूध्म है, उसम विश्लेषण वा सौ'दय है । जिस परम्परागत मधुवत को हम पल्लया पे ममर मै लज्जाशण प्रौर फ्लो दे रंग गुजन से यौवन गवित देखत प्राय हैं उसबी दलिण पवन (वाब्य प्रेरणा २) लिधिर मे ठण्डी उसासें भर, भाज देर-्डेर पीले-पुराने पत्ता वो युग-परिवत्तन पी ध्राँधी भे पडावर,--जैंस, उतर दूटत हुए स्वप्नो पर स्थिर घरण ने रस सवत मे बारण ही प्रलय नृत्य करती हुई -« नयी मस्दूति ये बीज बसेर रही है ! 'पुगवाणी में धाव टेढी मेढ्ी पतली दूँढठी टहनियों वे बा मा। दर तब फैला हुआ वासामि जीर्णानि विहय सौददय देखेंगे, शिसते नयप्रभात पी सुनहली विरणें बारीर रेशमी जाली की तरह लिपटी हुई हैं, जहाँ प्रासा बे भरत हुए प्रश्नु प्रागत स्वर्णोदय पी प्राभा म॑ हंसते हुए-स दिसायीदेत है, जहाँ शापा प्रशापराभां के प्रस्ताव रा->जिनम भय भी छुछ विवण पत्ते प्रटवे हुए हैं--छोटे-बडे, तरह-तरह बे, भावनापों पे नीड, जा' वी ठिदुसती कॉँपती हुई महानिश्ञा के युग यापी चास से मुंवत होकर नवीन वोयलो से छनत हुए नवीन प्रालौय तथा उबीन उप्णता का रपश पावर फिर से सगीत मुखर होने का प्रयत्न कर रहे हैं ।
पले की मासल हृश्यिली वो जब बीडे चाट जाते है, उसकी सूक्ष्म स्नायुप्रो से चुनी हुई हथेली वा कभना वियास जिस प्रवार देखते बालो को ब्राइय्यवक्ति मर दता है उसी प्रवार की मिलती जुलती हुई सौ दय सत्रारति वी भकी आप “युगवाणी' में भी पायेंगे । तब श्राप सहज ही युगवाणी के स्वरो भे बह उठेंगे
सदियों से श्ाया मावव जग में मह पतऋर और, -- जीवन वस'त सुम, पतकर बन मित आती, प्रपत्प, चहुदिक सु दरता वरसाती 'मुगवाणी' मे प्रद्ृति सम्बधी कविताओं के अतिरिक्त, जो मेरी प्राय
गुगवाणी / ७७
दृष्टिपएत
बुगवाणी' वा तीसरा सस््तर रण वाठरों वे सामने प्रस्तुत है । इसमें मैंने ध्युगवाणी' वे कलापक्ष व सम्ब थे मं दो शब्द लिखकर, पाठरों वी सुविधा बे लिए, युग दशन वे प्रमुख तत्वों पर भी प्रवाश डाला है ।
मगुगवाणी' को मैने गीत गध इसलिए नहीं कहा है वि उसमे वाब्या त्मपता वा भ्रभाव है, प्रत्युत उसका वास्य अग्रच्छन, अनलक्षत तथा विचार भावता प्रधान है । युग के खण्डहर धर युगवाणी' वा बाव्य सौदय प्रभात वे इंपत् स्वणिम झातप वी तरह बिखरा हुभा है, जिसे कला प्रेमी, ध्वस के ढेर से दृष्टि हृदावर, सहज ही टख सकते हैं!
धयुगवाणी की भाषा सूक्ष्म है, उसमे विश्लेषण की सौ-दय है । जिस परम्परागत मघुवन वो हम पललवो वे. ममर से लज्जारण प्रौर फ्लो के रग गुजन म मौवन गांवित देखत भागे है उसवी टलिण पवन (काव्य प्रेरणा ?) शिश्चिर मे उ0्डी उसासे भर, भाज ढेर-देर पीले-पुराने पत्तो को युग परिवतन थी प्राघी में उड़ाकर,--जैसे, उः दूटते हुए स्वप्नो पर स्थिर चरण न रख सबने के कारण ही प्रलय नंत्य करती हुई “7 नयी सस्कृत्ति वे बीज बखेर रही है ! 'युगवाणी में भ्राप टेटी भैढ़ी पतली दही वो वे. बन का दर तब फैला हुआ बासामि जीर्णानि विहाय सौ-दय देखेंग, जिससे नवप्रभात वी सुनहली किरणें बारीत रेशमी जाली बी तरह लिपटी हुई हैं, जहाँ भ्रोसा के ऋरते हुए भ्रश्ठु आगत स्वर्णदिय की श्राभा भें हेसत हुएन्से दिखायी देते है, जहाँ शासा प्रशाखाशो में प्रततराल से-- जिनमें श्रव भी कुछ विवण पत्ते अठके हुए हैं“ बडे, तरह तरह बे', आवनाओो वे नीड, जाड़ो की ठिंठरती बपती हुई महातिश्ञा के युगव्यापी त्रास से सुरेते होकर नवीन बोपली से छनते हुए नवीन आलोक तथा नवीन उप्णता वी स्पश पाकर फिर से सगीत मुखर होने का प्रयत्व बर रहें हैं।
पत्ते की मासल हस्याली को जब बीडे चाट जाते हैं; उसकी सूक्ष्म स्नायुप्रो से दुनी हुई हथेली का कला-वियास जिस प्रवार देखने बालो को प्रान्चयचक्ति कर देता है उसी प्रकार की मिलती जुलती हुई सौ दय सन्नाति वी झाकी आप ध्युगवाणी' में भी पार्यंगे। तब झाप सहज ही युगवाणी के स्वरो मे बह उठेंगे
सदियों से श्राया मानव जेगे में यह पतकर ' श्रौर,
जीवन वसत तुम, पतकर देन नित आती, झपरूप, चतुदिक_ सुंदरता बरसाती धयुगवाणी' मे ब्रकृति सम्द थी कविताओं के अतिरिकत, जी मेरी पभ्रय
मुगवाणी / ७७
प्राकृतिक रचनाग्रो की तुतना मे भ्रपनती विज्वेयता रखती हैं,--मुरश्त पाँच प्रकार की विचारघाराए मिलती हैं
(१) भूतवाद और पध्यात्मवाद का समावय, जिसस मनुष्य वी चेतना वा पथ प्रशस्त बन सके |
(२) समाज में प्रचलित जीवन मायताओ का पर्यालोचन एव नवीन सस्क्ृति के उपकरणों का सम्रह । हे
(३) पिछते युगो के उन मृत आादझों और जीण रूढि रीतिया की तीम़् भत्सना, जो आज मानवता के विशयास में बाधक बन रही हैं।
(४) मावसवाद तथा फ्रॉयड के प्राणिशास्त्रीय मगोदशन का युग की विचारधारा पर प्रभाव जन समाज का पुन संगठन एवं दलित लोक समुदाय का जीर्णोद्धार ।
(५) वहिर्जीवन के साथ श्र तर्जीवन बे संगठन वी प्रावश्यक्ता राय भावना का विकास तथा नारी जागरण) मुग्रवाणी' की कुजी उसकी “बापू शीपक पहली कविता में है,--
भूतवाद उस धरा स्व के लिए मात्र सोपान, जहा प्रात्म दशन झगादि से समासीन प्रम्लान !
मातव जीवन एवं समाज वा रूपात्तर करने तथा पृथ्वी पर मानव स्वग वसाते का वस्तु स्वप्द नवीन युग वी भावात्मक देन है। मध्ययुग के दाशनिको से जिस प्रकार बाह्य जीवन सत्य की प्रवहेलना कर जयतू को माया या मिथ्या बहा है और आधुनिक भूतदशन जिस प्रवार प्र-तर्जीवन सत्य की उपेक्षा कर उसे वहिर्जीवन के भ्रधीन रखना चाहता है, 'युगवाणी' भे इन दोनो एकागी दृष्टिकोणो का खण्डन किया गया है ।
लोक कल्याण वे' लिए जीवन की बाह्य (सम्प्रति राजनीतिक प्राथिक ) और ग्राभ्य-त्तरिक (सास्कृतिव आध्यात्मिक) दोनो ही गतियो वा सग्ठन करता आवश्यक है। मात्रा और गुण दोनो में सतुलन होना चाहिए ) जहाँ एव प्रोर ग्रसरय नग्रे भूखो वा उद्धार करना जक्षरी है वहाँ पिछली सस्कृतियों बे विरोधा एवं रीतिजीतियो की ख्यखलामा से मुक्त हाकर मातव चेतना को युग उपकरणों के अनुरूप, विकसित लोक जीवन निर्माण करने मे सलग्न होना है ।
'युगवाणी का विध्वमूरति कहा है, जिससे वह जातिगत मन से मुक्त दहोगर पिश्वमन एवं युग के लोकमन को अपने स्वरो में सूतत कर सके मनुष्य वी अतर्चेतना म जो सत्य श्रभी श्रमूत है उसे रूप दे सके जीवन सौ-दय की जो मानसी प्रतिमा ्राज अतमन मे विकसित हो रही है उठ भोतिक जीवन भे साकार कर सके, प्लौर हमारा मा स्वयं पथ्वी पर उतर श्राये । कही-कही भावी जीवन वी कल्पना प्रत्यक्ष हो उठी है। यथा, भ्रर छदो श्र प्रासो मे सीमित कविता विश्व जीवन
के धूपमें बहने लगी है, मानव जीवन ही काव्यमय बन यया है वलात्मय भाव जीवन की वास्तविकता म बंध गये हैं। ऐसे ससार मे, जहाँ सास्द्ृतिक दावितयाँ उमुकत्त हो गयी हैं श्रद जीवन संघपण एवं समाज तिसाण का श्रम सुबद सुदर लगता है ।
हम झुग वे अ्रसगठित जीवन वो ब्रायवार वहा है, संगठित मत व प्रवाण । विकमित ब्यवितिदाद वे साथ हो वितरित समाजवाद को
७४८ | पत प्रयायलो
विशेष महत्त्व दिया है, जिससे देव बनने के एकागी प्रयत्न में हम मनुष्यत्व से विरकत होकर सामाजिव जीवन में पशुझो स भी नीचे न गिर जाये, देवत्व को श्रात्मसात् कर हम मनुष्य वत रह और माप दुबलताओं के भीत रा अपना सिर्माण एवं विकास कर सकें । नवीन समाज की परिस्थितिया हमे श्रादर्शों की आर ले जान वाली हा। हमारा मन युग के छायाभावा से समस्त न रह, हम झाज मे मनुष्य वी चेतना का, जो सण्ड युगो वी चेतना है, विकसित विश्व परिस्थितिया के झनुरूप समठन एवं निर्माण वर सकें ।
अपने दश में जनसाधारण के मन में जीवन के प्रति जा खोखले चराग्य वी भावना धर बर गयी है उसवा जिरोध कर तवीन सामाजिक परिस्थितिया के भ्रावार पर नवीन मानसिक जीवय प्रतिष्ठित करो पर जोर दिया गया है। भोतिव विनान वे विवास के कारण भू रचना वे' जिस भावात्मक दशन वा इस युग मे आविर्भाव हुआ है उसे युगदशन वा एब' मुण्य स्तम्भ माना है।
मध्ययुग झात्मदशन या श्रात्मदाद वा सक्तिय, सगठित एवं सामूहिक प्रयोग नही कर सका । तब भौतिव विनान इतना समुनत नही था, चाप्प, विद्युत, रप्िम श्रादि मानव-जीवय के वाहन नहीं बन सके थे । जीवन की बाह्य परिम्थितिया एक सीमा त्तक विकसित होने के बाद निष्क्रिय और जड़ हो गयी थी । मध्ययुगीन विचारबो, सता एवं साधु बे' लिए यह स्वाभाविक ही था कि वे विश्व सचरण के' प्रति निरीह होकर (मायरावाद मिथ्यावाद श्रादि जिसके दुष्परिणाम है) व्यक्त से सीधे परात्पर की भ्रोर चले जायें | उनके नैतिक उनयन वे प्रयत्न भगीरथ प्रयत्त कह जा सकत है पर वे राम प्रयत्न या हृष्ण प्रयत्त (जिहे राम इृष्ण भ्रवतरण कहना उचित होगा) नही थे, जिनके हारा विश्व सचरण भ भी प्रवाराततर या युगाततर उपस्थित हो सकता झौर जिनकी विकसित चेतना विश्व जीवन के रूप में संगठित एवं प्रतिष्ठित हो सकती । वतमान युग, नैतिक उन्नयन स भ्रधिक, इसी प्रकार के बहिर तर रूपा-तर की प्रतीक्षा करता है
रूप सत्य श्रौर कम के मन स मेरा अ्रभिष्रायथ लाक जीवन के संगठित रूप से भ्रौर सास्कृति वे रूप मे सगठित मन स है । पिछले जीवन के मगठित सत्य (संस्कृति) को जिसके मूल बेवल अध्ययुग की चंतना के झ्ावाश में हैं लीकक््सग्रह से प्राणशक्ति महण करते के लिए भ्रधोमूल यने जाता है, फिर से नीचे से ऊपर की ध्ोर उठना है। गीता भे जिस विश्व भ्रश्वत्थ वो ऊध्वमूलमध शास कहा है वह प्राध्यात्मि दब्दि कोण है जिसके धतुसार विश्वमन (झधिमत) एवं जोवन वा समस्त सत्य विज्ञान भूमि मे बीज रूप म॑ सचित है, जहाँ से वह जगत जीवग में प्रवतरित एव भ्रस्फुटित होता है। 'युगवाणी' म, श्रवतरण झौर वित्रास, दोनो सचरणो वो महत्त्व दिया है। इसी प्रवार का समावय पाठका यो ज्योत्स्ता' में भी मिलेया ।
समेप में मैंने सावसवाद वे लोस सयठन रूपी व्यापव श्रादशवाद भरौर भारतीय टशन के चेतनात्मव ऊ्व प्रादशवाद दोनो वा सःलपण घरने वा प्रयत्व किया है । भारतीय विचारधारा भी सत्य, भता, द्वापर
थुगवाणी / ७६
कलियुग के नामो स प्रादुर्भाव, निर्माण, विकास और हास के वत्त सचरणो पर विश्वास रखती है ' श्रत नवीन युग की भावना बेबल कपोल कल्पना नही है। पदाथ (मटर) झौर चेतना (स्पिरिट) को मैंने दो किनारो की तरह माना है जिनके भीतर जीवन का लोकोत्तर सत्य प्रवाहित एवं विकसित होता है । भविष्य मे जब मानव जीवन विद्युत झोर प्रणु शक्ति की सबल टांगो पर प्रलय वेग रा दौड़ने लगेगा तब आज के मनुष्य को तर्फों वादों में बिखरी हुई चेतना उसका संचालन करने में कसी तरह भी समय नहीं हो सकेगी । इसलिए सामाजिक जीवन के साथ ही मनुष्य की प्रतर्चेतना मे भी युगा-तर होना प्रवश्य भावी है ।
इस युगविवतन मे झनेव झभावात्मक एवं विरोधी दक्षितयाँ भी काम कर रही हैं जी हमारे पिछले सामाजिक सम्ब धो की प्रतिक्रियाएँ हैं। वतमान राजनीतिक पभ्राथिक ग्रादोलन इही विरोधो को दबाने एवं नवीन भाव परिस्थितियों का निमाण बरने वे लिए जाम ले रहे है। एक विरोधो तत्व और भी है जो इनस सूक्ष्म है। वह है मनुष्य का रागतत्व, जो पिछले युगों के' सस्कारो से रजित झौर सीमित है। इस रागतत्व को अपने विकास के लिए भविष्य में भ्रधिक ऊष्व एवं व्यापक धरातल चाहिए। वतमान नारी जागरण झौर नारी मुवित के श्रादोलन उस घरातल पर पहुचने के लिए सोपान मात्र हैं। राग सम्बधी झादोलन एक प्रकार से प्रभी भ्रविकसित ग्रौर पिछडा हुम्ना है। प्राणि शास्तीय मनोविचान उस पर केवल प्राशिक प्रकाश डालता है। मनुष्य स्वभाव को सस्कृत बनाये के लिए रागात्मिका प्रवत्ति का विवास होना प्रनिवाय है । वह एक मूल प्रवत्ति है। इस वत्ति के विकास से ममुष्य अपने देवत्व के समीप पहुच जायेगा श्रौर ससार मे नर नारी सम्ब घी रागात्मक भा यताझ्री मे प्रकारातर हो जायेगा। स्त्री पुरुष भौतिक' विज्ञान शत्रित से सगठित भावी लोकत-त्र मे रहने योग्य सस्क्षार बिक्सित प्राणी बन सकेंगे । तब शायद धरती की चेतना स्वग के पुलिनों को छूने लगेगी । राग ही इस सचरण बे लिए “युगवाणी' में यत्र-तत्र सकेत किया गया है ।
मुझे विदवास है कि इन दब्टिकोणों से 'युगवाणी को समभने मे पाठकों को सुविधा होगी | दशन पक्ष वे लिए भ्राधुनिक कवि (भाग दो) वी भूमिका को पढना भी उपयोगी सिद्ध होगा । इति ।
प्रयाग २४ सितम्बर ४७ सुमित्रानदन पत
उ० | पत प्रधावली
बापु।
बिन तत्वों से गढ़ जाध्ोगे तुम भादी सानव को २ किस प्रकाश से भर जाप्रोगे इस समरोमुख भव को ? सत्य भ्रहिता में प्रालोकित होगा मानव का मन ? झमर प्रेम का भधुर स्वर्ग बन जायेगा जग जीवन ? प्रात्मा ही सहिमा से मण्डिस होगी पव मानवता ?ै प्रेम शक्ति से चिर निरस्त ही जायेगी पाशवता ?
युगवाणी लए
द्ापू ) तुमसे सुन प्रात्मा का तेजरशशि प्राह्मान हँस उठत हैं रोम हप से, पुलकित होते प्राण ' भूतवाद उस धरा स्वग के लिए मात्र सोपान जहाँ प्रात्म दशन झनादि से समासीन अम्लान नहीं जानता, युग विवत में होगा कितना जन क्षय, पर, मनुष्य को सत्य भ्रहिसा इष्ट रहेगे निश्चय | नव संस्कृति वे दूत । देवताभो का करने बाय मानव प्ात्मा को उबारते भाये तुम झनिवाय ! ,->बभ “नमी? ३७. >ड्:
7 युग की वाणी, है विदवमूति, कल्पाणी ५5 रूप ढुप बन जाँय भाव स्वर, ९८ वित्र गीत झवार मनोहर, , -, रत मास वन जाँय निखिल: | भावसा, बल्पना, रानी | को * युग की याणी | आत्मा ही थन जाय देह नव, भान ज्योति ही विश्व स्नेह नच, हास,. भश्ु,. भाशाष्वाक्षा बन जाँय खाद्य, सधु पानी । युग की वाणी । सवप्त वस्तु बन जाय सत्य नव, स्वय मानसी ही भौतिय' भव, अतर जग हो बहिजगत चने जावे, वीणायाणी * गुंग की वाणी !
युगवात्री / रूरे
सब मुक्ति हो मुक्ति तत्व भव, सामूहिकता ही निजत्व ब्रब, बने विश्व जीवन की स्व॒रलिपि जन मन मम कहानी ! बबि की वाणी !
नव दृष्दि |
खुल गये छद के बाघ, प्रास के रजत पाश, !
भ्रव गीत मुक्त, भ्रौ' युग वाणी बहती अयास !
बने गये कलात्मक भाव जगत के रूप नाम,
जीवन सघपषंण देता सुख, लगता ललाम सुदर, शिव, सत्य वला के बल्पित माप मात, बन गये स्थूल, जग जीवन से हो एक्प्राण ! मानव स्वभाव हो बन मानव प्रादश सुपर करता श्रपूण को पूर्ण, असुदर को सुदर !
सानव
जग जीवन के तम में दाय, अभाव दायन मे 4 परवश मानव बुन स्वप्ना के जाल ढक दो विदव-पराभव बुत्सित गहित, घोर ऊणनाभ से प्राण सुक्ष्म, भ्रमर प्र-तर-जीवन का तानें मधुर बितान, देश बाल के मिला छोर! पशुज्जीवन के त्म में | जीवन रूप मरण मे जाग्रत मानव ! सत्य बनांप्रा स्वष्नां वो रच मानवता नव, हो नय थुग का भोर !
युग उपकरण
बहे जीवित समरीत, सीन हो जिसमे जग-जीवन-सघप, बह झाहण, मनुज-स्वभाव ही जिसबा दोष थुद्ध निप्कप ! वह झ ते सौदय, राहुन बर भवे बाह्य वरूप्य विरोध, सत्रिय परगुवम्पा न घृणा बा कर घणा गे जा परिशोध |
४२ / पत प्रंघादली
नम्न शक्ति वह, जो सहिष्णु हो, निवल को बल करे प्रदान मूत प्रेम, मानव मानव हो जिसके लिए अभिन, समान | बह् पवित्रता, जग्रती के कलुपो से जो न रहे सात्रस्त, वह सुख, जो सवत्र सभी के सुख के लिए रहे सयस्त !
ललित कला, कुत्सित कुरूप जग का जो रूप करे निर्माण, वह दश्यन विज्ञान, मनुजता का हो जिससे चिर कल्याण ! वह सस्कृति, नव मानवता का जिसमे विकसित भव्य स्वरूप, वह विश्वास, सुदुस्तर भव सागर में जा चिर ज्योति-स्तूप ! रीति नीति, जो विश्व प्रगति मे बनें नही जड बाधन पाश, ऐसे उपकरणों से हो भव मानवता का पूण विकास!
नव सस्क्ृतति
भाव कम में जहा साम्य हो सतत,
जग जीवन मे हो विचार जन के रत |
ज्ञान वद्ध, निष्क्रिय न जहा मानव मन,
मत प्रादश न व घन, सक्रिय जीवन
रूटि रीतिया जहा न हो आ्राराधित,
श्रेणि वग में मानव नहीं विभाजित !
धन बल से हो जहा न जन श्रम शोपण,
पूरित भव-जीवन के मिखिल प्रयोजन जहा देय जजर प्रभाव ज्वर पीडित जीवन यापन हो न मनुज को गहित | युग युग के छाया-भावों से त्रासित मानव प्रति मानव मन हो न सशक्त! मुक्त जहाँ मन की गति, जीवन में रति, भव मानवता में जन-जीवन परिणति।! सस्दृत वाणी, भाव, कम, सस्दृत मन, सुदर हो जन वास, वसन, सुदर तन!
ऐसा स्व घरा में हो समुपस्थित,
नव मानव सस्कृति किरणो से ज्योतित
पुण्यप्रसु॒ , ताक रहे हो गगन ? मत्यु नीलिमा-गहन गसन ? झनिमेष, भचितवन, काल-नयने ?-- निस्पद, शूय, निजन, निस््वन?े दखो भू को | जीव प्रसू वो । हरित भरित
युगवाणी /,८३
पलल्लवबित ममरित कूजित गुजित बुसुमित
भूको!
कोमल
चचल
झाइल
अचल,
कल बल
छल छल
चल जल निमल,-7 कुसुम खचित
माझुत सुरभित
खग बुल कूजित
प्रिय पशु मुफस्ति-7
जिस पर भकित सुर मुनि वा दत न मानव पद तल
चोटी
चीटी वो देखा ? बहू सरल विरल, बाली रेखा तम के तागेन्सी जो हिल डुल चलती लघुपद पल पल मिल जुल, वह है चविपीलिवा पाँति ! देखो ना, विस भाँति काम करती वह सतत * कस कल बसे चुनती पविरत ! गाय चराती, घूप खिलाती, बच्चा वी (निगरानी करती, लडती, भरि से तनिक न डरती दल के दल सेना सँंवास्ती, घर, प्रौगन, जनपथ बुहारती ' देखो वह वल्मीकि ' सुर उसके भीतर हैं ढुग, गैंगर |
चंड | पस प्रथावला
अदभुत उसको निर्माण-कला, कोई शिल्पी क्या कहे भला।
उसमे हैं सोध, धाम, जनपथ, झ्रँगन, गो गृह भण्डार झकथ, हैं डिम्बर सच्म, वर शिविर रचित, डयोढी बहु, राजमाग विस्तृत ! चीटी है प्राणी वह श्रमजीवी, वह देखा चीटी को ? उसके जी को ? भूरे बालो वी-सी कतरन, छिपा नहीं उसका छोटापन, वहू समस्त पृथ्वी पर निमय विचरण करती, श्रम में त मय, वह जीवन वी चिनगी श्रक्षय | वह भी क्या देही है तिलसी ? प्राणो की रिलमिल भिलमिल सी | दिन भर में वह् मीलो चलती, अ्रथक, काय से कभी न टलती, वह् भी क्या शरीर से रहती ? बहू कण, अणु, परमाणु ? चिर सक्रिय वह, नही स्थाणु हा मानव !
सामाजिक, सुनागरिक !
दह तुम्हारे ही है, रे व | तन की चितामे घुल निशिदिन देह मात्र रह गये, दबा तिन !
प्राणि प्रवर हो गये निछावर अचिर धूलि पर |!
निद्रा, भय, मथुनाहार वज्ये.. पशु लिप्साएँ चार-- हुईं. तुम्हँ सवस्व सार ? घिकू मंथुन - शझाहार - यत्र । क्या इही बालुका - भीतो पर रचने जात हो भव्य, प्रमर तुम जन समाज का नब्य तत्र ? मिली यही मानव म क्षमता ? पशु पक्षी, पुष्पो से समता ? मानवता पशुता समान है? ब्राणिज्षासत्र देता प्रमाण है?
बाह्य नही, झातरिक साम्य जीवो स मानव को प्रवाम्य!
युगवाणो | ८५
मानव यो झाटप चाहिए,
सस्वृति, भात्मोतव चाहिए,
बाहा विधान उस हैं बपन
यदि न साम्य उनमे श्रतरतम--
मूल्य ने उनता घीटी थे सम
व हैं जड़, चीटी हैं चतन।
जीटित चोटी, जीवन - बाहप,
मानव जीवन था दर नायथप,
बह स्व तत्र बह भ्रात्म विधायर
८ १ १4 पूर्ण तन्न मानव, यहू ईश्वर, मानव वा विधि उसके भीतर
पतभर
रिक्त हो रही भाज डालियाँ,--डरो ने गिचित्,
रवत पूण, मासल हागी फिर, जीवन रजित ।
जामशील है मरण भमर मर मर वर जीवन,
भरता नित प्राचीन, पल्लवित होता नूतन! पतमकर यहू, मानव जीवा में झायथा पतमर, भाज युगो वे बाद हा रहा नया गुगातर! वीत गये बहु हिम, वर्षातप, व्िभव परामव, जग जीवन में फिर घसात भाने यो भमिनव
भरते हो, मरने दा पत्ते--डरो न जिधित,
नवल मुकुल मजरियों स भव हागा शोभित?
सदियों म श्राया भागर जग में यह पतझर,
सदियों तक भोगोगे नव मघु का वैभव वर
शिल्पो
इस क्षुद्र लेखनी स बेवल करता मैं छाया लोक सजन ? पेदा हो मरते जहां भाव, बुदबुद विचार झौ स्वप्न सघन ?ै निर्माण कर रहे वे जग का जा जोड इट, चूना, पत्थर, जो चना हथोडे, घन, क्षण क्षण हैं बना रहे जीवन का घर ? जो कठिन हज्लो की नोको म॑ ग्रविराम लिस रहे घरतो पर ? जो उपजात फल, फूल, अत, जिन पर मानव जीवन निभर ?
इस धमर लेखनी से प्रतिक्षण मैं बरता मधुर भ्रमृत बषण, जिससे मिट॒टी के पुतलो मे भर जाते प्राण, अमर जीवन
निर्माण कर रहा हूँ जग का मैं जोड जोड मनुजो के मन मैं बांट काट बदु घृणा कलह रचता शझ्रात्मा का मनोभवन
5८६ / पत ग्र थशवली
खर-कोमल छब्दों को चुन-चुन मैं लिखता जन जन के मन पर,- मानव प्रात्मा का खाद्य प्रेम जिस पर है जग जीवन निमर !
में जग जीवन वा शिल्पी हूँ जीवित मेरी वाणी के स्वर, मैं मास-वड पर जन मन के मुद्रित करता हू सत्य अमर
दो लडके
भेरे प्रॉगल में, (टीले पर है मेरा घर)
दां छोटे से लडके झा जात॑ हैं प्रक्सर
मंग्रे तन, यदबदे, सावले, सहज छवीले,
मिट्टी के मठमेले पुतले,--पर फुर्तलि | जल्दी से, टीले के नीचे, उधर उतरकर वेचुन ले जाते कूडे से निधिया सुदर,- सिगरेट के खाली डिब्बे, पनी चमकीली फीतो के टुकडे, तस्वीरें नीली पीली
मासिक पत्रों के कबरों की, शौ' बदर से क्लिकारी भरते है, खुश हो-हा श्रदर से | दौड पार झागन के फिर हो जाते आभल वे नाटे छ-सात साल के लडके मासल |
सु दर लगती नग्न देह, मोहती नयन मन, मानव के नात उर में भरता अपनापन | मानव के बालक हैं ये पासी के बच्चे, रोम-रोम मानव, साँचे में ढाले सच्चे |
अ्रस्थि मास के” इन जीवो का ही यह जग घर,
आत्मा का भ्रधिवास न यह, वह सूक्ष्म, अनशवर !
पयोछावर है भात्मा नश्वर रक््त-मास॒ पर,
जग या अधिकारी है वहू, जो है दुबलतर !
वह्नि, बाढ, उल्का, कमा की भीषण भू पर कस रह सकता है कोमल मनुज क्लवर ? निष्ठुर है जड प्रकृति, सहज मग्रुर जीवित जन, मानव को चाहिए यहाँ मनुजोचित साधन !
क्यों न एक हो मानव मानव सभी परम्पर
मानवता निर्माण करें जय म॑ लोकोत्तर ?
जीवन का प्रासाद उठे भू पर गौरवमय,
मानव का साम्राज्य बने,-मानव हित निइचय। जीवन की क्षण घूलि रह सबे जहा सुरक्षित रक्त मास की इच्छाएँ जन वी हो पूरित | -मनुज प्रेम से जहाँ रह सरके,-मानव ईइवर और कौन-सा स्वग चाहिए तुझे घरा पर ?
युगवाणो / ८७
मिज जीवन के हित भगषित प्राणी हैं इसके श्राधित, मावव इसका झासक,--आतप, अनिल, ग्रन, जल श्ञास्रित !
मानव - जीवन, प्रकृति -सरणि मे जड विरोध दुछ निश्चित, विजित प्रकृति को वर, उसने की विश्व सम्यता स्थापित । देश, काल, स्थिति से मानवता रही सदा ही वाधित, देश, काल, स्थिति को वश म कर करना है परिचालित !
क्षुद्र व्यक्ति को विकसित होकर बनना भ्रव जन - मानव, सामूहिक भानव को निर्मित करनी भव सस्दृति नव मानवता के युग प्रभात मे मानव - जीवन घारा मुक्त अवाघ वहे, मानव जग सुख स्वणिम हो सारा |
मूल्याकन
प्राज _पझसु दर
प्राज सत्य, शिव, सुदर करता नही. हृदय प्राकवित, सन््य, शिप्ट औ' सस्द्ृत लगते मन को बेवल कुत्सित सस्वृरति, कला, सदाचारो स भव - मानवता पीड़ित, स्वण - पीजडे भें बंदी हैं मानव आत्मा निश्चित लगते सुदर
ब्रिय पीरिति, शोषित जन
जीवन के दैंया
से जजर
मानव - मुख हरता मन्र । मूठ, प्रस्मम्प, उपक्षित, दूषित
के उपवारव,
घामिव, उपदेशव . पण्डित, दानी हैं लोव - प्रतारक |
€० / पत प्रंधावलो
घम नीति शभ्रौ” सदाचार कप भूल्यावत है जन हित,
चूण करो गत रास्यारा बा, ला जन प्राण उबार -- सोलो फिर इस बार!
गूज उठे जन - जय मे जीवन
उर मे प्रणय पुकार,
पुन ॒पल्लवित हा मानव-जग,
हो वसात, पतभार >- साला फिर इस बार!
मावस के प्रति
दलवथा, वोरो वी गाया, सत्य, नहीं इतिहास, सम्राटा को विजय लालसा, ललना भूगुदि- विलास, देव नियति का 0 त्रीडा चत्र ने वह उच्छूखल घर्मा घता, नीति, मस्दति का ही न मात्र समर स्थल साक्षी हूं इतिहास, किया धुमन दुदुभि से घोषित,-- प्रकृति विजित कर, मानव ने क) विश्व सम्यता स्थापित ! विकसित हो बदले जब जब जीवनोपाय के साधन, युग बदले, हासन बदल, वर गत सम्यता समापन ! साम्राजिक सम्बंध बने नव, प्रथ भित्ति पर मूतन नव विचार नव रीति नीति, नव वियम, भाव, नव दान साक्षी है इतिहास, पश्राज हाने का पुन युगान्तर श्रमिकों का भब शासन होगा उत्पादन यंत्रों पर ! वग हीन सामाजिवता देगी सबका सम साधन, पूरित हांगे जन के भव जीवन के निखिल प्रयोजन ! दिय दिग तम व्याप्त निश्वििल युग युग वर चिर गौरव हर, जन सस्कृति का नव विराट प्रासाद उठेंगा मू पर । धय माक्स | चिर तमच्छन पृथ्वी के उदय शिखर पर, तुम धिनत के भान चक्षु -से प्रकट हुए प्रलयकर |
भुत दर्शन बहता भोतिक्वाद, वस्तु जंग या कर तत्वावेषण-- भौतिक भव ही एक सात्र मानव का अंतर दपण !
स्थूल सत्य आधार सुक्षम प्राधेय, हमाराजो मत बाह्य विवतन से होता युगपत्त भातर परिवतन
राष्ट्र, वग, आदश, घम, गत रीति नीति भौ” दशन
स्वण पाञ्ञ हैं मुवित योजना सामूहिक जन जीवन दत युग वा भत शझत विज्ञाना का सघषण, प्रव दशत विज्ञान सत्य वा करता नब्य निरूपण *
६२ | पत ग्रधावली
चरोदूभूत इतिहास मूल सरिय, सबस्ण, जड़ चेतन हैंड तक से प्रभिव्यक्ति पाता युग -शुग मे नूतन ! परत प्राज साग्राज्याद, घेगपति वर्गों बा हासन, अस्तर युग थी जीप सम्यता मरणासन, समापत
सम्पपाद ये साथ स्वण युग बरता मघुर ददापण, मुझ्त निछिल मानवता बरती मानव गा भभिवादन !
साम्राज्यवाद
परिवर्तन ही जग जौवा वा सियग चिरन््तत, दुजय साश्ी है इतिहास युगा वा प्रत्यावतन प्रभिनय
ग्रतिया के, बुलपति, सामन्त, महता के बभव क्षण ब्िल्ला गय बहु राज सात्र,--सागर में ज्या बुदबुद कण रजत स्वप्न साम्राज्यवाद वा ले नयनों मे शाभत पूजीवाद लिया भी है होन यो ध्ाज समापन !
विविध चान, विज्ञान, बला, यात्रा वा प्रदमुत पौशल जग यो दे थहु जीउन साधने, वाप्प, रश्मि, विद्युत बल, मरणांमुख साम्राज्यवाद मर वह्चि और विप वषण, भीतिम रण को है सचचेष्, रच निज विनाश प्रायोजन !
विश्व द्षितिज मे. घिरे परामव वे हैं मेष भ्रयकर, नव युग या सूउया है तिश्चय यह ताण्डव प्रलयकर ) जन युग वी स्परििम किरणों से होगी भू आलोकित, नव सख्ृत्ति बे” नव प्ररोह होगे झोणित से सिचित !!
समाजवाद-गाधीवाद
साम्यवाद ने दिया विश्व को नव भौत्तितर दक्षय का ज्ञान अ्रथशास्त्र श्री राजनीति गत. विद एतिह्ाप्तिक विज्ञान
साम्यवाद मे दिया जगत को सामूहिक जवेतात्र सहान, भव जीवन मे' देय दुस से किया मनुजता वा परियाण
श्रत्तर्मुख्त भ्रद्धत पडा था गुगन्युग से निष्किय, निष्प्राण, जग मे उसे प्रतिष्ठित बरने दिया साम्य ने वस्तु विवान )
गाधीवाद जगत मे भाया ले मानवता वा सब सास, सत्य श्रहिसा स मनुजोबित वन सस्क्ृति करते निर्माण गाधीयाद हमे जीवन पर देता भ्रतगत कियास, मानव की नि सीम शक्ति वा मिलता उससे चिर झामास
व्यविस पूणण बन, जम जीवन में भर मरा है नूतन प्राण, विकसित मनुष्यत्व वर सकता पश्ुता से जन वा कयाग !
शुधदाधी हैं
मधुप्यदव का तत्व सिसाता निश्चय हमयो गांघीवाद, सामूहिक जीवन विय्रास वी साम्य योजना है प्रविवाद !
सकीर्ण भौतिकवादियो फे प्रति
हांड मास का श्लाज बनाओये सुम मनुज॒ समाज ? हाथ पाँव समगठित चलावेंग्रे जय जीवन बाज!
दया द्रवित हो गये देख दारिद्रथ प्रससख्य तनो का? अब दुहरा दारिद्रथ उह्े दोगे मिरुपाय मनो का?
आत्मवाद पर हँसत हा भोतिक्ता का रट नाम ? मानवता की मूर्ति गरढ़ोगे तुम संवार कर चामर
वस्तुवाद ही सत्य, मपा भमिद्धालवाद, प्रादर्श है बाह्य परिस्थिति पर प्राश्रित्त प्रतर जीवन उत्मपर
मानव | कभी भूल से भी क्या सुधर सकी है मूल ? सरिता का जल मपा, सत्य केवल उसके दो कूल?
आत्मा झो' भूता मे स्थापित वरस्ता कौन समत्व ? बहिरतर, झात्मामूता से है अतीत बहू तत्व!
भौतिक्ता, प्राध्यात्मितता बेवल उसके दा कूल, व्यक्ति विश्व से, स्थूल-्सूक््म से परे 'सत्य के मूल!
घनपति
वे नशस हैं वेजन के श्रमबल स पोधित,
दृहरे घनो, जोक जग के, भू जिनसे झोषित !
नहीं जिह करनी श्रम से जीविका उपाजित,
नेतिकता से भी रहते जो झत प्रपरिचित शय्या को जीडा कदुक है जिनको नारी, अहमय वे, मूट, अथबल के व्यभिचारी ! सुरागना, सम्पदा, सुराप्रा से ससवित । नर पशु वे भू भार मनुजता जिनसे लज्जित !
दर्षी हंठी निरकुश निमम, वलुषित, कुत्सित
गत सस्क्ृति के गरल लोक जोवन जिनसे मृत!
जग जोवन था दुरुपयोग है उनका जीवन,
भ्रव न प्रयोजन उनका प्रीतिम हैं उनके क्षण !
मध्य चर्ग
मस्ठति का वह दास विविध विश्वाम विधायह, दिखिल चान विज्ञान नीतिया का उनायक
€४ | पत ग्रथाबली
उच्च वग की सुविधा का ज्ञास्त्रोक्त प्रचारक, प्रभु सेवक, जन वधक वह, निज वय प्रतारक ! भोग झील, धनिक्रो का स्पर्धी, जीवन प्रिय श्रति, झात्म वृद्ध, सक्रीण हृदम, ताकिक, व्यापक मति पाप पुण्य सन्त्रस्त, श्रस्थियों ता बहु कोमल, वाक बुश्चल, घी दर्पी, श्रति विवेक से निम्नल्न मध्यवर्गं वा मानव, वह परिजन पत्ती प्रिय, गशकामी, व्यवितत्व प्रसारक, पर हित निष्क्रिय श्रमजीवी वह, यदि श्रमिकों का हो अभिभावक, नव युग का वाहब हो नेता, लोक अ्रभावक!
कैपक
युग - युग का वह भारवाह आाक्दि नत मस्तक, विल्लिल सम्य ससार पीठ का उसके स्फोटब ! वच्च मूढ, जड मूत्र, हठी, वृष बाधव क््पक, भ्रूब, ममत्व की मूर्ति, रूढियो का घिर रक्षत्र कर जमर, ऋण ग्रस्त, स्पल्प्र पैप्रिक स्मृति भू धन, निख्ित देय, दुर्भाग्य, दुरित, दुख का जो कारण, वह कुबेर निधि उस,-स्वेद सिथित जिसके कण, हप॑ झ्ोक की स्मृति के बीते जहाँ वष सथ। विश्व + विवतनशोल, ग्रपरिवर्तित वह निश्चल बही खेत, ग्रह द्वार, वही वृष, हूँसिया श्रौ'हल ! स्थायर स्थितियों का शिशु, स्थावर, स्थाणु हृपीयल, दीपश्ूत, श्रत्ि दुराग्रही, साशतः भो बृषत्न ! है पुनीत सम्पत्ति उसे देवी मिधि निश्चित साततिवत गो वृषभ, ग्रुल्म, तृण, तरुचिर परिचित | बेह सवीर्ण समूह - ए्पण, स्वाधित, पर-पीश्ति, झति निजस्व प्रिय, शोपित, लुग््ित, द्वित क्षुघादित युग - युग से तिसय, स्पीय श्रमवबल से जीवित, विश्व प्रगति प्रमभिज्न, दूप-्तम मे निज सीमित फ्प/ का उद्धार पुण्य इच्छा है वन्पित, सामूहिक कपि काय-कल्प, झयथा दृषया मृत !
श्रमजीबी
बहु पविश्न है वह जग के कन्म से पोषित,
वह निर्माता श्रेण्रि, वंय घन, बल में धोधिता
मूढ, भविक्षित,--सम्य थिक्षिता ते बह शिक्षित,
विश्व उपेधित,-- थिप्ट सस्शगों से मनूजोचित! ईं-य. कष्ट वृष्यित,-युलर है उसका धानन गादे यात बसे हा पावन श्रम ता जीवन
युगवात्रों | १४
मतुरत्य या तत्य सिलाता निश्चय हमको स्रॉंधीयाट, सामूहिक जीयन विकास की साम्य योजना है प्रवियाद |
सकीर्ण भौतिकवादियो फे प्रति
हाड मास या ह्राण बनाभोय तुम मनुज स्रम्ाज हाथ पाँव संगठित चलावेंगे जग जीया बाज!
दया द्रवित हो गय देरा दारिद्रभ भ्र्तस्य तनो मा? झ्रय दुहरा दारिद्रधः उहू दोग निशषाय मनो मारी
प्रात्ममाद पर हँसत हा भौतिकता या रद नाम ? मानवता वी भूति गद्ोगे तुम सेयार वर धाम?
वस्तुवाद ही सत्य, मृपा सिद्वालवाट, प्रादश्म ?ै बाह्य परिस्थिति पर प्राश्रित प्रतर जीवा उत्तप?ै
मानव | कभी भूइ से नी वया सुपर सवी है भूल ?ै सरिता वा जल मा, सत्य केवल उसके दो कबूल?
आत्मा प्रौ मूता म स्थापित वरता कौन समत्व ?ै बहिरतर, प्रात्मा मूता से है भतीत बहू तत्त।
भौतिवता, प्राष्यात्रायता मेवल उसने दा बूल, व्यक्त विश्व रा, स्थूल सूक्ष्म से परे सत्य में मूल!
घनपति
वे नशस हैं वजन ये श्रमबल से पोषित, दुृहरे घनी जाक जग ये मू जिनसे झोपित ! नहीं जिहें बरनी श्रम से जीविक्रा उपाजित, नेतिकता से भी रहत जो भत प्रपरिचित | दाय्या वी त्रीडा कदुक है जिनका _ नारी, प्रहमय वे सूठ, अभथबल के व्यभिचारी सुरागना, सम्पदा, सुराप्रो से ससवित नर पशुवे मू भार मनुजता जिनमस सज्जित ! दर्षी, हठी निरकुश, निमम बलुपित, कुत्सित, गत सस्कृति के गरल, लोक जीवन जिनसे मृत जग जीवन का दुरुपयोग है उनका जीवन, भ्रब न प्रयोजन उनका, आ्रतिम हैं उनके क्षण!
सध्य वर्ग
संस्कृति वा वह दास विविध विश्वाम विधाया, निखिल चान, विज्ञान नीतियों का उतायक |
&४ | पत प्रथावलो
श्ज्
/_ झास्त्रोक्त 7रक,
जन वचक वह, निज नेग प्रतारक । भोग चील, 7 स्पर्धी, जे तन प्रिय अति ऋात्म बद्ध, पफीण हृदय, कि
पे प्राप
स्नेह साम्य, सौहाद्रपूण तप से उसका मन, वह संगठित करेगा भावी भव का दयासना
भूख प्यास से पीडित उसवी भद्दी पझ्राइति स्पष्ट कया वहती --कसी इस युग यी सस्क्ृति [ वह पशु से भी घृणित मनुज--मानव वी है इृति। जिसके श्रम से सिची समृद्धा की पृथु सम्पत्ति!
मोह सम्पदा भ्रधिवारां वा उसे ने विचित, काय दुशल य-त्री वह, श्रम पटुता से जीवित! शीत ताप श्रौ! क्षुघा तपा में सदा सयमित, दढ़ चरित्र वह, दुस सहिष्णु, ध्रूव धीर, ध्रभय थित |
लोक क्राति का श्रग्रदूत, बर वीर, जनादुत, नव्य सम्यता का उनायक, शजझ्ासक, शासित ! चिर पवित्र वह भय झ्याय, घृणा स पालित, जीवन का शिल्पी,--पावन श्रम मे प्रक्षालित |!
घन नाद
ठड ठड ठन |
लोह नाद से ठोषा पीट घन निर्मित करता श्रमिकों वा मन, ठड़ ठड़ ठन !
“कम विलिष्ट. मानव भव जीवन, श्रम ही जग का शिल्पि चिरतन, कठिन सत्य जीवन वा क्षण क्षण घोषित करता घन बज्च स्वन- व्यय विचारों का सधपण, अविरत श्रम ही जीवन साधन, लौह बाष्ठ मय, रक्त मास मय, वस्तु रूप ही सत्य चिरतन |, ठड्ू ठड् ठन
अग्नि स्फुलिगो का कर चुम्बन जाग्रत करता दियर दिगात घन,-- जागो, श्रमिकों, बनो सचेतन, मू के अधिकारी हैं श्रमजन ! मास पैशियाँ हृप्ट, पुष्ट, घन, बटी शिराएं, श्रम - बलिष्ठ तन, मू वा भव्य वरेंगे बासन, चिर लावण्यपूण श्रम के कण । ठड ठंड ठन !
€६ | पत ग्रधावली
चना
रूप भाव का सूल रूप को भाव करो सब अपण | मुक्त रूप का तत्व बनेगा जगती का नव जीवन, रूप मुक्ति ही भाव मुक्ति ! यह तात्विक सत्यावेषण। *
॥ रूप पुजन हे करो रूप पूजत, भव मातव ! भाव पुष्प फर ' भपण, घरो रूप चरणों मे गव नव तन, मन, जीवन, यौवन ! निखिल शक्ति बंध रूप पादश में करती ससूरति मतन, रूप परिधि में मुक्त प्रकाशित शत शत रवि, शशि, उडुगन १ श्राज झलकृत करो धरा को रूप रग भर नूतन, युग युग की चिर भाव राशि के पहना वसन, विभूषण प्रकृति रूप - इच्छा से उमद करती सजन सनातन, रूप सुष्टि यह भावों को दो मधुर रूप परिरम्भण ! सच है, जय जीवन विकास में आते ऐसे थुग क्षण, जब मानव इस रूप जगत का करता सूक्ष्म निरूपण ! वह विश्लेषण युग देता निर्माण शक्ति फिर नूतन, प्रतर जग का बहिजगत में होता जब परिवतन ! प्राज युगातर होने को है जगती तल में निश्चित, नव मानवता की क्रिणो से विश्व क्षितिज है ज्योतित ! तव्य रूप से करो, भव्य मानव | स्वरूप जग विभित, झखिल श्रवनि खिल उठे रूप मानवता से हो कुसुमित ! वरो रूप को, हे नव मानव ! रच भव प्रतिमा जीवित, भ्ग श्रग में देश दश की भाव राशि बर प्रपित ! जन जने वी विच्छिन 'धवित हो जग जीवन में विकसित, मरुंग युग की श्रतष्त प्राक्ाक्षा उर उर की प्रिपूरित
रूप निर्माण |
रम्य रूप निर्माण क्रो हे, रम्य वस्च परिधान, रम्य बनाझो गह जनपथ+ को, रम्य नगर, जनस्थान ! रम्य सुष्टि हो रूप जगत की रम्य घरा ख्यगार, बाह्य रूप हो रम्य वस्तु वा, होगे रम्य विचार ! रम्य रूप हो सानवता का, झखिल मनोरम वेश, भाषा रम्य मनुजता का सन बहने करें निशेष भेद जनित माया, माया का रूप करो वियास, मानव सम्हृति में विरोध डूबें, हो ऐक्य प्रवाश। रूप रचो भव मानवता का, रूप भाव झाधार, रम्य रूप मानव रामूह हा जीवन रूप विचार !
€५ / पत प्रधावली
वह भी क्या मानव जीवन या लाछन, बहू, मानव के देव भाव का चाहने! पु
नहीं रहे जीवनोपाय तव विकसित, जीवन यापन वर न सके सब इच्छित ! नैतिक सीमाएँ बहु पर निर्धारित, + जीवन इच्छा, बी जन ने मर्यादित ! मानव के श्रेयस् वे हित निश्चित पशु ने! भपनी बलि दी, देवो वे हित! जीवन के उपकरण ग्रखिल कर प्रधिकृत गत युग का पणु हुआ भाज मनुजोवित ! देव श्रौर पौश्ु, भावों में जो सीमित युग युग में होते परिवर्तित, भ्रवप्तित ! मानव पशु ने क्या भ्राज भव प्रजित मानव देव हुप्ना भ्रव वह सम्मानित |
सानव के पशु के शभ्रति
मध्य वग की हो रति।
नारी
मुक्त करो नारी को, मानव ! चिर बाीदिनि नारी को, ४ युग वी बबर कारा से जननि, सखी, प्यारी को छत करो सब स्वण पाश उसके कोमल तन भन के, वे प्रामूषण नही, दाम उसके वदी जीवन के!
पुरुष वासना की सीमा से पीडित “नारी जीवन,
नर नारी का तुच्छ भेद है केवल युग्म विभाजन |
उसे मानवी का गौरव दे पूण सत्व दो नूतन,
उसका मुख जंग का प्रकाश हो उठे श्रध श्रवगुण्ठन। योनि मात्र रह गयी मानवी निज श्रात्मा कर श्रपण, पुरुष प्रकृति की पछुता का पहने नैतिक आमूषण॥/ नष्ट हो गयी उसकी झात्मा, त्वचा रह गयी पावन, युग युग से प्रवगुण्ठित गहिणी सहती पशु के बघन
खोलो हे मेखला युगो की क्टि प्रदेश से, वन से !
अमर प्रेम हो बंधन उसका, वह पवित्र हो मन से
झ्गो की प्रविकच इच्छाएँ रहें न जीवन पातक,
वे विकास मे बर्ने सहायक, होवें प्रेम _प्रवादक | छुघा तृपा, ही के समान युम्मेच्छा प्रकृति प्रवतित, कमेच्छा प्रेमेषणय बनकर हो जाती मनुजोचित! क्ुधा कामबश गत युग ने पशु बल से कर जन शासित जीवन के उपकरण सदृश सारी; भी कर लो प्रघिकझृत
सुकक््त करो जीवन समिनि को, जनति देवि को झादत,
जग जीवन में मानव के सग हो मानवी प्रतिष्ठित
१०० / पत ग्रधावली
अम स्वय हो घरा, सथुर जारी महिमा क भग्डित, नारी भुख्त की नव क्र्यि से थुग अगोत हमे ज्योत्रित ।
भर को छाया उस्पो ही को प्रांखो से नित देख देख भ्रपना तन, अस्पो हो के भावों के अपने प्रत्ति भर श्रपना मत... लो, प्पनी ही चितवन पे वह ही उठती है त| ज्नित, अपने है) भीतर छिए छिप जग सह गयी तिरोहित । पह तर की छाया बारी । चिर नप्रित चयन, बढ विजडित, वह चक्ति, भीत हिरनी: सी विज परण चाक से शक्रित । मानव +) चिर पह्रम्रिणि, जग युग के मुख अवगुण्ठित, स्थापित घर के कोने में वह गए शिखा - सी कम्पित | हे यापनर यु प्रयु- की) पावित, वरदिनी काम करा को, आदेश नीति परिच्ालित ।।
वे दे तुम्हारे द्वार ? मुसकाती आची ऊपा
ले | हार, जागी सरसी मर सरोजिनी, सोयी पुम इस कार ?
पद तुम्हारे द्वार ? गा म, चर मलयानित्,
नः भो जार, विहग केष्ठ के है मोन उप्पो क्ले सौरभ भार,
बंद तुम्हारे द्वार ? ग्राण । अतीक्षा # श्रकाश्ष
औ! प्रेम बने प्रतिहार !
पमसे मिलने प्यार पुम्हारे द्वार ?
गीत हैंप के बस मार
भाकाश्न क्र पार,
भेद सकेगी नही हृदय
शआ्राणा की कार । न्
बद ठुम्हारे द्वार प्राज नि चुरप्ि
चछावर जुचा जग मे मधु का भण्थर, दबा सकोगी बुम्ही राज उर भर मधु जीकन ज्वार ? बाद पुम्हारे हार ?
इृगवाणोी अं
सुमन के प्र्ति
भाव वाणी या रूप, ?
तुम क्या हो चिर मूक सुमन! क्सिके प्रतिहृषप ?
मौत सुमन
सुदरता से स्क्हनिमिष चितवन छू. कोमल. ममस्थल मूक संत्व के भेद सकल
कह देती, (खुल दल पर दल)-- सहण समभ लेता मन |
विजय रूप की सदा भाव पर, भाव रूप पर निमर!
मैं श्रवाक हूँ तुम्हे देखकर मौन रूपधर !
रूप नहीं है नश्वर | --- सत्ता का वह पृण, प्रकृति स्वर, सुंदर है वह, प्मर!
कवि |
है राजनोतिबिद, प्रथविज्ञ !
रच शत शत्त बाद, विवाद, त्तात्र,
पुरतात्र॒ जिया तुमने मानव,
तुम बना न सके उसे स्वतत्र
हू दशनन, शत तर्कों से,
सच्छास्त्रो से पा गहने ज्ञान,
तुम भी न दे सके मानव को
उसकी मानवता का प्रमाण!
है चित्रकार, ले रस तूलि,
भर रूप रेख, छागाभम श्रग,
चित्रित न कर सके मानव में
तुम मानवता के रूप रग। गायक पा कोमल, भघुर कण्ठ, रच वाद्य ताल, प्रालाप, तान, मानव उर तुम मानव उर में खय कर न सके, गा मम याद! है शिल्पकार बर' कठिन घातठु, जड प्रस्तर में भर प्रमर प्राण दे सके नही मानव जग को छुम मानवता का भ्रश्टतत माल!
१०२ / पत ग्रयावली
गाता नवीन मधु के गाने,
जग में नव जीवन
मुरझभा मानव - उर विकसाने!
है भाजम्र विहंग ! तुम सुनी सजग,-- जग का उपवन मानव जीवन
है. शिश्षिर - तब्रस्त बहु व्याधि त्रस्त
मे जीण, छीण, चिर दीण, पण जो स्रस्त, घ्वस्त, श्री - हत, विवण
क्षय हो समस्त--
युग सूयथ भस्त ! ये राष्द्र बय बल शक्ति भग,
बहु जाति - पाँति कुल वश ख्याति, द्रुत हो विनष्ट सब नरक स्वग |
विश्वास भाष, सघप द्रव, बहु तकवाद, उर क्षे प्रमाद,
गत रूढि रीति मृतत घम नोति ये हैं जगती की ईति भीति !
हो परत
दें य जग के दुरात,
प्रावे वसात,
जीवन दिवत
फिर से हो स्मित कुसुमित प्रनन्त !
हो नग्न भग्त
आानद मग्न, सहार श्रात निर्माण लग्न सब क्षृधा - छुब्घ कामना लुब्ध हो तप्त दष्त जग काय लिप्त! अज्ञान च्ण हो ज्ञान पृण,
१०४ / पत प्रयावलो
मौन रहेगा ज्ञान, स्तब्घ वि
क्राति, पे तके बुद्धि राजनीति होगे
घम, रुथेगी
भ्रनुन्तृति
रक्त - भास की देह बन
सधुर भावना, मंदिर रिक्त प्रूण हो, निश्चल
तैमस नयन की तारा करता
गत प्रभाव बन गये भाव हो लोक - प्र: प्रखिल पभ्रमयत्न ८॑
गँ मर
मूलकर सत्र - मुघ फणियों - से करते
भव सल्कृतति पुम हरित - क्चु, सित् ज्योति किरण छवि वसना, संस्कृति की नव अतिमा
घासक क्ात्ित सस्शत प्राइत,
निधन सम:
मृद्ध, पुमको सम्रान
खिल विज्ञान ।
गयी जीवन - इच्छा निभर,
शूय सव, चल मरण स्पृह् से चचल के: 7 बन चरचि
भालोकिति सम्पोधित ।
बेर विरोध, विनत _ फन, रते जीवन-स्वर भे नतन ।
पुगवायो / १०५
गत धर्म बम, मृत रूढ़ि रीति तम भशना, नव मानवता की महिमा!
सहार मग्न, शुभ सृजन लग्न, बर राष्ट्र बम बल भेद भग्न
भरती समत्व जगती में, तुम दिशि रदनां नव युग पी गोरव गरिमा!
बर देश काल झक््रौ” प्रकृति विजित, विनान भान इतिहास प्रथित,
मानव की विदव विजय स तुम स्मित - दशना पृथ्वी वी स्वग मधुरिमा।
हरीतिमा हँसते भू वे प्रेंग भेंग, हरित हरित रंग! दूर्वा पुलवित मूतल नवोललसित तृण तरु दल इंगित करते चचल जीवन का जीवित रंग हरित हरित रेंग। इयामल, _ कोमल, शीतल लोचन - प्रिय, प्राणोज्वल, तन पोपक, मन सम्बल, सजल सिंधु शोभित रंग हरित हरित रग। हरित वसन, तन छबि सिंत, जग जीवन प्रतिमा नित हरती मानव का चित, भव सस्कृति भावित रंग, हरित हरित रंग!
प्रकृति के प्रति हार गयी तुम प्रद्ोति | रच निस्पम मानव-कृति | निखिल रूप, रेखा, स्वर हुए निछावर मानव के तने, सन पर ! पातु_वण, रस सार, बने अस्थि, त्वच, रक््त-धार, बुसुमित भग उमार |
१०६ / पत ग्रधावली ही,
दुनिवार यह राग, रागका ख्प करो. निर्माण, चेष्टित करो राग से भव, हो जन - जीवन वल्याण !
राग साधना
जीवन तात्री आज सजाप्रो भमर राग तारों से, गूज उठें नम घरा प्रेम की स्वगिक भकारोसे!
राग - साधना करो मधुर उर -उर के भ्रखिल मिला सुर, प्रतिध्चनित हो राग
हृदय से, रोभो के द्वारो से
राग विश्व का जीवन, ससति का है सार सनातन, भ्रभिव्यतत हो राग, भाव, वाणी भो! श्राचारोसे जीवन तश्री झ्राज सजाप्नो भप्रणण राग तारो से |
रूप सत्य
मुझे रूप ही भाता। प्राण ! रूप ही भेरे उरमे मधुर भाव बन जाता। मुझे रूप ही भाता! जीवन का चिर सत्य नहीं दे सत्रा मुझे परितोष, मुझे चान से वस्तु सुहाती, सूक्ष ब्रीज से कोषा सच है जीवन के वसंत मे रहता है पतमकार, वण गाधमय कलि कुसुमो का पर, ऐश्वय प्रपार राशि - राशि सोदय, प्रेम, आनन्द, ग्रुणो का द्वार, मुझे लुभाता रूप रग रखा का यह ससार।
१०८ | पत प्रयावली
पेस्चु सत्य जाये खो शिशिर शयित जग वन बने मे नव, क्षण मे, कार्यों मे, कागी मे
स्व्नो का गुजन हो । के जागरूक । भव जीवन के
नव मुझे स्वप्न दो । मन के स्वप्न
सत्य बनाओ, है मेरे मर
स्वप्नो क) - सत्य बनाप्रो । भाज स्वप्न को सत्य,
पत्य को स्वष्त बना नव सब्टि बचाग्रो । निल्चिल चान को कम, को जाने बना भव मूत्ति सजामो । ाज विदक को व्यक्ति, व्यक्ति को विश्व बना जय-जोीवन साध्रो । सत्य बनापओ्रो, है, मेरे जीवन कप सत्य बनाओ । पाज भविल विज्ञान भान को , गध,
पआ्रात्मा की नि सीम सुक्ति को
भव की सोमा मे बधवाधो
जन की रक्त मास इच्छा को
मधुर झन-फल में उपजाप्रो ! सत्य. बनाओ, हें मानव उर के स्वृप्सो को . सत्य बनापओ्नो ( :
जीवन स्पर्श
क्यों चचल, व्याकुल जन... « फूंद रहा मधुवन में जी सीदर्योल्लास, कलि कुसुमो में राग रणमय शक्ति विकास,-- भाकुल इसीलिए जन जन सन दौड रही रकितिम पलाश में जीवन-ज्वाल, ग्राम्न मौर मे मंदिर गध, तरुभ्रो मे तरुण प्रवाल | घिह॒ग-युग्म हो विहल सुख से प्राप पखो से प्रिय पख मिला करते मद प्रेमालाप | अखिल विघ्न, भय, बाधाएँ कर पार शोत, ताप, भरा के सह बहु वार, कौन दावित सजती जीवन का वास ती शख्यूगार ? सभी उसी के हेतु घिकल मन | उसी दविति का पाने जीवन स्पश रोम रोम में भरने विद्युत हुए, विर चचल, व्यादुल जन
मधु के स्वप्न
रक्त पलाश ! रक्त पलाश !
ससे, मुझे दोगे सिद्दुर के पुष्पो वी ज्वाला का हास है ग्राज उल्लसित धरा, पल््लवित विटपो में बहु बण विकास, पीपल, नौम, प्रशोक, श्राम्र से फूट रहा हरिताभ हुलास, गीत निरत हैं युवव, नृत्य 'रत युवती जन हिमित मुज, संविलास, किर भी स्वप्त नही झाते उड-उड सुब के पस्ो मे पास !
रक्त पलाश ! खत पलाश ।
मुझे चाहिए भव जन जन के जीवाग मे ही भव मघुमास ! जन जीवन से शभ्ाज चाहता हूँ पाना जीवन उत्लांस, ठुम मुमरो दोगे जीवन बी ज्वाला का जाज्वल्य प्रताश ? प्रिय बचनार [ प्रिय क्चनार
मुझे बिना पत्नों पो पृष्पा वी डाली दोगे उपहार ? सुदर मधुऋतु सुदर है गुणित दिगत वा हरित प्रसार,
११० | पत्त प्रंचादसी
प्राकालाएं श्रखिल भ्रवनि की हुईं पूण उमुकत, यह रक्तोज्वल तेज घरा के जीवन वे उपयुक्त | उद्भिज के जीवन-विकास में हुप्ना नवीन प्रभात, तरुझो का हरिताधकार हो उठा ज्योति प्रवदात
नव जीवन का रुघिर शिराष्नों मे कर वहन, पलाश !
तृण-तर जग से मानव जग में तुमने भरा प्रकाश!
यह शोभा, यह शवित, दीप्ति यह यौवन की उद्दाम
भरती मन में झ्ोज, दुगो को लगती प्रिय, ध्भिराम *
जीवन की श्ावाक्षाप्रो का यह सौदय प्रमद /
मानव भी उपभोग कर सके मुक्त, स्वस्थ भावन्द त है ||
फलिफोनिया पॉपी दिल, कमा प्रकाश से प्रेम तुम्हे, छू स्वर्ण-रजत ,किरणें प्रभात प्रीले सुफेद सो फूलो में तुम खिलखिल पड़ती पुलक गात । जड वात मूल । उडती होतीं तुम नितली सी सुख से उमुलष पृथ्वी के हो ये डाल - पात पर पाधिव नहीं तुम्हारा सुख | ब घन मे भी हो सहज मुक्त तुम, इसीलिए उडकर क्षण मे, निज सुस की ही भतिशयता में हो समा ययी मेरे 'सत में |
बदली फा प्रभात
निशि वे! त्तम भे भर भर
हलकी जल की
घरती को कर गयी सजल
अंधियाली में छनकर
निमल जल वी फुही रू
तृण तर को कर उज्ज्वल
बीती रात,---
घूुमिल सजल प्रभात यूबष्टि झूय, नव स्नात ! प्रलस उनीदा सां जग, कोमलाभ, _ दग सुमग ! कहाँ मनुज को भवसर देखे मधुर प्रकृति भुख ? भव अभाव से जजर प्रकृत्ति उसे देगी सुख रे
दो सिन्र
उस निजन टीले पर दोनो चिलबिल
११२ | पत प्रधावली
९ रे गे विस, किे-्म मर, |; मोन, मयोहर । ह होगे वाइर गह सयतिप हीप, दी बट, पे, मुदृद़गर । प्रयभर मे सर गये भर 7टा, पक््स गे पतनी, ह रेह- प्रगनित (राजात फ्प्ी प्रविरत, गर्षो ९) रेत एक प्रवि मर पर $#₹ छापा व्रत रे गगन क्र पिप्रित - + )े ग पाँव को हा जे पुयरर । फेम मे मोम धर सर अर मरू कफ ह्वर भर, पन नोम इक सम्ब, पतन, पतन, "स्पफ के रोम हप मे द्द्नि ह्द्कि उ्ग्म प्रतिषत । वश प्मर मे मू पर नक-चक मिश्चित ध्वनि ++ पट पा, सा, निमनर, है --जम्प्र, भर ुम भूम, का मुकरुर नीम नी चर जिन > शहर पर धर थर सर मर पघर॒यर । िमयुत ० विनय लय डूर्ति गर्म प्रानक, पा कक के प्रवि+> हणट-ककर-क बह ० । मिल ल्ल्द्रि हक ०
डुतकार्जी / शहर
ऋोस के च्र्ति
तुम्हे जो (दया बनी उज्ज्वल, कीमल, चजचल, (नमल, र्दोप चदुल भनिल मे तुम्हें तोल समान कर गोल गोल, झशिन्छवि से भरें बषु को सं दे काया भू के वलकी पर। हे स्वप्न-सुघर तुम पर सहत इवि योछावर है व तुम्हारा जलोल लास। जीवन के चल-पल का हुलासः नज सु सत्ता बा कर तुम || ओोड्स छर-परितोष । झो स्पों शीत १ छवि गीत औझोस ॥
शिलीभूत सौ दय, ज्ञान, प्रान-द भनश्वर दाब्द धाब्द मं तरे उज्ज्वल जडित हिम शिखर! धुल वल्पना वो उडान भर भास्वर वलरव, हस, प्रश् वाणी बे, तरी प्रतिभा नित नव !
जीवन वे कदम रा प्मलिन मानस सरशिज शोभित्त तेरा, वरद दारदा था प्रासन निज ! प्रमृत पुश्र॒ पवि, यश वाय तथ जरामरणजित्, स्वयं भारती से तरी द्वत्तात्री भगत!
शआ्राचायं द्विवेदी के प्रति (१)
भारते दु ने जिसको प्रक्षय प्रमर नीव पर प्रथम शिल्ला या गौरव स्थापित क्रिया परवतर, कुशल शिल्पिगण विविध बीति-स्तम्मो से सुदर महिमा सुपमा जिसे दे गय, स्तुत्य यत्न बार,
भारत वी थवाणी का वह भव्योच्च सौधवर आअतनयनोी में क्या, हे भाचाय, पूणतर उदभाप्तित हो उठा प्रापवे दिव्य रूप घर ? ज्योति विचुम्वित, स्वीय कीति का स्वण कलश वर जो पहले ही प्राप रख गये प्रग्न शिखर पर ! देव, भापके मनस्वप्त को ले पलकों पर भावी चिर साकार कर सके रूप रग भर, दिल्शि दिल्लि की भ्रनुभूति, भान, वहु भाव निरतर, उसे उठावें युग-युग के सुख दुख प्रनश्वर, --पश्राप यही भाज्षीर्वाद दें, देव यही वर!
(२)
भारत॑दु क्र गये भारती की वीणा निर्माण, किया भ्रमर स्पशों ने जिसका बहूविधि घ्वर साधान, निईच॒य, उसमे जगा झापने प्रथम स्वण कार अखिल देश की वाणी को टे दिया एक झाकार | पंखहीन थी क्षुब्ध॒ कल्पना, मूक कण्ठगत गान दाद शूय थे भाव, रुद्ध प्राणोंसे वचित प्राण! सुख दुख वी प्रिय कथा स्वप्त बादी थे हृदयोदगार | एक देश था सही, एक था क्या वाणी व्यापार ? वाग्मि ! झ्रापने मुक दश को कर फिर से वाचाल, रूप रम से पूण कर दिया जीण राष्ट्र ककाल
११६ / पत ग्रयावलो
झत बण्ठो से फूट आपके शनमुख गौरव गान शत शत युग स्तम्भो पर तानें स्वणिम बीति वितान । चिर स्मारक सा उठ युगयुग मे भारत का साहित्य श्राय, प्लापके मश् वाय को घरे सुरक्षित नित्य!
कुसुम के प्रति भर गये हाय, तुम कात कुसुम ! सब रूप - रगम दल गये बिखर, रह से न चारु चिरतन तुम, जीवन की मधु स्मिति गयी विसर ! चुपके से झर, तुमने फ्ल को निज सौंप दिया जीवन, यौवन, क्षण - भर जो पलका पर भलबा वह मधु का स्वप्न न रहा स्मरण | खिर पूण नहीं बुछ जीवन में अस्थिर है रूपजगत का मद, बस प्रात्म त्याग, जीवन - विनिमय इस साघि-जगत में है सुश्षप्रद !
करुणा है प्रायवत जग की, अवलम्बित जिस पर _ जग जीवन, भर देती चिर स्वर्गिक करुणा जीवन का खोया. सूनापन करुणा रजित जीवन का सुख, जग की सुदरता पश्रु स्तात, करुणा ही से साथक होते चिर जम मरण, सधघ्या प्रभात |
क्रान्ति
तुम प्रघकार, जीवन को ज्योतित करती,
तुम बिप हो, उर म_मधुर सुध। सी भरती !
तुम मरण, विश्व में मधुर चेतना भरती,
तुम निखिल भमकर, भीति जगत वी हरती ! तुम शूुय, अतुल ऐब्वय सदा बरसाती, झ्रपरूप, ,_ चतुदिक सुदरता। सरसाती ! निष्ठुर निमम क्षुद्रा को भी अपनाती तुम दावा वन को हरित भरित कर जाती !
तुम चिर विनाश, नव सजन गोद में लाती,
चिर प्राह्त, नव सस्कृति के ज्वार उठाती !
तुम रुद्र, प्रलय-्ताण्डव में ही सुख पाती
जीवन वसत तुम, पतभड बन नित श्राती ।
प्रुगवाणी | ११७
घूम धूम छा निभर भश्रम्बर, भूल भूल भेका भोको पर, हे दुदम॑ उददाम हरो ' भव ताप, दाप, अ्रभिमत कर सिचन ।
इद्रचाप से कर दिशि चित्रित, बहभार से केकी पुलक्ति, हरित भरित हे करो धरणि को हो करुणाद्र, घोर वजच्च स्वन
निशचय
सधर्षों में शाति बनू मैं! झ्रधकार मे पड जीवन के, प्रधकार की काति बनू मैं!
जग जीवन के ज्वारों म॑ बह, कोमल प्रखर प्रहारों को सह, भव के क्रदन क्लिकारो मे हँसमुख नीरव करा ति बनू मैं
घुणा उपेक्षा में रह अविचल,
निदा लाछन से बन उज्ज्वल,
ब्रुटियों से ज्योतित कर निज पथ
जन-सेवा की श्रातति बनू मैं! भेल निराशा, कटु निष्फलता देय, स्वभाव जनित दुबलता, ,._ भागे बढ, घीर एकाकी, भाग्य चक्र वो आतित बनू मैं ।
खोज
भाज मनुज को खोज निवालो |
जाति वण सस्दृति समाज से
मूल व्यक्ति को फिर से चालो | देश राष्ट्र के विविध भेद हर, धम नीतियों म॑ समत्व भर, रूढि रीति गत विदववासो की श्रध यवनिका प्राज उठालो।-
भाषा भूपा के जो भीनर,
श्रेणि वग से मानव ऊपर,
झ्रखिल श्रवनि में रिक्त मनुज वो
केवल मनुज जान पपना ला |
यूगवायों / ११६
राजा प्रजा, धनी भौ! निर्धन सम्य प्रसस्वृत, सज्जन दुजन भव मानवता से सबको भर, खण्ड मनुज वो फिर स ढालो !
श्रावाहन
रूप घरों, नव रूप घरो।
जीवन वे घन प्रधवार,
नव ज्योतित हो भव रूप घरो है कुर्प, हे वुत्सित, प्राइत, ह सुदर, हे मस्वृत, सस्मित, भाग्नो जय जीवन परिणय में परिचित से मिल वाँह भरो।!
घोमल कटु, कट कोमल बनपर,
उज्ज्वल मद, मदद उज्ज्वलतर,
दिवा निशा के ज्योति तमस मिल
सौक प्रात प्भिसार करो! पतभर में मधु, मघु में पतकर, सुख से दुख, दुख भे सुख बनकर, जम मृत्यु में, जाम भत्युहर | भव की जीवन भीति हरो।! रूप धरो, नव रूप धरो।!
लेन-देव
क्यतो झाधकार तन मन वा | नव प्रकाश के रजत स्वण से बुनो तरुण पट नव जीवन का !
युगनयुग के बहू भेदों को धुन
बबरता, पाशवता को चुन,,
नव मानवता से ढेंक दोह
कुत्सित नग्न रूप जन जन का | दिशिपल के ताने बाने भर घूपछाँह रच ससस््क्ृति सुदर बीनो स्नह सुरुचि सयम से दील चसन नव भव यौवन का |
सजा पुरातन को, कर नूतन
/ देश देश का रेंग ग्पनापन,
निखिल विश्व की हाट घाट में
लेन-देन हो मानवपन का!
१२० / पत प्रधावलो
चस्तु सत्य
श्राज भाव से बनो वस्तु-भव | चेतनता से रूप गाध रस - शब्द स्पश बन उपजो पअ्रभिनव ! बनो प्रेम से प्रेमी प्रिय जन, सुदरता से सुदर तन मन, अभ्राज अतुल झान द राशि से बनो विपुल जग जीवन उत्सव !
कारण से शुभ कम बन सकल,
सूक्ष्म बीज से पत्र, पुष्प, फल,
नित्य मुक्ति मे भव बंधन बन,
बनो शक्ति स खाद्य मधु विभव | सीमा में हे बनो भ्रसीमित, ज-म मरण मे ही चिर जीवित, पल पल के परिवतन म॑ तुम बनो सनातनता का अनुभव !
भव सानव
ग्राज बनो फिर तुम नव मानव ! चुन-चुन सार प्रकृति से अतुलित जीवन रूप घरो हू प्लभिनव !
नभ से शा त, का ति रवि से हर, भूतोीं में चेतनता दो भर, निस्तलता जलनिधि से लेकर भू से विभव मरुत स लो जब ! सुमनो स स्मिति, विहगो से स्वर शशि से छबि, मधु से यौवन वर, सुदरता, श्रात दे, प्रेम का-- भू पर विचर,--क्रो नव उत्सव |
आज त्याग तप, संयम साधन
साथक हो, पूजन आरराधन,
नीरस दशन दशनीय---
डा मानव वषु पाकर मुग्ध करे भव |
निखिल ज्ञान विज्ञान समीक्षा --
करता भव इतिहास प्रतीक्षा,
मूतिमान नव सस्दृति बन,
8 आाो, भव मानव, युय-सुग सम्भव |
युगवाणोी / १२१
प्रकृति-शिशु
बढे प्रकृति शिशु भव मानव में ।
भय का दे पाथेय प्रकृति ने
भेजा मनुज प्रपरिचित भव में | बेंधा मोह बंघन भें श्रपने, उर में इच्छाग्रो के सपने जीवन का ऐश्वय खोजता वह चिर जीण जगत के शव में |
जीवन इच्छा को कर मस्कत,
प्राकृतत भग के तम को ज्योतित,
विकसित हो, मातव मानव को
बह अपना-सा पा प्रनुभव में निज पर में समता कर निर्मित मानवता का सार सवलित, बहू भव जीवन का खष्टा हो, द्रष्टा हो, रति हो चिर नव मे ! बढ़े प्रकृति शिशु भव मानव में |
आपेश
ज्यों मघुवन में गूजते भअ्रमर, नव भ्राज़् कुज में पिकी मुश्र, भेरी उर तत्री से रह रह भीतो के भधुर फूटते स्वर | ज्यों भरते हरसिगार भर भर, ज्या हिम फुहार #ण फहर फहूर, मेरे मानस से» सुदरता नि सतत होती त्यो निखर-निखर गिरि उर से ज्यों बहत निभार, रवि शशि मे तिग्म मधुरतर कर, मेरे मन की झावेश शातकति गीतों मे पडत्ती बिखर बिखर !
आत्म समपंण
रक्त मास वी झचिर देह में तुमने भ्रपनापन भर बता दिंपा इसको खिर पावन नाम रूप ज्यातित बर | बहू जन शूय, भ्रपरिचित जग मे प्रतिक्षण दे निज परिचय रहने योग्य कर दिया इसको स्नेह गेह् शोभामय दात प्तृष्त प्राशाआ्लाक्षाएं तुम पर॒ हो योछावर पूण हो गयी श्राज, जाम वी युय-मुग वो साधें बर !
१२२ | पंत प्रंधावली
तक प्रो! जम. अरनोत्तर ? हैण ते मय प्रिय पुममे होकर ऐम ईइचर सीमाप्रो ही तुम मर, वे घन नियमा मे मुक्त सतत, बहु रुप में नित एक ख्प सषषों + है घान्ति भहत | 4लुपित दि चिर पवित्न कुत्सिति कुस्प भे पुम झुदर, खष्ड्ति पृण सदा मधुर मे तुम नित्य पर । तुम पति शुद्र मे चर , परित्यक्षतो गीवत महचर, तुम वि मैयो के शत जीवन मृत के जीवन दर । बाधा विध्णो मे हो बल, जीवन के परम मे चर भास्वर प्रसफ्लतामो # पट सिद्धि तुम जीको ही मे हो ईदकर । पारी जाणी, काणी, पैन की वाणी दो मुझको भास्वर । मोन गगन को भेद बोलत जिस वाणी > उड़चर, जिसमे नीरव प्रिरि से निसृत होते रत निभर जिस फाणी प्र गरजते, लहरा उठते सागर, जिसमे गत द्ामिनी देमक्ती, भोर नाचते चुदर । वाणी, वाणी, मुझे बे >वार्ण मिस.
जिस वाणी में क्षुधा, तृपा धो काम दीप्त करते तन, जिसमे इच्छा, सुख दुख उठते, झाते शैशब, यौवन |
चाणी, वाणी,
मुझे सबष्टि की वाणी दो अविनव्वर जो बहु वण, गाध, छरूपो में करती सृजन निरतर, जिस वाणी में झनुभव करते चुए_:फे. निखिल चराचर ।
जा वाणी चिर जम मरण त्म श्री प्रकाश से है पर, जो वाणी जीवन की जीवन, शाइवत, सुदर, प्रक्षर ! वाणी, वाणी,
मुझको दो घट-घट की वाणी के स्वर ।
युग नृत्य नृत्य करो, नत्य करो! शिशिर समीर मत्त गधीर, प्रलयकर नृत्य. करो, मृत्यु से न व्यय डरो॥! जीण शीण विश्व पण हू बिदीर्भ, द्वे विवण, काल भीत, रत पीत, मेमर भर सजन गीत, भमभयकर नत्य बरो, निधिल विश्व बाघ हरो ! अनिल भनल नभ जल स्थल, भ्रचल चपल, दिशि ग्लौ पल, ज्याति भ्राघ, सूय चढद्र, त्तार मद्र, गीति छद निगम भान, स्मृति पुराण, प्रलयवर नृत्य करो निश्चिल विश्व बाघ हरो।! रूढि रीति, याय नीति, बर प्रीति, ईति भीति, शुघा तपा, रात्य मुपा, सऊजा, भय, रोप, विनय,
१२४ / पत प्रंचावसती
राग द्वेष, हंप॑ क्लेश, प्रलयवर॒ नृत्य. करो, जीवन जड सिधु तरो। देश राष्ट्र, लौह काप्ड, श्रेणि वंग, नरक स्वग, जाति पाँति, वश ख्याति, घनी निधन, भूषति जन, प्रात्मा मन, वाणी तन, पभ्रभयवर नृत्य. करो, नव युग को भखिल बरो | नृत्य करो, नृत्य करो, शिशिर समीर, क्षुब्ध॒ प्रधीर, ताण्डव ग्रति नृत्य करो, भूतलत इृतदृत्य करो !
युववाणी / १२५
ग्रास्या
[प्रथम प्रवाशन-वप १६४०)
प्रिय नरेन्द्र को
निवेदन
ग्राम्या' मे मेरी युगवाणी' के बाद की रचनाए सग्रहीत हैं । इनमे पाठको को ग्रामीणों के प्रति केवल बौद्धिक सहानुभूति ही मिल सकती है। ग्राम्य जीवन मे मिलकर, उसके भीतर से, ये ग्रवश्य नही लिखी गयी हैं । ग्रामो की बतमान दशा मे वैसा करना केवल प्रतिक्रियात्मक साहित्य को जम देना होता। “युग, 'सस्कृति” प्रादि शब्द इन रचनाप्नो मे वेतमान भौर भविष्य दोनो के लिए प्रयुक्त हुए हैं, जिसे समझने मे पाठकों को कठिनाई नही होगी, “प्राम्या' की पहली कविता 'स्वप्न पट” से यह बात स्पष्ट हो जाती है। 'बापू' भौर 'महात्माजी के प्रति, 'चरखा गीत' भौर 'सूत्रघर' जैसी बुछ कविताप्रो मे बाहरी दष्टि से एक विचार वषम्य जान पड़ता है, पर यदि हम “प्राज' भ्रौर 'कल' दोनो को देखेंगे तो वह विरोध नही रहेगा। भत में मेरा निवेदन है कि 'ग्राम्या' मे ग्राम्य दोषों का होना भत्यन्त स्वाभाविक है, सहृदय पाठक उनसे विचलित न हो । नक्षत्र कालाकॉकर [प्रवध) सुमित्रातदत पतत १ भाच, १६४० ई०
स्वप्न पट
ग्राम नही वे ग्राम झ्राज श्रौ" नगर न नगर जना5कर, मानव कर से निखिल प्रकृति जग सस्कत, साथक, सुदर । देश राष्ट्र वे नहीं, जीण जग पत्र त्रास समापन, नील गगन है हरित घरा नवयुग नव मानव जीवन | झ्राज मिट गये देय दुख, सब क्षुघा तृपा के क्रदन भावी स्वप्नों के पट पर युग जीवन करता नतन । डूब गये सब तक वाद, सब देशो राष्ट्रो के रण, डूब गया रव घोर क्राति का शात विश्व सघपण | जाति वण की, श्रेणि बग की तोड भित्तियाँ दुधर थुग युग के बदीगृहू से मानवत्ता निकली बाहर! नाच रहे रवि शशि, दिगात मभे,--नाच रहे ग्रह उडुगण, नाच रहा भूगोल, नावते नर नारी हपित मन ! फुल्ल रक्त शतदल पर शोभित युग लक्ष्मी लोकोज्ज्वल ग्रयुत करों से लुटा रही जन हित, जन बल, जन मगल ! ग्राम नही वे, नगर नहीं वे,--भुक्त दिशा भश्रौ' क्षण से जीवन की क्षुद्रता निखिल मिट गयी मनुज जीवनसे (दिसम्बर ३६)
ग्राम कवि
यहा न पललव वन में ममर,यहा न मघु विहगो मे गुजन, जीवन का सग्रीत बन रहा यहां प्रतध्त हृदय का रोदन ! यहाँ नही शब्दों में बंधती प्रादर्शों की प्रतिमा जीवित, यहा व्यय है चित्र गीत म॑ सुदरता को करना सचित ! यहा धरा का मुख बुरूप है, कुत्सित गहित जन का जीवन, सु-दरता का मूल्य वहाँ क्या जहा उदर है क्षुर्घ, नग्न तन -- जहा देय जजर भ्रसख्य जन पशु-जघय क्षण करते यापन, कीडो से रेंगते मनुज शिक्षु, जहाँ झकाल वृद्ध है यौवन ! सुलभ यहाँ रे कवि को जग में युग का मही सत्य शिव सुदर, कप-कप उठते उसके उर की व्यथा विमूछित वीणा के स्वर ! (दिसम्बर ३६)
ग्राम
बहुद ग्र-थ मानव जीवन का, बाल ध्वस से क्व॒लित, ग्राम झ्राज है पष्ठ जनो की करण कथा का जीवित |
प्राम्पा /
युग युग का इतिहास सम्यताप्रों का इसमे सचित,
सस्कुृतियों वी हास वृद्धि जन झोपण से रेखाक्ति | हिस्त विजेताग्रो, भूपषो के भात्रमणो वी निदय, जीण हस्ततिपि यह नुशस गृह सघर्पों की निश्चय । घर्मों का उत्पात, जातियो, वर्गों वा उत्पीडन, इसमे चिर सकलित रूढि, विश्वास, विचार सनातन | घर घर के बिसखरे पनो में नग्न, क्षुधात कहानी, जन मन वे दयनीय भाव कर सकता प्रवट न वाणी [| मानव दुगतिकी गाया से भोतप्रोत मर्मातक सदियो के प्त्याचारों वी सूची यह रोमाचक
मनुष्यत्व वे! मूल तत्त्व ग्रामो ही में प्रतहित,
उपादान भावी सस््कति के भरे यहाँ हैं भ्रविद्वत
छिक्षा के सत्याभासों से ग्राम नहीं हैं पीडित,
जीवन के सह्कार भविद्या-तम मे जन बे रक्षित
(जनवरी /४०)
ग्राम दृष्टि
देख रहा हू प्राज विश्व को मैं ग्रामीण नयन से सोच रहा हूँ जटिल जगत पर, जीवन पर जन मन से। भान नही है, तक नही है, कला न भाव विवेचन, जन हैं, जग है, क्षुधा, काम, इच्छाएँ, जीवन साधन । रूप जगत है, रूप दृष्टि है, रूप बोघमय है मन, माता पिता, बघु, बाधव, परिजन पुरजन, भू गो धना रूढि रीतियो वे' प्रचलित पथ, जाति पाँति के बघन, नियत कम हैं, नियत व मफल,--जीवन चक्र सनातन | जाम मरण के, सुख दुख के ताने बानो वा जीवन, निदुर नियति के घृपछाँह जग का रहस्य है गोपन ! देख रहा हूँ निखिल विश्व को मैं ग्रामीण नयन से, सीच रहा हूं जग पर मानव जीवन पर जन-मन से | रूढि नही है रीति नही है, जातिवण केबल परम, जन जन म है जीव जीव जीवन में सब जन हैं सम | ज्ञान वथा है, तक वथा, सस्कतियाँ व्यथ पुरातन, प्रथम जीव हैं मानव मे, पीछे है सामाजिक जन | भनुष्यत्व के मान वथा, विज्ञान वया रे दशन, चथा घम,गणतत्र,-उह्े यदि प्रिय न जीव जन जीवन! (दिसम्बर ३६)
ग्राम चित्र
यहाँ नही है चहल-पहल वैभव विस्मित जीवन की यहाँ डोलती वायु म्लान सोरभ ममर ले वन की |
१३२ | पत ग्रयावलर
झाता मौन प्रभात अकेला, स ध्या भरी उदासी, यहाँ घूमती दोपहरी में स्वप्नो की छायासी ! यहाँ नही विद्युत दीपो का दिवस निशा मे निभित, भ्रेंधियाली मे रहती गहरी झेंघियाली भय कल्पित | यहाँ खब नर (वानर ? ) रहते युग युग से भ्रभिद्यापित, झन्न वस्त्र पीडित अ्रसम्य, निबुद्धि, एक में पालित ! यह तो मानव लोक नही रे, यह है नरक प्रपरिचित, यह भारत का ग्राम,--सम्यता, सस्कति से निवासित! भाडफूस के विवर --यही क्या जीवनशिल्पी के घर? कीडो-से रेंगते कौन ये ? बुद्धि-प्राण नारी नर ? अकथनीय क्षद्रता विवद्यता भरी यहा के जग मे गह गृह भे है कलह, खेत मे कलह, कलह है मग में ? यह रवि शशि का लांक,-जहं हँसते समू हूं मे उडुगण, जहा चहकते विहग, बदलते क्षण क्षण विद्युत प्रभ घन! यहाँ वनस्पति रहते, रहती खेतो की हरियाली, यहाँ फूल हैं, यहाँ भोस, कोक्लिा, भाम की डाली ! ये रहते है यहाँ,--आऔर नीला नभ, बोयी घरती सूरज का चौडा प्रकाश, ज्योत्स्ता चुपचाप विचरती। प्रकृतिधाम यह तृण तृण,कण कण जहा प्रफुल्लित जीवित, यहाँ भ्रकेला मानव ही रे चिर विषण्ण जीवन मत ||
(दिसम्बर ३६)
प्राम युवती
उमद यौवन से उभर घटा -सी नव श्रसाढ की सुदर भ्रति श्याम वरण, इलथ, मद चरण, इठलाती आती ग्राम युवति बह गजगति सप डगर पर ! सरबाती पट, खिसकाती लट,-- शरमाती_ भट नव नमित द॑ंष्टि से देख उरोजो के युग घट ! हँसती खलखल अबला चचल ज्यो फूट पडा हो स्रोत सरल भर फेनोज्ज्वल दशनी से श्रघरो के तट !
वह मग में रुक मानो कुछ भुक,
“ # ग्रास्या | १३३
ग्रॉँचल सेमालती, फेर नयन मुख, पा प्रिय पद वी झाहट। भरा ग्राम युवव, प्रेमी याचवा जब उसे ताबता है इब्टक, उल्नपित, चकित, वह लेती मूद पलब पट
पनघट पर मोहित नारी नर (-- जब जल से भर भारी गागर सीचती उबहनी वह, बरबस चौली से उभर - उभर कसमस
िचते सग युग रस भरे बलश , -- जल छलक़ाती, रस बरसाती,
बल खाती वह घर को जाती, सिर पर घट उर पर घर घटा
कानों में गरुडहल खोस,--धवल या कुँई कनेर, लोध पाठल, वह हरसिंगार से क्च सेंवार, मदु_ मौलसिरी के गूथ हार, मउओ संग करती वन विहार, पिक चातक के सेंग दे पुकार,-- वह कुद, कॉँस से, झमलतास से, प्ाम्न मौर, सहजन, पलाश से, निजन में सज ऋतु पिंगार ! तन पर यौवन सुप्रमाशाली मुख पर श्रमक्ण, रवि की लाली, सिर पर घर स्वण शस्य डाली, वह मेडी पर भाती जाती, उरू मठकाती, क्टि लचकाती चिर वर्षातप हिम की पाली! घमि श्याम वरण, भति क्षिप्र चरण, अघरो स घर पकी बाली!
१३४ | पत ग्रधावलो
वह स्नेह, शील, सेवा, ममता वी मधुर मूर्ति, यद्यपि चिर देय, अविद्या वे! तम से परीडित, बर रही मानवी वे प्रभाव वी श्राज पूर्ति, प्रग्मजा चागरी की,--यह ग्राम वधू निश्चित ! (दिसम्बर (३६)
कठपुततले ये जीबित हैं या जीवमृत / या कसी काल विप से मूछित ? ये मनुजाइति ग्रामिक भ्यणित ! स्थावर, विपण्ण, जडदत स्तम्मित ! किस महारात्रि त्तम में निद्वित ये प्रेत ?--स्वप्नवत संचालित किस मोह मात्र से रे कवीलित ये देव दग्ध, जग वे पीढित !! वाम्हन, ठाकुर, लाला, कहार, वुर्मी, भ्रहीर, बारी, बुम्हार, नाइ, कोरी, पासी, चसार, शोषित क्सिन या क्षमींदार,-- ये हैं खाते पीते, रहते, चलते फिरते, रोते हँसते, लड़ते मिलते, सोते जगते, झानाद, नृत्य, उत्सव करते,-- पर जैसे कठपुतले निर्मित, छल प्रतिमाएँ भूषित सज्जित | युग युग की प्रेतात्मा भ्रविदित, इनकी गतिविधि बरती यावत्रित में छाया तन, ये माया जन, विश्वास मूढ नर नारी गण, चिर रूढि रीतियो बे ग्रोपन सूत्रों मे बंध करते नतन। पा गत ससस्कारों के इंगित ये क़ियाचार बरते निश्चित, कल्पित स्वर में मुखरित, स्पदत क्षण भर को ज्यों लगते जीवित ! ये मनुज नहीं हैं रे जागत जिनका उर भावों से दोलित, जिसमे मह॒दाकाक्षाएँ मित होती समुद्र -सी प्रालोडित ! जो बुद्धिप्राण, करते चितत्न, तत्त्वावेपण, ' सत्यालोचन जो जीवन शिल्पी चिर झोभन सचारित वरते भव जीवन ये दास सूतिया है चित्रित, जो घार श्रविद्या मे भोहिंत, मे मानव नहीं, जीव श्ापित, चेतना विहीन, पात्म विस्मृत | (दिसम्बर ३६)
वे आँखें थे अधकार की ग्रह सरीखी
उन भ्रांखों से डरता हैं मन, भरा दूर तक उनमे दारुण
देय दुख का नीरव। रोदन भ्रह, भयाह नेराश्य, विवशता का '
उनमे भीषण « _ सूनापन, मानव के पाशव पीडन का '
देती वे सलिमम बिज्ञापन |। फूट रहा उनसे गहरा पब्ातक, ।
क्षोम, शोषण, सशय, भ्रम,
१३६ / पत् प्रधावसती
डरैंब कालिमा मे
कपता मन, उनमे मरघट कप तम ग्रत्षज्ञेती दशः ये वह
इैज्रेय दया की भूखी चितवन, भूंच रहा उस छाया-पट मे
युग-युग का जजर जन जीवन । वह स्वाधीन क्सिान र|्
, अभिमान भरा आजो मे इसका, छोड. उसे मभधघार आज
सतार क्यार सदर वह खिसका । चहराते के खेत मे
व हेंसती थी उसके जीवन कप
गया जवानी ही म मारा । द्वार,
द्व हाजन ने न ब्याज की कौडी छोड़ी, रह - रह प्रांचो मे चुभती कुक हुईं गी की जोडी । उजरी उसके सिवा क्सि कृः से दुंडाने श्रामे देती ? प्रह, ग्राँतो में ज्ाचा
गयी जो चुख की खेती । बिना दवा
स्वरय चली, भरें प्राती भर, देख - रेस के बिना
बिटिया दो दिन बाद गयी. मर । घर में रही पत्तोह, लछमी थी > पति घातिन, पड म्रगाया कोतवाल गत मे, बुऐं मे भसे एक दिन । खेर, पर की जती, जोरू
है। एक, दुसरी पाती, पर जवान लडके की सुध कर छाती पिछले सुख की स्मत्ति खो में » भेण भर एक है. लाती, परत क्रय में गड वह चितवन तीखी नोक पदूंध बन जाती ।
* प्राम्या / १३७
वह स्मेह, शील, सेवा, ममता वी मधुर मूति, मधपि चिर दैय, प्रविद्या के तम॑ से पीडित, बर रही मानवी ये प्रभाव वी प्ाज पूर्ति, अग्रजा नायरी बी,--यह ग्राम वधू निश्चित ! (दिसम्बर '३६)
कठपुत्तलि ये जीवित हैं या जीवमुत ! या विसी बाल विय से मूछित ? ये मनुजाकृति ग्रामिव प्रगणित ! स्थावर, विषण्ण, जडवत् स्तम्मित किस भमहारात्रि तम में निद्वित ये प्रेत ?--स्वप्नवतत सचालित किस मोह मत्र संरे वीलित ये देव दग्घ, जग मे पीढित !। बाम्हन, ठाबुर, लाला, वहार वुर्मी, भ्रहीर, बारी, दुम्हार, नाई, कोरी, पासी, चमार, धछोषित किसान या ' जर्मीदार/- ये हैं खाते पीते, रहते, चलते फिरते, रोत हँसते, लडत॑ मिलते, सोते जगते, भ्रानाद, नत्य, उत्सव वरत,-- पर जैसे कठपुतले निमित, छल प्रतिमाएँ भूषित सब्जित ! युग युग की प्रेतात्मा भ्रविदित, इनवी गतिविधि बरती यात्रित ये छाया तन, ये साया जन, विश्वास मूढ नर मारो गण, लिर रूढ़ि रीतियो वे गोपन सूत्रों मे बंध करते नतन।! पा गत सस्वारों के इंगित ये क्ियाचार मरते निश्चित, कल्पित स्वर में भुखरित, स्पीदत क्षण-भर को ज्यो लगते जीवित ये मनुज नहीं हैं रे जागत जिनवा उर भावो से दोलित, जिसमे महदावाक्षाएँ नित होती समुद्र -सी प्रालोडित ! जो बुद्धिप्राण, करते चितन, तत््वावेषण, सत्यालोचन, जो जीवन शिल्पी चिर झोमत सचारित करते भव जीवंत ये दारु मृतिया है चित्रित, जो धोर श्रविद्या मे मोहित, ये मानव नहीं, जीव शापित, चेत्तता विहोन, भप्रात्म विस्मत ।! (दिसम्बर ३६)
दे आँखें
अझअधंकार वी गुहा सरीखसी
उन पझ्राँंखों से डरता है मन, भरा दर तक उनमे दारुण
देय दुख का नीरव रोदन अह, भधाह नेराश्य, विवशता का. '
उनमें भोषण | सूनापन, मानव के पाशव पीडन का )
देती वे निम् विज्ञापन | फूट रहा उनसे गहंरा झ्लातक,
क्षोम, 'ोपण, सशय, अम,
१३६ | पत प्रथावली
डूब कालिमा मे उनकी
कृपता मन, उनमे मरघट कप तम् ग्रतत॒ ज्िती दा
दुनय दया को भूखी चितवन, भूल रहा उत्त छाया पर मप्र
उप्चुग का जजर जन जीवन ! वह स्वाधीन वि हा,
प्रभिमान भरा प्रांसो भ इसका, छाड उस श्रा
सेच्ार क्यार संदेश वह खिसका । भहराते के खेत दगो सम
हैमा बेदसल वहु भव जिनसे, हेंपती थी जीवन
हरियात्ी जिनके प्ने - तृन से । भ्रांसो ही मरे घूमा करता
पेहँ उसकी आबो का तारा, कारबुनो ही से जो गया जानी ही मरे मारा !
र,
हैाजिन ते ने ब्याज को कोौडी छोडी, रह - रह प्रा मे चुभत्ती बह
हुई उजरी उसके सिवा हे आस दुड़ाने प्राम देती ? प्रह, श्रांवो मरे ब्रती टॉंड गयी जो सुस्त को खेती । बिना दवा दः
चली,-. प्रा आती भर,
बिका दिया
गे की जोड़ी । कब
देख - रेस के बिटिया दो टिन बाद गयी मर । धर मे विधवा रही पनोह, गी थी, यद्यपि पति घातिन, गत ने, डूब बुएं में भय एक दिन ! जेर, पर कक! जोरू सही एक इससी आती पर जवान लड़के सुध
प लोट' फ़टती छात्ती । पिछले पल की स्मति आँख
लणथ - भर एक उम्रक है. बातो, ऐरत भू मे है चितवन तीखी नोक सदश बन जाती।
प्रमम्या / १३७
चोली मे कदुक रहे उपर,
(स्त्रो नहीं गुजरिया, वह है नर ! ) लो, छत छन, छने छन, छत छत, छत छन, हुलस गरुजरिया हरती मन !
उर वी भतृप्त यासना उभर
इस ढोल मेंजीरे ये! स्वर पर
नाचती, गान वे फंला पर,
प्रिय जन गण बो उत्सव झ्रवधर,--
लो, छत छत, छने छत, छन छत, छन छन, चतुर गरुजरिया हस्ती मन!
(जनवरी /४०)
ग्रास वधू
जाती ग्राम वधू पति के घर ! मां से मिल, गोदी पर सिर धर, गा गा बिटिया रोती जी भर, जन जन का मन बढ्णां कातर, जाती ग्राम वधू पति के घर। भीड लग गयी लो स्टेशन पर, सुन यात्री ऊँचा रोदन स्वर फकरौॉक रह खिड़की से बाहर, जाती ग्राम वधू पत्ति के घर ! चितातुर सव, कौन गया मर पहियो से दब, कट पटरी पर, पुलिस कर रही कही प्रड धर ! जाती ग्राम वधू पति के धर ! मिलती ताई से भा रोकर, मौसी से वह पापा खोकर, बारी बारी रो, चुप होकर, जाती ग्राम वधू पति के घर! विदा फुभ्ा से ले हाहाकर, सखियो से रो धो बतियाकर, पडोसिनो पर टूठ, रंभाकर जाती ग्राम वधू पति के घर ! मा वहती,--रखना संभाल घर, मौसी,-धनि, लाना गोदी भर, सखियाँ जाना हमे मत बिसर जाती ग्राम वधू पति के घर !
१४० /,पत ग्रयावलोी
भर रहे ढाक, पोपल के दल, हो उठी कोकिला मतवाली ! महके क्टहल, मुकूलित जामुन, जगल भरबेरी . भूली, फूले प्राडू, नीबू, _ दाडिम, झालू, गोभी, बेगन, भूली! पीले मीठे. भ्रमरूदो बग्रब॒ लाल लाल चित्तियाँ पडी, पक ग्येः छुनहले मधुर बेर, झवली से तर की डाल जड़ी! लहलह पालक, महमह धनिया, ग्रैकी प्रो" सेस फ़ली फंली, मखमली टमाटर हुए लाल, मिर्चों की बढी हरी थंसी। गजी को मार गया पाला, अरहर के फूलों को भुलसा, हाका करती दिन-भर बदर भव मालिन की लडकी तुलसा | बालाएँ ग़जरा काट काठ, कुछ कह गुपचुप हँसती किन किन, चांदी की-सी घण्टियाँ तरल बजती रहती रह रह खित खिन् | छायातप के हिलकोरो चौडी हरीतिमा लद्दराती, ईखा के खेतों पर सफेद कासो की भण्डी फहराती ! ऊंची प्ररहर में [का छिपी खेलती युवतियाँ. मदमाती, चुस्बन पा प्रेमी गखुबवको के श्रम से इलथ जीवन बहलाती ! बगिया के छोटे पेडो पर सुदर॒ लगते छोटे छाजन, सुंदर गेहूँ की बालों पर मौती के दानो - से हिमकन ! प्रात भ्ोमल हो जाता जग, मू पर भ्ाता ज्यों उतर गगन, सुदर॒ लगते फिर बुहरे से उठते - से खेत, बाग, गहू बन ! बालू के साँपो से श्रकित ग्रगा थी सतरगी रेती सुदर॒ लगती सरपत छायी तट पर तरबवूजो की खेती!
१४२ | एत प्रयावली
अंगुली की कधी से बसुले कलेंगी सेंवारते हैं. कोई तिरते जल में सुरखाब, पुलिन पर मगरोठी रहती सोयी ! ड्वकियाँ. लगाते सामुद्रिक, घोती पीली चोचे घोबिन, उड श्रबाबील, टिटिहरी, बया, चाहा चुगते कदस, कृमि, तन । नीले नभ में पीलो के दल भातप मे घीरे मेंडराते, रह रह काले, मूरे, सुफेद चल पखो के रंग भलकाते लटके तरुप्रो पर विहग नीड वनचर लडको को हुए ज्ञात, रेखा - छवि विरल ट्हनियों की दूठे तस्झो के नग्न गात! भागग मे दोड रहे पत्ते घूमती भेंवर -सी शिशिर वात, बदली छोटने पर लगती प्रिय ऋतुमती धरित्री सर स्नात। हँसमुख. हरियाली हिम - भातप सुख से भलसाये -से सोये, भीगी अधियाली में निधि की तारक स्वप्नो मे-से खोगे,-- मरकत डिब्बे - सा खुला ग्राम-- जिस पर नीलम नभ भाच्छादन,--- निरुषम हिमात में स्निग्ध शात निज शोभा से हरता जमे मन
(फरवरी ४०)
नहान
जन पव मकर पसझक्रात पशभाज
उमडा नहान को जन समाज
भगा तट पर सब छोड काज | नारी नर कई कोस पैदल भा रहे चले लो, दल के दल गंगा दशन को पुण्योज्वल
लड़के, बच्चे, बूढे, जवान,
रोगी, भोगी, छोटे, महान,
क्षेत्रपति, महाजन प्रो किसान
ग्राम्या | १४३
* इनमे विश्वास श्रगाध, भ्रटल, इनको चाहिए प्रकाश नवल, भर सके नया जो इनमें बल ! ये छोटी बस्ती में कुछ क्षण भर गये झ्राज जीवन स्पदन,-- प्रिय लगता जनगण सम्मेलन (फरवरी /४०)
गगा
भ्रव ग्राधा जल निशचल, पीला, श्राधा जल चचल ग्रौ” नीला,--
गीले तन पर मृदू संध्यातप सिमटा रेशम पटसा ढीला !
ऐसे सोने के साँझ प्रात ऐसे चाँदी के दिवस रात॑,
ले जाती बहा कहाँ गगा जीवन के युग क्षण,--क्सि ज्ञात | विश्रुत हिम पवत से निगत, क्रिणोज्वल चल कल ऊमि निरत॑,
यमुना, गोमती श्रादि से मिल होती यह सागर में परिणत ! पह भौगोलिक गगा परिचित, जिसके तट पर बहु नगर प्रथित,
इस जड गया से मिली हुई जन गगा, एक और जीवित ! बह विष्णुपदी, शिव मोलि स्रुता, वह भीष्म प्रसु औ” जहू, सुता,
वह देव निम्नगा, स्वगगा, वह सगर पुत्र तारिणी श्रुता | वह गगा यह केवल छाया, वह लोक चेतना, यह माया,
बह आत्म वाहिनी ज्योति सरी, यह भू पतिता, कचुक' काया ! वह गया जन मन से निसत जिसमे बहु बुदबुद युग नतित,
वह भ्राज तरमित ससति के मत सेकत को बरने प्लावित ! दिशि दिशि का जन मत वाहित कर, बहू बनी झकल अझतल सागर
भर देगी दिशि पल पुलिनो में
प्राम्या / १४५
वह नव जीवन वी रज उबर!
अब नभ पर रेखा शशि शोमित, गया का जल द्यामल कम्पित लहरो पर चाँदी वी किरणें करती प्रकाशमय कुछ भ्रकित | (फरवरी ४०)
चमारो का नाच
अररर मचा खूब हुल्लड हुडदग, घमक घमाधम रहा मृदग, उछल कूद, बकवाद भडव में खेल रही खुल हृदय उमंग यह चमार चौदस का ढग। ठनक कक््सावर रहा ठनाठन, थघिरक चमारिव रही छताछन, भूम झूम बासुरी कॉरिया बजा रहा, बेसुध सब हरिजन गीत नृत्य के संग है प्रहसन ! मजलिस का मससरा कॉरिया बना हुआ है रंग विरमा, भरे चिरकुटों से वह सारी देह हँसाता खूब लफगा, स्वॉय युद्ध का रच बेढगा ! बेंघा चाम का तवा पीठ पर पहुंचे पर बद्धी का हण्टर, लिये हाथ मे ढाल, टेडही दुमूंहा सी बलखाई सूदर-- इत्तराता वह बने सुरलीधर क्षमीदार॒ पर॒ फबती कसता, बाम्हत ठाकुर पर है हँसता, बातो में बक्रोब्रित काकु प्रा इलेप बोल जाता वह सस्ता, कल कॉँटा को कह क्खक्ता! घमासान हो रहा है समर, उस बलाने भागे अफसर, गोला फटकर भ्ाँख उडा दे छिपा हुप्ला वह उसे यही डर, खौफ ने मरने का रची भर! वाया उसका है साथी नट, / गदबे उस यर जमा परठापट,
१४६ /पत्त ग्रषावली
उसे टोकता--'गोली खाकर ः आख जायगी क्यो बे नटखट ? भुन न जायगा मुनगे सा झट है “गोली खायी ही है !” चल हट |? 'कई--भाँग की | वा , मेरे भट | सच काका |” भगवान राम 'सीसे की गोली |? 'रामधे ?” 'विकट ? गदवा उस पर पडता चटठपट वह भी फौरन बद्धी कसकर काका को देता प्रत्युत्तर, खेत रह गये जब सब रण मे वह तब निधडक गुस्से मे भर लडने को निकला था बाहर ! लटदू उसके ग्रुन पर हरिजन, छेड रहा वशी फिर मोहन, तिरछी चितवन से जन-मन हर इंठला रही चमारिन छन छन, ठनक कसावर बजता ठन ठन ये समाज के नीच ग्रधम जन, नाच कद कर बहलाते मन, वर्णों के पद दलित चरण ये मिटा रहे निज क्सक भौ” कुढन कर उच्छु खलता उद्धतपम अररर शार, हंसी, हुल्लड, हुडदग, धमकः रहा धाग्डाग मृदग मार पीद बकवास झड़प में रंग दिखाती महुप्मा मग यहू चमार चौदस का ढग।
(जनवरी !४०)
कहारो का रुद्र नृत्य
रग- रंग के चोरो से भर पग, चीस्वासा से, देय शूय मे प्रप्रतिहत जीवन की अभिलापां सं, जटा घटा सिर पर यौवन की इमश्रु छटा प्रानन पर, छोटी बडी तूबिया, रंग रेंग की गुरियाँ सज तन पर, हुलस नत्य करते तुम भटपट घर पदु पद, उच्छद्धल झाकाक्षा से समुच्छबमित जन मन का हिला घरातल |
फडके रहे प्रवयव प्रावेश विवन मुद्राएँ प्रशित, प्रखर लालसा वी ज्वालाप्रा सी पझ्गुलियाँ कम्पित, उष्ण देच के तुम प्रगाढ जीवनाल्लास-से निमर,
प्रास्या | १४७
बहभार उद्यम कामना के-से खुले मनोहर एक हाथ मे ताम्र डमर घर, एक शिवा की कदि पर, नृत्य तरमित रुद्ध पूरुसे तुम जन- मन वे सुखकर | बाद्यों वे उमत घोष से, गायन स्वर से वम्पित जन इच्छा का गाढ चित्र वर हृदय पटल पर झ्वित, खोल गये ससार नया तुम मेरे मन में, क्षण भर जन सस्कृति का तिग्म स्पीत सौदय स्वप्न दिखलाकर युग - युग के सत्याभासों से पीडित मेरा अंतर जन मानव गौरव पर विम्मित मैं भादी चितन पर ! (फरवरी ४०)
भारतमाता भारतमाता
प्रामवाप्धिनी खेतों मे फैला है ध्यामल धूल भरा मेला सा भ्रॉचल
गंगा मा मे भ्रांपू जल सि को प्रतिमा उदासिनी !
देन्य जडित भ्रपलक नत चितवन अधरो मे चिर नीरच रोदन, युग ग्रुग के तम से विषण्ण मन, बह भ्रपने घर में प्रवासिती ।
तीस कोटि संतान नरन तन, भ्रध क्षुधित, ग्योषित निरस्त्र जन, मूढ, भ्रसुम्य, भ्रशिक्षित, निधन, नत मस्तक तर तल निवासिनी !
स्वण शस्म पर-पद-ठल लुण्ठित, घरती सा सहिष्णु मन कृण्ठित, ऋदन कम्पित भ्रघर मोन रिमत, राहु ग्रसित दइरदेदु हासिनी !
चितित्त मदुरि क्षितिज तिमिराकित, नभित नयत्त नम वाष्पाच्छादित, आनन श्री छाया छाशि उपभित, ज्ञान मूढ गीता प्रवाशिनी !
हृष्ट८ | पत प्रयावत्ती
जीवन विज्ञ
त्तप
सिनी ।
व तम श्र
सयम, सुष्ोपम, म,
जिः नेबरी १७७ )
(दिः सम्बर ?; ३6 )
प्राम्या 7 श्ष्ह
भहात्माजी के प्रति
निर्वाणोमुख श्रादर्शों के श्रातम दीप शिखोदय --
जिनकी ज्योति छटा के क्षण से प्लाबितआज दिगचल,--
गत आदक्षों का भ्रभिभव ही मानव आत्मा की जय,
अत पराजय श्राज तुम्हारी जय से चिर लोकोज्ज्वल मानव आत्मा के प्रतीक झादशों से तुम ऊपर, निज उद्देश्यों से महान, निज यश से विशद, घिर तन, सिद्ध नही, तुम लोक सिद्धि के साधन बने महत्तर, विजित आज तुम नर वरेण्य, गणजन विजयी साधारण!
युग युग की सस्कतियों का चुन तुमने सार सनातन
नव सस्कृति का शिलायास करना चाहा भव शुभकर,
साम्राज्यों ने ठुक॒रा दिया युगो का वेभव पाहन--
पदाघात से माह मुक्त हो गया आज जन प्ातर |! दलित देश के दुदम नेता, हे ध्रुव, भीर, धुरधर, आत्मशक्ति से दिया जाति शव को तुमने जीवन बल, विश्व सम्यता का होना था नखशिख नव रूपातर रामराज्य का स्वप्न तुम्हारा हुआ न यों ही निष्फल
विकसित व्यक्तिवाद के मूल्यों का विनाश था निश्चय,
वद्ध विश्व सामत काल का था केवल जड खड॒हर
है भारत के हृदय तुम्हारे साथ झ्लाज निसशय
चूण हो गया विगत सास्कतिक हृदय जगत का जजर। गत सस्कृतियों का, झ्रादशों का था नियत पराभव, वग व्यक्ति की प्राध्मा पर थे सौध' धाम जिनके स्थित, ताड ग्रुगो के स्वण पाश्ष श्रव भुक््त हो रहा मानव, जन मानवता की भव सस्क्ृति प्राज हो रही निर्मित
किये प्रयोग नीति सत्यो के तुमने जन जीवन पर,
भावादश न सिद्ध कर सके सामूहिक जीवन हित,
झभधोमूल अश्वत्य विश्व, शाखाएं सस्क्ृतिर्या वर
वस्तु विभव पर ही जनगण का भाव विभव झ्रवलस्बित । वस्तु सत्य का करते भी तुम जग में यदि झ्रावाहन, सबसे पहले विमुख तुम्हारे होता निधन भारत, मध्य युगो वी नैतिकता मे परोधित शोधित जनगण बिना भाव-स्वप्तों को परखे क्व हो सकते जांग्रत ?
सफल तुम्हारा सत्यावेषण, मानव सत्यावेपषक !
धम नीति के मान प्रचिर सव, असिर शास्त, दशन मत,
दासन, जनगण ताञ्र अचिर युग स्थितियाँ जिनकी प्रेरक,
मानव ग्रुण, भव रूप नाम होत परिवर्तित युगपत पूण पुरुष, विकसित मानव तुम जीवन सिद्ध अहिसत, मुक्त हुए तुम मुक्त हुए जत है. जग वद्य महात्मन! देव रहे मानव भविष्य तुम मनइचक्षु बन प्पलक घाय वुम्हारे श्री चरणा से धरा ग्राज चिर प्रावन
(दिसम्बर ३६) १५४० [पत प्रयावलो
राष्ट्र गान
जन भारत है! भारत है!
स्वग स्तम्भवत गौरव मस्तक उनत हिमवत् हु, जन आरत हे जाग्रत भारत है!
गमन चुम्बि विजयी तिरग ध्वज इगद्रचापवत हे,
कोर्टि कोडि हम श्रमजीवी सुत सम्श्रम युत नत हे,
सव एक मत, एक ध्येय रत, सच श्रेय ब्रत हे जन भारत हू, जाग्रत भारत हे!
समुच्चरित शत शत कण्ठा से जम युग स्वागत हु, सिबु तरगित, मलय इश्वसित, गगाजल ऊमि निरत हे, शगद इददु स्मित अ्रभिन दन हित, प्रतिध्वनित पकत है स्वागत हे स्वागत हं, 3 जन भारत हे, जाग्रत भारत हू
स्वगी खण्ड पड ऋतु परिनमित, ब्राम्न मजरित, मधुप गुजरित, कुसुमित फल द्रुम पिक कल कूजित, उबर, प्रभिमत हूं, दश दिशि हरित शस्य श्री हूपित पुलक राशिवत हे, ; जन भारत हे, जाग्रत भारत ह!
जाति घम मत, वग श्रेणि झ्त्त, नीति रीतिगत हे
मानवता मे सकल. समागत जन मन परिणत हे,
झहिसास्त्र जन का मनुजोचित खिर झप्रतिहुत हु,
प्राम्या ( १५१
रॉ फल
बल के विमुख, सत्य के सम्मुख हम श्रद्धानत है, जन भारत हे, जाग्रत भारत है
क्रिण केलि रत रक्त विजय ध्वज युग प्रमातवत् हे,
बीधि स्वम्भवत् उनत . भस्तक प्रहदी हिंमवत है,
पद तल छू शत फंमतिलोमि फन दशेयोदधि नत हू,
वग मुक्त हम श्रमिक कृपक जन चिर शरणागत हे, जन भारत हे, ज़ाग्रल भारत है ।
(जनवरी /४०)
ग्राम्त देवता
राम राम,
है ग्राम देवता, भूति ग्राम ! तुम पुरुष पुरातन, देव सनातन पृणकाम, सिर पर शञामित वर छत्र तड़ित स्मित घन श्याम वन पवन ममरित व्यजन, भ्रान फ्ल श्री ललाम
तुम कोटि बाहु, वर हलघर, वय वाहन बलिप्ठ, मित अ्रशन, निर्वश्नन, क्षीणादर, चिर सौस्य शिष्ट, शिर स्वण शस्य मजरी मुकुंद, गणपति वरिष्ठ, वास्युद्ध बीर, क्षण कुद्ध घीर, मित बमनिष्ठ!
पिक्रः बयनी मधुऋतु से प्रति बत्सर श्रभिना दत्त,
नदे झ्रानप्न सजरी मलय तुम्हें करता पपित,
प्रादुट मे तब प्रारण घन गजन से हक्षित,
मरकत बल्पित नव हरित प्ररोहों में पुलक्िति! शशि मुखी शरद बरती परिक्षमा बुद रस्मित, वंणी में खोसे कस कान मे बुई लप्तित, हम तुमशो करता तुहिन मोतिया से मूपित, बहु सीच बाबा युस्मो स तब सरिसर कूजित!
प्रभिराम तुम्हारा बाह्य रूप मोहित कवि मन;
नम के नीलम सम्पुट मे तुम मरबत शोभना
पर, साल श्राज निज ग्रन्तपुर बे पट यापन
बिर प्रोह मुक्त कर दिया, देव तुमे यह जन:
१५२ | पत प्रेंचाव ली
राम राम है ग्राम देवता, रूढि घाम। तुम स्थिर, परिवतन रहित, कल्पवत एक याम, जीवन सघधपण विरत, प्रगति पथ के विराम, द्विक्ष तुम, दस वर्षों स मैं सेवक, प्रणाम ! कवि प्रल्प, उड़प मति, भव तितीपुं,--दुस्तर अपार, कल्पना पुत्र॒ मैं, भावी द्रष्टा निराधार, सौदय स्वप्नचर,--नीति दण्डघर तुम उदार, चिर परम्परा के रक्षक, जन हित मुक्त द्वार! दिखलाया तुमने भारतीयता का स्वरूप, जन मर्यादा का स्लोतशुय चिर भ्रध कूप, जय से अबोध, जानता न था मैं छाह धूप, तुम युग “युग के जन विश्वासों का जीण स्तूप, यह वही श्रवध | तुलसी की सस्कृति का निवास! श्री राम यही करते जन मानस में बिलास।! पभह, सतयुग के खेंडहर का यह दयनीय ह्ास ! बहू भ्रक्ततीय मानसिक देय का बना ग्रास |! ये श्रीमानो के भवन आज साकेत धाम सयत तप के आदश बन गये भोग काम झाराधित सत्त्व यहाँ, पूजित धन, वश माम ! यह विकसित व्यक्तिवाद की सस्कृति | राम राम श्री राम रहे सामत काल के ध्रुव प्रकाश, पशुजीवी युग म॑ नव कृषि सस्कृति के विकास, कर सका मध्य युग नहीं जनों का तम विनाश, के रहे सनातनता के तब में कीत दास पशु युग में थे गणदेवी के पूजित पशुपति, थी रुद्रचरो से कुण्ठित कृषि ग्रुग की उनति। श्री राम रुद्र की शिव में कर जन हित परिणति, जीवित क्र गये झहल्या को, थे सीतापति | वाल्मीकि बाद झाये श्री व्यास जगत गा दत, वह कृषि संस्कृति का चरमोनत युग था निश्चित, बन गये राम तब हइुृष्ण, भेद, मात्रा का मित, वभव युग वी वद्दी स कर जन मन मोहित ड तब से थरुगयुग के हुए चित्रपट परिवर्तित तुलसी ने कृषि मत्न ग्रृग अनुरूप किया निर्मित, खो गया सत्य का रूप, रह गया नामामत, जन समाचरित वह समुण बन गया झाराधित ! गत सक्रिय गुण बन रूढि रीति के जाल गहन कृषि प्रमुख देश के लिए हो गये जड बाघन, जन नही. यत्र जीवनोपाय के अब वाहन, सस्कृति के केद्ध न वग अधिप, जन साधारण
प्राम्या / १५३ 7
बल वे विमुस, सत्य वे सम्मुख हम श्रद्धानत ह, जन भारत हूं, जाग्रत भारत है!
पकि्रिण केलि रत रफ़्त विजय ध्वज युग प्रभातवत ह,
नीति स्तम्मवत उनत मस्तक प्रहरी हिमदतू हु,
पद तल छू छत फेनिलोमि फ्न शेषोदधि नत हु,
वग मुक्त हम श्रमिक हृपक जन चिर शरणागत हु, जत भारत हू, जाग्रत भारत है ।
(जनवरी /४०)
ग्राम देवता
राम राम,
है ग्राम देवता, भूति ग्राम! मर पुरुष पुरातत, देव सनातन पूणबाम, कर पर शोभित वर छत्र तडित स्मित घन श्याम घन पवन ममरित व्यजन, भ्राव फल श्री ललाम |
तुम काटि बाहु, वर हलघर, वृष वाहन बललिष्ठ, मित्त अशन, निवसन, क्षीणादर, चिर सौभ्य शिप्ट, शिर स्वण हास्य मजरी मुकुट, गणपति वरिष्ठ, वबास्युद्ध वीर, क्षाण कुद्ध धीर, नित कमनिष्ठ
पिक बयनी मधुऋतु से प्रति वत्सर अभि दत, नव आम्र मजरी मलय तुम्ह करता अ्रपित, प्रावट में तव प्रायण घन गजन से ह॒वित, मरबत कल्पित नव हरित प्ररोहो मे पुलकित! शशि सुखी शरद करती परिश ि वेणी मे खोसे कौस कान हिंम तुमको करता तुहिन बहु सोन काोक युग्सा से अभिराम तुम्हारा वाह्य रूप, मो नभ के नीलम सम्पुट में छुम पर, साल आज निज श्रत पुर चिर मोह मुक्त कर दिया, देव
१५२ / पत्त प्रधावली
पृम पाष । ड जनगणष ञग क्रात्ति के हि घि सलाम पुम रूड़ि रोक ) गे 5, यह जम
जनवरी “४, है] पैन््ध्या के बाद लिगटा पल फि की लाली
जा २ भव तर सिरे क्र तामञ्रपण पीपल सर, शतमुख
औरत चचल स्वेण्मि निकर !
ज्योति स्तम्भ साध: सरिता मे
जय श्लि पर होता ग्रोकल बेहद जिद्य (६ केचुल जा
चेग्ता च् बरा गयाजत्न !
प्राम्या / ३४ पु
उच्छिष्ट गरुगा या प्राज _ सनातनवत् प्रचलित, बन गयी चिरतन रीतिनीतियाँ, स्थितियाँ मृत | गत सस्वृतियाँ थी विकश्चित वग व्यकित प्राथित, तय बग व्यवित गुण, जन रामूह गुण भव विव्तित! प्रति मानवीय था निश्चित विनधित व्यक्ितवाद मनुजा में जिसो भरा दवय पु या प्रमाद, जन जीवा बना ने विशद, रहा वह निरा्धाद, विकधित नर पर प्रपवाद नहीं, जन गुण वियाद तब था न वाप्प विद्युत गरा जंग म हुमा उदय, थे मनुज यात्र, युग पुरुष सहक्ष हस्त बलमय, प्रव यात्र मनुज वे पर पद बल, संववा समुदय, सामत मान प्रव व्यय, समद्ध विश्व प्रतिशय प्र मनुप्यता वा नैतिवता पर पानी जब, गत बग ग्रुणा यो जाय सस्वृत्ति में होना लय, शा राषप्ट्री को मानव जग बनना निश्चय, प्रतर जय को फिर लेना बहिजगत झाश्य
राम राम, हू ग्राम्य देवता यया नाम ! शव हो तुम, मैं शिष्य, तुम्हे सविनय प्रणाम ' जिजया, महुप्रा, ताडी, गाँजा पी सुबह द्षाम तुम समाधिस्थ नित रहो, तुम्हें जग से न काम पण्डित, पण्डे, प्रोभा, मुखिया भ्ौ' साधु सन्त दिखलात रहत तुम्ह स्वग प्रघवग पथ, जो था, जो है, जो होगा,--सब लिख गये ग्र थ, विज्ञान भान से बडे तुम्हारे मात्र तत्र! गुगयुग स जनगण, देव ! तुम्हारे पराधीन, दारिद्रथ दुख के कदम म कृमि सदश लीन बहु रोग शोक पीढित, विद्या बल बुद्धि हीत, तुम रामराज्य ये स्वप्न देखते उदासीन ! जन श्रमानुषी प्रादर्शों के तम स कबलित, माया उनको जग, मिथ्या जीवन देह प्रनित, वे चिर निवत्ति के भोगी,--त्याग विराग विहित, निज प्राचरणों मे नरक जीवियो तुल्य पत्तित ! व॑ देव भाव के प्रेमी,--पशुझा से उुत्सित, नतिक्ता के पोपक--मनुष्यता से वचित बहु नारी सेवी,--पततिब्रता घ्येयी निज हित, वैधव्य विधायव ---बहु विवाह वादी निश्चित । सामाजिक जीवन के प्रयोग्य, ममता प्रधान, सघपण विमुख, श्रटल उनको विधि का विधान, जग से गलिप्त वे, पुननम का उहं ध्यान, मानव स्वभाव के द्रोही, श्वारों के समान!
१५४ | पत ग्रथावली
राम रॉम,
हे ग्राम देव, लो हृदय थाम,
भ्रव जन स्वातञ्य युद्ध की जग्र में घूम घाम !
उद्यत जनगण गय्रुग॒ न्रातति के लिए बाघ लाम,
तुम रूढि रीति की खा अफीम लो चिर विराम | यह जन स्वात'त्य नही, जनेक्य का वाहक रण, यह अथ राजनीतिक न, सास्कृतिक सघपण ! युग युग वी खण्ड मनुजता, दिशि दिशि के जनगण मानवता में मिल रहे,-- ऐतिहासिक यह क्षण!
नव मानवता में जाति वग होगे सब क्षय,
राष्ट्र के युग वृत्ताश परिधि मे जग की लय
जन श्राज भ्रहिसंक, होगे कल स्नेही सहृदय,
हिंदू, ईसाई, मुसलमान,--मानव निश्चय | मानवता ग्रव तक देश काल के थी अभ्राश्चित, सस्कृतियाँ सकल परिस्थितियों से थी पीडित, गत देश काल मानव के बल से झ्ाज विजित, सब खव विगत नतिकक््ता मनुष्यता विकसित ।
छायाएँ हैं ससकृतिया मानव की निश्चित
वह केद्र, परिस्थितिया के गुण उसमे बिम्बित,
मानवी चेतना खोल युगो के गुण क्वलित
अब नव सस्कृति के वसनो सं होगी भूषित ! विश्वास, धम, सस्द्ृतिया, नीति रीतियाँ गत जन सघपषण में होगी ध्वस, लीन, परिणत, बाघत विमुक्त हो मानव आत्मा अ्रप्रतिहत नव मानवता का सद्य करेगी युग स्वागत
राम राम हू ग्राम देवता, रूढिधाम
तुम पुरुष पुरातन, देव सनातन पूण काम,
जडवत्, परिवतन झूय, कल्प शत एक यमाम,
शिक्षव हा तुम, मैं शिष्य, तुम्ह शत शत प्रणाम !
(जनवरी /४०)
सन्ध्या के बाद
सिमटा पख साँक की लाली
जा बेठी भ्रव तर शझिखरों पर ताम्रपण पीपल से, शतमुख
मरते चचल स्वण्मि निभर।! ज्योति स्तम्भ सा धेंस सरिता मे
सूय क्षितिज पर होता झोमल बहुद जिह्य विइलथ केंचुल-सा
लगता चितक्बरा गगाजला।
ग्राम्या | १४५
चूपछाँह मे रंग मी रैती अनिल ऊमियो से सर्पांबित,
नीोल तहरियों मे लोढित पीला जल रजत जलद से विम्बित
पिबरता, ललिल, समीर रादा से पाटा में बंधे समुज्यत,
अनित पिधघलशर सलिल, सलित ज्यों गति द्रव खो बन गया लवापत |
शस घण्ट बघजते माँ दर में लहूरो मे होता लय बम्पन, दीव लिखा सी ज्वलित पलश भ में उठवर भरता नीराजन ! तट पर बंगुलो - सी चुढ्ाएँ विघवाएँ जप ध्यान में मगन, मथर पारा में बहता (जनवा भ्रदृष्य गति भतर रोदन | दूर रेपाप्रो - सी, उडते पा की गति सी चिर्धित सोन खगो दाँति प्राद्र ध्वनि से नीस््व नम बरती मुखरिति । स्वण चूण -सी उडती गोणज लिरणो वी बादल «सी जलकर, सनन्ू तीर सा जाता नभ॑ ज्योतित पखो बण्ठो नी स्वर । लौटे खग, गायें घर लौटी, लौटे कृपक श्रात श्लघ डग घर छिपे गृहो में स्थान छाया भी हो गयी पअ्रगोचर, लौद प5 से व्यापारी भी जाते घर, उस पाए नाव १९, ऊँटो,. घोडो के संग बेठे खाली बोरो पर हुबका भर ] नी
जाडो द्वामा (निशि छाया गहरी, ।
कूल रही डूब. रहें. लिष्ध्रभ विषाद
जख्ेत बाग, गर्दि तरु, तट, लहरी ' बिरहा. गत गाडी चालि,
मूक + भू कर _लंडते कवर, हुआ. हुथ करते. सियार
दैते विपण्ण निशि बेला को वर ।
माली की मेंडई से उठ सम के नीचे नभ सी चूमाली
१५६ [ पत प्रयावली
मद पवन मे तिरती नीली रशम वी सी हलकी जाली ! बत्ती जला दुकानों में बैठे सब कस्बे के ध्यापारी, मौन मद भाभा में हिम वी ऊँघ रही लम्दी मेधियारी | धुआा शभ्रधिक देती है टिन की ढबरी, कम करती उजियाला, मन से कढ भवसाद शांति ्राखो के भागे बुनती णाला ! छोटी -सी बस्ती के भीतर लेन देन के थोथे सपने दीपक वे मण्डल में मिलकर हर मेंडराते घिर सुख दुख प्रपन कप बंप उठते लौ के संग कातर उर कऋ्रदन, मूक निराशा, क्षीण ज्योति ने चुपके ज्यो ग्रोपन मन को दे दी हो भाषा | लीन हो गयी क्षण मे बस्ती, मिट्टी खपरे के घर श्रागन, भूल गये लाला श्रपनी सुधि, मूल गया सव व्याज, मूलघन । सकुची सी परचून किराने की ढेरी लग रहा तुच्छतर, इस नीरव प्रदोष में श्राकुल “उम्ड रहा प्रतर जग बाहर! अनुभव करता लाला का मन, छोटी हस्ती का सस्तापन जाग उठा उसमे मानव, कु झ्रौ' श्रसफल जीवन का उत्पीड़न ! देय दुख प्रपमान ग्लानि बिर क्षुधित पिपासा, मृत प्ममिलापा, बिता श्राय की क््लातति बन रही उसके जीवन की परिभाषा! जड श्रताज वे ढेर सदश ही वह दिन - भर वेठा गद्दी पर बात बात्ततर झूठ. बोलता कौडी की स्पर्धा मे मरमर! फिर भी क्या दुद्ुम्ब पलता है? रहते स्वच्छ सुघर संव परिजन ? बना पा रहा वह पक्का घर २ मन में सुख है ? जुटता है धन २
प्राम्या / १४७
खिसक गयी को से कक््यही विदुर रहा प्रव सर्दी स तन, सोच रहा बस्ती का बनिया घार विवशता का निज कारण शहरी बनियों सा वहू भी उठ बयो बन जाता नहीं महाजन ? रोब दिये हैं कितने उसको जीवन उन्नति बे सब साधन ? यह क्या सम्भव नहीं व्यवस्था म जग की कुछ हो परिवतन ? कम्म और गुण के समान ही सकल आय व्यय का हो वितरण ? घुसे घरोंदों मे मिट्टी के झपनी झपनी सोच रहे जन, क्या. ऐसा कुछ. नही, फूंकः दे जो सबमे सामूहिक जीवन ? मिलकर जन तिर्माण करें जग, मिलकर भोग करें जीवन का, जन विमुक्त हो जन शोपण स, हो समाज प्रधिकारी घन का ? दरिद्रता पापों की जननी, मिर्ट जना के पाप, ताप, भय, सुंदर हो भ्रधिवास, वसन, तन पशु पर फिर मानव की हो जय ? व्यक्ति नही, जग की परिपाटी दोषी जन के दुख क्नेश की, जन का श्रम जन मे बेंट जाये, प्रजा सुखी हो देश दश वी। दूद गया वह स्वप्त वणिक का, झायी जब बुंढिया बेचारी, आ्राघ पाव. आदा _ लेने,-- लो, लाला ने फिर डण्डी मारी | चीज उठा घुघघू डालो में लोगो ने पट दिये द्वार पर, निगल रहा बस्ती को घीरे, गा भ्रलस निद्रा का झजगर ! (दिसम्बर /३६)
खिडकी से
पूस निशा का प्रथम प्रहर घिडगी सा बाहर दूर क्षितिज तक स्तब्ध झ्राम्न वन सोया क्षणभर
१५८ / पतत प्रधायसी
दिन का भ्रम होता पूना न तथ तस्भ्रो पर
चांदी मढ दी है, भू को स्वप्नो स जडकर !
चार चार द्रिवातप से पुलक्ति तिखिल घरातल
चमक रहा है, ज्यो जल मे बिम्बित जग उज्ज्वल स्पष्ट दीखते,-- खिंडकी की जाली में विजडित बटहल, लीची, श्राम.--धूक गेंदुर से कम्पित, फाटवय' झभो' हाते वे खम्भे, बगिया के पथ, झभाधी जगत बाएं की, पुरिया वी छाजन इलथ, प्रसप्ताल का भाग, मेहराबें, दरवाजे, स्फटिक संदेश जो चमक रहे चूने से ताजे ! झभो' टेढी मेढ़ी दिगत रेखा के ऊपर पास पास दो पेड ताड के खडे मनाहर।
भाधी खिडकी पर प्रगणित ताराप्नो से स्मित
हरित घरा के ऊपर नीलाम्बर छायाकित
कचपतचिया (उृत्तिवा) सामने झोभित सुदर
मोती के गुच्छे सी भरणी ज्यो त्रिकोण वर !
पास रीहिणी, प्रिय मिलनातुर बाँह खोलकर,
सेंदुर की बेंदी दे, जुडबों का गोदी भर।
सुब्ध दृष्टि लुब्धभ, समीप ही, छोड रहा शर
प्रादि काल से मृग पर मृगशिर सहज मनोहर ! उधर जड़े पुखराज लालस गुर झौ मगल साथ साथ, जिनमे भ्रवश्य गुरु सबसे उज्ज्वल । हसस््ता है प्रत्यक्ष कठिन वश्चिक का मिलना, बह झ्ायद श्रार्द्रीा, कहता हिमजल सा हिलना। ज्योति फेनसी स्वगगा नभ बीच तरगित, परियो की माया सरसी सी छायालोकित, ज्वलित पुज ताराग्नो के वाष्पो से सस्मित नीलम के नभ में रत्नप्रभ पुलसी निर्मित | खोज रहा हु कहाँ उदित सप्तधि गगन मे अरुधती को लिये साथ विस्मित-से मन में ! प्रन्तन॑ चिहक्त से जो प्रनादि से नभ मे श्रकित, उत्तर मे स्थिर ध्रूव की श्रोर किय घिर इगित-- पूछ रहे हो ससति का रहस्य ज्यो झविदित, क्या है वह श्रुव सत्य ? गहन नभ जिससे ज्योतित |”
ज्योत्स्ता में विकसित सहल्लनदल भू पर अम्बर
शांभित ज्यों लावण्य स्वप्न भ्रपलक नयनो पर |
यह प्रतिदिन का देय नहीं छल से बातायन
भ्राज खुल गया अप्सरिया के जग मे मोहन!
चिर परिचित माया बल से बन गये अपरिचित
निखिल वास्तविक जगत कल्पना से ज्यो चित्रित
झाज भसुदरता, बुरूपता मू से श्ोभव--+
सब कुछ सुदर ही सु दर, उज्ज्वल ही उज्ज्वल
प्रास्या / १५६
एक शक्ति से, कहते, जग भ्रपच यह विकसित, एक ज्योति वर से ममस्त जड चेतन निभित, सच है यह आलोक पाश मे बंधे चराचर आज भादि कारण की श्रोर खीचते झातर। क्षुद्र श्रात्म पर भूल, भूत सब हुए समावित, तृण, तह से तारालि--सत्य है एक श्रखण्डित ! मानव ही क्यों इस अश्रसीम समता से बचित ? ज्योति भीत, युग युग से तमस बिमूढ, विभाजित [ (दिसम्बर '३६)
रेखचित्र
चाँदी की चोडी रेती, फिर स्वणिम गगा घारा, जिसके निशचल उर पर विजडित रत्न छाय नभ सारा! फिर बालू का नासा लम्बा ग्राह तुण्ड-सा फला, छित्तरी जल रेखा--कछार फिर गया दूर तक मेला । जिस पर मछुग्रो को मेंडई, गो तरबुजो के ऊपर, बीच बीच मे, सरपत के मूठे सग -से खोले पर! पीछे, चित्रित विटप पाँति लहरायी साध्य्य क्षितिज पर जिससे सटकर नील धूम्र रेखा ज्यों खिची समातर। चह पु्ठः से जलद पंख प्रम्बर में बिखरे सुदर रग रगम वी हलकी गहरी छायाएँ छिटवाकर सबसे ऊपर निजन नभ में अपलक सच्या तारा, नीरव झो' निसंग, खोजता-सा बुछ, चिर पथहारा साँक,--नदी का सूना तठ, मिलता है नहीं किनारा, सोज रहा एकाकी जीवन साथी, स्नेह सहारा (जनवरी ४०)
दिवा स्वप्न
दिन की इस विस्तत भा मे, खुली नाव पर
भार पार के दश्य लग रहे साधारणतर।!
केवल नील फलक सा नभ, संँक्त रजतोंज्ज्वल,
झौर तरल बिल्तौर वेइमतल मा गंगा जल-- चेपल पवन के पदाचार से प्रहरह स्पा दत-- शात हास्य से भतर को करते भाद्वादित | मुक्त स्निग्ध उल्लास उमड जल हिलत्रोरों पर नृत्य कर रहा, टकरा पुलवित तट छोरी पर
यह सैक्स तट पिघल विधल यदि बन जाता जन >
बहू सती यदि घरा दिगच यदि न ड्वाता जल, रह तर तो मैं नाव छोड, गगा पर
१६० / पत प्रषावली
भ्राज लोटता, ज्योति जडित लहरो सेंग जी भर |
किरणो स खेलता मिचौनी मैं लुक छिपकर,
लहरो के झ्रचल मे फेन पिरोता सुदर,
हसता कल-कल मत्त नाचता, भूल पग भर |!
कसा सुदर होता बदन ने होता गोला
लिपटा रहता सलिल रेशमी पट सा ढीला
यह जल गीला नहीं, गलित नभ केवल चचल
गीला लगता हमे न भीगा हुआ स्वय जल हाँ चित्रित से लगते तण - तह मूं पर बिम्बित भेरे चल पद चूम घरणि हो उठती कम्पित ! एक सूय होता नभ में, सो मू पर विजडित सिहर सिहर क्षिति मारुत को करती आलिंगित |
निशि में ताराक््नो से होती धरा जब खबचित
स्वप्न देखता स्वग लोक म मैं ज्योत्स्ना स्मित |
ग्रुन के बल चल रही प्रतनु नौका चढाव पर
बदल रहे तट दृश्य चित्रपट पर ज्यो सुदर वहू जल से सटकर उडते हैं चदुल पनेवा इन पखो की परियो को चाहिए न खेवा! दमक रही उजियारी छाती करछौंहे पर श्याम घनो से भलक रही बिजली क्षण क्षण पर |
उधर कगारे पर अटका है पीपल तस्वर
लम्बी, टेटी जडें जटासी छितरी बाहर
लोद रहा सामने सूस उनडुब्बीसा तिर,
पूछ मार जल मे चमकीली करवट खा फिर ! सोन कोक के जोडे बालू वी चादो पर चांचो से सहला पर क्रीडा करते सुखकर ! बंठ न पाती, चक्कर देती देव दिलाई तिरती लहरों पर सफेद काली परछाँईं
लो मछरगा उतर तीर-सा नीचे क्षण मे
पकक्ड तडपती मछली को उड़ गया गगन में
नरकुल की चोचें ले चाहा फिरते फर फर,
मेंडराते सुरखाब व्योम में श्रात नाद कर,-- काले, पीले खरे, बहुरगे चित्रित पर चमक रहे बारी-बारी स्मित आभा से भर वह, टीले के ऊपर तूबीसा बबूल पर, सरपत का घांसला बया का लटका सु दर |
दूर उधर, जगल में भीटा एक मनोहर
दिखलायी देता है वन देवों का सा घर,
जहाँ खेलते छायातप मास्त तर ममर
स्वप्न देखती विजन शात्ति म॑ मौन दोपहर !
वन की परियाँ घूषछाह की साडी पहने
जहाँ विचरती चुनने ऋतु कुसुमों के गहने
ग्राम्या | १६१
वहाँ मत करती मत नव मुकुलो की सौरभ, गुजित रहता सतत द्वुमो का हरित श्वप्तित बभ |
वहाँ गिलहरी दौडा करती तर डाला पर
चचल लहरी सी, भुदु रोमिल पूछ उठाकर
प्रोर वय विहेंगो-कीटो के सौसो प्रिय स्वर
गीत वाद्य से बहलाते शोकाकुल प्रतर! वही कही जी करता, मैं जाकर छिप जार मानव जग के क्रदन से छुटकारा पार्क प्रकृति नौड में व्योम खगो के गाने गाऊँ अपने चिर स्नेहातुर उर की व्यया भुला
(जनवरी “४०)
सौन्दर्य कला नव वसत की रूप राशि का ऋतु उत्सव यह उपवन, सोच रहा हूँ, जन जग से क्या सचमुच लगता शोभन । या यह केवल प्रतिक्रिया, जो वर्गों के सस्कृत जन मत में जागृत करते, कुसूमित श्रग, कण्टकावृत मन ! रुमग रगे के खिले फ्लॉक्स वरवीना, छपे डियाथस, नत दृग ऐस्टिछ्विनम तितली सी पजी पाँपी सालस, हँसमुख_ कंप्डीटपट.. रेशमी चटकीले नेंस्टरशम, खिली स्वीट पो,--एबडस, फ्लिबास्केट, भो” ब्लू बेटम दुहरे कार्नशस, स्वीट सुलतान सहज _ रोमाचित, ऊंचे हॉली हॉक”, लाकस्पर पुष्प स्तम्भ के शोमित, फूले बह मखमली, रेशमी, मृदुल ग्रुलाबों के दल, घवल मिसेज्ञ एड कानेंगी, ब्रिटिश क्वीन हिम उज्ज्वल । ह जोसेफ हिल, सनबस्ट पीत, स्वणिम लेडी हेलिडने, ग्रेंड मुगल, रिचमण्ड, विकच ब्लैक प्रिंस नील लोहित तन, फेश्ररी बवीन, मारगेरेट मृदु वीलियम शीन घिर पाठल बटन रोज वहु लाल, ताम्र भाखनी रंग के कोमल | विविध ग्रामताकार, वगघदकोण कक््यारियाँ सुप्मित, वतुल, भ्रण्डाकृति नव रुचि से कटी छठी, दुर्वावबृत, चिधित से उपबन में शत रगो में श्ातप छाया, सुरभि श्वसित मारुत, पुलक्ति युसुमो की कम्पित काया ! नव वसत वी खस्री शोभा का दपण सा यह उपवबन, सोच रहा हूँ, वया विवर्ण जन जग से लगता दोमन ) इस मभठमली पृथ्वी ने सतरगी रवि किरणों से खीच लिये क्सि माया बल से सब रंग भामरणोन्स ? युग युग से वित सूक्ष्म बीज कोपो स विकसित होकर राशि राशि ये रूप रंग मू पर हो रहे निछावर ! जीवन ये भर सवे' नहीं मण्मय तन में घरती के, सुदरता वे! सब प्रयोग खग रहे प्रहृत्ति वे पीजी
१६२ /पत प्रयादसी
जग विकास ज्षम में सुदरता कब की हुई पराजित, तितली पक्षी, पुष्प वग इसके प्रमाण हैं जीवित ! हृदय नहीं इस सुदरता के, भावोमेष ने मन में अगो का उल्लास न चिर रहता, कुम्हलाता क्षण में !
हुआ सष्टि में बुद्ध हृदय जीवों का तभी पदापण, जड सुदरता को निसय कर सका न भात्म समपण * मानव उर में भर ममत्व जीवो के जीवन के प्रति चिर विकस प्रिय प्रकृति देखती तब से मानव परिणति
झाज मानवी सस्कृतिया हैं वम चयन से पीडित, पुष्प पक्षियो - सी वे भपने ही विकास में सीमित | इस विशाल जन जीवन के जग से हो जाति विभाजित व्यापक मनुष्यत्व से वे सब ग्राज हो रही वचित हृदय हीन, भ्रस्तित्व मुग्ध ये वर्गों के जन निश्चित, वेश वसन मूषित बहु पुष्प वनस््पतियो-से शीभित हुआ कभी सौ'दय कला युग ब्रत श्रकृति जीवन में,
मानव जग से जाने को वह ग्रब ग्रुग परिवत्न में
हृदय, प्रेम के पूण हुदय से निखिल प्रकृति जग शासित, जीव प्रेम के सम्मुख रे जीवन सौदय पराजित ! नव वसत की वंग कला का दशन गृह यह उपबन, सोच रहा हूँ विश्वी जन जग से लगता क्या शोभन *
(फरवरी /४०)
स्वीट पी के प्रति
छुल वधुभो सी झयि सलज्ज, सुवुमार शयन कक्ष, दशन गृह की श्गार ! उपवन के यत्नो स॒ पावित, पुष्प पात्र में शोभित रक्षित, कुम्हलाती जाती हो तुम निज शोभा ही के भार! कुल वधुओ सी भयि सलज्ज सुकुमार | सुभग _ रेशमी वसन तुम्हारे सुरंग, सुरुचिमय,-- झपलक रहते लीचन ! फूट फूट भगो स॑ सारे सौरभ प्रतिशय पुलकित कर देती मन! उनते व्म वल पर निमर, तुम ससस््क्ृत हो सहज सुघर, प्रौ निश्चय वानस्पत्य घयन मे दोनो निविगेष हो सुदर। निबल धिराष्रो में, मदु तन में
श्राम्या | १६३ हि
बहुती-युग युग से जीवन के सूक्ष्म रुधिर की धार ! कुल वधुम्रो सी भ्रथि सलज्ज, सुकुमार !
मुदुल॒ मलय के स्नेह स्पष्ष से होता हने. में कम्पन, 77 जीवन के ऐडवय हप से करता उर नित नतन-- क्रेवल हास विलास मभयी तुम शोभा ही में. शीभन, प्रणण कुज में साँक प्रात करती हो योपन इूजन ! जग से घचिर भज्ञात, बंधे निकुज गह द्वार! कुल वधुधो सी भ्रथि सलज्ज सुकुमार ! हाय, न क्या आदोलित होता हृदय तुम्हारा सुन जगती का क्रदन?े लुधित व्यधित मानव रोता जीवन पथ. हारा सह दुसह उत्पीडन ! छोड. स्वण पिंजर न निकल प्राप्रोगी बाहर खोल वक्ष अवगुण्ठन ! युग - युग से दुख कातर द्वार खडे नारी नर देते तुम्हें निमत्रण। जग प्रागण मे कया न करोगी तुम जन हिंत भ्रभिसार * कुल वधुप्रो सी भ्रथि सलज्ञ, सुकुमार ! क्या न विछापझोगी जन पथ पर स्नेह _ सुरभि मय पलक. पलंडियो के दल ! स्निग्घध दृष्टि से जन मन हर आ्रचल से ढेंक दोगी न झुल चय ? जजर मानव पदतल बया न करोगी जन स्वागत सस्मित मुख से ? होने को +प्राज युगान््तर ? शोषित दछ्षित हो रहे जाग्रत,
सुख समुच्चवच्ित क्या नही तुम्हारा श्रन्तर २ बषा ने, विजय से फूल बनोगी सुम जन उर का हार ? कुल वधुप्रो सी भ्रथि सलज्ज सुनुमार !
१६४ | पत प्रधावलो
हाय, नही करुणा समता है मन मे वही तुम्हारे ! बुलात
डा गाते युग युग से जन हारे! ऊँची डाली से तुम द्ण भर नही उतर सकती जन भू पर | फूली रहती मूली रहती शोभा ही के मारे! कैेदल हांस हुलास मयी तुम | केवल मनोविलास मयी तुम ! विभव भोग उल्लन्रात्त मयी तुम ! तुमको प्रपनाने के सारे व्यथ प्रयत्त हमारे ! वधिय तुम निष्ठुरा,---जना वी विफ्ल सवल मनुहार | बुल थधुप्रा सी प्रथि सलज्ज सुहुमार ! (फरवरी ४०)
कला के प्रति
तुम भाव प्रवण हो | जीवन प्रिय हो, सहनशील, सहृदय हो, कोमल मन हो ! ग्राम तुम्हारा बांस रूढियो का गढ है चघिर जजर, उच्च वश मर्यादा वेवबल स्वण - रत्नप्रभ विजर | जोीण परिध्पितियाँ ये तुममें श्राज हो रही बिम्बित, सीमित होती जाती हो तुम, भ्रपने ही भें प्रवत्तित ! तुम्हें तुम्हारा मधुर शील कर रहा शभजान पराजित, वृद्ध हो रही हो तुम प्रतिदिन, नहीं हो रही विकसित । नारी की सुदरता पर मैं हांता नहीं विमोहित, शोभा या ऐश्वय मुर्के करता प्रवश्यः झानाीदत विद स्त्रीत्व का ही मैं मन में करता हूँ नित पूजन, जब पभाभा दही नारी भाह्लाद प्रेम बर वषण मधुर मानवी की महिमा से भू को करती पावन !
तुममें सब ग्रुण हैं तोड़ो अपने भय कहिपत बंधन जड समाज के कदम स॑ उठकर सरोज सी ऊपर अपने स्झतर के विकास से जीवन के दल दो भर! सत्य नहीं बाहर नारी का सत्य तुम्हारे भीतर, भीतर ही से करो निर्वात्रृत जीवन को, छोडों डर!
(दिसम्बर “३६
ग्राम्पा / १६
सनी
ग्दि स्थग पही है पच्दी पर, तो बह मारो उर मे भीतर, दव पर दस गो दृदय मे स्वर जब बिठताती प्रमाग द्वारर बह प्रमर प्रणय ये शादस पर ! मादवता जग में ही पध्रगर, वह नारी प्रपरों म॑ सुसबर, क्षण मर प्राणी थी पीड़ा हर नंद जीवर या दे सकती वर यह भधरों पर घर मदिराधर | गदि बही नरप है इस भू पर, तो वह भी नारी के प्रदर, वासनावत म॑ डास प्रस॒र बहू प्राथ गत में घिर दुस््तर नर गा दमेल सक्ती सत्यर (जनवरी /४०)
आधुनिफा
पशुपो से मृदु चरम, परक्षियों सेल प्रिय रोमिल पर, ऋतु पुसुमो स सुरंग सुझुथिमय चित्र बस्तर से सु दर, सुभग रूज, लिपस्टिक, ग्रोस्टिक, पोडर से पर मुख रजित, प्रगराग, ग्यूटेक्स झलकतव सबने नस लिख शोमित, 'सागर तल स ले मुकताफ्ल, सानो से मणि उज्ज्वल-- रजत स्वण में भवित तुम फ्रिती प्रप्सरि-ली चचल शिक्षित तुम सस्हृत युग के सत्याभासों में पोषित, समवक्षिणी नरो मी तुम, निज द्वद्व मूल्य पर गवित, नारी को सौदय मधुरिमा झौो महिमा से मण्डित, तुम नारी उर की विभूति स, दृदय सत्य से बचित ! दम, दया, राहुदयता, दधील, क्षमा, पर दुख बातरता, तुममे तप, सयम, सहिष्णुता नहीं त्याग तत्परता ! लहरी-सी तुम चपल लालसा इ्वास वायु से नतित, तितली सी तुम फूल फूल पर मेंडराती मधुलण हित ! मार्जारी तुम, नही प्रेम को करती प्रात्म समपण, तुम्हें सुहाता रंग प्रणय, घन पद मद प्रात्म प्रदशन ! तुम सब बुछ हो, फूल, लहर, तितली, विहृगी, मार्जारी, ध प्राघुनिके, तुम नहीं झगर कुछ नहीं मिफ तुम नाए ॥ (फरवरी '४०)
मजदूरनी के प्रति
नारी वो सज्ञा भुला, नरो के सग बेठ, चिर जाम सुहद सी जन हृदयो में सहज पठ,
१६६ [ पत प्रयावली
जी बेटा रही तुम जग जीवत का काम काज तुम प्रिय हो मुझे न छूती तुमको काम लाज !
सर से आचल खिसवका है,--धूल भरा जूडा,-- अधखुला वक्ष,--ढोती तुम सिर पर घर बूडा, हँसती बतलाती सहोदरा सी जन जन से, यौवन का स्वास्थ्य भलकता प्रातप-सा तन से
कुल वघू सुलभ सरक्षण से तुम हो वचित, निज बंधन खो, तुमने स्वतत्रता की अजित | स्त्री नही, श्राज मानवी बन गयी तुम निश्चित, जिसके प्रिय अगो को छू झनिलातप पुलकित
निज द्वद्व प्रतिष्ठा भूल जनो के बेठ साथ, जो बेंटा रही तुम काम काज मे मधुर हाथ, तुमने निज तन की तुच्छ कचुकी को उतार जग के हित खोल दिये नारी वे हृदय द्वार
(फरवरी ”४०)
नारी
हाय, मानवी रही न नारी लज्जा से अवगुण्ठित,
बह नर की लालस प्रतिमा, शोभा सज्जा से निरमित !
युग-युग की वा दनी, देह वी कारा मे निज सीमित,
वह प्रदश्य प्रस्पइय विश्व से, गृह पशु सी ही जीवित सदाचार की सीमा उसके तन से है निर्धारित, पूत्त योनि वह मूल्य चम पर केवल उसका अ्रक्ति, अ्रग ग्रग उसका नर के वासना चिह्न से मुद्रित, वह नर की छाया, इगित सचालित, चिर पद लुण्ठित !
बह समाज की नही इकाई,--शूय समान झनिश्चित, उसका जीवन मान, मान पर नर के है अ्वलम्बित ! मुक्त हृदय वह स्नेह प्रणय कर सकती नही प्रदर्शित, दृष्टि, स्पश सज्ञा से वह हो जाती सहज कलकित
योनि नहीं है रे नारी, वह भी मानवी प्रतिष्ठित, उसे पूण स्वाधीन करो, वह रहे न नर पर अवसित ! दर्द क्षुध्रतर मानव समाज पद्यु जम से भी है गहित, नर नारी के सहज स्नेह से सूक्ष्म वत्ति हो विकसित ! आज मनुज जग से मिट जाये कुत्सित, लिय विभाजित नारी नर की निखिल छुद्गता, ग्रादिम मानो पर स्थित ! सामूहिक-जन भाव स्वास्थ्य से जीवन हो मर्यादित नर नारी की हृदय मुक्ति से मानवता हो सस्छृत ! (दिसम्बर “३६)
प्राम्या | १६७
इन्द्र प्रणय ८८
घधिक रे भनुपष्य, तुम स्वच्छ, स्वस्थ, निश्चल चुम्बन प्रकित कर सकते नही प्रिया वे प्रघरों पर? मन मे लज्जित, जन से शक्ति, चुपके गोपन तुम प्रेम प्रकट बरते हो नारी से, कायर।!
क्या गुह्य, क्षुद्र ही बना रहेगा, बुद्धिमान !
नर नारी का स्वाभाविक, स्वग्रिक प्रॉक्यण ?
क्या मिल न सकेंगे प्राणो से प्रेमात प्राण
ज्यों मिलते सुरभि समीर, वुसुम भ्रलि, लहर किरण ? क्या क्षघा तपा प्री स्वप्न जागरणसा सुदर है नहीं काम भी नेसगिक जीवन द्योतक ? यन जाता श्रमत न देह-गरल छू प्रेम भ्रघर ? उज्ज्वल करता न प्रणय सुबण, तन का पावक ?
पद्चु पक्षी से फिर सीखों प्रणय कला, मानव
जो भश्रादि जीव जीवन ससस््कारो से प्रेरित,
खग युग्म गान गा करत मधुर प्रणय प्रनुभव,
मूंग मिथुन आड्भ से भ्रगो को कर मु मरद्ित मत कहो मास की दुबलता, हे जीव प्रवर है पुष्य तीथ नर॒तारी जन का हृदम मिलन, श्रार्ना दत्त हीभ्रो, गवित, यह जीवन का बर,
गौरव दा द्वाद्द प्रणय को, पृथ्वी हा प्रावन
(दिसम्बर ३६)
१६४०
समर भूमि पर मानव शाणित से रजित निर्भीक चरण धर प्रभिना दत हा दिग घोषित तोपा के ग़जन से प्रलयकर, घुभागमन नव व्ष कर रहा, हालाडोला पर चढ़ दुधर, बहूद विमानों के पखो से बरसाकर विप वह्लि निरन्तर ! इधर झडा साम्राज्यवाद, शत शत विनाश के ले प्रायोजन, उधर प्रतिक्रिया रुद्ध शक्तियाँ क्रुद्ध दे रही युद्ध निमत्रण! सत्य “याय वे बाने पहने सत्व लुब्ध लड रहे राष्ट्रगण, सिधु तरगा पर उठ गिर क्रय विक्रय स्पर्धा करती नतन धूघू करती वाप्प शकित, विद्युत ध्वनि करती दीण दिगतर घब्वसः अर करते विस्फोटक धनिबर सम्यता वे गढ़ जजर तुमुल वर्ग सर्प म॑ निहित जनगण का भविध्य लोकोत्तर, इद्रचाप पुलसा नव वत्सर झोभित प्रलय प्रम मेघा परी प्राप्नो है दुघघ वष ! लाग्नो विनाश के साथ नव सूजन,
विद्या झताब्टी का महान विज्ञान भान ले, उत्तर यौवन! (जनवरी ४०)
१६८ / पत प्रधावलो
सूत्रधार
तुम घाय, वस्त्र व्यवसाय कला के सूत्रधार, बबर जन के तन स हर वल्वल चम भार, तुमने झादिम मानव वी हर नव द्वाद लाज, बन शीत ताप हिंत कवच, बचाया जन समाज ! तकली, चरखे, वरघे से अब झाधुनिक यत्र तुम॑ बने यत्र बल पर ही मानव लोक तात्र स्थापित करते को श्रव मानवता का विकास यजत्रो के सम हुप्रा, सिखलाता नइतिहास !
जड नही यंत्र वे भाव रूप सस्हृति द्योतक ये विश्व शिराएँ, निस्तिल सभ्यता के पोषक ! रेडियो, तार भ्रौ/ फोन,--वाप्प, जल वायु यान, मिट गया दिशावधि का जिनसे व्यवधान मान, -- घावित जिनमें दिशि दिशि का मन,--वार्ता, विचार,
सस्कृति, संगीत गगन में भाइत निराकार।
जीवन सौदय प्रतीक यात्र जन के शिक्षक, युग क्राति प्रवत्तक प्रो भावी के पथ दशक ! वे कृत्रिम, निभित नहीं, जगत क्रम में विक्रसित, मानव भी यत्र, विविध युग स्थितियों में चधित । दाशनिक सत्य यह नहीं-यत्र जंड, मानवढृत, वे हैं प्रमूत जीवन विकास की कृति निश्चित |
(फरवरी ४०)
सस्कृति फा प्रइन
राजनीति का प्रश्न नही रे प्राज जगत के सम्मुख, भथ साम्य भी मिटा न सकता मानव जीवन के दुख ! व्यय सकल इतिहासो, विज्ञानों का सागर मंथन वहाँ नही युग लक्ष्मी, जीवन सुधा, इद् जब मोहन । ग्राज बहुत सास्कृतिक समस्या जग के निकट उपस्थित, खण्ड मनुजता को युग युग की होना है नव निर्मित, विविध जाति, वर्मों, धर्मों को होना सहज समावित, मध्य युगो की नेतिक्ता को मानवता में विकसित | जग जीवन के ग़तमुख नियमों म स्वय प्रवर्तित, मानव का श्रवचेतन मन हो गया श्राज परिवर्तित ! बाह्य चेतनाओों मे उसके क्षोभ क्रागत उत्पीडन, विगत सम्यता दत शूय फणि-सी करती युग नतन ! व्यथ ग्राज राष्टो का विग्रह और तोपो का भजन, रोक न सकते जीवन की गति शत विनाश आयोजन, नव प्रकाश में तमस युगो का होगा स्वय निमज्जित प्रतिक्रियाएँ विगत गरुणी की होगी झरने पराजित |
(जनवरी ४०)
ग्राम्या / १६६
सास्कृतिक हुदय
कृषि युग से वाहित मानव वा सस्ट्रेतिक हृदय जो गत सम्ताज फी रीति नोतियो का समुदय, भ्राचार विचारों म जो बहू देता परिचय, उपजाता मन में सुख दुल, झाशा, भय, संशय, जो भले बुरे का ज्ञान हम देता निश्चित सामात जगत में हुप्रा मनुज के बह निमित! उन युग स्थितियों का श्राज दृश्य पट परिवर्तित, प्रस्तर युग वी सम्यता हो रही श्रव प्रव्तित जो प्रतर जग था बाह्य जगत पर पअ्रवतम्बित वह बदल रहा मुगपत यृग स्थितियों से प्रेरित जहु जाति घम श्रौ'नीति कसम में पा विकास गत संगुण प्राज लग होने को झ्रौ/ नव प्रकाश नव स्थितियों के सजन से हो प्रव शर्न उदय बने रहो मनुज थी नव अ्रात्मा, सास्कृतिक हृदय (फरवरी /४०)
भारत प्राम
सारा भारत है प्राज एक रे महा ग्राम हैं मात लित्र प्राभा के, उसके प्रधित उपर ग्रामीण हृदय में उमके शिक्षित सस्कृत नर, जीवन पर जिनका दष्टिकोण प्राकृत, बबर
वे सामाजिक जन नहीं, व्यक्षित हैं प्रहकाम | है वही क्षुद्र चेतना, व्यक्तिगत शग द्वेष, खघु स्वाथ झोर अधिकार सत्द त्ष्णा प्शेष, भ्रादश, प्रधविश्वस वही,--हा सम्यवेश,
सचालित करते जीवन जन का छ्षुधा काम! वे परम्परा प्रेमी, परिवतन से विभीत, ईश्वर परोक्ष से ग्रस्त भाग्य के दास कीत, बुत जरति हीतनि प्रिय यह, नही मनुजत्व प्रीत,
भव प्रगति माग में उनके पूण धरा विराम ! लौक्कि से नहीं भलोकिक स है उहे भ्रीति, दे पाप पुण्य सत्रस्त, कम गति पर भ्रतीति, उपचेंतन मन से पीडित, जीवय उहे ईति,
है स्वग मुक्ति कामना, मंप्य से सही काम ! आदिम मानव करता अब भी जत में निवास सामूहिक सभा वा जिसकी से हुआ विकास, जन जीवी जत दारिद्रध दुख के बने ग्रास,
परवशा यहाँ की चम सती ललना लताम!
१७० पल वयावली
जन द्विपद कर सके देश काल मो नहीं विजित, वे वाप्प वायु यानो से हुए नही विकसित, वे बग जीव, जिनसे जीवन साधन प्रधिदृत, लालायित वरते उहें वही घन, धरणि धाम! ललकार रहा जग को भौतिक विज्ञान प्राज मानव को निर्मित करना होगा नव समाज, विद्युत भौ” वाप्प करेंगे जन निर्माण काज, सामूहिक मगल हो समान समदष्टि राम | (दिसम्बर ३६)
स्वप्न श्ौर सत्य
ग्राज भी सुदरता ने स्वप्न हृदय में भरते मधु गुर्जार, बंग कवियों ने जिनको गूथ रचा भू स्वग, स्वण ससार |
ध्राज भी प्रादर्शों के सोध मुग्ध करते जन-मन शभ्रनजान, देश देशां के कालिदास गा चुके जिनके गोरव गान
मुहम्मद, ईसा, मूसा, बुद्ध केद्र सस्कृतिया के, श्री राम, हृदय मे श्रद्धा, सम्भ्रम, भक्ति जगाते विकसित व्यक्ति ललाम | घम, बहु. दशन नीति, चरित्र सक्षम चिर का गाते इतिहास, व्यवस्थाएँ, सस्थाएं, तंत्र बाँघते मन बन स्वणिम पाश प्राज रे, जग जीवन का चक्र दिशा गति बदल चुका अनिवार, सिधु मे जन युग के उद्दाम उठ रहा नव्य शक्ति का ज्वार | प्राज मानव जीवन का सत्य घर रहा नये रूप भ्राकार, भाज युग का गुण है---जन रूप रूप जन सस्कृति के झ्राधार । स्थूल, जन गआ्रादर्शों की सुष्ठि कर रही नव सस्क्ृति विर्माण, स्घूल-युग का शिव, सु दर, सत्य स्थूल ही सूक्ष्म भाज, जन प्राण | (दिसम्बर ”३६)
बापु।
चरमोनत जग मे जब कि झाज विनान ज्ञान,
भ्रहु भौतिषय साधन यत्र यान, वैभव महान,
सेवक हैं विद्युत वाप्प शक्ति घन बल निता-त,
फिर क्यो जग मे उत्पीडन ? जीवन यो श्रश्ञान्त ? मानव ने पायी देश काल पर जय निरचय, मानव के पास नही मानव का झाज हृदय! चवित उसका विज्ञान ज्ञान वह नहीं पचित भौतिक मद से मानव आत्मा हो गयी विजित |
है श्लाघ्य मनुज का भौतिक सचय का प्रयास,
मानवी भावना का क्या पर उसमे विकास?
प्राम्या / १७१
चाहिए विश्व को आजे भाव का नंवोमेंध, ” मावव उर में फिर मानवता का हो प्रवेश | बापू | तुम पर हैं आज लगे जय के लाचन, तुम खोल नहीं जाओगे मानव के बघन ? (दिसम्बर ३६)
अहिसा
बाघन वन रही अहिता श्राज जनां के हित,
वह मनुजोचित निश्चित, कब ? जब जन हो विकसित !
भावात्मक आज नहीं वह, वह श्रभाव बाचक
उसका भावात्मक रूप प्रेम केवल साथव ! हिंसा विनाश यदि, नहीं अहिंसा मात्र सूजन, वह लक्ष्य यूप झब भर न सकी जन में जीवन, निष्चिय उपचेतन ग्रस्त एक देक्षीय परक, सास्ट्रतिक प्रमति से रहित भाज जन हित दुगम |
हैं. सजन विनाश सूप्टि के भावश्यक साधन
यह प्राणि घास्त्र का सत्य नहीं, जीवन दहन !
इस द्वद्द जगत में द्वाद्यतीत विहिंत सगति,
है जीव जीव का जीवन,--राक' न सका प्रगति | भव तत्व प्रेम साधन हैं उभय विनाश सूजन, साधन बन सकते नहीं सूध्टि गति में बंधन !
(फरवरी /४०) पतभर फरा, भरो, भरो! जगम जन प्रायण में, जीवन सघपण मे
नव युग परिवतन मम सन के पीले पत्ती | मरो, झरो, झरो। |
सतू सन् शिक्षिर संमीरण देता क्रीति निमज्रण यही जीवन स्फ्यर ति क्षण ++ जीप. जगत हे पत्तों टरो, टरो, ट्रो | केंपक्र, उडबर, गिरकर, दबकर, . पिसक्र, चर मर, मिटदी से मिल. निमर अमर बीज के पत्तो! मरो, मरो, मरो'ं
१३२ / पत प्रंधादसी
तुम पतकर, तुम मधु--जय !
पीले दल, नव विसलय,
तुम्ही , सुजन, वधन, लय,
आावागमनी पत्तों | सरो, सरो, सरो।!
जाने से लगता भय?
जग में रहना सुखमय ?
फिर आझोगे निश्चय ।
निज चिरत्व से पत्तो | डरो, डरो, डरो!
जम मरण से होकर, जाम मरण को खोकर, स्वप्नो मे जग सोकर, मधु पतकर के पत्तों! तरो, तरो, तरो ! (फरवरी /४०)
उदबोधन
खोलो. वासना के वसन, नारी नर! वाणी के बहु रूप, बहु वेश, बहु विभूषण खोलो सब, बोलो सब एक वाणी,--एक प्राण, एक सर्वर! वाणी केवल भावा--विचारो की वाहन, खोलो भेद भावना के मनोवसन नारी नर! खोलो जीण विश्वासों, सस्कारो के शीण वसन, रूढियो रीतियो, अभ्राचारो के भ्रवगुण्ठन, छिन ब्रो पुराचीन सस्क्ृतियों के जड बघन,-- जाति वण, श्रेणि वग से विमुक्त जन नूतन विश्व सभ्यता का शिलायाोस करें भव शोभन, देश राष्ट्र मुक्त धरणि पुण्य तीथ हो पावन मोह पुरातन का वासना है, वासना दुस्तर, खोलो सनातनता वे शुष्क वसन नारी नर! समरागण वना झाज मानव उपचेतन मन, नाच रहे युग युग के प्रेत जहा छाया तन, धम वहाँ, कम वहाँ, नीति रीति, रूढि चलन, तक वाद, सत्य याय श्ञास्त्र वहाँ पड दशन, खण्ड - खण्ड में विभकक्त विश्व चेतना प्रागण,
ग्राम्या | १७३
भित्तिया खडी हैं वहां देश काल की दुधर ! घ्वस करो, अ्रश करो, खंडहर हैं ये खडहर, खोलो विगत सम्यता के छ्ुद्र बसन सारी नर!
नव चेतन मनुज श्राज करें घरणि पर विचरण, मुवत गगन भें समूह शोभव ज्यों त्तारगण, प्राणो प्राणों में रहे ध्वनित प्रेम का स्पदन, जन से जन मे रे बहे, मन से भनर में जीवन, भानव हो मानव--हो मानव में मानवपन श्रन वस्त्र से प्रसन््त, शिक्षित हो सव जन, सुदर हो बेश, सबके निवास हो सुदर, खोलो परम्परा के कुहूप वसन, नारी मर
(दिपम्बर /४०)
नव इन्द्रिय नव जीवन की ईद्रय दो हे, मानव को, नव जीवन की नव इद्रिय, नव मानवता का श्रनुभव कर सके मनुज नव चेतनता से सक्रिय स्वग. खण्ड इस पुण्य मूमि पर प्रेत गरुगो के करते ताण्डव, भव सानव का मिलन तीय बन रहा रक्ते चण्डी का रौरख।! अनिर्वाष्य साम्राज्य लालसा अगणित नर भाहुति देती नव, जाति वग प्री! देश राष्ट्र में आज छिडा प्रलयकर विप्लव ॥ नव युग की नव भात्मा दो पशु मातव को, नंद जीवन की नव इीद्रय, नव सानवता व साम्राज्य बनें भू पर गे दस दिशि के जतगण को प्रिय (दिसम्बर /२६)
कवि किसान
जोती है फवि, निज प्रतिभा के फल से निष्दुर मानव पध्तर चिर जीण विगत की खाद डाल, जन भूमि. वनाधो सम सुददर ! बोघी, फ्रि जन -मन में बोधो तुम ज्योति पते नव बीज प्रमर,
१७४ | पंह प्र घावली
जग जीवन पझकुर हँस हस मूं को हरोतिमा से दें भर। पथ्वी से खोद निकालो, कवि, मिथ्या विश्वासों के तृण खर, सीचो पमृतोपम वाणी घारा से मन, भव हो उ्र। नव मानवता का स्वण शस्य- सौदय लुनाभो. जन सुखकर, तुम जग गृहिणी, जीवन किसान जन हित भण्डार भरो निभर ! (जनवरी '४०)
बारी ! तुम वहन कर सको जन मात्र मे भेरे विचार, वाणी मेरी, चाहिए तुम्हे क्या झलकार! भव कम झाज युग की स्थितियों से है पीडित, जग का रूपान्तर भी जनेक्य पर अवलम्बित, तुम रूप कम से मुक्त, शब्द के पख मार, कर सको सुदूर मनोनभ मे जन के विहार, वाणी मेरी, चाहिए तुम्हे क्या झलकार ! चित् शरूय,--भाज जग नव निनाद से हो गुजित, मन जड ---उसमे नव स्थितियो के ग्रुण हो जागृत, तुम जड चेतन की सीमाझो के झार पार भकृत भविष्य का सत्य कर सको स्वराकार, वाणी मेरी, चाहिए तुम्हे क्या भलकार ! युग कम शब्द, युग रूप शब्द, युग सत्य शब्द, दशब्दित कर भावी के सहत्न छत मूक दाब्द, ज्योतित कर जन मन के जीवन का प्रधकार, तुम खोल संको मानव उर से निदशदब्द द्वार, वाणी मेरी, चाहिए तुम्हे क्या भलकार।! (फरवरी ४०)
नक्षत्र
[भ्रपनो कॉठेज के प्रति] मेरे निकुज, नक्षत्र वास ! इस छाया ममर के वन में तू स्वप्न नीड सा निजन में है बना प्राण पिक वा विलास लहूरी पर दीपित ग्रह समान इस भू उभार पर भासमान,
प्राम्या | १७४५
तू बना मूव चेतनावान पा मेरे सुख दुख, भाव ञछवास
श्राती जग की छवि स्वण आात, स्वप्नो की नभ सी रजत रात, भरती दश दिशि की चारवात तुकमे बन -वन की सुरभि साँस !
कितनी आशाएँ मनोल्लास, सवल्प महंत उच्चाभिलाप, तुममे प्रतिक्षण करते निवास,-- है मौत श्रेय साधन प्रयात्त | तू मुझे छिपाये रह भ्रजात निज स्वण मम मे खंग समान 7 हांगा प्र जंग का कण्ठ गान तेरे इन शआ्राणों का अ्रकाश | मेरे तिकुज, नक्षत्र वास! (१६३२)
आँगन से
रोमाचित हो उठे झ्राज नव वर्षा के स्पर्शों से
छोटे से प्रौगन मेर, तुम रीते ये वर्षों से
नव दूर्वा के हरे अरोहो से भ्रव भरे मनोहर
मरकक्ते के टुकड़े से लगते तुम विजडित भू उर पर ! जन निवास से दूर, नीड में वन तरुप्रां के छिपकर मू उरोज-से उभरे इस एकल मोन भौोदे पर कोमल शाइल अचल पर लेटा मैं स्मित, चिन्तन पर, जीवन की हेसमुख हरीतिमा को देखू भाँसें भर
एक ओर गहुरी खाई में सोया तस्भो का तम
केका रवस चकित, बखेर सुख स्वप्तों का सम्भ्रम
और दूसरी शोर मजरित आम विपिन कर मुखरित
मधु में पिक, पावस में पी-खग करे हृदय को हित ' हरित भरित वन नौम उच्छव्तित शाखामों वा विद्धल बक्षमार, हाँ, रहे कुकाये मेरे ऊपर कोमल!
(अगस्त ३६)
याद
विदा हो गयी साँस, विनत मुख पर भीना भाँचल धर, मेरे एकाकी भाँगन मे मौन भछुर स्मतिया भरा बहु केसरी दुकल भ्रभी भी फहय रहा ल्ितिन पर नब असाढ वे मैधो से घिर रहा बराबर अम्बर
१७६ | पत्त ग्रषाव्ी
मैं बरामदे में लेटा, धाय्या पर, पीडित प्रवयव, मेने का साथी बना बादलां वा विषाद है नीरव सक्रिय यह सवरुण विषाद,--मेघों से उमड़ उमडकर भावी थे बहू स्वप्न, भाव बहु व्यधित कर रहे प्रतर ! मुखर विरह दादुर पुवारता उत्वण्ठित भेवी को, बहमार से मोर लुभाता मेघ-मुग्ध वेकी वो, मालोकित हो उठता सुस्त से मेघो का नभ चचल, प्रतरतम में एवं मघुर स्मृति जय जग उठती प्रतिपल ! बम्पित बरता वक्ष घरा वा घन गभीर गजन स्वर, भू पर ही झा ग्रया उतर धत धारामों में प्रम्बर भीनी भीनी भाष सहज ही साँसो में घुलमिल कर एक झौर भी मधुर गधघ से हृदय दे रही है भर! नव भसाढ की संध्या मं, मेधो के तम में कोमल, पीडित एकावी दाय्या पर, शत भावों में विहक्ूल, एक मधुरतम स्मृति पल भर विद्युत-सी जलकर उज्ज्वल याद दिलाती मुझे हृदय मे रहती जो तुम निएचल | (जुलाई ३६)
गुलदावदी
शस्पां ग्रस्त रहा में दो दिन, फूलदान में हँसमुख चंद्र मल्लिका के फूलो वो रहा देखता सम्मुज | गुलदावदी वहूँ,--बोमलता की सीमा ये कोमल ! शशव समिति इनमे जीवन की भरी स्वच्छ, सद्योज्वल | पुज पुज उल्लास, लीन लावण्य राशि में भपने, भदु पखडियों के पलको पर देख रहा हो सपने! उज्ज्वल सूरज का प्रकाश, ज्योत्स्ना भी उज्ज्वल, शीतल, उज्ज्वल सौरभ प्ननिल, भर उज्ज्वल निमल सरसी जल, इन फूलो वी उज्ज्वलता छू लेती प्रतर के स्तर, मधुर भवयवो मे बंध वह् ज्यो हां भ्रा गयी निक्टतर ! मदुल दलो के श्रगजाल से फूट त्वचा कोमल सुख सहृदय मानवीय स्पजोँ से हर लेता मन का दुख ! तण-तण मे भौ” निखिल प्रकृति मे जीवन की है क्षमता, पर मानव का हृदय लुभाती मानव करुणा ममता ! (दिसम्बर ३६)
विनय विनान ज्ञान बहु सुलभ, सुलभ बहु नीति घम सकलप कर सके जन, इच्छा पझ्नुरूष कम उपचेतन सन पर विजय पा सके चेतन मन, मानव को दो यह झावित पूण जय के कारण!
ग्राम्या | १७७
मनुजो की लघु चेतना भिटे, सु प्रहकार, नव युग के गुण से विगत ग्रुणो का भाषकार ! हो शान्त जाति विद्वेष, वर्म गत रत समर, हा झात युगी के प्रेत, मुवत मानव घतर!
सस्टत हो सब जन, स्नेहीं हो, सहृदम, सुदर, संयुक्त वमें पर हो सयुकतर क्षिव तिमरा राष्ट्रों से राष्ट्र मिलें, देशो से देश प्राज, मानव से मानव,--हो जीवन निर्माण काज |
हो धरणि जनो की, जयत् स्वयं,--णीवन का घर, सेव सानव को दो, प्रमु। भव-मानवता कावर! (फ़रवरी /४०)
१७८ | पत प्र थावलों
स्वर्ण किरण
[प्रधम प्रकाशन-वषे १६४७]
स्वर्गीय डॉक्टर एन सी जोशी को
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अपनी दीघ प्रस्वस्थता के बाद स्नेही प्राठको को 'ह्वण किरण! से झभिनदन करने में मुझे हप हो रहा है। उनके वातायनों मे यदि 'स्वण किरण! प्रवेश पा सकी तो मैं झ्पना श्रम सफल समभूणा !
सुमित्रानदन पत्त
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हितोय सस्कररण इस संस्करण मे मैंने स्वर्ण किरण” की अनेक रचनाप्रो में इधर उधर छोटे मोटे परिवतन कर दिये हैँ, भाशा है वि वे पाठकों को रुचिकर प्रतीत होगे । १८/७ बी स्टेनले रोड इलाहाबाद सुभित्रानरन पत मार्च १६५६
फूलो से उड़ फूल, रेगो से
निसर सूक्ष्म रेंग उर मे! भीतर युनते स्वप्म मधुर सम्मोहन,
स्वण शघिर से प्रतर थर् थर् ! स्पीदत भ्राज हृदय पण बण भे,
भाषा बनी द्वर्मो बी ममंर, लहरें उर पर देती भ्राँचल,
वमल मुझ्ों स जीवित-से सर | प्रणय दृष्टि दी मुग्ध दुगा को,
प्राणों में संगीत दिया भर, स्वण कामना का नव घूषट
डाल घरा वे मुख पर सुदर !